
Sukta 10.64
Collective gods (open inquiry which deity grants grace and help)
Triṣṭubh (probable; requires metrical confirmation)
This hymn opens as a searching invocation: the poet asks which among the gods truly hears, grants joy, and turns toward the worshipper with saving help. It then broadens into a collective appeal to divine powers—especially the life-nourishing Waters and rivers—and culminates in praise of the Ādityas and Aditi as sovereign upholders of order and protection.
Mantra 1
कथा देवानां कतमस्य यामनि सुमन्तु नाम शृण्वतां मनामहे । को मृळाति कतमो नो मयस्करत्कतम ऊती अभ्या ववर्तति ॥
देवताओं के नाम का कैसे स्मरण करें, यह सवाल है। सुमन-तु का नाम सुनके हम कैसे ध्यान रखें? कौन देवता हमें खुशी देता है? कौन हमारे लिए अच्छा करे? कौन शक्ति हमारे पास आके मदद करती है? यह सब बातें हमें समझनी चाहिए।
Mantra 2
क्रतूयन्ति क्रतवो हृत्सु धीतयो वेनन्ति वेनाः पतयन्त्या दिशः । न मर्डिता विद्यते अन्य एभ्यो देवेषु मे अधि कामा अयंसत ॥
जब हम कोई काम करते हैं, तो हमारे दिल में इच्छा उठती है। हमारी सोच चारों तरफ फैलती है जैसे पंछी उड़ते हैं। इन देवताओं के अलावा कोई और हमें खुशी नहीं देता। हमारी इच्छाएं इन देवताओं पर ही टिकी हैं।
Mantra 3
नरा वा शंसं पूषणमगोह्यमग्निं देवेद्धमभ्यर्चसे गिरा । सूर्यामासा चन्द्रमसा यमं दिवि त्रितं वातमुषसमक्तुमश्विना ॥
तुम अपनी आवाज़ से नरशंस का गुण गा रहे हो। पूषन को बुला रहे हो जो छुपा है, और अग्नि को जो देवियों ने जलाया है। सूरज और चंद्रमा को बुला रहे हो। यम को आसमान में, त्रित और वायु को, उषा और रात को, और अश्विन दोनों भाइयों को। यह सब शक्तियाँ जाग रही हैं और काम कर रही हैं।
Mantra 4
कथा कविस्तुवीरवान्कया गिरा बृहस्पतिर्वावृधते सुवृक्तिभिः । अज एकपात्सुहवेभिॠक्वभिरहिः शृणोतु बुध्न्यो हवीमनि ॥
बृहस्पति जो बड़े हैं, वो अच्छी बातों से बड़े होते हैं। अज एकपद जो एक पैर वाली शक्ति है, वो गाने वाले लोगों की सुन रही है। और जो साँप नीचे पानी में रहता है, बुध्न्य, वो भी हवन में सुन रहा है।
Mantra 5
दक्षस्य वादिते जन्मनि व्रते राजाना मित्रावरुणा विवाससि । अतूर्तपन्थाः पुरुरथो अर्यमा सप्तहोता विषुरूपेषु जन्मसु ॥
दक्ष के जनम में और उनके नियम में, अदिति तुम मित्र और वरुण दोनों राजाओं की पूजा कर रहे हो। अर्यमन बहुत रथ वाले हैं, उनका कोई रास्ता रोक नहीं सकता। सात लोग जो हवन करते हैं, वो अलग-अलग रूप में काम करते हैं।
Mantra 6
ते नो अर्वन्तो हवनश्रुतो हवं विश्वे शृण्वन्तु वाजिनो मितद्रवः । सहस्रसा मेधसाताविव त्मना महो ये धनं समिथेषु जभ्रिरे ॥
यह सब शक्तियाँ हमारी आवाज़ सुन रही हैं। जो लोग बड़े हैं और अपने आप में ताकत रखते हैं, वो हज़ार गुना फल पाते हैं। यह हमारे अंदर ही धन लाए हैं जब हम संघर्ष में थे। अब यह हमारी मदद करें।
Mantra 7
प्र वो वायुं रथयुजं पुरंधिं स्तोमैः कृणुध्वं सख्याय पूषणम् । ते हि देवस्य सवितुः सवीमनि क्रतुं सचन्ते सचितः सचेतसः ॥
अपने गानों से वायु को बोलो जो रथ में जुता है। पूषन को बोलो जो दोस्ती देता है। यह दोनों सवितुर की इच्छा के साथ चलते हैं। जो लोग जाग के समझते हैं, वो इस में जुड़ जाते हैं।
Mantra 8
त्रिः सप्त सस्रा नद्यो महीरपो वनस्पतीन्पर्वताँ अग्निमूतये । कृशानुमस्तॄन्तिष्यं सधस्थ आ रुद्रं रुद्रेषु रुद्रियं हवामहे ॥
हम तीस-सत्तर नदियों को बुलाते हैं, यह सब बड़ी नदियाँ हैं। पानी, पेड़, पहाड़, सब अग्नि को हमारे लिए बुलाते हैं। कृशानु और तिष्य को बुलाते हैं, यह दोनों मदद करते हैं। रुद्र को बुलाते हैं, जो सब रुद्रों में सबसे ताकतवर है। वो हमारे अंदर शक्ति जगा दे।
Mantra 9
सरस्वती सरयुः सिन्धुरूर्मिभिर्महो महीरवसा यन्तु वक्षणीः । देवीरापो मातरः सूदयित्न्वो घृतवत्पयो मधुमन्नो अर्चत ॥
सरस्वती, सरयू, सिंधु, यह तीन नदियाँ अपनी लहरों के साथ आएँ। यह बड़ी और ताकतवर हैं, हमारे काम आएँ। पानी देवियाँ माँ जैसी हैं, हमारी ग्रोथ करती हैं। घी और शहद जैसा दूध देके हमें खुश करें।
Mantra 10
उत माता बृहद्दिवा शृणोतु नस्त्वष्टा देवेभिर्जनिभिः पिता वचः । ऋभुक्षा वाजो रथस्पतिर्भगो रण्वः शंसः शशमानस्य पातु नः ॥
