Bala KandaPrakarana 2721 Verses

Prakarana 27

This Sopāna is the awakening of bhakti through ‘darśana’ and ‘parīkṣā’: the soul witnesses the Lord’s effortless supremacy (bow-breaking) and learns that egoic strength collapses before grace. Bālakāṇḍa functions as the entry-stair where śraddhā becomes lived experience—devotion is born not from argument but from a heart pierced by beauty (rūpa-mādhurya) and moral clarity (dharma).

शिवधनुष ‘अहं-बल’ और ‘लोक-प्रतिष्ठा’ का भी प्रतीक है—जिसे तोड़ना बाहुबल का प्रदर्शन नहीं, बल्कि ईश्वर-कृपा से अहंकार का विघटन है। धनुष का ‘समुद्र/नौका’ रूपक बताता है कि संसार-सागर पार करने का साधन बाह्य कौशल (कड़हारू/फेरिमैन) नहीं, शरणागति है; राम की भुजा ‘पारगामी शक्ति’ है—धर्म में स्थित सामर्थ्य। ‘कठोर धुनि’ केवल भौतिक ध्वनि नहीं: यह अधर्म-गर्व के ताले तोड़ने वाली दैवी घोषणा है, जो भीतर के संशय को भी चूर करती है। सीता का अंतर्द्वंद्व भक्ति का मनोविज्ञान है—रूप-माधुर्य से हृदय पिघलता है और धर्म-निश्चय से प्रेम मर्यादा पाता है। सभा के राजाओं का क्रोध दिखाता है कि जब साधना ‘प्रतिस्पर्धा’ बनती है तो वह रौद्र में गिरती है; जब वह ‘दर्शन’ बनती है तो अद्भुत से शान्ति में खिलती है।

Verses

चौपाई 260.1-4

दिसकुंजरहु कमठ अहि कोला।धरहु धरनि धरि धीर न डोला।।

रामु चहहिं संकर धनु तोरा।होहु सजग सुनि आयसु मोरा।।

चाप सपीप रामु जब आए।नर नारिन्ह सुर सुकृत मनाए।।

सब कर संसउ अरु अग्यानू।मंद महीपन्ह कर अभिमानू।।

भृगुपति केरि गरब गरुआई।सुर मुनिबरन्ह केरि कदराई।।

सिय कर सोचु जनक पछितावा।रानिन्ह कर दारुन दुख दावा।।

संभुचाप बड बोहितु पाई।चढे जाइ सब संगु बनाई।।

राम बाहुबल सिंधु अपारू।चहत पारु नहि कोउ कड़हारू।।

disakuṁjarahu kamaṭha ahi kolā |dharahu dharani dhari dhīra na ḍolā ||

rāmu cahahiṁ saṁkara dhanu torā |hohu sajaga suni āyasu morā ||

cāpa sapīpa rāmu jaba āe |nara nārinha sura sukṛta manāe ||

saba kara saṁsau aru agyānū |maṁda mahīpanha kara abhimānū ||

bhṛgupati keri garaba garuāī |sura munibaranha keri kadarāī ||

siya kara socu janaka pachitāvā |rāninha kara dāruna dukha dāvā ||

saṁbhucāpa baḍa bohitu pāī |caḍhe jāi saba saṁgu banāī ||

rāma bāhubala siṁdhu apārū |cahata pāru nahi kou kaṛahārū ||

अरे दिशाओं के हाथी, कछुआ, सांप और सूअर, धरती को ठीक से पकड़ो, ताकि वो हिले नहीं। राम, शिव का धनुष तोड़ना चाहते हैं। मेरा आदेश सुनो और तैयार रहो। जब राम धनुष के पास आए, तब आदमी और औरतों ने अपने पिछले पुण्य देकर भगवान से प्रार्थना की। सब का शक और अनजानपन, और बेवकूफ राजाओं का घमंड। परशुराम का भारी घमंड, और भगवान और बड़े रिशियों का डर। सीता का चिंता, जनक का पछतावा, और रानियों का भयंकर दुख की आग। इन सब ने शिव के धनुष को एक बड़ी नाव मान लिया, और सब मिलकर उस पर चढ़ गए। राम की बाजू की ताकत एक बेहद बड़ा समुंदर है, और वो उससे पार करना चाहते हैं, पर कोई नाव वाला नहीं है।

