Opening the text

Sukta 1.79
Gotama (traditional attribution for RV 1.79 to Gotama Rāhūgaṇa in many indices)
Agni (depicted with dawn-like and wind-like dynamics)
Triṣṭubh (11-syllable quarters; hymn style shifts from gāyatrī of 1.78)
This hymn praises Agni as a radiant, swiftly moving power—dawn-bright and wind-like—who spreads through the midspace and awakens inspired action. It asks Agni to descend with protections and aids into the poets’ thoughts and chants, to drive away obstructing forces (rakṣas) and to establish the sacrifice in clarity and truth.
Mantra 1
हिरण्यकेशो रजसो विसारेऽहिर्धुनिर्वात इव ध्रजीमान् । शुचिभ्राजा उषसो नवेदा यशस्वतीरपस्युवो न सत्याः ॥
अग्नि के बाल सुनहरे हैं। वो आसमान में फैलता है। वो साँप की तरह हिलता है, हवा की तरह तेज चलता है। वो चमकता है और साफ है। वो सुबह की तरह नया है, उज्वल है, सच है। वो काम में लगा रहता है।
Mantra 2
आ ते सुपर्णा अमिनन्तँ एवैः कृष्णो नोनाव वृषभो यदीदम् । शिवाभिर्न स्मयमानाभिरागात्पतन्ति मिहः स्तनयन्त्यभ्रा ॥
तेज़ ऊर्ज वाली शक्तियाँ तुम्हारे पास आ रही हैं, रुके नहीं। काला बैल जब चिल्लाता है, तब यह सब शुरू होता है। अच्छी और खुशी वाली शक्तियाँ आती हैं। धुंध उड़ने लगती है और बादल गरजने लगते हैं। यह सब बताता है कि अंदर से एक ज़ोर निकल रहा है जो पानी और ताकत लाता है।
Mantra 3
यदीमृतस्य पयसा पियानो नयन्नृतस्य पथिभी रजिष्ठैः । अर्यमा मित्रो वरुणः परिज्मा त्वचं पृञ्चन्त्युपरस्य योनौ ॥
जब वो सत्य के दूध से भरता है, तब वो सत्य के सबसे तेज़ रास्ते पे ले चलता है। अर्यमन, मित्र, वरुण, यह तीनों घूम के आते हैं। वो उसकी चमड़ी को ऊपर वाली दुनिया के गर्भ में मलते हैं। यह उसका रूप सत्य में स्थिर करते हैं।
Mantra 4
अग्ने वाजस्य गोमत ईशानः सहसो यहो । अस्मे धेहि जातवेदो महि श्रवः ॥
अग्नि, तुम वो बलवान हो जिसमें रोशनी की किरण भरी है। तुम ताकत के हो। जातवेदस, हम में बड़ा नाम और सुनने की शमता डाल दो। हम सत्य को समझ सकें।
Mantra 5
स इधानो वसुष्कविरग्निरीळेन्यो गिरा । रेवदस्मभ्यं पुर्वणीक दीदिहि ॥
अग्नि को जलाया गया है। वो अच्छा खज़ाना है, वो रिशि है। उसे बोल से पुकारा जाता है। वो हमारे लिए खुशाली लाता है। वो हमारे आगे चमकता है और हमें सही रास्ते पे ले चलता है।
Mantra 6
क्षपो राजन्नुत त्मनाग्ने वस्तोरुतोषसः । स तिग्मजम्भ रक्षसो दह प्रति ॥
अग्नि, तुम रातों के राजा हो। तुम खुद से ही घर और सवेरे के मालिक हो। तुम्हारी तोड़ी तेज़ है। अंधेरी शक्तियाँ जो हमारे रास्ते में आती हैं, उनको जला के पीछे कर दो।
Mantra 7
अवा नो अग्न ऊतिभिर्गायत्रस्य प्रभर्मणि । विश्वासु धीषु वन्द्य ॥
अग्नि, हमारे पास आ जा। हम गायत्री मंत्र पढ़ रहे हैं, तू उसमे मदद कर। तू हर सोच में वही है जिसको हम सब से ज़्यादा मानते हैं।
Mantra 8
आ नो अग्ने रयिं भर सत्रासाहं वरेण्यम् । विश्वासु पृत्सु दुष्टरम् ॥
अग्नि, हमे वो शक्ति ला के दे जो हर जंग में जीत दे। तू चुने जाने वाला है। दुश्मन तुझे हरा नहीं पाते।
Mantra 9
आ नो अग्ने सुचेतुना रयिं विश्वायुपोषसम् । मार्डीकं धेहि जीवसे ॥
अग्नि, तू सही रास्ता दिखाके हमे वो शक्ति ला। जो हमारी ज़िन्दगी को पूरा खुश रखे। हमे शांति और सेहत दे, ताकि हम अच्छे से जी सकें।
Mantra 10
प्र पूतास्तिग्मशोचिषे वाचो गोतमाग्नये । भरस्व सुम्नयुर्गिरः ॥
हमारी साफ-साफ बातें अग्नि के पास जाती हैं। अग्नि जो चमकता है और आग में जलता है। वो हमारी पूजा सुनता है और उसे भगवान तक पहुँचाता है।
Mantra 11
यो नो अग्नेऽभिदासत्यन्ति दूरे पदीष्ट सः । अस्माकमिद्वृधे भव ॥
अग्नि, जो भी हम पे अटैक करे, चाहे पास हो या दूर, उसको तू दूर कर दे। और हमारे लिए ऐसा बन कि हम आगे बढ़ते रहें।
Mantra 12
सहस्राक्षो विचर्षणिरग्नी रक्षांसि सेधति । होता गृणीत उक्थ्यः ॥
अग्नि के हज़ारों आँखें हैं, वो सब कुछ देख सकता है। वो रास्ता रोकने वाली चीज़ें भगा देता है। पुरोहित उसे पुकारता है और उसकी महिमा गाता है।
Agni is praised—both as the physical sacrificial fire and as the divine power that carries offerings, awakens inspiration, and protects the rite.
Dawn imagery highlights Agni’s renewing, ever-fresh radiance, while wind imagery emphasizes his swift, penetrating movement through the midspace and through our awareness.
It asks Agni to repel harmful or obstructing forces—ritually, anything that disrupts the sacrifice; inwardly, confusion, fear, and negative impulses that block clear thought and right action.
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