Sukta 1.127
स हि शर्धो न मारुतं तुविष्वणिरप्नस्वतीषूर्वरास्विष्टनिरार्तनास्विष्टनिः । आदद्धव्यान्याददिर्यज्ञस्य केतुरर्हणा । अध स्मास्य हर्षतो हृषीवतो विश्वे जुषन्त पन्थां नरः शुभे न पन्थाम् ॥
sá hí śárdho ná mārútam tuví-svaṇír ápnāsvatīṣv urvárāsv iṣṭanír ā́rtanāsv iṣṭaníḥ | ā́dad dhavyā́ny ā́dadír yajñásya ketúr arhā́ṇā | ádha smā́sya hárṣato hṛ́ṣīvato víśve juṣanta pánthāṃ nárāḥ śubhé ná pánthām ||
अग्नि मरुत जैसी सेना है, ज़ोर से आवाज़ करता है। काम के खेत में वो सबसे आगे चलता है। मुश्किल वक़्त में भी वो सबसे आगे रहता है। वो हमारी भेंट ले लेता है। यज्ञ का निशान है वो, उसकी पूजा करनी चाहिए। जब वो खुश होता है और ताकत से भरा होता है, सब लोग उसके रास्ते पे चलने को तैयार हो जाते हैं। वो रास्ता अच्छा होता है।
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