दोहा 260

राम बिलोके लोग सब चित्र लिखे से देखि।चितई सीय कृपायतन जानी बिकल बिसेषि।।⁠260।।

rāma biloke loga saba citra likhe se dekhi |citaī sīya kṛpāyatana jānī bikala biseṣi ||⁠260||

राम सभी लोगों को देखा, सब एक पेंटिंग के फिगर की तरह एकदम स्टेशनरी खड़े थे। फिर कृपा के धारा वाले राम ने सीता की तरफ देखा, और समझ लिया कि वो खास तरह से परेशान थी।

चौपाई 261.1-4

देखी बिपुल बिकल बैदेही।निमिष बिहात कलप सम तेही।।

तृषित बारि बिनु जो तनु त्यागा।मुएँ करइ का सुधा तड़ागा।।

का बरषा सब कृषी सुखानें।समय चुकें पुनि का पछितानें।।

अस जियँ जानि जानकी देखी।प्रभु पुलके लखि प्रीति बिसेषी।।

गुरहि प्रनामु मनहि मन कीन्हा।अति लाघवँ उठाइ धनु लीन्हा।।

दमकेउ दामिनि जिमि जब लयऊ।पुनि नभ धनु मंडल सम भयऊ।।

लेत चढ़ावत खैंचत गाढ़ें।काहुँ न लखा देख सबु ठाढ़ें।।

तेहि छन राम मध्य धनु तोरा।भरे भुवन धुनि घोर कठोरा।।

dekhī bipula bikala baidehī |nimiṣa bihāta kalapa sama tehī ||

tṛṣita bāri binu jo tanu tyāgā |muẽ karai kā sudhā taṛāgā ||

kā baraṣā saba kṛṣī sukhāneṁ |samaya cukeṁ puni kā pachitāneṁ ||

asa jiyã jāni jānakī dekhī |prabhu pulake lakhi prīti biseṣī ||

gurahi pranāmu manahi mana kīnhā |ati lāghavã uṭhāi dhanu līnhā ||

damakeu dāmini jimi jaba layaū |puni nabha dhanu maṁḍala sama bhayaū ||

leta caṛhāvata khaiṁcata gāṛheṁ |kāhũ na lakhā dekha sabu ṭhāṛheṁ ||

tehi chana rāma madhya dhanu torā |bhare bhuvana dhuni ghora kaṭhorā ||

उसने सीता को देखा, वो बहुत परेशान थी। उसके लिए हर एक पल एक युग जैसा लग रहा था। जो प्यासा इंसान पानी के बिना अपनी जान दे दे, मरने के बाद अमृत का तालब क्या करेगा? जब सारी फसल सूख चुकी हो तो बारिश का क्या फायदा? और वक्त निकल जाने के बाद पछतावा का क्या मतलब? दिल में ऐसा सोच कर भगवान ने जानकी को देखा, और उनकी खास प्रीति देख कर उनका तन बदन खुशी से कांपा। अपने गुरु को दिल से प्रणाम किया, और बहुत आसानी से धनुष उठा लिया। जैसे ही उठाया, बिजली की तरह चमका। फिर जैसे उसने मोडा, आसमान के गोल जैसा बन गया। उठाते, चढ़ाते, खींचते हुए किसी को नहीं दिखा, सब लोग देखते हुए भी वही खड़े रहे। उसी पल राम ने धनुष बीच से तोड़ा, और एक भयानक कड़क आवाज से सारे जहान भर गए।

छंद 261

भरे भुवन घोर कठोर रव रबि बाजि तजि मारगु चले।चिक्करहिं दिग्गज डोल महि अहि कोल कूरुम कलमले।।

सुर असुर मुनि कर कान दीन्हें सकल बिकल बिचारहीं।कोदंड खंडेउ राम तुलसी जयति बचन उचारही।।

bhare bhuvana ghora kaṭhora rava rabi bāji taji māragu cale |cikkarahiṁ diggaja ḍola mahi ahi kola kūruma kalamale ||

sura asura muni kara kāna dīnheṁ sakala bikala bicārahīṁ |kodaṁḍa khaṁḍeu rāma tulasī jayati bacana ucārahī ||

