
Sukta 1.22
Aśvinau
This hymn opens as a dawn-invocation to the Aśvins, urging the swift twin healers to arrive and drink the Soma, bringing awakening, protection, and effective power. As it unfolds, the prayer widens to supportive divine forces (including a group of goddesses as sustaining “queens”), and culminates in the celebrated vision of Viṣṇu’s “highest step,” the supreme station kindled by wakeful seers.
Mantra 1
प्रातर्युजा वि बोधयाश्विनावेह गच्छताम् । अस्य सोमस्य पीतये ॥
सुबह के वक्त अश्विन दोनों भाइयों को जगाओ। वो अपनी गाड़ी में आएँ। यह सोम रस पीने के लिए यहाँ आएँ।
Mantra 2
या सुरथा रथीतमोभा देवा दिविस्पृशा । अश्विना ता हवामहे ॥
अश्विन भाई सबसे अच्छी गाड़ी चलाते हैं। वो आसमान तक पहुँचते हैं। हम उन्हें बुलाते हैं ताकि हमारा काम आगे बढ़ सके।
Mantra 3
या वां कशा मधुमत्यश्विना सूनृतावती । तया यज्ञं मिमिक्षतम् ॥
अश्विन भाइयों, तुम्हारी लगाम में मीठा है और सच बात की ताकत है। उससे हमारी पूजा को पक्का करो, जैसे एक ही जगह सब मिल जाए।
Mantra 4
नहि वामस्ति दूरके यत्रा रथेन गच्छथः । अश्विना सोमिनो गृहम् ॥
अश्विन भाइयों, तुम्हारे लिए कोई जगह दूर नहीं है। तुम अपनी रथ में जहाँ भी जाओ, सोम वाले भक्त के घर पहुँच जाते हो।
Mantra 5
हिरण्यपाणिमूतये सवितारमुप ह्वये । स चेत्ता देवता पदम् ॥
मदद के लिए मैं सविता भगवान को बुला रहा हूँ, जो सोना हाथ में लिए आते हैं। वो जानते हैं भगवान का सही रास्ता और वो रास्ता हमारे लिए भी बना देते हैं।
Mantra 6
अपां नपातमवसे सवितारमुप स्तुहि । तस्य व्रतान्युश्मसि ॥
मदद के लिए सविता भगवान की तारीफ करो, जो पानी के बेटे हैं। उनके नियम हमारे काम आते हैं और हमारे लिए सही रास्ता बनाते हैं।
Mantra 7
विभक्तारं हवामहे वसोश्चित्रस्य राधसः । सवितारं नृचक्षसम् ॥
हम सविता भगवान को बुलाते हैं जो अच्छी अच्छी चीज़ें बाँटते हैं। वो लोगों के दिल की बात जानते हैं और हर किसी को उसके हिसाब से देते हैं।
Mantra 8
सखाय आ नि षीदत सविता स्तोम्यो नु नः । दाता राधांसि शुम्भति ॥
दोस्तों, यहाँ बैठ जाओ। अब हम सविता की स्तुति करेंगे। वो सब को देता है और जो कुछ मिलता है उसको सही तरीके से लगाता है।
Mantra 9
अग्ने पत्नीरिहा वह देवानामुशतीरुप । त्वष्टारं सोमपीतये ॥
अग्नि, देवियों को यहाँ लाओ। वो सब आने के लिए तैयार हैं। और त्वष्ट्र को भी लाओ, सोम पीने के लिए।
Mantra 10
आ ग्ना अग्न इहावसे होत्रां यविष्ठ भारतीम् । वरूत्रीं धिषणां वह ॥
अग्नि, हमारे काम के लिए देवियों को यहाँ लाओ। भारती, वरूत्री, धिषणा, इन तीनों को हमारे पास लाओ।
Mantra 11
अभि नो देवीरवसा महः शर्मणा नृपत्नीः । अच्छिन्नपत्राः सचन्ताम् ॥
देवियाँ हमारे आस-पास रहें, हमारे लिए शांति और सुरक्षा लाएँ। वो हमारे साथ चिपकी रहें, हमारा साथ दें।
Mantra 12
इहेन्द्राणीमुप ह्वये वरुणानीं स्वस्तये । अग्नायीं सोमपीतये ॥
मैं इंद्राणी को बुला रहा हूँ, वरुणानी को भी, भले के लिए। और अग्नायी को भी, सोम पीने के लिए।
Mantra 13
मही द्यौः पृथिवी च न इमं यज्ञं मिमिक्षताम् । पिपृतां नो भरीमभिः ॥
आसमान और धरती दोनों मिल के यह यज्ञ को बड़ा करें। यह दोनों हमारे लिए ताकत भरें जो हमे सारे काम में संभाल के रखें।
Mantra 14
तयोरिद्घृतवत्पयो विप्रा रिहन्ति धीतिभिः । गन्धर्वस्य ध्रुवे पदे ॥
