सोपान-प्रवेश: ‘भक्ति का जन्म’ और अहं-क्रोध-प्रताप के बीच मर्यादा का प्राकट्य। बालकाण्ड इस अर्थ में प्रथम सीढ़ी है कि यहाँ राम-नाम/राम-रूप के प्रति श्रद्धा, विनय, और गुरु-समाज में व्यवहार-धर्म का संस्कार बनता है; साधक के भीतर उठती ‘तेज-आक्रोश’ शक्ति को ‘मृदु-वाणी’ और ‘दास्य’ में रूपांतरित करने का द्वार यही है।
यह प्रकरण ‘भक्ति का जन्म’ को एक आंतरिक नाट्य की तरह दिखाता है: (1) धनुष-भंग के बाद उठी उपलब्धि-ऊर्जा जब ‘अहं-प्रताप’ बन सकती है, तभी परशुराम-रौद्र परीक्षा बनकर आता है। (2) लक्ष्मण की तीखी वाणी साधक के भीतर की उग्र-शक्ति है—वह सत्य-बल तो है, पर यदि मर्यादा-विहीन हो तो धर्म-व्यवस्था को तोड़ भी सकती है। (3) राम की ‘अति बिनीत मृदु सीतल बानी’ नाम-भक्ति का व्यावहारिक रूप है: वाणी-संयम, गुरु/वृद्ध/तपस्वी के प्रति आदर, और दास्य-भाव। (4) सभा का सामूहिक भय बताता है कि धर्म केवल निजी वीरता नहीं; वह सामाजिक संतुलन है—मर्यादा ही वह सेतु है जो तेज को लोक-कल्याण में बदलता है। प्रतीक-स्तर पर परशुराम = तप-प्रताप/क्रोध, लक्ष्मण = क्षात्र-ऊर्जा/अहं का उभार, राम = मर्यादा/भक्ति का शीतल जल, सभा = लोक-धर्म का नाज़ुक ताना-बाना।
चौपाई 270.1-4
समाचार कहि जनक सुनाए।जेहि कारन महीप सब आए।।
सुनत बचन फिरि अनत निहारे।देखे चापखंड महि डारे।।
अति रिस बोले बचन कठोरा।कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा।।
बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू।उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू।।
अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं।कुटिल भूप हरषे मन माहीं।।
सुर मुनि नाग नगर नर नारी।सोचहिं सकल त्रास उर भारी।।
मन पछिताति सीय महतारी।बिधि अब सँवरी बात बिगारी।।
भृगुपति कर सुभाउ सुनि सीता।अरध निमेष कलप सम बीता।।
samācāra kahi janaka sunāe |jehi kārana mahīpa saba āe ||
sunata bacana phiri anata nihāre |dekhe cāpakhaṁḍa mahi ḍāre ||
ati risa bole bacana kaṭhorā |kahu jaṛa janaka dhanuṣa kai torā ||
begi dekhāu mūṛha na ta ājū |ulaṭaũ mahi jahã lahi tava rājū ||
ati ḍaru utaru deta nṛpu nāhīṁ |kuṭila bhūpa haraṣe mana māhīṁ ||
sura muni nāga nagara nara nārī |socahiṁ sakala trāsa ura bhārī ||
mana pachitāti sīya mahatārī |bidhi aba sãvarī bāta bigārī ||
bhṛgupati kara subhāu suni sītā |aradha nimeṣa kalapa sama bītā ||
जनक ने सारी खबर बताई, और वोह वजह भी बताई जिसके लिए सारे राजा आ थे। उनकी बात सुन कर परशुराम घूम कर इधर उधर देखा, और धनुष के टुकडे जमीन पर पडा देखे। बहुत गुस्से में उसने कडके बोल बोल, बोलो बेवकूफ जनक, धनुष किसने तोडा? तुरंत उसके सामने कर, बेवकूफ, वरना आज ही मैं जमीन उलटा दूंगा, जहां तक तेरा राज है। राजा इतना डरा कि कुछ जवाब नही दिया, और बुरे राजा अपने दिल में खुश हुए। देवता, रिशी, नाग, और शहर के सारे आदमी औरत परेशान थे, उनके दिल में भारी डर था। सीता की मां दिल में दुखी हुई, भाग्य ने अब वोह बात बिगाड दी जो इतनी अच्छे से बन गई थी। जब सीता ने भृगु के स्वामी का गुस्सा सुना, तोह आधी पल भी उसको एक युग जैसी लग गई।
