Uttara KandaPrakarana 323 Verses

Prakarana 3

राम-राज्य के आदर्श द्वारा ‘भक्ति-परिणति’ (bhakti’s fruition) का सोपान: साधक के अंतःकरण में शांति, धर्म-स्थैर्य, और लोक-कल्याण का समन्वय। यहाँ मुक्ति-मार्ग केवल वैराग्य नहीं, बल्कि ‘धर्म-समाज’ में प्रेम, न्याय, और राम-नाम-स्मरण की सतत धारा बनकर प्रकट होता है—यही उत्तरकाण्ड का सोपान-स्वरूप है।

यह प्रकरण ‘राम-राज्य’ को भक्ति-परिणति का सामाजिक रूपक बनाता है: (1) निषाद को बुलाकर भूषण-वस्त्र देना—कृपा का ‘दृश्य’ रूप, जहाँ प्रेम और सम्मान से सामाजिक दूरी गलती है; भक्ति का प्रमाण जाति/वर्ग नहीं, हृदय-समर्पण है। (2) ‘प्रसाद’—राजकीय दान नहीं, ईश्वरीय अनुग्रह का चिह्न; भक्त के जीवन में धर्म-स्थैर्य और आत्मविश्वास का बीज। (3) ‘जाहु भवन मम सुमिर…’—गृहस्थ-धर्म के भीतर नाम-स्मरण की स्थापना: मुक्ति-मार्ग पलायन नहीं, घर-समाज में राम-भाव का निरन्तर प्रवाह। (4) रामराज्य-वर्णन (शोक-भय-रोग का लय, परस्पर-प्रीति, प्रकृति का सौम्य अनुकूलन)—सृष्टि का शुद्धीकरण: ऐश्वर्य भी सेवा-विनय में ढलकर ‘धर्म के चारि-चरन’ (सत्य, दया, तप/संयम, दान/धर्म-पालन) को पूर्ण करता है।

Verses

चौपाई 20.1-4

पुनि कृपाल लियो बोलि निषादा।दीन्हे भूषन बसन प्रसादा।।

जाहु भवन मम सुमिरन करेहू।मन क्रम बचन धर्म अनुसरेहू।।

तुम्ह मम सखा भरत सम भ्राता।सदा रहेहु पुर आवत जाता।।

बचन सुनत उपजा सुख भारी।परेउ चरन भरि लोचन बारी।।

चरन नलिन उर धरि गृह आवा।प्रभु सुभाउ परिजनन्हि सुनावा।।

रघुपति चरित देखि पुरबासी।पुनि पुनि कहहिं धन्य सुखरासी।।

राम राज बैंठें त्रेलोका।हरषित भए गए सब सोका।।

बयरु न कर काहू सन कोई।राम प्रताप बिषमता खोई।।

puni kṛpāla liyo boli niṣādā |dīnhe bhūṣana basana prasādā ||

jāhu bhavana mama sumirana karehū |mana krama bacana dharma anusarehū ||

tumha mama sakhā bharata-sama bhrātā |sadā rahehu pura āvata jātā ||

bacana sunata upajā sukha bhārī |pareu carana bhari locana bārī ||

carana nalina ura dhari gṛha āvā |prabhu subhāu parijananhĩ sunāvā ||

raghupati carita dekhi purabāsī |puni-puni kahahĩ dhanya sukha-rāsī ||

rāma-rāja baĩṭhẽ trelokā |haraṣita bhae gae saba sokā ||

bayaru na kara kāhū sana koī |rāma pratāpa biṣamatā khoī ||

फिर राम ने निषाद को बुलाया और उसको कपड़े और गहने दिए, एक तरह से उपहार के रूप में। राम बोले, घर जाना और मेरा नाम याद करना। सोच में, बोल में और काम में, धरम के रास्ते पर चलना। तुम मेरा दोस्त हो, और भरत की तरह मेरा भाई। हमेशा शहर में आते जाते रहना। यह बातें सुनकर उसको बहुत खुशी हुई। आँखों में आँसू भर आए और राम के चरणों में गिर गया। राम के चरण अपने दिल में लेकर वो घर आया। अपने घर वालों को राम के अच्छे स्वभाव की बात बताई। शहर वालों ने रघु कुल के प्रभु के किस्से देखे। बार बार बोले, राम बहुत धन्य है, खुशी का खजाना है। राम रजगद्दी पर बैठे, तो तीनों लोक खुश हो गए। सब का दुख गयाब हो गया। किसी ने किसी से कोई दुश्मनी नहीं रखी। राम की ताकत से सारी कलेश खत्म हो गई।

दोहा 20

बरनाश्रम निज निज धरम बनिरत बेद पथ लोग।चलहिं सदा पावहिं सुखहि नहिं भय सोक न रोग।।⁠20।।

baranāśrama nija-nija dharama bani-rata beda patha loga |calahĩ sadā pāvahĩ sukhahi nahĩ bhaya soka na roga ||⁠20||

लोग अपने अपने वर्ण और आश्रम के धरम में टिके हुए हैं, और हमेशा वेदों के रास्ते पर चलते हैं। इससे उन्हें सुख मिलता है, कोई डर नहीं, कोई दुख नहीं, और कोई बीमारी नहीं होती।