आसमान और धरती का दूध जैसे घी में मिला हो, वैसा है। रिशि लोग अपने सोच से उसका स्वाद लेते हैं। यह वो जगह है जहाँ खुशी पक्की रहती है।
Mantra 15
स्योना पृथिवि भवानृक्षरा निवेशनी । यच्छा नः शर्म सप्रथः ॥
हे धरती, तुम हमारे लिए अच्छी बन जाओ। तुम हमे कोई तकलीफ मत देना। हमे ऐसा घर और आराम दे जो फैला हुआ हो और सुरक्षित हो।
Mantra 16
अतो देवा अवन्तु नो यतो विष्णुर्विचक्रमे । पृथिव्याः सप्त धामभिः ॥
इसलिए देवता हमे बचाएं। विष्णु ने वहाँ कदम रखा था जहाँ से वो धरती के सात हिस्सों में फैल गए थे।
Mantra 17
इदं विष्णुर्वि चक्रमे त्रेधा नि दधे पदम् । समूळ्हमस्य पांसुरे ॥
विष्णु ने आगे कदम बढ़ाया। उन्होंने तीन जगह अपना कदम रखा। एक कदम तो धूल में छुपा हुआ है, कोई नहीं देख सकता।
Mantra 18
त्रीणि पदा वि चक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्यः । अतो धर्माणि धारयन् ॥
विष्णु ने तीन कदम चल के दिखाया। वो सबकी रक्षा करता है, कभी फेल नहीं होता। उसके इस काम से धरम बना रहता है।
Mantra 19
विष्णोः कर्माणि पश्यत यतो व्रतानि पस्पशे । इन्द्रस्य युज्यः सखा ॥
विष्णु के काम को देखो। उसने धरम के नियम सामने रख दिए। वो इंद्र का साथी है, दोनों मिलकर ताकत ले के चलते हैं।
Mantra 20
तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः । दिवीव चक्षुराततम् ॥
विष्णु का सबसे ऊँचा पद रिशियों को हमेशा दिखाई देता है। जैसे आसमान में कोई आँख खुली हो, वैसे वो स्थान साफ नज़र आता है।
Mantra 21
तद्विप्रासो विपन्यवो जागृवांसः समिन्धते । विष्णोर्यत्परमं पदम् ॥
रिशि लोग जाग के विष्णु के उस ऊँचे पद को पुकारते हैं। वो उसको अपने अंदर जगाना चाहते हैं, सब मिलकर उसी में लगे हैं।
A direct dawn-call: awaken the dawn-yoked Aśvins and invite them to the Soma-drink (RV 1.22.1).
Requests broaden from arrival and drinking to ongoing protection, shelter, and supportive divine companionship, including feminine sustaining powers described as ‘queens’ (nṛpatnīḥ).
The hymn’s peak is the famous contemplative turn: the wakeful seers kindle the vision of “Viṣṇu’s highest step” (RV 1.22.21).
The movement resolves in steadied assurance—divine help and shelter culminate in a fixed supreme ‘station’ (padam) as the inner goal and ritual remembrance.
prātaryujā … aśvināv eha gacchatām
अभि नो देवीरवसा महः शर्मणा नृपत्नीः । अच्छिन्नपत्राः सचन्ताम् ॥viṣṇor yat paramaṃ padam
It begins by calling the Aśvins at dawn to come and drink Soma, asking for help, healing, and protection. It then rises to a higher vision centered on Viṣṇu’s “highest step,” a symbol of the supreme spiritual station.
The Aśvins are “dawn-yoked” powers—swift helpers who arrive with the first light. In ritual terms, dawn is the natural time to invite them to the morning Soma offering and to seek an auspicious start, clarity, and well-being.
Literally it is “Viṣṇu’s highest step/abode.” In the hymn it points to the supreme, stable standpoint that awakened seers strive to kindle and realize—both as a cosmic truth and as an inner goal of consciousness.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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