दोहा 270
सभय बिलोके लोग सब जानि जानकी भीरु।हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु।।270।।
sabhaya biloke loga saba jāni jānakī bhīru |hṛdayã na haraṣu biṣādu kachu bole śrīraghubīru ||270||
सब लोग देख रहे थे कि सब डर गए हैं, और जानकी भी डर रही थी, ये जान कर रघुकुल के भगवान ने बिना खुशी या दुख के दिल में कुछ बोला।
चौपाई 271.1-4
नाथ संभुधनु भंजनिहारा।होइहि केउ एक दास तुम्हारा।।
आयसु काह कहिअ किन मोही।सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही।।
सेवकु सो जो करै सेवकाई।अरि करनी करि करिअ लराई।।
सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा।सहसबाहु सम सो रिपु मोरा।।
सो बिलगाउ बिहाइ समाजा।न त मारे जैहहिं सब राजा।।
सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने।बोले परसुधरहि अपमाने।।
बहु धनुहीं तोरीं लरिकाईं।कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं।।
एहि धनु पर ममता केहि हेतू।सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू।।
nātha saṁbhudhanu bhaṁjanihārā |hoihi keu eka dāsa tumhārā ||
āyasu kāha kahia kina mohī |suni risāi bole muni kohī ||
sevaku so jo karai sevakāī |ari karanī kari karia larāī ||
sunahu rāma jehiṁ sivadhanu torā |sahasabāhu sama so ripu morā ||
so bilagāu bihāi samājā |na ta māre jaihahiṁ saba rājā ||
suni muni bacana lakhana musukāne |bole parasudharahi apamāne ||
bahu dhanuhīṁ torīṁ larikāīṁ |kabahũ na asi risa kīnhi gosāīṁ ||
ehi dhanu para mamatā kehi hetū |suni risāi kaha bhṛgukulaketū ||
राम ने कहा, प्रभु, जिसने शिव का धन तोड़ा है, वो ज़रूर आपका कोई नौकर होगा। आपका आदेश क्या है, मुझे क्यों नहीं बताते? ये सुन के गुस्से वाले रिशि बड़ा गुस्सा हो के बोले। नौकर वो होता है जो नौकरी करता है। पर जो दुश्मन का काम करे, उससे लड़ाई करनी पड़ती है। सुन राम, जिसने शिव का धन तोड़ा है, वो मेरा दुश्मन है, सहस्रबाहु जैसा। वो अपने आप को इस सभा से अलग कर ले, वरना सारे राजा मारे जाएंगे। रिशि की बात सुन के लक्ष्मण मुस्कुराए, और परशुराम को बुरी तरह बेइज़्ज़ती कर के बोले। गोसाईं, बचपन में मैंने बहुत सारे छोटे धन तोड़े, और आपने कभी इतना गुस्सा नहीं किया। इस धन पर ऐसा लगाव क्यों है? ये सुन के भृगु वंश के सरदार गुस्सा हो के बोले।
दोहा 271
रे नृप बालक कालबस बोलत तोहि न सँमार।धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार।।271।।
re nṛpa bālaka kālabasa bolata tohi na sãmāra |dhanuhī sama tipurāri dhanu bidita sakala saṁsāra ||271||
राजा के बच्चे, तेरा काल आ गया है, इसलिए तू बोलते वक्त अपनी जीभ नहीं रोक पा रहा। शिव का धनुष जिसने त्रिपुरा को तबाह किया, जिसे पूरी दुनिया जानती है, क्या तू उसको खिलौने का धनुष समझ रहा है?