चौपाई 21.1-4

दैहिक दैविक भौतिक तापा।राम राज नहिं काहुहि ब्यापा।।

सब नर करहिं परस्पर प्रीती।चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती।।

चारिउ चरन धर्म जग माहीं।पूरि रहा सपनेहुँ अघ नाहीं।।

राम भगति रत नर अरु नारी।सकल परम गति के अधिकारी।।

अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा।सब सुंदर सब बिरुज सरीरा।।

नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना।नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना।।

सब निर्दंभ धर्मरत पुनी।नर अरु नारि चतुर सब गुनी।।

सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी।सब कृतग्य नहिं कपट सयानी।।

daihika daivika bhautika tāpā |rāma rāja nahĩ kāhuhi byāpā ||

saba nara karahĩ paraspara prītī |calahĩ svadharma nirata śruti nītī ||

cāriu carana dharma jaga māhī̃ |pūri rahā sapanehũ agha nāhī̃ ||

rāma bhagati rata nara aru nārī |sakala parama gati ke adhikārī ||

alpa-mṛtyu nahĩ kavanīu pīrā |saba suṃdara saba biruja sarīrā ||

nahĩ daridra kou dukhī na dīnā |nahĩ kou abudha na lacchana hīnā ||

saba nirdaṃbha dharmarata punī |nara aru nāri catura saba gunī ||

saba gunagya paṇḍita saba gyānī |saba kṛtagya nahĩ kapaṭa sayānī ||

राम के राज में किसी को कोई तकलीफ नहीं पहुँची। ना शरीर की, ना भगवान की तरफ से, ना किसी और इंसान की वजह से। सब लोग एक दूसरे से प्यार करते थे। हर कोई अपना धरम फॉलो करता था, और वेदों की बातों और नियमों में लगे रहते थे। धरम पूरी दुनिया में चारों पैरों पर खड़ा था, हर जगह फैला हुआ था। सपने में भी किसी ने कोई पाप नहीं किया। सब मर्द और औरतें राम की भक्ति में लगे थे, और सबको सबसे ऊँचे स्थान का अधिकार था। किसी की जल्दी मौत नहीं हुई, किसी को कोई दर्द नहीं हुआ। सब सुंदर थे, और सबकी बॉडी बिमारी से फ्री थी। कोई गरीब नहीं था, कोई दुखी या बेबस नहीं था। कोई अनपढ़ नहीं था, और किसी के पास अच्छे निशान की कमी नहीं थी। सब ढोंग से फ्री थे, धरम में लगे थे। सब मर्द और औरतें समझदार और गुणी थे। सब गुणों की कदर करते थे, सब पढ़े लिखे थे, सब ज्ञानी थे। सब एहसान मंद थे, और कोई चालक या ढोंगी नहीं था।

दोहा 21

राम राज नभगेस सुनु सचराचर जग माहिं।काल कर्म सुभाव गुन कृत दुख काहुहि नाहिं।।⁠21।।

rāma-rāja nabhageśa sunu sacarācara jaga māhiṃ |kāla karma subhāva guna kṛta dukha kāhuhi nāhiṃ ||⁠21||

सुन गरुड़, तुम पंछियों के राजा हो। राम के राज में इस दुनिया के सब जीव, जो चलते हैं और जो नहीं चलते, किसी को कोई दुख नहीं होता। ना वक्त की वजह से, ना पुराने कर्मों की वजह से, ना स्वभाव की वजह से, ना गुणों की वजह से किसी को दुख नहीं होता।

