
Sukta 1.114
Hiraṇyastūpa Āṅgirasa (traditional for RV 1.114)
Rudra
Jagatī
RV 1.114 is a prayer to Rudra—mighty, awe-inspiring, yet profoundly beneficent—asking that his power turn toward healing rather than harm. The hymn seeks peace and wholeness for the entire community: humans (two-footed), cattle (four-footed), and the settlement’s nourishment, progeny, and wellbeing. It culminates in a protective invocation where Rudra, accompanied by the Maruts, is asked to hear the call, with other cosmic powers asked to uphold the boon.
Mantra 1
इमा रुद्राय तवसे कपर्दिने क्षयद्वीराय प्र भरामहे मतीः । यथा शमसद्द्विपदे चतुष्पदे विश्वं पुष्टं ग्रामे अस्मिन्ननातुरम् ॥
हम रुद्र भगवान के लिए अपनी पूजा सामान ले के आए हैं। वोह बहुत ताकत वाले हैं और उनके बाल लंबे हैं। उनके पास बहुत ताकत है। हम उनसे यही दुआ करते हैं कि हमारे गाँव में इंसान और जानवर सब शांति में रहें। कोई बीमारी न हो और सब खुश रहें।
Mantra 2
मृळा नो रुद्रोत नो मयस्कृधि क्षयद्वीराय नमसा विधेम ते । यच्छं च योश्च मनुरायेजे पिता तदश्याम तव रुद्र प्रणीतिषु ॥
रुद्र भगवान हम पर दया करें और हमें खुशी दें। हम उनके आगे सिर झुका के पूजा करते हैं। उनके पास जो ताकत है उसका हम सम्मान करते हैं। हमारे पुरखे मनु भी यही शांति और अच्छा माँगते थे। रुद्र भगवान हमें भी वही अच्छा रास्ता दिखाएं।
Mantra 3
अश्याम ते सुमतिं देवयज्यया क्षयद्वीरस्य तव रुद्र मीढ्वः । सुम्नायन्निद्विशो अस्माकमा चरारिष्टवीरा जुहवाम ते हविः ॥
हम रुद्र से यह प्राय करते हैं कि वो हमें अपनी कृपा दे। हम भगवान के लिए यज्ञ करते हैं और रुद्र से बड़ी दया माँगते हैं। रुद्र, तुम जो बलवान हो, हमारे घर आओ। हमारे दुश्मन को दूर करो। हम तुम्हे पूजा के साथ बुलाते हैं। हमारी जान को सुरक्षित रखना।
Mantra 4
त्वेषं वयं रुद्रं यज्ञसाधं वङ्कुं कविमवसे नि ह्वयामहे । आरे अस्मद्दैव्यं हेळो अस्यतु सुमतिमिद्वयमस्या वृणीमहे ॥
हम रुद्र को बुलाते हैं वो हमारे काम आए। रुद्र यज्ञ को पूरा करता है और वो बड़ा तेज है। भगवान का गुस्सा हमसे दूर हो। हम सिर्फ उनकी कृपा चाहते हैं। वो हमारे ऊपर मेहरबानी करें।
Mantra 5
दिवो वराहमरुषं कपर्दिनं त्वेषं रूपं नमसा नि ह्वयामहे । हस्ते बिभ्रद्भेषजा वार्याणि शर्म वर्म च्छर्दिरस्मभ्यं यंसत् ॥
हम रुद्र को नमस्ते करते हैं। वो आसमान का देवता है, चमकता हुआ सूरज जैसा। उनके हाथ में दवाई है जो लोगों को ठीक करती है। वो हमारे लिए सुरक्षा का काम करें। हमें छुपा के रखें और बुराई से बचाएं।
Mantra 6
इदं पित्रे मरुतामुच्यते वचः स्वादोः स्वादीयो रुद्राय वर्धनम् । रास्वा च नो अमृत मर्तभोजनं त्मने तोकाय तनयाय मृळ ॥
यह बात मरुत के पिता के लिए है। रुद्र के लिए यह बड़ा मीठा है और उनको ताकत देता है। भगवान, तुम हमें भी खाना दो जो इंसान खा सकें। हमारी जान पर, हमारे बच्चों पर, हमारी आने वाली पीढ़ी पर दया करो।
Mantra 7
मा नो महान्तमुत मा नो अर्भकं मा न उक्षन्तमुत मा न उक्षितम् । मा नो वधीः पितरं मोत मातरं मा नः प्रियास्तन्वो रुद्र रीरिषः ॥
रुद्र, हमारी बड़ी ताकत को मत तोड़ना। हमारे छोटे काम को भी मत तोड़ना। जो उग रहा है उसको मत मारना, जो बढ़ चुका है उसको भी नहीं। हमारे बाप को मत मारना, हमारी माँ को भी नहीं। हमारे शरीर को दुखी मत करना।
