Opening the text

Sukta 1.25
Śunaḥśepa Ājīgarti (traditional for this Varuṇa sequence)
Varuṇa
Gāyatrī (3 pādas of 8 syllables typical in RV 1.25 opening)
This hymn is a confession and plea to Varuṇa: even when humans repeatedly fail to uphold his ṛta (cosmic-moral order), the poet asks for pardon and restoration. It praises Varuṇa as the all-seeing guardian who knows what is done and what remains, and culminates in the famous request to be released from Varuṇa’s binding “nooses” (pāśa) so life may continue in freedom and truth.
Mantra 1
यच्चिद्धि ते विशो यथा प्र देव वरुण व्रतम् । मिनीमसि द्यविद्यवि ॥
देव वरुण, हम तुम्हारे लोग हैं। दिन भर तुम्हारे नियम तोड़ते रहते हैं। रोज़-रोज़ हम गलतियाँ करते हैं।
Mantra 2
मा नो वधाय हत्नवे जिहीळानस्य रीरधः । मा हृणानस्य मन्यवे ॥
हमें मात मारने के हाथ मत दे दो। जो लोग गुस्से में हैं, उनकी मार से बचा लो। जब तुम नाराज़ हो, तब भी गुस्सा मत दिखाना।
Mantra 3
वि मृळीकाय ते मनो रथीरश्वं न संदितम् । गीर्भिर्वरुण सीमहि ॥
वरुण भगवान, तुम्हारी मेहरबानी के लिए हम अपना मन कंट्रोल करते हैं। जैसे सारथी घोड़े को ठीक से जोता है, वैसे हम अपने मन को सीधा रखते हैं। हमारी प्रार्थना से यह मन तुम्हारे सही रास्ते पर चले।
Mantra 4
परा हि मे विमन्यवः पतन्ति वस्यइष्टये । वयो न वसतीरुप ॥
मेरा गुस्सा और बुरा इरादा सब दूर हो जाता है। मैं अच्छा बनना चाहता हूँ। जैसे चिड़िया शाम को अपने घोंसले को वापस आती है, वैसे मेरा मन शांत हो जाता है। वरुण की सही बात मन में आने से सब ठीक लगता है।
Mantra 5
कदा क्षत्रश्रियं नरमा वरुणं करामहे । मृळीकायोरुचक्षसम् ॥
कब हम वरुण भगवान के पास जाएंगे? वो बहुत बड़े हैं और सब देखते हैं। उनकी मेहरबानी से हम भी बड़े बन जाएंगे। उनका सही रास्ता पकड़के हम भी राज कर सकते हैं।
Mantra 6
तदित्समानमाशाते वेनन्ता न प्र युच्छतः । धृतव्रताय दाशुषे ॥
दोनों लोग एक ही चीज़ चाहते हैं। वो आगे बढ़ते रहते हैं और रास्ते में हारते नहीं। जैसे कोई अपने प्यारे के पास जाता है, वैसे वो भी जाते हैं। वो अपना व्रत निभाते हैं और भगवान को अपना सब कुछ दे देते हैं।
Mantra 7
वेदा यो वीनां पदमन्तरिक्षेण पतताम् । वेद नावः समुद्रियः ॥
वरुण भगवान सब जानते हैं। वो जानते हैं चिड़िया कहाँ उड़ती है आसमान में। वो जानते हैं कश्ती समुंदर में कहाँ जा रही है। वो हर चीज़ देखते हैं क्योंकि उनका नियम सब पे चलता है।
Mantra 8
वेद मासो धृतव्रतो द्वादश प्रजावतः । वेदा य उपजायते ॥
वरुण जो धरम पे पक्का है, वो बारह महीने जानता है। यह महीने आगे बढ़ने वाले हैं। वो जानता है कि आगे क्या पैदा होगा। वो वक्त नापता है और सच्चाई के नियम में सब कुछ देखता है।
Mantra 9
वेद वातस्य वर्तनिमुरोॠष्वस्य बृहतः । वेदा ये अध्यासते ॥
वरुण हवा का रास्ता जानता है। वो बड़े ऊँचे और चौड़े रास्ते जानता है। वो उनको भी जानता है जो ऊपर बैठे हैं। वो प्राणी की सांस और ज़िन्दगी की हरकतों को समझता है।
Mantra 10
नि षसाद धृतव्रतो वरुणः पस्त्यास्वा । साम्राज्याय सुक्रतुः ॥
वरुण जो धरम पे पक्का है, वो घर में बैठा है। वो सब पे राज करने के लिए आया है। वो अच्छी सोच वाली शक्ति है जो सच्चाई का राज हमारे घर में ठहराती है।
Mantra 11
अतो विश्वान्यद्भुता चिकित्वाँ अभि पश्यति । कृतानि या च कर्त्वा ॥