चौपाई 22.1-4

भूमि सप्त सागर मेखला।एक भूप रघुपति कोसला।।

भुअन अनेक रोम प्रति जासू।यह प्रभुता कछु बहुत न तासू।।

सो महिमा समुझत प्रभु केरी।यह बरनत हीनता घनेरी।।

सोउ महिमा खगेस जिन्ह जानी।फिरी एहिं चरित तिन्हहुँ रति मानी।।

सोउ जाने कर फल यह लीला।कहहिं महा मुनिबर दमसीला।।

राम राज कर सुख संपदा।बरनि न सकइ फनीस सारदा।।

सब उदार सब पर उपकारी।बिप्र चरन सेवक नर नारी।।

एकनारि ब्रत रत सब झारी।ते मन बच क्रम पति हितकारी।।

bhūmi sapta sāgara mekhalā |eka bhūpa raghupati kosalā ||

bhuana aneka roma prati jāsu |yaha prabhutā kachu bahuta na tāsu ||

so mahimā samujhata prabhu kerī |yaha baranata hīnatā ghanerī ||

sou mahimā khageśa jinha jānī |phirī ehiṃ carita tinhahuṃ rati mānī ||

sou jāne kara phala yaha līlā |kaha-hiṃ mahā munibara damasīlā ||

rāma rāja kara sukha saṃpadā |barani na sakai phanīsa sārādā ||

saba udāra saba para upakārī |bipra carana sevaka nara nārī ||

eka-nāri vrata rata saba jhārī |te mana baca krama pati hitakārī ||

सात समुंदर से घेरी हुई ज़मीन का एक ही राजा था, राम, जो कोसल पे राज करते थे। उनके शरीर के एक एक रोम में अनेक दुनिया हैं। तो ज़मीन का राज करना उनके लिए कोई बड़ी बात नहीं है। जो भगवान की असली महिमा समझता है, उसके लिए उन्हें ऐसे बताना उनका बहुत बड़ा अपमान है। फिर भी गरुड़, जिन्होंने वो महिमा जानी है, उन्होंने भी मुड़ कर उनके किस्से की कहानी में आनंद लिया है। बड़े बड़े रिशि, जो अपने उपर कंट्रोल रखते हैं, वो कहते हैं कि भगवान की ये लीला ही उस ग्यान का फल है। नाग राजा और सारदा दोनों नहीं बता सकते कि राम के राज में कितना सुख और तरक्की थी। सब लोग उदार थे, सब दूसरों का भला करते थे, और सब, मर्द और औरत, ब्राह्मन के चरणों की सेवा करते थे। हर आदमी एक बीवी वाले व्रत में पूरी तरह लगा था, और बीवियां अपने मन, बोली और करम से अपने पति का भला चाहती थी।

दोहा 22

दंड जतिन्ह कर भेद जहँ नर्तक नृत्य समाज।जीतहु मनहि सुनिअ अस रामचंद्र कें राज।।⁠22।।

daṃḍa jatinha kara bheda jahaṃ nartaka nṛtya samāja |jītahu manahi suni-a asa rāmacandra keṃ rāja ||⁠22||

राम के राज में सब कुछ ठीक था। सजा सिर्फ रिशि लोगों के बारे में सुनाई देती थी, वो भी उनकी लाठी की तरह। फर्क सिर्फ नचने वालों के ग्रुप में होता था, वो भी नाच के स्टेप्स का। और जीत की बात सिर्फ तब होती थी जब कोई अपने मन को जीत रहा होता। राम का राज ऐसा था।

चौपाई 23.1-5

फूलहिं फरहिं सदा तरु कानन।रहहि एक सँग गज पंचानन।।

खग मृग सहज बयरु बिसराई।सबन्हि परस्पर प्रीति बढ़ाई।।

कूजहिं खग मृग नाना बृंदा।अभय चरहिं बन करहिं अनंदा।।

सीतल सुरभि पवन बह मंदा।गूंजत अलि लै चलि मकरंदा।।

लता बिटप मागें मधु चवहीं।मनभावतो धेनु पय स्रवहीं।।

ससि संपन्न सदा रह धरनी।त्रेताँ भइ कृतजुग कै करनी।।

प्रगटीं गिरिन्ह बिबिध मनि खानी।जगदातमा भूप जग जानी।।

सरिता सकल बहहिं बर बारी।सीतल अमल स्वाद सुखकारी।।

सागर निज मरजादाँ रहहीं।डारहिं रत्न तटन्हि नर लहहीं।।

सरसिज संकुल सकल तड़ागा।अति प्रसन्न दस दिसा बिभागा।।

phūlahiṃ pharahiṃ sadā taru kānana |rahahi eka saṅga gaja pañcānana ||

khaga mṛga sahaja bayaru bisarāī |sabanhi paraspara prīti baṛhāī ||

kūjahiṃ khaga mṛga nānā bṛndā |abhaya carahiṃ bana karahiṃ anaṃdā ||

sītala surabhi pavana baha maṃdā |gūṃjata ali lai cali makaraṃdā ||

latā biṭapa māgeṃ madhu cavahīṃ |manabhāvato dhenu paya sravahīṃ ||

sasi saṃpanna sadā raha dharanī |tretāṃ bhi kṛta-juga kai karanī ||

pragaṭīṃ girinha bibidha mani khānī |jagadātamā bhūpa jaga jānī ||

saritā sakala bahahiṃ bara bārī |sītala amala svāda sukhakārī ||

sāgara nija marajādāṃ rahahīṃ |ḍārahiṃ ratna taṭanhi nara lahahīṃ ||

sarasija saṃkula sakala taṛāgā |ati prasanna dasa disā bibhāgā ||

जंगल के पेड़ हमेशा फूल और फल देते रहे. हाथी और शेर साथ में रहते थे, बिना किसी डर के. पंछी और जानवर अपना पुराना दुश्मन भूल गए. सब एक दूसरे से प्यार बढ़ाने लगे. पंछी झुंड में झनकते थे, और हिरण लोग डर के बिना जंगल में घूमते थे. सब खुश थे. ठंडी और खुशबू वाली हवा धीरे से चलती थी. भँवरे गुन गुनाते हुए फूल का रस ले जाते थे. लता और पेड़ माँगे तो मध छोटे. गाय अपनी मर्जी से दूध देती रहती थी. ज़मीन हमेशा फसल से भरी रहती थी. त्रेता युग में सतयुग वाला सिस्टम चल रहा था. पहाड़ों में तरह तरह के नगीना की खान निकल आई. दुनिया अपने राजा को जगत की आत्मा मानने लगी. सारी नदियाँ पानी बहती थी, जो ठंडा, साफ और मीठा था, और सुख देता था. समुंदर अपनी लिमिट में रहता था. किनारे पर नगीना फेंकता था, जो लोग उठा लेते थे. सारे ताल कमल से भरे हुए थे. दसों दिशाएँ बहुत खुश थी.