चौपाई 272.1-4
लखन कहा हँसि हमरें जाना।सुनहु देव सब धनुष समाना।।
का छति लाभु जून धनु तौरें।देखा राम नयन के भोरें।।
छुअत टूट रघुपतिहु न दोसू।मुनि बिनु काज करिअ कत रोसू।।
बोले चितइ परसु की ओरा।रे सठ सुनेहि सुभाउ न मोरा।।
बालकु बोलि बधउँ नहिं तोही।केवल मुनि जड़ जानहि मोही।।
बाल ब्रह्मचारी अति कोही।बिस्व बिदित छत्रियकुल द्रोही।।
भुजबल भूमि भूप बिनु कीन्ही।बिपुल बार महिदेवन्ह दीन्ही।।
सहसबाहु भुज छेदनिहारा।परसु बिलोकु महीपकुमारा।।
lakhana kahā hãsi hamareṁ jānā |sunahu deva saba dhanuṣa samānā ||
kā chati lābhu jūna dhanu taureṁ |dekhā rāma nayana ke bhoreṁ ||
chuata ṭūṭa raghupatihu na dosū |muni binu kāja karia kata rosū ||
bole citai parasu kī orā |re saṭha sunehi subhāu na morā ||
bālaku boli badhaũ nahiṁ tohī |kevala muni jaṛa jānahi mohī ||
bāla brahmacārī ati kohī |bisva bidita chatriyakula drohī ||
bhujabala bhūmi bhūpa binu kīnhī |bipula bāra mahidevanha dīnhī ||
sahasabāhu bhuja chedanihārā |parasu biloku mahīpakumārā ||
लखन ने मुस्कुरा के कहा, मेरे खयाल से सुनिए, सारे धनुष एक जैसे हैं। पुराने धनुष टोड़े जाने से क्या लेना देना है? राम ने उसको नया समझ लिया, उनके आखों ने धोखा दे दिया। हाथ लगते ही वो टूट गया, इसमे राम का कोई दोष नही है। रिशि जी, बिना किसी वजह आप क्यों गुस्सा कर रहे हैं? परशुराम अपने फरसे की तरफ देखते हुए बोले, अरे बेवकूफ, मेरी फितरत नही सुनी क्या? मैं तुम्हे इसलिए नही मार रहा क्योकि तुम मुझे बच्चा लगते हो। तुम मूर्ख, मुझे बस एक साधु समझ रहे हो। मैं बचपन से ब्रह्मचारी हूं और बहुत गुस्से वाला हूं, दुनिया भर मे मुझे क्षत्रियों का दुश्मन कहते हैं। अपने हाथों की ताकत से मैं ज़मीन से सारे राजा मिटा चुका हूं, और बहुत बार वो ज़मीन ब्राह्मणों को दे दी है। राजा बेटा, ये फरसे देखो, जिसने सहस्रबाहु के हाथ काट दिए थे।
दोहा 272
मातु पितहि जनि सोचबस करसि महीसकिसोर।गर्भन्ह के अर्भक दलन परसु मोर अति घोर।।272।।
mātu pitahi jani socabasa karasi mahīsakisora |garbhanha ke arbhaka dalana parasu mora ati ghora ||272||
राजा के बेटे, अपने माँ बाप को दुखी मत कर। मेरा फरसा बहुत खतरनाक है। वो पेट में बच्चे को भी कुचल देता है।
चौपाई 273.1-4
बिहसि लखनु बोले मृदु बानी।अहो मुनीसु महा भटमानी।।
पुनि पुनि मोहि देखाव कुठारू।चहत उड़ावन फूँकि पहारू।।
इहाँ कुम्हड़बतिया कोउ नाहीं।जे तरजनी देखि मरि जाहीं।।
देखि कुठारु सरासन बाना।मैं कछु कहा सहित अभिमाना।।
भृगुसुत समुझि जनेउ बिलोकी।जो कछु कहहु सहउँ रिस रोकी।।
सुर महिसुर हरिजन अरु गाई।हमरें कुल इन्ह पर न सुराई।।
बधें पापु अपकीरति हारें।मारतहूँ पा परिअ तुम्हारें।।
कोटि कुलिस सम बचनु तुम्हारा।ब्यर्थ धरहु धनु बान कुठारा।।
bihasi lakhanu bole mṛdu bānī |aho munīsu mahā bhaṭamānī ||
puni puni mohi dekhāva kuṭhārū |cahata uṛāvana phū̃ki pahārū ||
ihā̃ kumhaṛabatiyā kou nāhīṁ |je tarajanī dekhi mari jāhīṁ ||
dekhi kuṭhāru sarāsana bānā |maiṁ kachu kahā sahita abhimānā ||
bhṛgusuta samujhi janeu bilokī |jo kachu kahahu sahaũ risa rokī ||
sura mahisura harijana aru gāī |hamareṁ kula inha para na surāī ||
