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Sukta 10.47
Indra
Trishtubh (probable for RV 10.47; confirmation needed)
This hymn is a sustained petition to Indra for "citra" (many-formed, radiant) and "vṛṣan" (vigorous, potent) rayi—wealth that is at once material prosperity, victorious strength (vāja), and luminous increase. The speakers affirm intimacy with Indra ("we grasp your right hand") and praise him as guardian of the cows/rays, asking for a great, unequalled dwelling and secure foundation blessed by Heaven and Earth.
Mantra 1
जगृभ्मा ते दक्षिणमिन्द्र हस्तं वसूयवो वसुपते वसूनाम् । विद्मा हि त्वा गोपतिं शूर गोनामस्मभ्यं चित्रं वृषणं रयिं दाः ॥
इंद्र, हमने तुम्हारा दायाँ हाथ पकड़ा है। तुम धन के मालिक हो और हम धन माँगने आए हैं। हम जानते हैं तुम गाय और बड़े रक्षक हो। हमें ऐसा धन दो जो चमकता है और ताकत रखता है।
Mantra 2
स्वायुधं स्ववसं सुनीथं चतुःसमुद्रं धरुणं रयीणाम् । चर्कृत्यं शंस्यं भूरिवारमस्मभ्यं चित्रं वृषणं रयिं दाः ॥
इंद्र से यह प्रार्थना है कि वो हमे ऐसा धन दे जो खुद अपने आप में पूरा हो। यह धन ऐसे ही पक्का हो जैसे चार समुंदर अपनी जगह पक्के खड़े हैं। इससे बहुत सारे लोग फायदा उठा सकें। यह वो धन हो जिससे हम काम बना सकें, जिसको लोग बातों में बताएं, जिसमे कोई कमी न हो। अलग-अलग तरह का, ताकतवाला, हमारे लिए अच्छा धन दे।
Mantra 3
सुब्रह्माणं देववन्तं बृहन्तमुरुं गभीरं पृथुबुध्नमिन्द्र । श्रुतऋषिमुग्रमभिमातिषाहमस्मभ्यं चित्रं वृषणं रयिं दाः ॥
हे इंद्र, हमे ऐसा धन दे जिसमे मंत्र की ताकत हो, जिसमे भगवान की शक्ति हो। यह इतना बड़ा हो कि हम सोच भी न सकें, इतना गहरा हो कि नींद न दिखाए। यह धन रिशियों की बात सुनता है, बुरी सोच को तोड़ देता है, दुश्मनी करने वालों को हरा देता है। हमे अलग-अलग तरह का, ताकतवाला धन दे।
Mantra 4
सनद्वाजं विप्रवीरं तरुत्रं धनस्पृतं शूशुवांसं सुदक्षम् । दस्युहनं पूर्भिदमिन्द्र सत्यमस्मभ्यं चित्रं वृषणं रयिं दाः ॥
इंद्र, हमे पुराने ज़माने जैसी ताकत दे। इसमे बहुत सारे अच्छे लोग हों, जो हमें मुश्किल वक्त में बचा सकें। यह धन लाने वाली शक्ति हो, जिसमे उत्साह हो, जिसमे काम आने वाली समझ हो। यह अंदर के दुश्मन को मारे, रास्ते में आने वाली रुकावटों को तोड़ दे। सच काम करे, हमे अलग-अलग तरह का ताकतवाला धन दे।
Mantra 5
अश्वावन्तं रथिनं वीरवन्तं सहस्रिणं शतिनं वाजमिन्द्र । भद्रव्रातं विप्रवीरं स्वर्षामस्मभ्यं चित्रं वृषणं रयिं दाः ॥
इंद्र, हमे वो शक्ति दे जिसमे घोड़े हों, रथ हों, बहुत सारे वीर हों। यह शक्ति हज़ारों गुना और सौ गुना बढ़ के आए। इसके साथ अच्छे नियम हों, अच्छे लोग हों, जो ऊपर वाली तरफ ले के जाए। हमे चमकदार, ताकतवाला धन दे।
Mantra 6
प्र सप्तगुमृतधीतिं सुमेधां बृहस्पतिं मतिरच्छा जिगाति । य आङ्गिरसो नमसोपसद्योऽस्मभ्यं चित्रं वृषणं रयिं दाः ॥
हमारी सोच बृहस्पति की तरफ जाती है। वो सात गुना ज्ञानी है, सच का पालन करता है, दिमाग में चमक रखता है। वो अंगिरस रिशि है, जिसके पास हम झुक के बैठते हैं। वो हमे अलग-अलग तरह का अंदर का धन दे, जो ताकतवाला हो।
Mantra 7
वनीवानो मम दूतास इन्द्रं स्तोमाश्चरन्ति सुमतीरियानाः । हृदिस्पृशो मनसा वच्यमाना अस्मभ्यं चित्रं वृषणं रयिं दाः ॥
मेरे भजन इन्द्र के पास जाते हैं, जैसे कोई दौड़ के पैग़ाम ले कर जाता है। यह भजन सीधे दिल को छेड़ें, और मन से बने हैं। इन्द्र हमें वो दौलत दे जो चमकती है और अंदर से स्ट्रॉन्ग है।
Mantra 8
यत्त्वा यामि दद्धि तन्न इन्द्र बृहन्तं क्षयमसमं जनानाम् । अभि तद्द्यावापृथिवी गृणीतामस्मभ्यं चित्रं वृषणं रयिं दाः ॥
मैं इन्द्र से यह माँगता हूँ कि वो मुझे वो चीज़ दे। एक ऐसा घर जो बहुत बड़ा हो और किसी के बराबर न हो। आसमान और धरती भी यह बात मानें। और वो चमकती हुई दौलत हमें मिले जो अंदर से स्ट्रॉन्ग है।
It repeatedly asks Indra to give "citra vṛṣaṇa rayi"—a radiant, many-formed, powerful wealth—along with vāja (victorious strength), prosperity, and a secure dwelling (kṣaya).
It is a poetic sign of alliance and trust: the worshippers claim Indra as their close protector and patron, confident that he will lead and support them in gaining wealth and victory.
They can be literal wealth (cattle) and also symbolic “rays” of light and insight; calling Indra "gopati" presents him as the protector and winner of both prosperity and luminous powers.
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