दोहा 23

बिधु महि पूर मयूखन्हि रबि तप जेतनेहि काज।मागें बारिद देहिं जल रामचंद्र के राज।।⁠23।।

bidhu mahi pūra mayūkhanhi rabi tapa jetanehi kāja |māgeṃ bārida dehiṃ jala rāmacandra ke rāja ||⁠23||

राम के राज में चाँद की रोशनी पूरी ज़मीन पर फैली थी। सूरज सिर्फ़ इतनी गर्मी देता जितनी ज़रूरत थी। बादल जब भी पानी माँगे, बरस देते थे।

चौपाई 24.1-5

कोटिन्ह बाजिमेध प्रभु कीन्हे।दान अनेक द्विजन्ह कहँ दीन्हे।।

श्रुति पथ पालक धर्म धुरंधर।गुनातीत अरु भोग पुरंदर।।

पति अनुकूल सदा रह सीता।सोभा खानि सुसील बिनीता।।

जानति कृपासिंधु प्रभुताई।सेवति चरन कमल मन लाई।।

जद्यपि गृहँ सेवक सेवकिनी।बिपुल सदा सेवा बिधि गुनी।।

निज कर गृह परिचरजा करई।रामचंद्र आयसु अनुसरई।।

जेहि बिधि कृपासिंधु सुख मानइ।सोइ कर श्री सेवा बिधि जानइ।।

कौसल्यादि सासु गृह माहीं।सेवइ सबन्हि मान मद नाहीं।।

उमा रमा ब्रह्मादि बंदिता।जगदंबा संततमनिंदिता।।

koṭinh bājimedha prabhu kīnhe |dāna aneka dvijanha kahaṁ dīnhe ||

śruti-patha pālaka dharma dhuraṁdhara |guṇātīta aru bhoga puraṁdara ||

pati anukūla sadā raha sītā |sobhā khāni suśīla binītā ||

jānati kṛpāsiṁdhu prabhutāī |sevati carana kamala mana lāī ||

jadyapi gṛhaṁ sevaka sevakinī |bipula sadā sevā bidhi gunī ||

nija kara gṛha paricarajā karaī |rāmacandra āyasu anusaraī ||

jehi bidhi kṛpāsiṁdhu sukha mānai |soi kara śrī sevā bidhi jānai ||

kausalyādi sāsu gṛha māhīṁ |sevai sabanhi māna mada nāhīṁ ||

umā ramā brahmādi baṁditā |jagadambā saṁtata-maninditā ||

भगवान ने लाखों अश्वमेध यज्ञ किए, और बहुत सारे ब्राह्मण को दान दिया। वो वेद के रस्ते की रक्षा करते थे, धरम का बोझ उठाने वाले सबसे आगे थे, गुणों से परे थे, और सुख भोग में इंद्र जैसे थे। सीता हमेशा अपने पति की मर्जी के हिसाब से रहती थी, सुंदरता का खदान थी, अच्छे स्वभाव वाली और विनम्र थी। वो राम की महिमा को जानती थी, और अपना मन लगाकर उनके चरणों की सेवा करती थी। घर में बहुत से नौकर और नौकरानियां थे, जो हमेशा सेवा के तरीके में निपुण थे। फिर भी वो अपने हाथ से घर की सेवा करती थी, राम के हुकुम के हिसाब से चलती थी। राम को जिस तरह से सुख मिलता था, सीता उसी तरह की सेवा को जानती थी और वही करती थी। घर में सासुओं की सेवा करती थी, कौसल्या और बाकी सबकी, बिना किसी घमंड या अहंकार के। उमा, वो सीता ही लक्ष्मी है, ब्रह्मा और बाकी देवता उनकी पूजा करते हैं, वो दुनिया की मां हैं, हमेशा किसी बुराई से परे हैं।

दोहा 24

जासु कृपा कटाच्छु सुर चाहत चितव न सोइ।राम पदारबिंद रति करति सुभावहि खोइ।।⁠24।।

jāsu kṛpā kaṭācchu sur cāhata citava na soi |rāma padārabiṁda rati karati subhāvahi khoi ||⁠24||

देवता भी उसकी एक नजर के लिए तरसते हैं, पर वो उनकी तरफ देखती भी नहीं। सीता अपना प्यार राम के चरणों में लगा देती है, अपने भक्ति के स्वभाव में खो कर।

चौपाई 25.1-4

सेवहिं सानकूल सब भाई।राम चरन रति अति अधिकाई।।

प्रभु मुख कमल बिलोकत रहहीं।कबहुँ कृपाल हमहि कछु कहहीं।राम करहिं भ्रातन्ह पर प्रीती।नाना भाँति सिखावहिं नीती।।