badheṁ pāpu apakīrati hāreṁ |māratahū̃ pā paria tumhāreṁ ||
koṭi kulisa sama bacanu tumhārā |byartha dharahu dhanu bāna kuṭhārā ||
लक्ष्मण मुस्कुराए और नरम आवाज़ में बोले, अरे बड़े रिशि, आप सच में बहुत बलवान हैं, अपनी योद्धा ताकत का घरूर है। बार बार मुझे अपनी कुल्हाड़ी दिखाते हैं, जैसे पहाड़ को एक फूँक से उड़ा देना चाहते हैं। यहाँ कोई नरम कद्दू के फूल जैसा नहीं है जो उँगली देख कर ही सूख कर मर जाए। जब मैंने आपकी कुल्हाड़ी, कमान और तीर देखा, तब मैं थोड़ा घरूर के साथ बोला था। अब मैंने आपका जनेऊ देख लिया है और समझ लिया है कि आप भृगु के बेटे हैं। तो अब जो भी आप कहें, मैं झेलूँगा, अपना गुस्सा रोक कर। देवता, ब्राह्मण, हरि के भक्त और गाय के मामले में हमारे खानदान में कोई बहादुरी नहीं होती। उन्हें मारना पाप है और उनसे हार जाना बदनामी है। इसलिए अगर आप मुझे मारें भी तो मुझे आपके पैर पर गिरना पड़ेगा। आपकी बात ही करोड़ वज्र जैसी है। आप अपनी कमान, तीर और कुल्हाड़ी बेकार उठाए फिर रहे हैं।
दोहा 273
जो बिलोकि अनुचित कहेउँ छमहु महामुनि धीर।सुनि सरोष भृगुबंसमनि बोले गिरा गभीर।।273।।
jo biloki anucita kaheũ chamahu mahāmuni dhīra |suni saroṣa bhṛgubaṁsamani bole girā gabhīra ||273||
मैंने आपको देख कर जो कुछ गलत बोल दिया, उसे माफ कर दीजिए, हे महारिशि। ये सुनते ही भृगु वंस के रत्न ने गुस्से से गहरी आवाज़ में बोला।
चौपाई 274.1-4
कौसिक सुनहु मंद यहु बालकु।कुटिल कालबस निज कुल घालकु।।
भानु बंस राकेस कलंकू।निपट निरंकुस अबुध असंकू।।
काल कवलु होइहि छन माहीं।कहउँ पुकारि खोरि मोहि नाहीं।।
तुम्ह हटकउ जौं चहहु उबारा।कहि प्रतापु बलु रोषु हमारा।।
लखन कहेउ मुनि सुजस तुम्हारा।तुम्हहि अछत को बरनै पारा।।
अपने मुँह तुम्ह आपनि करनी।बार अनेक भाँति बहु बरनी।।
नहिं संतोषु त पुनि कछु कहहू।जनि रिस रोकि दुसह दुख सहहू।।
बीरब्रती तुम्ह धीर अछोभा।गारी देत न पावहु सोभा।।
kausika sunahu maṁda yahu bālaku |kuṭila kālabasa nija kula ghālaku ||
bhānu baṁsa rākesa kalaṁkū |nipaṭa niraṁkusa abudha asaṁkū ||
kāla kavalu hoihi chana māhīṁ |kahaũ pukāri khori mohi nāhīṁ ||
tumha haṭakau jauṁ cahahu ubārā |kahi pratāpu balu roṣu hamārā ||
lakhana kaheu muni sujasa tumhārā |tumhahi achata ko baranai pārā ||
apane mũha tumha āpani karanī |bāra aneka bhā̃ti bahu baranī ||
nahiṁ saṁtoṣu ta puni kachu kahahū |jani risa roki dusaha dukha sahahū ||
bīrabratī tumha dhīra achobhā |gārī deta na pāvahu sobhā ||
कौसिक सुनो: ये लड़का बेवकूफ है, टेढ़ा है, मौत के गले में फंसा हुआ है, अपने ही खानदान को खत्म करने वाला है। ये सूरज वंश के चाँद पर कलंक है, बिल्कुल कंट्रोल में नहीं रहता, समझ नहीं रखता और किसी से डरता नहीं। एक पल में ये मौत का खाना बन जाएगा। मैं ज़ोर से बोल रहा हूँ, इसमें मेरी गलती नहीं है। अगर तुम इसे बचाना चाहते हो तो इसे रोक लो, और इसे मेरी शान, मेरी ताकत और मेरे गुस्से के बारे में बता दो। लक्ष्मण बोले: हे रिशि, आपका अच्छा नाम सबको पता है। जब आप खुद यहाँ हैं तो और कौन इसे बता सकता है? आपने अपने मोह से अपने ही काम कई बार, बहुत तरह से बता दिए हैं। अगर अभी भी दिल नहीं भरा तो फिर कुछ और बोलो। अपना गुस्सा रोक कर बेहतर दर्द मत सहो। आप वीर के व्रत वाले हैं, स्थिर हैं और हिलते नहीं। गालियाँ देना आपको शोभा नहीं देता।