Mantra 8
मा नस्तोके तनये मा न आयौ मा नो गोषु मा नो अश्वेषु रीरिषः । वीरान्मा नो रुद्र भामितो वधीर्हविष्मन्तः सदमित्त्वा हवामहे ॥
रुद्र भगवान से यह प्रार्थना है कि वो हमारे बच्चों को तकलीफ न दे। हमारी जान में, हमारे पशुओं में, हमारे घोड़ों में कोई हानि न हो। जब वो गुस्सा में भी हो तो हमारे वीरों को मात मारे। हम हमेशा पूजा के साथ उन्हे बुलाते हैं।
Mantra 9
उप ते स्तोमान्पशुपा इवाकरं रास्वा पितर्मरुतां सुम्नमस्मे । भद्रा हि ते सुमतिर्मृळयत्तमाथा वयमव इत्ते वृणीमहे ॥
मैंने अपनी पूजा और स्तुति रुद्र के पास ले कर रख दी है। जैसे कोई अपने पशुओं को उनके मालिक के पास लाता है। मरुत देवताओं के पिता, हमें अपनी कृपा दे। आपकी मेहरबानी बहुत अच्छी है। इसलिए हम सिर्फ आपकी शरण लेते हैं।
Mantra 10
आरे ते गोघ्नमुत पूरुषघ्नं क्षयद्वीर सुम्नमस्मे ते अस्तु । मृळा च नो अधि च ब्रूहि देवाधा च नः शर्म यच्छ द्विबर्हाः ॥
रुद्र, आप हमारे धन और शक्ति को मत तोड़ो। आप हमारे वीरों को जीने दीजिए। आपकी कृपा हम पर बनी रहे। आप ऊपर से हमें आशीर्वाद दीजिए। हमें शांति और सुरक्षा प्रदान करें।
Mantra 11
अवोचाम नमो अस्मा अवस्यवः शृणोतु नो हवं रुद्रो मरुत्वान् । तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः ॥
हमने रुद्र को नमन किया है और उनसे सुरक्षा मांगी है। रुद्र और मरुत देवता हमारी पूजा सुन लें। मित्र और वरुण देवता हमारी बात को बड़ा करें। अदिति, नदी, धरती और आसमान सब हमारे साथ हों।
The hymn opens by bearing ‘thought-offerings’ (matīḥ) to Rudra, requesting peace and uninjured nourishment for the whole settlement—two-footed and four-footed alike.
Praise intensifies: Rudra is honored as powerful and as the Maruts’ father, while the poet repeatedly pivots from awe to supplication—asking for amṛta-like support and ‘mortal nourishment’ that sustains life, children, and lineage.
A direct plea for Rudra’s graciousness (mṛḻa) and attentive hearing—Rudra ‘with the Maruts’ is asked to receive the call and convert dangerous force into protection and vitality.
The hymn closes with a spoken namas and a widening circle of support: Mitra-Varuṇa, Aditi, Sindhu, Earth, and Heaven are invoked to uphold the granted protection and prosperity.
śam asad dvipade catuṣpade
इदं पित्रे मरुतामुच्यते वचः स्वादोः स्वादीयो रुद्राय वर्धनम् । रास्वा च नो अमृत मर्तभोजनं त्मने तोकाय तनयाय मृळ ॥avocāma namo asmā
It asks Rudra to grant peace, health, and freedom from affliction, especially for the whole community—people, cattle, food supply, and the continuity of children and lineage.
It is a Vedic way of including everyone in the settlement: humans (two-footed) and animals like cattle (four-footed), so wellbeing is complete and shared.
The closing invokes Mitra-Varuṇa, Aditi, Sindhu, Earth, and Heaven as witnesses and supporters, reinforcing that the requested protection is upheld by the wider cosmic order.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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