हरषित रहहिं नगर के लोगा।करहिं सकल सुर दुर्लभ भोगा।।

अहनिसि बिधिहि मनावत रहहीं।श्रीरघुबीर चरन रति चहहीं।।

दुइ सुत सुन्दर सीताँ जाए।लव कुस बेद पुरानन्ह गाए।।

दोउ बिजई बिनई गुन मंदिर।हरि प्रतिबिंब मनहुँ अति सुंदर।।

दुइ दुइ सुत सब भ्रातन्ह केरे।भए रूप गुन सील घनेरे।।

sevahiṁ sānakūla saba bhāī |rāma carana rati ati adhikāī ||

prabhu mukha kamala bilokata rahahīṁ |kabahuṁ kṛpāla hamahi kachu kahahīṁ ||

rāma karahiṁ bhrātanha para prītī |nānā bhāṁti sikhāvahiṁ nītī ||

haraṣita rahahiṁ nagara ke logā |karahiṁ sakala sur durlabha bhogā ||

ahanisi bidhihi manāvata rahahīṁ |śrīraghubīra carana rati cahahīṁ ||

dui suta sundara sītāṁ jāe |lava kusa beda purānanha gāe ||

dou bijaī binaī guna maṁdira |hari pratibiṁba manahuṁ ati suṁdara ||

dui dui suta saba bhrātanha kere |bhae rūpa guṇa sīla ghanere ||

सारे भाई मिलकर उसकी सेवा करते थे। उनका राम के चरणों में प्रेम बहुत ज्यादा था। वो भगवान के चेहरे को देखते रहते थे। सोचते थे कि शायद राम हमें कुछ कहें। राम अपने भाइयों से बहुत प्रेम करते थे। और उन्हें कई तरह से सही तरीका सिखाते थे। शहर के लोग खुशी में रहते थे। और वो सब सुख भोगते थे जो देवताओं को भी मुश्किल से मिलता है। दिन रात वो ब्रह्मा की पूजा करते रहते थे। और राम के चरणों में भक्ति मांगते थे। सीता के दो सुंदर बेटे हुए, लव और कुश। जिन्हें वेद और पुरान ने गाया है। दोनों विजयी और विनम्र थे, गुणों का घर थे। और बहुत सुंदर थे, जैसे हरि का ही प्रतिबिंब हो। बाकी सब भाइयों के भी दो दो बेटे थे। वो रूप, गुण और अच्छे चरित्र में बहुत आगे बढ़े।

दोहा 25

ग्यान गिरा गोतीत अज माया मन गुन पार।सोइ सच्चिदानंद घन कर नर चरित उदार।।⁠25।।

gyāna girā gotīta aja māyā mana guna pāra |soi saccidānanda ghana kara nara carita udāra ||⁠25||

वो जो ग्यान से, बोली से और इंद्रियों से परे है. जो पैदा नही हुआ. और जो माया, मन और गुनो से भी आगे का है. वही सच, चेतना और आनंद का रूप वाला भगवान ने, एक इंसान की तरह बड़े और अच्छे काम किए.

चौपाई 26.1-4

प्रातकाल सरऊ करि मज्जन।बैठहिं सभाँ संग द्विज सज्जन।।

बेद पुरान बसिष्ट बखानहिं।सुनहिं राम जद्यपि सब जानहिं।।

अनुजन्ह संजुत भोजन करहीं।देखि सकल जननीं सुख भरहीं।।

भरत सत्रुहन दोनउ भाई।सहित पवनसुत उपबन जाई।।

बूझहिं बैठि राम गुन गाहा।कह हनुमान सुमति अवगाहा।।

सुनत बिमल गुन अति सुख पावहिं।बहुरि बहुरि करि बिनय कहावहिं।।

सब कें गृह गृह होहिं पुराना।रामचरित पावन बिधि नाना।।

नर अरु नारि राम गुन गानहिं।करहिं दिवस निसि जात न जानहिं।।

prātakāla saraū kari majjana |baiṭhahiṁ sabhā̃ saṁga dvija sajjana ||

beda purāna basiṣṭha bakhānahiṁ |sunahiṁ rāma jadyapi saba jānahiṁ ||

anujanha saṁjuta bhojana karahīṁ |dekhi sakala jananīṁ sukha bharahīṁ ||

bharata satruhana donau bhāī |sahita pavanasuta upabana jāī ||

būjhahiṁ baiṭhi rāma guna gāhā |kaha hanumāna sumati avagāhā ||

sunata bimala guna ati sukha pāvahiṁ |bahuri bahuri kari binaya kahāvahiṁ ||

saba keṁ gṛha gṛha hohiṁ purānā |rāmacarita pāvana bidhi nānā ||

nara aru nāri rāma guna gānahiṁ |karahiṁ divasa nisi jāta na jānahiṁ ||

सुबह जल्दी सरयू में नहा के, राम ब्रह्मन और अच्छे लोगों के साथ सभा में बैठते हैं। वसिष्ठ वेद और पुरान समझाते हैं, और राम सुनते हैं, जबकि उन्हें सब पता है। वो अपने छोटे भाइयों के साथ खाना खाते हैं, और सब माँ उन्हें देख के खुश हो जाती हैं। भरत और शत्रुघ्न, दोनों भाई, हनुमान के साथ एक बाग में जाते हैं। वहाँ बैठ के वो राम के गुण के बारे में पूछते हैं, और हनुमान जो बहुत समझदार हैं, वो बताते हैं। राम के अच्छे गुण सुन के वो बहुत खुश होते हैं, और बार बार हनुमान से कहते हैं कि और भी बताएं। हर घर में पुरान पढ़े जाते हैं, और राम के अच्छे काम अलग अलग तरीके से बताए जाते हैं। आदमी भी और औरतें भी राम के गुण गाते हैं, और उन्हें पता भी नहीं चलता कि दिन रात गुजर रहा है।

