
Sukta 10.25
Vimadá (traditional for RV 10.25)
Soma (explicit in 10.25.2-3; here andhasa and made link to Soma; deity-focus likely Soma)
Triṣṭubh (probable; unverified)
This hymn praises Soma (andhas) as the inspirer who breathes auspiciousness into the worshipper—clarity of mind (manas), skill (dakṣa), and right-willed intention (kratu). It celebrates Soma’s exhilarating “mada” that widens thought, empowers the seer and giver, and carries one beyond incapacity (the “blind and lame”) into increase and attainment.
Mantra 1
भद्रं नो अपि वातय मनो दक्षमुत क्रतुम् । अधा ते सख्ये अन्धसो वि वो मदे रणन्गावो न यवसे विवक्षसे ॥
हे सोम, हम में अच्छा साँस भर दे। हमारा मन, हमारी समझ, और सही इरादा, यह सब ठीक कर दे। तेरे साथ दोस्ती में, सोम के आनंद में, हमारी ताकत खुश होती है। जैसे गायें चरगाह देख के खुश हो जाती हैं, वैसे ही हम भी खुश हो जाते हैं। तू हमारा भला चाहता है।
Mantra 2
हृदिस्पृशस्त आसते विश्वेषु सोम धामसु । अधा कामा इमे मम वि वो मदे वि तिष्ठन्ते वसूयवो विवक्षसे ॥
हे सोम, तेरा स्पर्श दिल तक जाता है। तू हर जगह मौजूद है। तेरे आनंद में मेरे सारे इरादे जाग उठते हैं। मैं सच्चा धन पाना चाहता हूँ। तू चाहता है कि मैं बढ़ूँ।
Mantra 3
उत व्रतानि सोम ते प्राहं मिनामि पाक्या । अधा पितेव सूनवे वि वो मदे मृळा नो अभि चिद्वधाद्विवक्षसे ॥
हे सोम, कभी-कभी मैं तेरे नियम तोड़ देता हूँ, बचपना करके। पर तू बाप जैसा है, बेटे को माफ कर देता है। तेरा आनंद मुझे शक्ति देता है। मुझे सज़ा से बचा ले। तू चाहता है कि मैं आगे बढ़ूँ।
Mantra 4
समु प्र यन्ति धीतयः सर्गासोऽवताँ इव । क्रतुं नः सोम जीवसे वि वो मदे धारया चमसाँ इव विवक्षसे ॥
जैसे पहाड़ से पानी तेज़ी से नीचे आता है, वैसे ही अच्छे विचार आगे बढ़ते हैं। हे सोम, हमें जीने की शक्ति दे। हमारे अंदर सही इरादा बना दे। तेरे आनंद में यह शक्ति बनती है और बढ़ती है। जैसे प्याला भरा जाता है, वैसे ही हम भी भरते हैं।
Mantra 5
तव त्ये सोम शक्तिभिर्निकामासो व्यृण्विरे । गृत्सस्य धीरास्तवसो वि वो मदे व्रजं गोमन्तमश्विनं विवक्षसे ॥
हे सोम, तेरी शक्ति से जो लोग सच्चा आनंद ढूंढते हैं, वो खुल जाते हैं। जो रिशि तुझमें शक्ति देखते हैं, वो हमारे लिए अच्छा मार्ग बना देते हैं। यह मार्ग चमकता है, खुशियों से भरा है। तेरे आनंद में सब बढ़ता है।
Mantra 6
पशुं नः सोम रक्षसि पुरुत्रा विष्ठितं जगत् । समाकृणोषि जीवसे वि वो मदे विश्वा सम्पश्यन्भुवना विवक्षसे ॥
सोम, तुम जैसे किसान अपने जानवर की रक्षा करता है, वैसे ही हमारी रक्षा करो। यह दुनिया बहुत तरीके से फैली हुई है। तुम हमारे लिए पूरा कर देते हो ताकि हम जीते रहें। तुम अपने नशे में सब दुनिया को देख लेते हो और हमारे लिए जगह बढ़ा देते हो।
Mantra 7
त्वं नः सोम विश्वतो गोपा अदाभ्यो भव । सेध राजन्नप स्रिधो वि वो मदे मा नो दुःशंस ईशता विवक्षसे ॥
सोम, तुम हमारे लिए चारों तरफ से रक्षा करने वाला बनो। कोई तुम्हे हरा न सके। तुम राजा हो, हारने वाली ताकें भगा दो। तुम अपने नशे में बुराई को हमारे ऊपर हाथ न लगने दो। बल्कि हमारी ताकत बढ़ा दो।
Mantra 8