दोहा 274
सूर समर करनी करहिं कहि न जनावहिं आपु।बिद्यमान रन पाइ रिपु कायर कथहिं प्रतापु।।274।।
sūra samara karanī karahiṁ kahi na janāvahiṁ āpu |bidyamāna rana pāi ripu kāyara kathahiṁ pratāpu ||274||
बहादुर लोग जंग में अपना काम करते हैं, और खुद को बढ़ कर नहीं बताते। लेकिन कायर, जब सामने दुश्मन को देखते हैं, तो अपनी ताकत का बड़ा डांगा करते हैं।
चौपाई 275.1-4
तुम्ह तौ कालु हाँक जनु लावा।बार बार मोहि लागि बोलावा।।
सुनत लखन के बचन कठोरा।परसु सुधारि धरेउ कर घोरा।।
अब जनि देइ दोसु मोहि लोगू।कटुबादी बालकु बधजोगू।।
बाल बिलोकि बहुत मैं बाँचा।अब यहु मरनिहार भा साँचा।।
कौसिक कहा छमिअ अपराधू।बाल दोष गुन गनहिं न साधू।।
खर कुठार मैं अकरुन कोही।आगें अपराधी गुरुद्रोही।।
उतर देत छोड़उँ बिनु मारें।केवल कौसिक सील तुम्हारें।।
न त एहि काटि कुठार कठोरें।गुरहि उरिन होतेउँ श्रम थोरें।।
tumha tau kālu hā̃ka janu lāvā |bāra bāra mohi lāgi bolāvā ||
sunata lakhana ke bacana kaṭhorā |parasu sudhāri dhareu kara ghorā ||
aba jani dei dosu mohi logū |kaṭubādī bālaku badhajogū ||
bāla biloki bahuta maiṁ bā̃cā |aba yahu maranihāra bhā sā̃cā ||
kausika kahā chamia aparādhū |bāla doṣa guna ganahiṁ na sādhū ||
khara kuṭhāra maiṁ akaruna kohī |āgeṁ aparādhī gurudrohī ||
utara deta choṛaũ binu māreṁ |kevala kausika sīla tumhāreṁ ||
na ta ehi kāṭi kuṭhāra kaṭhoreṁ |gurahi urina hoteũ śrama thoreṁ ||
तुमने जैसे मौत को चिल्ला के बुला दिया, बार बार मुझे बुलावा भेज रहे हो। लक्ष्मन की कड़वी बातें सुन के परशुराम ने अपना फरासा तैयार किया और वो खतरनाक हथियार हाथ में पकड़ लिया। अब कोई मुझे दोष न दे। यह तेज ज़बान वाला लड़का मारा जाना चाहिए। बच्चा देख के मैने कई बार छोड़ा, अब यह सच में मरने वाला बन गया है। कौशिक ने कहा, इसका अपराध माफ़ कर दो। साधु लोग बच्चे की गलती या गुण नहीं गिनते। मेरा फरासा तेज है, मैं बे-रहम और गुस्से वाला हूं, और मेरे सामने एक अपराधी खड़ा है जो अपने गुरु का दुश्मन है। यह मुझे जवाब देता है फिर भी मैं इसे बिना मारे छोड़ रहा हूं, सिर्फ तुम्हारी अच्छाई के कारण, कौशिक। नहीं तो मैं इसे इस कड़वे फरासे से काट देता, और थोड़ी मेहनत में अपने गुरु का कर्ज़ चुकता हो जाता।
दोहा 275
गाधिसूनु कह हृदयँ हँसि मुनिहि हरिअरइ सूझ।अयमय खाँड न ऊखमय अजहुँ न बूझ अबूझ।।275।।
gādhisūnu kaha hṛdayã hãsi munihi hariarai sūjha |ayamaya khā̃ḍa na ūkhamaya ajahũ na būjha abūjha ||275||
गाधि के बेटे ने दिल ही दिल में हँस कर कहा, रिशि को सब कुछ हरियरा लगता है। यह गन्ना लोहे से बना है, गन्ने से नहीं। फिर भी अब तक अपनी नासमझी में वो समझ नहीं रहा।
चौपाई 276.1-4
कहेउ लखन मुनि सीलु तुम्हारा।को नहि जान बिदित संसारा।।
माता पितहि उरिन भए नीकें।गुर रिनु रहा सोचु बड़ जीकें।।
सो जनु हमरेहि माथे काढ़ा।दिन चलि गए ब्याज बड़ बाढ़ा।।
अब आनिअ ब्यवहरिआ बोली।तुरत देउँ मैं थैली खोली।।
सुनि कटु बचन कुठार सुधारा।हाय हाय सब सभा पुकारा।।