एक बहुत डरावनी और कठोर आवाज़ पूरी दुनिया में फैल गई। सूरज के घोड़े अपना रास्ता छोड़ कर भाग गए। दिशाओं के हाथी चिल्लाने लगे, ज़मीन हिलने लगी, और शेष नाग, भगवान का सुअर रूप और कछुआ सब परेशान हो गए। देवता, राक्षस और रिशि सब परेशान हो कर अपने कानों पर हाथ रख कर सोचने लगे कि ये क्या है। जब उन्हें पता चला कि राम ने धनुष तोड़ा है, तो उन्होंने जय की आवाज़ निकाली, तुलसीदास कहते हैं।

सोरठा 261

संकर चापु जहाजु सागरु रघुबर बाहुबलु।बूड़ सो सकल समाजु चढ़ा जो प्रथमहिं मोह बस।।⁠261।।

saṁkara cāpu jahāju sāgaru raghubara bāhubalu |būṛa so sakala samāju caṛhā jo prathamahiṁ moha basa ||⁠261||

शिव का धनुष एक जहाज की तरह था। राम के हाथों की ताकत एक समंदर की तरह थी। सारी सभा उस जहाज पर चढ़ी थी, पर वो सब परेशान थी। वो सब डूब गई।

चौपाई 262.1-4

प्रभु दोउ चापखंड महि डारे।देखि लोग सब भए सुखारे।।

कोसिकरुप पयोनिधि पावन।प्रेम बारि अवगाहु सुहावन।।

रामरूप राकेसु निहारी।बढ़त बीचि पुलकावलि भारी।।

बाजे नभ गहगहे निसाना।देवबधू नाचहिं करि गाना।।

ब्रह्मादिक सुर सिद्ध मुनीसा।प्रभुहि प्रसंसहि देहिं असीसा।।

बरिसहिं सुमन रंग बहु माला।गावहिं किंनर गीत रसाला।।

रही भुवन भरि जय जय बानी।धनुषभंग धुनि जात न जानी।।

मुदित कहहिं जहँ तहँ नर नारी।भंजेउ राम संभुधनु भारी।।

prabhu dou cāpakhaṁḍa mahi ḍāre |dekhi loga saba bhae sukhāre ||

kosikarupa payonidhi pāvana |prema bāri avagāhu suhāvana ||

rāmarūpa rākesu nihārī |baṛhata bīci pulakāvali bhārī ||

bāje nabha gahagahe nisānā |devabadhū nācahiṁ kari gānā ||

brahmādika sura siddha munīsā |prabhuhi prasaṁsahi dehiṁ asīsā ||

barisahiṁ sumana raṁga bahu mālā |gāvahiṁ kiṁnara gīta rasālā ||

rahī bhuvana bhari jaya jaya bānī |dhanuṣabhaṁga dhuni jāta na jānī ||

mudita kahahiṁ jahã tahã nara nārī |bhaṁjeu rāma saṁbhudhanu bhārī ||

1. प्रभु ने धनुष के दोनो टुकडे जमीन पर फेंक दिए. सब लोग देख के खुश हो गए. 2. रिशी कौशिक एक पानी का समुंदर जैसे थे. उनका प्यार उसका पानी था, बहुत सुंदर और गेहरा. 3. राम के रूप का चाँद देख के, वोह समुंदर उठा, और प्यार की लेहरे बडे-बडे खुशी के झम्पके बन के उठी. 4. आसमान पर ढोल बज रहे थे. ऊपर की औरतें नाच रही थी और गाना गा रही थी. 5. ब्रह्मा और बाकी भगवान, सिद्ध और बडे रिशी सब ने प्रभु की तारीफ की और उसको आशीर्वाद दिया. 6. फूल बरस रहे थे, रंग-बिरंगी माला गिर रही थी. किन्नर मीठा गाना गा रहे थे. 7. दुनिया भर मे जय जय की आवाज गूंज रही थी. धनुष टूटने की आवाज अब सुनाई नही दे रही थी. 8. हर जगह के आदमी और औरतें खुशी से बोल रहे थे, राम ने शम्भु का बडा धनुष तोड दिया.