दोहा 26

अवधपुरी बासिन्ह कर सुख संपदा समाज।सहस सेष नहिं कहि सकहिं जहँ नृप राम बिराज।।⁠26।।

avadhapurī bāsinh kara sukha saṃpadā samāja |sahasa seṣa nahiṃ kahi sakahiṃ jahã nr̥pa rāma birāja ||⁠26||

अयोध्या में जो लोग रहते थे, उनका खुशाली, दौलत और सब तरह की चमक, यहाँ राजा राम राज कर रहे थे. इतना सब कुछ बता नहीं सकते हज़ार शेष भी.

चौपाई 27.1-4

नारदादि सनकादि मुनीसा।दरसन लागि कोसलाधीसा।।

दिन प्रति सकल अजोध्या आवहिं।देखि नगरु बिरागु बिसरावहिं।।

जातरूप मनि रचित अटारीं।नाना रंग रुचिर गच ढारीं।।

पुर चहुँ पास कोट अति सुंदर।रचे कँगूरा रंग रंग बर।।

नव ग्रह निकर अनीक बनाई।जनु घेरी अमरावति आई।।

महि बहु रंग रचित गच काँचा।जो बिलोकि मुनिबर मन नाचा।।

धवल धाम ऊपर नभ चुंबत।कलस मनहुँ रबि ससि दुति निंदत।।

बहु मनि रचित झरोखा भ्राजहिं।गृह गृह प्रति मनि दीप बिराजहिं।।

nārada-ādi sanakādi munīsā |darasana lāgi kosalādhīsā ||

dina prati sakala ajodhyā āvahiṃ |dekhi nagaru birāgu bisarāvahiṃ ||

jāta-rūpa mani racita aṭārīṃ |nānā raṅga rucira gaca ḍhārīṃ ||

pura cahũ pāsa koṭ ati suṃdara |race kaṅgūrā raṅga raṅga bara ||

nava graha nikara anīka banāī |janu gherī amarāvatī āī ||

mahi bahu raṅga racita gaca kā̃cā |jo biloki munibara mana nācā ||

dhavala dhāma ūpara nabha cuṃbata |kalasa manahũ rabi sasi duti niṃdata ||

bahu mani racita jharokhā bhrājahĩ |gṛha gṛha prati mani dīpa birājahĩ ||

नारद और दूसरे रिशि, और सनक और उनके भाई, सबसे बड़े मुनि, कोसल के स्वामी को देखने के लिए आए। रोज़ सब अयोध्या आते हैं, और शहर देख कर अपना जग से अलग रहना भूल जाते हैं। महल सोने और नग से बने हैं, और खूबसूरत फर्श कई रंग के हैं। शहर के चारो तरफ एक बहुत खूबसूरत दीवार है, जिसके कंगुरे हर रंग से सजाए गए हैं। जैसे नव ग्रह की सेना लड़ी गई हो और अमरावती को घेर ले आई हो। ज़मीन पर काँच का फर्श कई रंग में बिछा है, देख कर बड़े रिशियों का मन खुशी से नाचता है। सफेद महल ऊपर उठ कर आसमान को छूते हैं, और उनके सोने के कलश सूरज और चाँद की चमक को शर्मिंदा कर देते हैं। कई नग से सजाए झरोखे चमकते हैं, और हर घर में नग का दिया चमकता है।

छंद 27

मनि दीप राजहिं भवन भ्राजहिं देहरीं बिद्रुम रची।मनि खंभ भीति बिरंचि बिरची कनक मनि मरकत खची।।

सुंदर मनोहर मंदिरायत अजिर रुचिर फटिक रचे।प्रति द्वार द्वार कपाट पुरट बनाइ बहु बज्रन्हि खचे।।

mani dīpa rājahiṃ bhavana bhrājahiṃ deharīṃ bidruma racī |mani khaṃbha bhīti birañci biracī kanaka mani marakata khacī ||

suṃdara manohara mandirāyata ajira rucira phaṭika race |prati dvāra dvāra kapāṭa puraṭ banāi bahu bajranhi khace ||

घर में नग वाले दीप जल रहे हैं। घर की देहली लाल मूंगा पत्थर से बनी है। खंभे नग के हैं। दीवारें सोने की हैं और उनमें पन्ना और और भी नग जड़े हुए हैं, जैसे खुद ब्रह्मा ने बनाई हो। महल बहुत सुंदर और दिलकश हैं। उनके बड़े आंगन शीशे से बने हैं और खूबसूरत लगते हैं। हर एक दरवाजे के पट सोने के हैं और उनमें बहुत सारे हीरे जड़े हुए हैं।