त्वं नः सोम सुक्रतुर्वयोधेयाय जागृहि । क्षेत्रवित्तरो मनुषो वि वो मदे द्रुहो नः पाह्यंहसो विवक्षसे ॥
सोम, तुम्हारे इरादे अच्छे हैं। हमें जगा दो ताकि हमारी ज़िन्दगी बड़ी हो। तुम खेत को जानते हो, इंसान से भी ज़्यादा। तुम अपने नशे में धोखेबाज़ से बचाओ और हमारे दुख दूर करो। हमारे लिए अच्छी जगह बना दो।
Mantra 9
त्वं नो वृत्रहन्तमेन्द्रस्येन्दो शिवः सखा । यत्सीं हवन्ते समिथे वि वो मदे युध्यमानास्तोकसातौ विवक्षसे ॥
सोम, तुम इंद्र के सबसे अच्छे दोस्त हो। तुम दुश्मन को मारते हो। तुम अच्छे साथी हो। जब लोग लड़ाई में तुम्हे पुकारते हैं, तुम अपने नशे में उन्हे जीत दिलाते हो। उनका काम आगे बढ़ता है।
Mantra 10
अयं घ स तुरो मद इन्द्रस्य वर्धत प्रियः । अयं कक्षीवतो महो वि वो मदे मतिं विप्रस्य वर्धयद्विवक्षसे ॥
यह सोम की ताकत है जो इंद्र को पसंद है। यह तेज़ी से बढ़ती है। कक्षीवान के बड़े काम के लिए तुम अपने खुशी में रिशि के सोच को बढ़ा देते हो। उसकी पूरी ताकत आती है।
Mantra 11
अयं विप्राय दाशुषे वाजाँ इयर्ति गोमतः । अयं सप्तभ्य आ वरं वि वो मदे प्रान्धं श्रोणं च तारिषद्विवक्षसे ॥
यह सोम जो देने वाले रिशि को ताकत देता है, वो चमकता है। यह सात शक्तियों के लिए सबसे बड़ा वरदान लाता है। यह नशा ऐसा है कि अंधे और लंगड़े से आगे ले जाता है। बुराई और कमज़ोरी को पीछे छोड़ के बड़े पंथ तक पहुँचा देता है।
A direct prayer for Soma to ‘breathe’ the good into the worshipper—mind, skill, and right intention—framing Soma as inner benefactor and friend.
Soma’s delight (mada) is unfolded as an expansive power: it makes energies rejoice and move toward increase, like cattle surging toward pasture; it also enlarges the seer’s thought and supports divine might.
Soma is acclaimed as the force that grants vāja and the ‘supreme choice’ for the sevenfold powers, carrying one beyond disabling limitations (the ‘blind and lame’) into wider attainment.
The hymn settles into assurance of growth and empowerment through Soma’s friendship—an affirmed movement from petition to realized expansion and capability.
bhadraṃ no api vātaya mano dakṣam uta kratum
अयं घ स तुरो मद इन्द्रस्य वर्धत प्रियः । अयं कक्षीवतो महो वि वो मदे मतिं विप्रस्य वर्धयद्विवक्षसे ॥अयं विप्राय दाशुषे वाजाँ इयर्ति गोमतः । अयं सप्तभ्य आ वरं वि वो मदे प्रान्धं श्रोणं च तारिषद्विवक्षसे ॥It praises Soma as the sacred essence whose delight (mada) brings a good mind, effective skill, and right intention, and helps the worshipper grow into greater capacity and attainment.
Andhas is the Soma-juice/essence, and mada is the inspired exhilaration it brings. The hymn treats this ecstasy as a real power that expands thought and energizes action.
It is a symbolic way of saying Soma helps one cross over inner and outer incapacities—confusion, weakness, or inability—into clearer vision, stronger movement, and wider success.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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