दोहा 262

बंदी मागध सूतगन बिरुद बदहिं मतिधीर।करहिं निछावरि लोग सब हय गय धन मनि चीर।।⁠262।।

baṁdī māgadha sūtagana biruda badahiṁ matidhīra |karahiṁ nichāvari loga saba haya gaya dhana mani cīra ||⁠262||

गाने गाने वाले, कहानी सुनाने वाले और राज-दरबार के वक्ता लोग, सब दिमाग से स्थिर होकर राम की तारीफ के गाने बोल रहे थे। और सारे लोग उपहार डाल रहे थे, घोडे, हाथी, पैसा, हीरे-मोती और कपडे सब कुछ दे रहे थे।

चौपाई 263.1-4

झाँझि मृदंग संख सहनाई।भेरि ढोल दुंदुभी सुहाई।।

बाजहिं बहु बाजने सुहाए।जहँ तहँ जुबतिन्ह मंगल गाए।।

सखिन्ह सहित हरषी अति रानी।सूखत धान परा जनु पानी।।

जनक लहेउ सुखु सोचु बिहाई।पैरत थकें थाह जनु पाई।।

श्रीहत भए भूप धनु टूटे।जैसें दिवस दीप छबि छूटे।।

सीय सुखहि बरनिअ केहि भाँती।जनु चातकी पाइ जलु स्वाती।।

रामहि लखनु बिलोकत कैसें।ससिहि चकोर किसोरकु जैसें।।

सतानंद तब आयसु दीन्हा।सीताँ गमनु राम पहिं कीन्हा।।

jhā̃jhi mṛdaṁga saṁkha sahanāī |bheri ḍhola duṁdubhī suhāī ||

bājahiṁ bahu bājane suhāe |jahã tahã jubatinha maṁgala gāe ||

sakhinha sahita haraṣī ati rānī |sūkhata dhāna parā janu pānī ||

janaka laheu sukhu socu bihāī |pairata thakeṁ thāha janu pāī ||

śrīhata bhae bhūpa dhanu ṭūṭe |jaiseṁ divasa dīpa chabi chūṭe ||

sīya sukhahi barania kehi bhā̃tī |janu cātakī pāi jalu svātī ||

rāmahi lakhanu bilokata kaiseṁ |sasihi cakora kisoraku jaiseṁ ||

satānaṁda taba āyasu dīnhā |sītā̃ gamanu rāma pahiṁ kīnhā ||

मंजीरा, ढोल, शंख और शहनाई बज रहे थे। बड़े ढोल और नगाड़े भी खूब बज रहे थे। बहुत सारे सुंदर बाजा बज रहे थे। यहाँ वहाँ जवान लड़कियाँ मंगल गीत गा रही थीं। रानी अपनी सहेलियों के साथ बहुत खुश हुई। जैसे सूखे धान पर पानी पड़ जाए वैसे। जनक को खुशी मिली और सारा चिंता गायब हो गया। जैसे पानी में तैरते तैरते थक आदमी को पैर ज़मीन मिल जाए। धन टूटने से राजा लोगों की चमक चली गई। जैसे दिन की रोशनी में दिया अपना उजाला खो देता है। सीता की खुशी कैसे बताए? जैसे चातक पंछी की जोड़ी को स्वाती बारिश का पानी मिल जाए। लखन राम को देखता रहा, जैसे छोटा चकोर चाँद को देखता है। फिर शतानंद ने आदेश दिया, और सीता राम के पास गई।

दोहा 263

संग सखीं सुदंर चतुर गावहिं मंगलचार।गवनी बाल मराल गति सुषमा अंग अपार।।⁠263।।

saṁga sakhīṁ sudaṁra catura gāvahiṁ maṁgalacāra |gavanī bāla marāla gati suṣamā aṁga apāra ||⁠263||

उसके साथ सुंदर और समझदार सहेलियां गई, और मंगल गीत गाती रही। वो लड़की जैसे होते हैं मरल, यानी हंस की चल से चली, और उसके बदन की खूबसूरती की कोई सीमा नहीं थी।

