Sukta 1.58
वि वातजूतो अतसेषु तिष्ठते वृथा जुहूभिः सृण्या तुविष्वणिः । तृषु यदग्ने वनिनो वृषायसे कृष्णं त एम रुशदूर्मे अजर ॥
ví vā́ta-jūto ataséṣu tiṣṭhate vṛ́thā juhū́bhiḥ sṛ́ṇyā tuvi-sváṇiḥ | tṛṣú yád agne vaníno vṛṣāyáse kṛṣṇáṃ te éma ruśád-ūrme ajara ||
अग्नि हवा की ताकत से आगे बढ़ता है। यह आग उन सब के बीच खड़ी है जहाँ लोग हवन करते हैं। इसका काम बेकार नहीं जाता, यह ताकत से चमकता है। जब अग्नि प्यासे पेड़ों में बैल की तरह उछलता है, तब उसकी काली रुकावत टूट जाती है। फिर उसकी चमक दिखने लगती है। यह कभी पुराना नहीं होता।
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