भृगुबर परसु देखावहु मोही।बिप्र बिचारि बचउँ नृपद्रोही।।
मिले न कबहुँ सुभट रन गाढ़े।द्विज देवता घरहि के बाढ़े।।
अनुचित कहि सब लोग पुकारे।रघुपति सयनहिं लखनु नेवारे।।
kaheu lakhana muni sīlu tumhārā |ko nahi jāna bidita saṁsārā ||
mātā pitahi urina bhae nīkeṁ |gura rinu rahā socu baṛa jīkeṁ ||
so janu hamarehi māthe kāṛhā |dina cali gae byāja baṛa bāṛhā ||
aba ānia byavahariā bolī |turata deũ maiṁ thailī kholī ||
suni kaṭu bacana kuṭhāra sudhārā |hāya hāya saba sabhā pukārā ||
bhṛgubara parasu dekhāvahu mohī |bipra bicāri bacaũ nṛpadrohī ||
mile na kabahũ subhaṭa rana gāṛhe |dvija devatā gharahi ke bāṛhe ||
anucita kahi saba loga pukāre |raghupati sayanahiṁ lakhanu nevāre ||
लखन ने कहा, हे रिशि, आपका सीधा साधा स्वभाव कौन नहीं जानता, पूरी दुनिया में मशहूर है। माता पिता का उधार आपने अच्छे से चुका दिया, बस गुरु का उधार बाकी रह गया था और वो भारी पढ़ रहा था। लगता है वो उधार आपने हमारे हिसाब में डाल दिया। बहुत दिन गुजर गए, ब्याज भी बहुत बढ़ गया। अब किसी मनीलेंडर को बुलाइए, मैं अपनी जेब खोल कर तुरंत पैसे दे दूंगा। ये कड़के बात सुन कर रिशि ने अपनी कुल्हाड़ी उठा ली, और पूरी सभा ने हाय हाय करके चिल्लाई। लखन ने कहा, हे भृगु वंशी, मुझे अपनी कुल्हाड़ी दिखा रहे हो? मैं आपको छोड़ रहा हूं बस इसलिए क्योंकि आप ब्राह्मिन हैं, वरना आप राजाओं के दुश्मन हैं। आपने कभी रन में जम के लढ़ने वाले बहादुर सिपाही नहीं देखे। हे ब्राह्मिन देवता, आप सिर्फ अपने घर में बड़े आदमी हैं। सब लोग चिल्लाकर बोले ये बिल्कुल गलत है, और राम ने लखन को चुप रहने का इशारा किया।
दोहा 276
लखन उतर आहुति सरिस भृगुबर कोपु कृसानु।बढ़त देखि जल सम बचन बोले रघुकुलभानु।।276।।
lakhana utara āhuti sarisa bhṛgubara kopu kṛsānu |baṛhata dekhi jala sama bacana bole raghukulabhānu ||276||
लखन जो बात कर रहा था, वो ऐसे लग रहा था जैसे गुस्से की आग में घी डाल रहे हो। परशुराम का गुस्सा बढ़ता देख कर, राम ने ऐसी बातें की जो पानी की तरह थी, आग ठंडी करने वाली।
चौपाई 277.1-4
नाथ करहु बालक पर छोहू।सूध दूधमुख करिअ न कोहू।।
जौं पै प्रभु प्रभाउ कछु जाना।तौ कि बराबरि करत अयाना।।
जौं लरिका कछु अचगरि करहीं।गुर पितु मातु मोद मन भरहीं।।
करिअ कृपा सिसु सेवक जानी।तुम्ह सम सील धीर मुनि ग्यानी।।
राम बचन सुनि कछुक जुड़ाने।कहि कछु लखनु बहुरि मुसकाने।।
हँसत देखि नख सिख रिस ब्यापी।राम तोर भ्राता बड़ पापी।।
गौर सरीर स्याम मन माहीं।कालकूटमुख पयमुख नाहीं।।
सहज टेढ़ अनुहरइ न तोही।नीचु मीचु सम देख न मौहीं।।
nātha karahu bālaka para chohū |sūdha dūdhamukha karia na kohū ||
jauṁ pai prabhu prabhāu kachu jānā |tau ki barābari karata ayānā ||
jauṁ larikā kachu acagari karahīṁ |gura pitu mātu moda mana bharahīṁ ||
karia kṛpā sisu sevaka jānī |tumha sama sīla dhīra muni gyānī ||
rāma bacana suni kachuka juṛāne |kahi kachu lakhanu bahuri musakāne ||
hãsata dekhi nakha sikha risa byāpī |rāma tora bhrātā baṛa pāpī ||
gaura sarīra syāma mana māhīṁ |kālakūṭamukha payamukha nāhīṁ ||
sahaja ṭeṛha anuharai na tohī |nīcu mīcu sama dekha na mauhīṁ ||