चौपाई 264.1-4

सखिन्ह मध्य सिय सोहति कैसे।छबिगन मध्य महाछबि जैसें।।

कर सरोज जयमाल सुहाई।बिस्व बिजय सोभा जेहिं छाई।।

तन सकोचु मन परम उछाहू।गूढ़ प्रेमु लखि परइ न काहू।।

जाइ समीप राम छबि देखी।रहि जनु कुँअरि चित्र अवरेखी।।

चतुर सखीं लखि कहा बुझाई।पहिरावहु जयमाल सुहाई।।

सुनत जुगल कर माल उठाई।प्रेम बिबस पहिराइ न जाई।।

सोहत जनु जुग जलज सनाला।ससिहि सभीत देत जयमाला।।

गावहिं छबि अवलोकि सहेली।सियँ जयमाल राम उर मेली।।

sakhinha madhya siya sohati kaise |chabigana madhya mahāchabi jaiseṁ ||

kara saroja jayamāla suhāī |bisva bijaya sobhā jehiṁ chāī ||

tana sakocu mana parama uchāhū |gūṛha premu lakhi parai na kāhū ||

jāi samīpa rāma chabi dekhī |rahi janu kũari citra avarekhī ||

catura sakhīṁ lakhi kahā bujhāī |pahirāvahu jayamāla suhāī ||

sunata jugala kara māla uṭhāī |prema bibasa pahirāi na jāī ||

sohata janu juga jalaja sanālā |sasihi sabhīta deta jayamālā ||

gāvahiṁ chabi avaloki sahelī |siyã jayamāla rāma ura melī ||

सीता अपनी सहेलियों के बीच में कैसी सुंदर लग रही थी, जैसे सबसे खूबसूरत चीज आम खूबसूरत चीजों के बीच में खड़ी हो। उसके कमल जैसे हाथ में खूबसूरत जयमाल था, जैसे उसके ऊपर पूरी दुनिया जीतने की सोभा छा गई हो। उसके शरीर में शर्म था पर मन में बहुत खुशी थी। उसका गहरा और छुपा हुआ प्यार किसी को समझ नहीं आता था। वह पास गई और राम की खूबसूरती देखी, और वह राजकुमारी ऐसे खड़ी रह गई जैसे किसी तस्वीर में बनी हुई फिगर हो। एक समझदार सहेली ने यह देखा और उसको सीधा बोला, यह खूबसूरत जयमाल उसको पहना दो। यह सुन कर उसने दोनों हाथों से माल उठाई, पर प्यार में डूब कर उसको पहना नहीं पाई। वह ऐसे लग रही थी जैसे दो कमल अपने डाटों के साथ चाँद को जयमाल पेश कर रहे हों, और चाँद से डर रहे हों। सहेलियां यह नजारा देख कर गाने लगी, और सीता ने जयमाल राम के सीने पर रख दिया।

सोरठा 264

रघुबर उर जयमाल देखि देव बरिसहिं सुमन।सकुचे सकल भुआल जनु बिलोकि रबि कुमुदगन।।⁠264।।

raghubara ura jayamāla dekhi deva barisahiṁ sumana |sakuce sakala bhuāla janu biloki rabi kumudagana ||⁠264||

राम के सीने पर जीत की माला देख कर भगवान ऊपर से फूल बरसाने लगे। सारे राजा जैसे शर्म से पीछे हट गए, जैसे सूरज को देख कर कमल के फूल बंध हो जाते हैं।

