Sukta 2.32
अहेळता मनसा श्रुष्टिमा वह दुहानां धेनुं पिप्युषीमसश्चतम् । पद्याभिराशुं वचसा च वाजिनं त्वां हिनोमि पुरुहूत विश्वहा ॥
áheḷatā mánasā śruṣṭím ā́ vaha dúhānāṃ dhénuṃ pipyúṣīm asaścatám | pádyābhir āśúṃ vácasā ca vājínaṃ tvā́ṃ hinomi puru-hūta viśváhā ||
बिना किसी बुराई के दिल से तुम यह सुनो और मानो। जैसे गाय दूध देती है और कभी रुकती नहीं, वैसे ही तुम्हारी सुन्नई मान ने में आए। मैं तेज़ कदम चल के और बोल के तुम्हे बुलाता हूँ। तुम बहुत लोगों की सुनते हो, हर वक्त हमारे अंदर ताकत बना के रखना।
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