इसलिए जो समझदार है वो सारे चमत्कार देखता है। वो देखता है कि क्या हो चुका है और क्या करना बाकी है। वरुण की नज़र रोशनी बन जाती है जो हमारे काम को सच्चाई की तरफ ले जाती है।
Mantra 12
स नो विश्वाहा सुक्रतुरादित्यः सुपथा करत् । प्र ण आयूंषि तारिषत् ॥
वो आदित्य जो अच्छी इच्छा वाला है, हमेशा हमारे लिए अच्छा रास्ता बना दे। वो हमारी ज़िन्दगी को आगे ले जाए और पार करे ताकि हमारे साल अच्छे बित जाएँ।
Mantra 13
बिभ्रद्द्रापिं हिरण्ययं वरुणो वस्त निर्णिजम् । परि स्पशो नि षेदिरे ॥
वरुण ने सोना जैसा चमकता कपड़ा पहन लिया है। यह कपड़ा बिल्कुल साफ और चमकदार है। उसके आस-पास जो लोग नज़र रखने के लिए बैठे हैं, वो सब सच्चाई देख रहे हैं। वो धरम की बात पकड़ के रखते हैं।
Mantra 14
न यं दिप्सन्ति दिप्सवो न द्रुह्वाणो जनानाम् । न देवमभिमातयः ॥
बुरे लोग वरुण को पकड़ नहीं सकते। जो लोग धोखा देते हैं, वो भी उसको कुछ नहीं कर सकते। भगवान को कोई बड़ी ताकत भी गिरा नहीं सकती। जब सच्चाई साथ होती है, तो झूठ कुछ नहीं कर सकता।
Mantra 15
उत यो मानुषेष्वा यशश्चक्रे असाम्या । अस्माकमुदरेष्वा ॥
जो इंसान लोगों में सबसे बड़ा नाम कमाता है, उसकी ताकत हमारे अंदर आनी चाहिए। वो हमारे दिल में आके हमारे लिए भी वैसी ही बड़ी बात करे। जैसे उसने अपना नाम बनाया, वैसे ही हमारे लिए भी कुछ अच्छा हो।
Mantra 16
परा मे यन्ति धीतयो गावो न गव्यूतीरनु । इच्छन्तीरुरुचक्षसम् ॥
मेरे खयाल आगे बढ़ रहे हैं जैसे गायें चरने के लिए निकलती हैं। वो उस बड़े दर्शक को ढूंढ रहे हैं जो सब देख सकता है। वहाँ जाके दिमाग को सही रास्ता मिलता है और समझ में आता है क्या सही है।
Mantra 17
सं नु वोचावहै पुनर्यतो मे मध्वाभृतम् । होतेव क्षदसे प्रियम् ॥
चलो अब फिर से मिलकर बात करें। जहाँ से मुझे यह मीठा प्यार मिला है, वहाँ से शुरू करें। जैसे पूजा में भगवान को मीठा खाना पसंद आता है, वैसे ही हमारी बात भी मीठी हो।
Mantra 18
दर्शं नु विश्वदर्शतं दर्शं रथमधि क्षमि । एता जुषत मे गिरः ॥
अब सब कुछ साफ दिख रहा है। रथ ज़मीन पर खड़ा है और सब उसे देख सकते हैं। मेरी बातें ऐसे ही मान लो। भगवान का रूप अब सामने आ जाए।
Mantra 19
इमं मे वरुण श्रुधी हवमद्या च मृळय । त्वामवस्युरा चके ॥
वरुण, मेरी पुकार सुन। आज मुझ पर दया कर। मैं तुझसे मदद माँग रहा हूँ। तुझ ही की तरफ देख रहा हूँ।
Mantra 20
त्वं विश्वस्य मेधिर दिवश्च ग्मश्च राजसि । स यामनि प्रति श्रुधि ॥
तू सब का मालिक है। आसमान और ज़मीन सब तेरे नीचे है। इस रास्ते पे हमारी सुन। हम सही रास्ते पे चलेंगे।
Mantra 21
उदुत्तमं मुमुग्धि नो वि पाशं मध्यमं चृत । अवाधमानि जीवसे ॥
हमें ऊपर से बाँध कर आज़ाद कर। बीच वाली बाँध भी काट दे। नीचे वाली भी ढीली कर दे। अब हम जीयेंगे, आज़ाद हो कर।
It admits human failure to follow ṛta and asks Varuṇa for forgiveness, protection, and release from the bonds that come from wrongdoing and fear.
The “noose” symbolizes the binding consequences of falsehood and transgression. The hymn prays that Varuṇa will loosen these bonds so the person can return to truthful living.
It can be recited as a prayer of self-correction: acknowledge mistakes, resolve to act truthfully, and ask for inner release from guilt, anxiety, and harmful habits—especially at evening or during reflection.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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