चौपाई 265.1-4

पुर अरु ब्योम बाजने बाजे।खल भए मलिन साधु सब राजे।।

सुर किंनर नर नाग मुनीसा।जय जय जय कहि देहिं असीसा।।

नाचहिं गावहिं बिबुध बधूटीं।बार बार कुसुमांजलि छूटीं।।

जहँ तहँ बिप्र बेदधुनि करहीं।बंदी बिरदावलि उच्चरहीं।।

महि पाताल नाक जसु ब्यापा।राम बरी सिय भंजेउ चापा।।

करहिं आरती पुर नर नारी।देहिं निछावरि बित्त बिसारी।।

सोहति सीय राम कै जौरी।छबि सिंगारु मनहुँ एक ठोरी।।

सखीं कहहिं प्रभुपद गहु सीता।करति न चरन परस अति भीता।।

pura aru byoma bājane bāje |khala bhae malina sādhu saba rāje ||

sura kiṁnara nara nāga munīsā |jaya jaya jaya kahi dehiṁ asīsā ||

nācahiṁ gāvahiṁ bibudha badhūṭīṁ |bāra bāra kusumāṁjali chūṭīṁ ||

jahã tahã bipra bedadhuni karahīṁ |baṁdī biradāvali uccarahīṁ ||

mahi pātāla nāka jasu byāpā |rāma barī siya bhaṁjeu cāpā ||

karahiṁ āratī pura nara nārī |dehiṁ nichāvari bitta bisārī ||

sohati sīya rāma kai jaurī |chabi siṁgāru manahũ eka ṭhorī ||

sakhīṁ kahahiṁ prabhupada gahu sītā |karati na carana parasa ati bhītā ||

शहर में और आसमान में बाजें बजने लगे। बुरे लोग उदास हो गए, और सारे अच्छे लोग खुश हो गए। देवता, किन्नर, इंसान, नाग और बड़े रिशि सब ने विजय विजय विजय बोला और आशीर्वाद दिया। देवताओं की पत्नियां नाची और गाई, और बार बार फूल बरसे। यहां वहां ब्राह्मण वेद पढ़ रहे थे, और कवि लोग भगवान की महिमा के गाने गा रहे थे। इसकी खबर धरती में, पाताल में और आसमान में फैल गई। सीता ने राम को चुना और राम ने धनुष तोड़ा। शहर के आदमी और औरतें आरती कर रहे थे, और दान दे रहे थे, अपना पैसा भूल गए थे। सीता और राम साथ में बहुत सुंदर लग रहे थे, जैसे सुंदरता और सजावट एक ही जगह आ गई हो। सखियों ने कहा, सीता, प्रभु के चरण पकड़ो। पर वो बहुत डर गई, उनके चरण नहीं छुए।

दोहा 265

गौतम तिय गति सुरति करि नहिं परसति पग पानि।मन बिहसे रघुबंसमनि प्रीति अलौकिक जानि।।⁠265।।

gautama tiya gati surati kari nahiṁ parasati paga pāni |mana bihase raghubaṁsamani prīti alaukika jāni ||⁠265||

सीता को गौतम की पत्नी का क्या हुआ था याद आता है, इसलिए वो राम के पैर हाथ से नहीं छूती है। और राम, रघु वंस का सबसे चमकती हीरा, दिल ही दिल में मुस्कुराता है क्योंकि उसको समझ आता है कि सीता का प्यार इस दुनिया के नॉर्मल तरीके से बहुत अलग है।