दोहा 27

चारु चित्रसाला गृह गृह प्रति लिखे बनाइ।राम चरित जे निरख मुनि ते मन लेहिं चोराइ।।⁠27।।

cāru citrasālā gṛha gṛha prati likhe banāi |rāma carita je nirakha muni te mana lehiṃ corāi ||⁠27||

हर घर में एक खूबसूरत चित्रशाला बनाई गई थी, जिसके दीवारों पर राम के काम दिखाने वाले खूबसूरत चित्र बनाए गए थे। जो रिशि भी उन चित्रों को देखते थे, उनका दिल उनकी तरफ खींच लिया जाता था।

चौपाई 28.1-4

सुमन बाटिका सबहिं लगाई।बिबिध भाँति करि जतन बनाई।।

लता ललित बहु जाति सुहाई।फूलहिं सदा बंसत कि नाई।।

गुंजत मधुकर मुखर मनोहर।मारुत त्रिबिध सदा बह सुंदर।।

नाना खग बालकन्हि जिआए।बोलत मधुर उड़ात सुहाए।।

मोर हंस सारस पारावत।भवननि पर सोभा अति पावत।।

जहँ तहँ देखहिं निज परिछाहीं।बहु बिधि कूजहिं नृत्य कराहीं।।

सुक सारिका पढ़ावहिं बालक।कहहु राम रघुपति जनपालक।।

राज दुआर सकल बिधि चारू।बीथीं चौहट रूचिर बजारू।।

sumana bāṭikā sabahiṃ lagāī |bibidha bhā̃ti kari jatana banāī ||

latā lalita bahu jāti suhāī |phūlahiṃ sadā basaṃta ki nāī ||

guṃjata madhukara mukhara manohara |māruta tri-bidha sadā baha suṃdara ||

nānā khaga bālakanhi jiāe |bolata madhura uṛāta suhāe ||

mora haṃsa sāras pārāvata |bhavanani para sobhā ati pāvata ||

jahã tahã dekhahiṃ nija parichāhīṃ |bahu bidhi kūjahiṃ nr̥tya karāhīṃ ||

suka sārikā paṛhāvahiṃ bālaka |kahahu rāma raghupati jana-pālaka ||

rāja duāra sakala bidhi cāru |bīthīṃ cauhaṭ rucira bajārū ||

सब ने फूलों का बगीचा बना रखा था. बहुत तरह से मेहनत करके उसे सुंदर बनाया था. हर तरह की प्यारी बेलें थी. फूल हमेशा खिलते रहते थे, जैसे बसंत का मौसम कभी खत्म ही ना हो. मधुमक्खियाँ प्यार से गुंजन करती थी. हवा हमेशा चलती थी, ठंडी, नरम और खुशबू वाली, बहुत अच्छी लगती थी. बच्चों ने हर तरह के पक्षी पाले हुए थे. वो मीठे बोलते थे और उड़ते हुए बहुत अच्छे लगते थे. मोर, हंस, सारस और कबूतर सब घर के ऊपर बहुत सुंदर दिख रहे थे. यहाँ वहाँ अपनी ही परछाई देखते थे. बहुत तरह से कूकते थे और नाचते थे. बच्चों ने तोता और मैना को सिखाया. बोले, राम, रघुपति, अपने लोगों की रक्षा करने वाले. राजमहल का दरवाजा हर तरह से सुंदर था. गलियाँ, चौराहा और बाजार सब बहुत खूबसूरत थे.

छंद 28

बाजार रुचिर न बनइ बरनत बस्तु बिनु गथ पाइए।जहँ भूप रमानिवास तहँ की संपदा किमि गाइए।।

बैठे बजाज सराफ बनिक अनेक मनहुँ कुबेर ते।सब सुखी सब सच्चरित सुंदर नारि नर सिसु जरठ जे।।

bājāra rucira na banai baranata bastu binu gatha pāiye |jahã bhūpa ramā-nivāsa tahã kī saṁpadā kimi gāiye ||

baiṭhe bajāja sarāpha banika aneka manahũ kubera te |saba sukhī saba saccarita sundara nāri nara sisu jaraṭha je ||

बाजार इतना सुंदर था कि बता नही जा सकता। वहां हर तरह की चीज बिना पैसे के मिल जाती थी। जहां राजा खुद भगवान हो, जहां लक्ष्मी का घर हो, वहां की दौलत की तारीफ कोई कैसे कर सके? कपडे बेचने वाले, पैसे बदलने वाले, और बहुत दुकानदार अपनी दुकान में बैठे थे, जैसे कई कुबेर बैठे हो। सब खुश थे, सब अच्छे लोग थे, सब सुंदर थे। औरते और मर्द, बच्चे और बूढे, सब एक जैसे।

दोहा 28

उत्तर दिसि सरजू बह निर्मल जल गंभीर।बाँधे घाट मनोहर स्वल्प पंक नहिं तीर।।⁠28।।

uttara disi sarajū baha nirmala jala gambhīra.bā̃dhe ghāṭa manohara svalpa paṅka nahĩ tīra ||⁠28||

उत्तर दिशा में सरजू नदी बह रही है. उसका पानी साफ और गहरा है. किनारे पर सुंदर घात बनाए गए हैं, और किनारे पर ज्यादा कीचड नहीं है.