आसमान की माँ हमारी सुन ले। त्वष्टा, जो पिता जैसा है, देवियों के साथ हमारी बात सुन ले। रिभुक्ष, वाज, रथ-पति, भग, यह सब हमारे लिए रक्षा करें। जो लोग मेहनत करते हैं, उनकी बात को बचा के रखें।
Mantra 11
रण्वः संदृष्टौ पितुमाँ इव क्षयो भद्रा रुद्राणां मरुतामुपस्तुतिः । गोभिः ष्याम यशसो जनेष्वा सदा देवास इळया सचेमहि ॥
जब सब साथ मिलके रहते हैं, बहुत अच्छा लगता है, जैसे घर में खाना हो। रुद्र और मरुत देवियों की पूजा से अच्छी बात होती है। हम रोशनी और ज्ञान के साथ रहें, लोगों में नाम करें। हमेशा देवियों के साथ जुड़ के रहें।
Mantra 12
यां मे धियं मरुत इन्द्र देवा अददात वरुण मित्र यूयम् । तां पीपयत पयसेव धेनुं कुविद्गिरो अधि रथे वहाथ ॥
मरुत, इंद्र, वरुण, मित्र, इन सब देवियों ने मुझे समझ दी है। इस समझ को दूध जैसा पाल के रखें। मेरी बातों को अपने रथ में उठा के ले जाएँ, देवियों तक पहुँचा दें।
Mantra 13
कुविदङ्ग प्रति यथा चिदस्य नः सजात्यस्य मरुतो बुबोधथ । नाभा यत्र प्रथमं संनसामहे तत्र जामित्वमदितिर्दधातु नः ॥
मरुत्स, क्या तुम हमें पहले जैसा देखोगे? हम लोग एक ही परिवार के हैं। जहाँ पहले हम सब मिलकर थे, वहीं अदिति हमें अपना बना ले। वहीं से हम सब का रिश्ता शुरू हुआ था।
Mantra 14
ते हि द्यावापृथिवी मातरा मही देवी देवाञ्जन्मना यज्ञिये इतः । उभे बिभृत उभयं भरीमभिः पुरू रेतांसि पितृभिश्च सिञ्चतः ॥
आसमान और धरती दो बड़ी मातें हैं। यह दोनों देवी हैं और भगवान पैदा करती हैं। यज्ञ में इनकी पूजा होती है। दोनों दुनिया को संभालती हैं। पितरों के साथ मिलकर यह नई जिंदगी देती हैं।
Mantra 15
वि षा होत्रा विश्वमश्नोति वार्यं बृहस्पतिररमतिः पनीयसी । ग्रावा यत्र मधुषुदुच्यते बृहदवीवशन्त मतिभिर्मनीषिणः ॥
यह पूजा का काम बहुत फैला हुआ है। हर अच्छी चीज़ तक पहुँचता है। बृहस्पति और अरमति इसमें हैं। जहाँ मधुआ निचोड़ा जाता है, वहाँ रिशियों ने अपने सोच से बड़ी आवाज़ उठाई।
Mantra 16
एवा कविस्तुवीरवाँ ऋतज्ञा द्रविणस्युर्द्रविणसश्चकानः । उक्थेभिरत्र मतिभिश्च विप्रोऽपीपयद्गयो दिव्यानि जन्म ॥
ऋषि जो सच जानता है, उसकी आवाज़ में ताकत है। वो धन चाहता है और खुश रहता है। अपने गानों और सोच से उसने भगवान की जिंदगी को बढ़ाया।
Mantra 17
एवा प्लतेः सूनुरवीवृधद्वो विश्व आदित्या अदिते मनीषी । ईशानासो नरो अमर्त्येनास्तावि जनो दिव्यो गयेन ॥
प्लते के बेटे ने तुम सब आदित्यों को बढ़ाया। अदिति, तुम भी इसमें हो। यह लोग प्रभु बनके अमर ताकत से तुम्हारी बड़ाई करते हैं। उनकी जिंदगी में दिव्य ताकत है।
A direct inquiry into divine responsiveness—who truly hears, who grants joy, who turns with help (ūtī).
The hymn expands from question to invocation, naming and welcoming sustaining powers, especially the Waters and great rivers as maternal nourishers.
A concentrated petition for fostering aid through the mighty rivers/Waters—imagined as luminous, ghee-rich, honey-sweet abundance that increases life.
It closes by affirming praise of the Ādityas and Aditi as sovereign protectors, anchoring the hymn in cosmic order and immortal strength.
katama ūtī abhy ā vavartati
सरस्वती सरयुः सिन्धुरूर्मिभिर्महो महीरवसा यन्तु वक्षणीः । देवीरापो मातरः सूदयित्न्वो घृतवत्पयो मधुमन्नो अर्चत ॥viśva ādityā adite
It is a hymn of inquiry and prayer asking which divine power truly hears and helps. It invokes the gods collectively, especially the Waters and the Ādityas with Aditi, for protection, joy, and nourishment.
They represent the divine Waters as living, maternal powers that sustain life. In Vedic imagery, their flowing abundance is like ghee-rich, honey-sweet nourishment that increases strength and well-being.
Aditi is honored as the great, expansive divine Mother associated with the Ādityas. She symbolizes protection, freedom from constraint, and the stable order that supports life and right conduct.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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