चौपाई 266.1-4

तब सिय देखि भूप अभिलाषे।कूर कपूत मूढ़ मन माखे।।

उठि उठि पहिरि सनाह अभागे।जहँ तहँ गाल बजावन लागे।।

लेहु छड़ाइ सीय कह कोऊ।धरि बाँधहु नृप बालक दोऊ।।

तोरें धनुषु चाड़ नहिं सरई।जीवत हमहि कुअँरि को बरई।।

जौं बिदेहु कछु करै सहाई।जीतहु समर सहित दोउ भाई।।

साधु भूप बोले सुनि बानी।राजसमाजहि लाज लजानी।।

बलु प्रतापु बीरता बड़ाई।नाक पिनाकहि संग सिधाई।।

सोइ सूरता कि अब कहुँ पाई।असि बुधि तौ बिधि मुहँ मसि लाई।।

taba siya dekhi bhūpa abhilāṣe |kūra kapūta mūṛha mana mākhe ||

uṭhi uṭhi pahiri sanāha abhāge |jahã tahã gāla bajāvana lāge ||

lehu chaṛāi sīya kaha koū |dhari bā̃dhahu nṛpa bālaka doū ||

toreṁ dhanuṣu cāṛa nahiṁ saraī |jīvata hamahi kuãri ko baraī ||

jauṁ bidehu kachu karai sahāī |jītahu samara sahita dou bhāī ||

sādhu bhūpa bole suni bānī |rājasamājahi lāja lajānī ||

balu pratāpu bīratā baṛāī |nāka pinākahi saṁga sidhāī ||

soi sūratā ki aba kahũ pāī |asi budhi tau bidhi muhã masi lāī ||

सीता को देख कर उन राजाओं ने चाहत की, और वो बुरे बेवजह मूरख लोग दिल गुस्से से जले। वो बदनसीब लोग एक एक करके उठे, अपनी आर्मौर पहनी, और इधर उधर फूक मारने लगे। कोई बोल उठा, सीता को उनसे छीन लो, और दोनों राजकुमार लड़कों को पकड़ कर बाँध दो। धनुष तोड़ देने से बात खतम नही होती। हम ज़िंदा है तब तक इस लड़की का कोई शादी कैसे कर लेगा? अगर मिथिला का राजा उनकी थोड़ी मदद भी करे, तो दोनों भाइयों के साथ उसको भी युद्ध में हरा दो। ये बात सुनकर अच्छे राजा बोले, और पूरी राजाओं की सभा को शरम आई। तुम्हारा बल, तुम्हारा प्रताप, तुम्हारी बहादुरी और तुम्हारी बड़ी बड़ी बातें, धनुष टूटने के साथ सब नरक चली गई। वो बहादुरी अभी नये नये मिली क्या? अगर ऐसा ही तुम्हारा दिमाग है, तो ब्रह्मा ने तुम्हारे चेहरे पर काला तीप लगा दिया।

दोहा 266

देखहु रामहि नयन भरि तजि इरिषा मदु कोहु।लखन रोषु पावकु प्रबल जानि सलभ जनि होहु।।⁠266।।

dekhahu rāmahi nayana bhari taji iriṣā madu kohu |lakhana roṣu pāvaku prabala jāni salabha jani hohu ||⁠266||

राम को आँख भर के देखो। इर्श्या, घमंद और गुस्सा छोड़ दो। लक्ष्मन का गुस्सा एक बहुत बड़ी आग है, ये समझ लो। उस आग मे पतंगो की तरह मत जलना।

चौपाई 267.1-4

बैनतेय बलि जिमि चह कागू।जिमि ससु चहै नाग अरि भागू।।

जिमि चह कुसल अकारन कोही।सब संपदा चहै सिवद्रोही।।

लोभी लोलुप कल कीरति चहई।अकलंकता कि कामी लहई।।

हरि पद बिमुख परम गति चाहा।तस तुम्हार लालचु नरनाहा।।

कोलाहलु सुनि सीय सकानी।सखीं लवाइ गईं जहँ रानी।।

रामु सुभायँ चले गुरु पाहीं।सिय सनेहु बरनत मन माहीं।।

रानिन्ह सहित सोचबस सीया।अब धौं बिधिहि काह करनीया।।

भूप बचन सुनि इत उत तकहीं।लखनु राम डर बोलि न सकहीं।।

bainateya bali jimi caha kāgū |jimi sasu cahai nāga ari bhāgū ||

jimi caha kusala akārana kohī |saba saṁpadā cahai sivadrohī ||

lobhī lolupa kala kīrati cahaī |akalaṁkatā ki kāmī lahaī ||

hari pada bimukha parama gati cāhā |tasa tumhāra lālacu naranāhā ||

kolāhalu suni sīya sakānī |sakhīṁ lavāi gaīṁ jahã rānī ||

rāmu subhāyã cale guru pāhīṁ |siya sanehu baranata mana māhīṁ ||

rāninha sahita socabasa sīyā |aba dhauṁ bidhihi kāha karanīyā ||

bhūpa bacana suni ita uta takahīṁ |lakhanu rāma ḍara boli na sakahīṁ ||

तुम वैसे हो जैसे कव्वा गरुड के खाने को चाहता हो, या खरगोश जो शेर का हिस्सा चाहता हो। तुम वैसे हो जो बिना वजह गुस्सा करता है फिर अपना भला चाहता है, या शिव का दुश्मन जो हर तरह की संपत्ति चाहता है। लालच वाला इंसान अच्छा नाम कैसे पायेगा? कामी इंसान साफ इमेज कैसे बचायेगा? राजा, तुम्हारा लालच ऐसा ही है। जैसे कोई हरि के चरणों से मुह मोद के भी सबसे ऊपर की स्थिति चाहता है। शोर सुन के सीता डर गई। उसकी सहेलियां उसे ले गई जहां रानी थी। राम अपने स्वभाव से शांत होके गुरु के पास गया। दिल में सीता का प्यार सोच रहा था। सीता और रानियां सब चिंतित थी। अब किस्मत क्या करेगी? राजाओं की बातें सुन के इधर उधर देखा। लक्ष्मन को राम का डर था इसलिए बोल नहीं सका।

दोहा 267

अरुन नयन भृकुटी कुटिल चितवत नृपन्ह सकोप।मनहुँ मत्त गजगन निरखि सिंघकिसोरहि चोप।।⁠267।।

aruna nayana bhṛkuṭī kuṭila citavata nṛpanha sakopa |manahũ matta gajagana nirakhi siṁghakisorahi copa ||⁠267||