चौपाई 29.1-4

दूरि फराक रुचिर सो घाटा।जहँ जल पिअहिं बाजि गज ठाटा।।

पनिघट परम मनोहर नाना।तहाँ न पुरुष करहिं अस्नाना।।

राजघाट सब बिधि सुंदर बर।मज्जहिं तहाँ बरन चारिउ नर।।

तीर तीर देवन्ह के मंदिर।चहुँ दिसि तिन्ह के उपबन सुंदर।।

कहुँ कहुँ सरिता तीर उदासी।बसहिं ग्यान रत मुनि संन्यासी।।

तीर तीर तुलसिका सुहाई।बृंद बृंद बहु मुनिन्ह लगाई।।

पुर सोभा कछु बरनि न जाई।बाहेर नगर परम रुचिराई।।

देखत पुरी अखिल अघ भागा।बन उपबन बापिका तड़ागा।।

dūri pharāka rucira so ghāṭā |jahã jala piyahĩ bāji gaja ṭhāṭā ||

panighaṭa parama manohara nānā |tahā̃ na puruṣa karahĩ asnānā ||

rājaghāṭa saba bidhi sundara bara |majjahĩ tahā̃ barana cāriũ nara ||

tīra tīra devanha ke mandira |cahũ disi tinh ke upabana sundara ||

kahũ kahũ saritā tīra udāsī |basahĩ gyāna rata muni sannyāsī ||

tīra tīra tulasikā suhāī |bṛnda bṛnda bahu muninh lagāī ||

pura sobhā kachu barani na jāī |bāhera nagara parama rucirāī ||

dekhata purī akhila agha bhāgā |bana upabana bāpikā taṛāgā ||

दूर पर एक बड़ा सुंदर घाट था, जहां घोड़े और हाथी पानी पीते थे। और भी बहुत सुंदर पानी भरने के घाट थे, वहां कोई लोग नहाते नहीं थे। राजा का घाट हर तरह से सुंदर था, वहां चारों जात के लोग नहाते थे। किनारे किनारे भगवान के मंदिर थे, और उनके चारों तरफ सुंदर बाग थे। नदी के किनारे यहां वहां रिशि और सन्यासी रहते थे, जो ग्यान में मगन थे। किनारे किनारे तुलसी के पेड़ बोहत सुंदर थे, बहुत रिशियों ने उनके झुंद लगाए थे। शहर की सोबा का डिटेल नहीं दे सकते, और शहर के बाहर भी बिलकुल सुंदर था। शहर देखते ही सारे पाप भाग गए, जिसमे जंगल, बाग, कुआं और तालाब थे।

छंद 29

बापीं तड़ाग अनूप कूप मनोहरायत सोहहीं।सोपान सुंदर नीर निर्मल देखि सुर मुनि मोहहीं।।

बहु रंग कंज अनेक खग कूजहिं मधुप गुंजारहीं।आराम रम्य पिकादि खग रव जनु पथिक हंकारहीं।।

bāpī̃ taṛāga anūpa kūpa manoharāyata sohahī̃ |sopāna sundara nīra nirmala dekhi sura muni mohahī̃ ||

bahu raṅga kañja aneka khaga kūjahī̃ madhupa gũjārahī̃ |ārāma ramya pikādi khaga rava janu pathika hãkārahī̃ ||

इसके बावली और तालाब किसी जैसे नहीं। कुएं भी बड़े और सोहने हैं। सीढ़ियां सोहनी हैं और पानी साफ है। देवता और रिशि देख कर खो गए हैं। वहां कई रंग के कमल खिलते हैं। बहुत से पक्षी बोलते हैं और मधुमक्खियां गुंजती हैं। सोहने बगीचे हैं। कोयल और दूसरे पक्षियों की आवाज ऐसी लगती है जैसे रास्तियों को बुला रही हो।

दोहा 29

रमानाथ जहँ राजा सो पुर बरनि कि जाइ।अनिमादिक सुख संपदा रहीं अवध सब छाइ।।⁠29।।

ramā-nātha jahã rājā so pura barani ki jāi.animādika sukha saṁpadā rahī̃ avadha saba chāi ||⁠29||

उस शहर को कैसे बताया जाए जहां राम, लक्ष्मी के स्वामी, राजा है। अनिमा आदि सब शक्तियां, और हर तरह की खुशी और संपत्ति, पूरी अयोध्या में फैल गई थी और वही बस गई थी।

Frequently Asked Questions

परंपरा में ‘रामराज्य-वर्णन’ का पाठ मन में भय-शोक-रोग की निवृत्ति, परस्पर-प्रीति, और स्वधर्म-स्थैर्य की प्रेरणा देता है; इसे सुनना/गाना ‘राम-भक्ति-रत’ वृत्ति को दृढ़ कर ‘परमगति’ की अभिलाषा जगाता है (दोहा 20–21 की भावना)।

प्रचलित रूप से ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ या ‘राम राम’ नाम-संपुट रामराज्य-वर्णन में जोड़ा जाता है; कुछ पाठ-परंपराओं में ‘सियाराममय सब जग जानी’ भाव-संपुट भी लिया जाता है (स्थानीय रीति अनुसार)।

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