Sukta 1.127
तमस्य पृक्षमुपरासु धीमहि नक्तं यः सुदर्शतरो दिवातरादप्रायुषे दिवातरात् । आदस्यायुर्ग्रभणवद्वीळु शर्म न सूनवे । भक्तमभक्तमवो व्यन्तो अजरा अग्नयो व्यन्तो अजराः ॥
tám asya pṛkṣám úparāsu dhīmahi náktaṃ yáḥ sudárśa-taro divā́tarād áprāyuṣe divā́tarāt | ā́d asyā́yur grábhaṇavad vīḷú śárma ná sūnáve | bhaktám ábhaktam ávo vyánto ajárā agnáyo vyánto ajárāḥ ||
हम उसकी शक्ति को ऊपर वाली जगह याद करते हैं। वो रात में दिन से ज़्यादा चमकता है। वो अंधेरा दूर करता है, दिन से भी ज़्यादा रोशनी देता है। वो हमारी जान को पकड़ के रखता है, जैसे कोई अपने बेटे को सुरक्षित रखता है। वो सब को मदद देता है, जिसको चाहिए उसको मिलता है। यह आग कभी पुरानी नहीं होती, हमेशा चलती रहती है।
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