प्रभु, बच्चे पर दया करो। इतने मासूम बच्चे पर गुस्सा मत करो, अभी तोह माँ का दूध पीता हुआ है। प्रभु, अगर उसे आपकी ताकत का थोड़ा भी पता होता, तोह ये नादान बच्चा कभी आपके बराबर बन बैठता? जब बच्चे कोई शरारत करते हैं, तोह उनके गुरु, माँ और बाप दिल से खुश हो जाते हैं। तोह कृपा करो, उसे बच्चा और अपना सेवक समझ लो। आप रिशी हैं, नरम दिल वाले, सबर वाले और ग्यानी। राम की बात सुन के रिशी थोड़ा ठंडा हो गया। पर लखन ने और कुछ कहा और फिर से मुस्कुराया। उसे मुस्कुराते देख के रिशी के सिर से पैर तक गुस्सा फैल गया। बोला, राम, तेरा भाई बहुत बड़ा पापी है। इसका बदन गोरा है पर दिल काला है। ये जहर का मुँह है, दूध का मुँह नहीं। ये पैदाइशी टेढ़ा है और तुझ जैसा नहीं है। ये नीच मुझे मौत नहीं समझता, न मेरी इज्जत करता है।
दोहा 277
लखन कहेउ हँसि सुनहु मुनि क्रोधु पाप कर मूल।जेहि बस जन अनुचित करहिं चरहिं बिस्व प्रतिकूल।।277।।
lakhana kaheu hãsi sunahu muni krodhu pāpa kara mūla |jehi basa jana anucita karahiṁ carahiṁ bisva pratikūla ||277||
लखन ने मुस्कुरा के बोला, सुनो रिशि, गुस्सा पाप की जड़ है। गुस्से के कबू में लोग गलत काम करते हैं, और पूरी दुनिया के खिलाफ हो जाते हैं।
चौपाई 278.1-4
मैं तुम्हार अनुचर मुनिराया।परिहरि कोपु करिअ अब दाया।।
टूट चाप नहिं जुरहि रिसाने।बैठिअ होइहिं पाय पिराने।।
जौ अति प्रिय तौ करिअ उपाई।जोरिअ कोउ बड़ गुनी बोलाई।।
बोलत लखनहिं जनकु डेराहीं।मष्ट करहु अनुचित भल नाहीं।।
थर थर कापहिं पुर नर नारी।छोट कुमार खोट बड़ भारी।।
भृगुपति सुनि सुनि निरभय बानी।रिस तन जरइ होइ बल हानी।।
बोले रामहि देइ निहोरा।बचउँ बिचारि बंधु लघु तोरा।।
मनु मलीन तनु सुंदर कैसें।बिष रस भरा कनक घटु जैसैं।।
maiṁ tumhāra anucara munirāyā |parihari kopu karia aba dāyā ||
ṭūṭa cāpa nahiṁ jurahi risāne |baiṭhia hoihiṁ pāya pirāne ||
jau ati priya tau karia upāī |joria kou baṛa gunī bolāī ||
bolata lakhanahiṁ janaku ḍerāhīṁ |maṣṭa karahu anucita bhala nāhīṁ ||
thara thara kāpahiṁ pura nara nārī |choṭa kumāra khoṭa baṛa bhārī ||
bhṛgupati suni suni nirabhaya bānī |risa tana jarai hoi bala hānī ||
bole rāmahi dei nihorā |bacaũ bicāri baṁdhu laghu torā ||
manu malīna tanu suṁdara kaiseṁ |biṣa rasa bharā kanaka ghaṭu jaisaiṁ ||
लखन बोले, "हे रिशियों के राजा, मैं आपका नौकर हूं. अब अपना गुस्सा छोड़ दो और मुझपे दया करो." "टूटा हुआ धनुष गुस्सा करके नहीं जोड़ सकता. बैठ जाइये, खड़े खड़े पैर में दर्द हो रहा होगा." "अगर ये आपको इतना प्यारा है, तो कोई उपाय निकालो. कोई बड़ा गुनी आदमी बुलाओ और उसे जोड़वा दो." लखन की बात सुनकर जनक डर गए और बोले, "चुप रहो! ये उचित नहीं है, ये अच्छा नहीं है." शहर के आदमी और औरतें कांप रहे थे. सोच रहे थे, इतना छोटा लड़का और इतनी बड़ी बदतमीजी. लखन की निर्भय बातें बार बार सुनकर, भृगु के स्वामी परशुराम के तन में गुस्सा उबल रहा था और उनका बल कम पड़ रहा था. परशुराम ने राम से कहा, उन्हें समझाते हुए, "मैं आपके छोटे भाई को आपकी वजह से छोड़ रहा हूं." "इसका दिमाग खराब है, जबकि शरीर इतना सुंदर है, जैसे सोने के बरतन में जहर भरा हो."
