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Sukta 10.93
Dyāvāpṛthivī (Heaven and Earth)
Gāyatrī/Anuṣṭubh not applicable; likely Triṣṭubh/related (needs verification for 10.93.1 specifically)
This hymn invokes Dyāvāpṛthivī—Heaven and Earth—as the vast, motherly Two who uphold the worlds and provide continual protection against overpowering and violent forces. As the sukta unfolds, the prayer widens into a vision of ordered power: the rite becomes “more-than-human,” and the cosmic arrangement of many forces is affirmed as already set in place for the sacrificer’s welfare.
Mantra 1
महि द्यावापृथिवी भूतमुर्वी नारी यह्वी न रोदसी सदं नः । तेभिर्नः पातं सह्यस एभिर्नः पातं शूषणि ॥
आसमान और धरती बड़ी हो गई हैं। दोनों बड़ी हैं, माँ जैसी हैं, ताकतवाली हैं। यह दोनों दुनिया हमेशा हमारे साथ हैं। इनके साथ हमारे रक्षा करो, जो भी बड़ी ताकत से आए। इनके साथ हमारे बचा लो, जो भी हमला करे।
Mantra 2
यज्ञेयज्ञे स मर्त्यो देवान्त्सपर्यति । यः सुम्नैर्दीर्घश्रुत्तम आविवासत्येनान् ॥
हर यज्ञ में वो इंसान भगवान की सेवा करता है, जो उनकी कृपा से सब सुनता है। वो भगवान को बुलाता है और उनका स्वागत करता है। भगवान उसके पास आते हैं।
Mantra 3
विश्वेषामिरज्यवो देवानां वार्महः । विश्वे हि विश्वमहसो विश्वे यज्ञेषु यज्ञियाः ॥
तुम सब देवता हो, चमकने वाले और गरम। तुम सब मिलके भगवान की बड़ी रक्षा करते हो। तुम सब की ताकत पूरी दुनिया में है। तुम सब यज्ञ में बुलाते हो और बुलाते हो।
Mantra 4
ते घा राजानो अमृतस्य मन्द्रा अर्यमा मित्रो वरुणः परिज्मा । कद्रुद्रो नृणां स्तुतो मरुतः पूषणो भगः ॥
यह सब अमृत के राजा हैं, खुश रहने वाले। अर्यमन, मित्र, वरुण, यह सब जगह घूमता है। और रुद्र भी, जो लोगों की तारीफ करते हैं। मरुत, पूषन, भग, यह सब ताकत हैं जो हमेशा जीते हैं।
Mantra 5
उत नो नक्तमपां वृषण्वसू सूर्यामासा सदनाय सधन्या । सचा यत्साद्येषामहिर्बुध्नेषु बुध्न्यः ॥
रात और पानी हमारे पास आएँ। सूरज और चाँद दोनों ताकत देने वाले हैं। यह सब हमारे लिए आस पास बैठें। जब यह सब साथ में आते हैं, तो नीचे छुपा हुआ ताकत जाग उठता है।
Mantra 6
उत नो देवावश्विना शुभस्पती धामभिर्मित्रावरुणा उरुष्यताम् । महः स राय एषतेऽति धन्वेव दुरिता ॥
अश्विनी कुमार भी हमें रखें। वो खुशी के स्वामी हैं। मित्र और वरुण भी अपनी रोशनी से हमें बचाएँ। फिर बड़ी बरकत आती है। मुश्किलें पार हो जाती हैं, जैसे कोई लंबा सूखा रास्ता पार करता है।
Mantra 7
उत नो रुद्रा चिन्मृळतामश्विना विश्वे देवासो रथस्पतिर्भगः । ऋभुर्वाज ऋभुक्षणः परिज्मा विश्ववेदसः ॥
रुद्र भी हम पर दया करें। अश्विनी कुमार और सारे देवता मदद करें। भगवान जो रास्ता दिखाते हैं वो भी साथ दें। रिभु और उसके साथी भी आएँ। वो सब जानते हैं और हमें सही दिशा में ले आएँ।
Mantra 8
ऋभुॠभुक्षा ऋभुर्विधतो मद आ ते हरी जूजुवानस्य वाजिना । दुष्टरं यस्य साम चिदृधग्यज्ञो न मानुषः ॥