दोहा 278
सुनि लछिमन बिहसे बहुरि नयन तरेरे राम।गुर समीप गवने सकुचि परिहरि बानी बाम।।278।।
suni lachimana bihase bahuri nayana tarere rāma |gura samīpa gavane sakuci parihari bānī bāma ||278||
ये सुन के लक्ष्मन फिर से हसा। राम ने उसको गुस्से वाली नज़रों से देखा। फिर राम को शरम आई, तो वो कड़ी बात छोड़ के अपने गुरु के पास गया।
चौपाई 279.1-4
अति बिनीत मृदु सीतल बानी।बोले रामु जोरि जुग पानी।।
सुनहु नाथ तुम्ह सहज सुजाना।बालक बचनु करिअ नहिं काना।।
बररै बालक एकु सुभाऊ।इन्हहि न संत बिदूषहिं काऊ।।
तेहिं नाहीं कछु काज बिगारा।अपराधी में नाथ तुम्हारा।।
कृपा कोपु बधु बँधब गोसाईं।मो पर करिअ दास की नाई।।
कहिअ बेगि जेहि बिधि रिस जाई।मुनिनायक सोइ करौं उपाई।।
कह मुनि राम जाइ रिस कैसें।अजहुँ अनुज तव चितव अनैसें।।
एहि के कंठ कुठारु न दीन्हा।तौ मैं काह कोपु करि कीन्हा।।
ati binīta mṛdu sītala bānī |bole rāmu jori juga pānī ||
sunahu nātha tumha sahaja sujānā |bālaka bacanu karia nahiṁ kānā ||
bararai bālaka eku subhāū |inhahi na saṁta bidūṣahiṁ kāū ||
tehiṁ nāhīṁ kachu kāja bigārā |aparādhī meṁ nātha tumhārā ||
kṛpā kopu badhu bãdhaba gosāīṁ |mo para karia dāsa kī nāī ||
kahia begi jehi bidhi risa jāī |munināyaka soi karauṁ upāī ||
kaha muni rāma jāi risa kaiseṁ |ajahũ anuja tava citava anaiseṁ ||
ehi ke kaṁṭha kuṭhāru na dīnhā |tau maiṁ kāha kopu kari kīnhā ||
राम ने दोनों हाथ जोड़ के बहुत नरम और ठंडी आवाज़ में बोला। सुन्नो नाथ, आप अपने आप से ही सब कुछ जानते हो। बच्चे की बात का कोई मतलब नही, उसको इग्नोर करो। भौंरे और बच्चे का एक ही नेचर होता है। संत लोग इनको कभी गलत नही मानते। और वैसे भी उसने आपका कोई नुकसान नही किया। मैं हूं जो आपका अपराधी है, नाथ। गोसाई, आप चाहे तो मुझपे कृपा करो या गुस्सा करो, मुझे मार दो या बांध दो, अपने नौकर जैसा ही सालो। जल्दी बताओ मुनिनायक, ऐसा क्या करूं कि आपका गुस्सा चला जाये, मैं वही करूंगा। मुनि ने कहा, राम, मेरा गुस्सा कैसे उतर सकता है? अभी भी तेरा भाई मुझे ऐसे ही गुस्से वाली नज़र से देख रहा है। मैंने अपना कुल्हाड़ी उसके गला पर नही रखा, फिर मैंने गुस्सा करके क्या किया?
दोहा 279
गर्भ स्रवहिं अवनिप रवनि सुनि कुठार गति घोर।परसु अछत देखउँ जिअत बैरी भूपकिसोर।।279।।
garbha sravahiṁ avanipa ravani suni kuṭhāra gati ghora |parasu achata dekhaũ jiata bairī bhūpakisora ||279||
राजा की पत्नियां सिर्फ मेरी कुल्हाड़ी के खौफनक चाल का सुन कर ही गर्भ गिरती हैं। और फिर भी, कुल्हाड़ी अभी भी मेरे हाथ में है, और मैं देख रहा हूँ कि मेरा दुश्मन, जो एक राजा का बेटा है, ज़िंदा है।
परंपरा में यह अंश ‘क्रोध-शमन’ और ‘वाणी-संयम’ की सिद्धि से जोड़ा जाता है: राम की विनय-भाषा और लक्ष्मण-परशुराम संवाद का पाठ गृह-कलह/अहंकार-उत्थान में शान्ति, सभा-धर्म और गुरु-आदर की बुद्धि देता है—विशेषतः बालकाण्ड-पाठ में ‘मर्यादा’ का संस्कार दृढ़ होता है।
सामान्य सत्संग-परंपरा में ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ (राम-नाम) या ‘सीता-राम’ का संकीर्तन-सम्पुट लगाया जाता है; इस प्रसंग में विशेष रूप से ‘राम-नाम’ को ‘क्रोध-निवारक’ मानकर दोहा-समाप्ति पर जप-सम्पुट प्रचलित है।
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
A free sign-in with Google or Apple keeps your chat saved across web and the app.