रिभु और उसके साथी आते हैं और खुशी लाते हैं। उनके दो घोड़े तैयार हैं जो तेज़ी से दौड़ते हैं। उनकी ताकत को पार करना मुश्किल है। यज्ञ एक अलग लेवल का काम बन जाता है। यह नॉर्मल इंसान का काम नहीं रहता।
Mantra 9
कृधी नो अह्रयो देव सवितः स च स्तुषे मघोनाम् । सहो न इन्द्रो वह्निभिर्न्येषां चर्षणीनां चक्रं रश्मिं न योयुवे ॥
हे सविता देवता, हमें शांत रख। मैं उन लोगों की तारीफ करता हूँ जो देते हैं। इंद्र अपनी आग के साथ आएँ और इन लोगों की ताकत हम में डाल दें। जैसे पहिये का चक्का सीधा चलता है, वैसे ही हमारा काम सही हो।
Mantra 10
ऐषु द्यावापृथिवी धातं महदस्मे वीरेषु विश्वचर्षणि श्रवः । पृक्षं वाजस्य सातये पृक्षं रायोत तुर्वणे ॥
धरती और आसमान, हमारे काम में मदद करो। हमारे वॉरियर्स में इतनी ताकत डाल दो जो सब संभाल सके। जीतने की ताकत दो, पूरा खज़ाना दो, और दुश्मन पर जीत दिलाओ।
Mantra 11
एतं शंसमिन्द्रास्मयुष्ट्वं कूचित्सन्तं सहसावन्नभिष्टये । सदा पाह्यभिष्टये मेदतां वेदता वसो ॥
इंद्र, यह हमारी पूजा है, हम तुम्हे चाहते हैं। अगर यह छोटी लगती है तो भी स्वीकार करो और हमें बचाओ। हमेशा हमारा ख्याल रखना। हमें धन और ज्ञान दोनों दो।
Mantra 12
एतं मे स्तोमं तना न सूर्ये द्युतद्यामानं वावृधन्त नृणाम् । संवननं नाश्व्यं तष्टेवानपच्युतम् ॥
यह स्तोत्र बढ़ रहा है जैसे सूरज चमकता है। लोग इसे और बड़ा बना रहे हैं। यह एक रथ की तरह मज़बूत है, हिलता नहीं है। हम सब मिलके मज़बूत रहें।
Mantra 13
वावर्त येषां राया युक्तैषां हिरण्ययी । नेमधिता न पौंस्या वृथेव विष्टान्ता ॥
जिनके पास धन है, वो सही रास्ते पर चल रहे हैं। उनकी चमक सोना जैसी है। उनकी ताकत आधी नहीं रहती, पूरी काम करती है। कुछ भी व्यर्थ नहीं होता।
Mantra 14
प्र तद्दुःशीमे पृथवाने वेने प्र रामे वोचमसुरे मघवत्सु । ये युक्त्वाय पञ्च शतास्मयु पथा विश्राव्येषाम् ॥
मैं यह बात सबको बोल रहा हूँ, मुश्किल में भी और खुले में भी। जो लोग हमारे साथ जुड़ते हैं, उनके लिए कितने रास्ते बन गए हैं। पाँच सौ रास्ते खुल गए हैं।
Mantra 15
अधीन्न्वत्र सप्ततिं च सप्त च । सद्यो दिदिष्ट तान्वः सद्यो दिदिष्ट पार्थ्यः सद्यो दिदिष्ट मायवः ॥
भगवान ने यहाँ सत्तर और सात चीज़ें रख दी हैं। वो तुरंत तुम्हारे लिए सब ठीक कर देता है। ज़मीन का बेस तुरंत बन जाता है। शक्तियाँ तुरंत काम करने लगती हैं।
They are Heaven and Earth addressed together as the ‘Two Worlds’—vast parental powers that uphold life and provide protection and stability for the worshipper and the sacrifice.
The hymn chiefly asks Heaven and Earth to protect the sacrificer from overpowering pressures and violent attack, and to keep the ritual action firmly supported within cosmic order.
It means that when the rite is rightly harmonized and ‘arranged,’ it becomes larger than personal effort—an objective, uplifting power that carries the practitioner beyond ordinary limitation.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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