उसकी आँखें लाल थी और भौं तनी हुई थी। वो राजाओं को गुस्से से देख रहा था। जैसे कोई जवान शेर, जोश में आके हाथों पर कूदने को तैयार हो, उन पागल हाथों को घूरता हो।

चौपाई 268.1-4

खरभरु देखि बिकल पुर नारीं।सब मिलि देहिं महीपन्ह गारीं।।

तेहिं अवसर सुनि सिव धनु भंगा।आयसु भृगुकुल कमल पतंगा।।

देखि महीप सकल सकुचाने।बाज झपट जनु लवा लुकाने।।

गौरि सरीर भूति भल भ्राजा।भाल बिसाल त्रिपुंड बिराजा।।

सीस जटा ससिबदनु सुहावा।रिसबस कछुक अरुन होइ आवा।।

भृकुटी कुटिल नयन रिस राते।सहजहुँ चितवत मनहुँ रिसाते।।

बृषभ कंध उर बाहु बिसाला।चारु जनेउ माल मृगछाला।।

कटि मुनि बसन तून दुइ बाँधें।धनु सर कर कुठारु कल काँधें।।

kharabharu dekhi bikala pura nārīṁ |saba mili dehiṁ mahīpanha gārīṁ ||

tehiṁ avasara suni siva dhanu bhaṁgā |āyasu bhṛgukula kamala pataṁgā ||

dekhi mahīpa sakala sakucāne |bāja jhapaṭa janu lavā lukāne ||

gauri sarīra bhūti bhala bhrājā |bhāla bisāla tripuṁḍa birājā ||

sīsa jaṭā sasibadanu suhāvā |risabasa kachuka aruna hoi āvā ||

bhṛkuṭī kuṭila nayana risa rāte |sahajahũ citavata manahũ risāte ||

bṛṣabha kaṁdha ura bāhu bisālā |cāru janeu māla mṛgachālā ||

kaṭi muni basana tūna dui bā̃dheṁ |dhanu sara kara kuṭhāru kala kā̃dheṁ ||

शहर की औरतों ने हंगामा देखा तो परेशान हो गई। सब मिलकर राजाओं को गालियां देने लगी। उसी वक्त शिव का धनुष टूटा सुन कर भृगु कुल का एक आदमी आया, जैसे सूरज कमल पर आता है। उसे देख कर सारे राजा डर गए और पीछे हट गए, जैसे बाज आने पर बटेर छुप जाती है। उसके गोरे शरीर पे भस्म अच्छे से चमक रहा था, और चौड़े माथे पे तीन धारे की तिलक चमक रही थी। सिर पे जटें थी और चांद जैसा चेहरा सुंदर था, पर गुस्से से थोड़ा लाल हो गया था। भूंह तिड़ी हुई थी और आंखें गुस्से से लाल थी। उसका नॉर्मल देखना भी ऐसा लगता था जैसे गुस्सा हो। कंधे बैल जैसे थे, छाती और बाजू बड़े थे। उसने सुंदर जनेऊ, माला और हिरन की चादर पहनी थी। कमर पे रिशि का कपड़ा था और दो तीर की पोटियां बंधी थी। हाथ मे धनुष और तीर थे, और कंधे पे कुल्हाड़ी थी।

दोहा 268

सांत बेषु करनी कठिन बरनि न जाइ सरुप।धरि मुनितनु जनु बीर रसु आयउ जहँ सब भूप।।⁠268।।

sāṁta beṣu karanī kaṭhina barani na jāi sarupa |dhari munitanu janu bīra rasu āyau jahã saba bhūpa ||⁠268||

उसके कपड़े देख के लगता था कि एक शांत बाबा है, लेकिन उसके काम बहुत खतरनाक थे, और उसका रूप भी बातों से नहीं बताया जा सकता। जैसे वीर रस ने किसी रिशि का शरीर ले लिया हो और जहाँ सारे राजा इकट्ठे थे, वहाँ आ गया हो।

चौपाई 269.1-4

देखत भृगुपति बेषु कराला।उठे सकल भय बिकल भुआला।।

पितु समेत कहि कहि निज नामा।लगे करन सब दंड प्रनामा।।

जेहि सुभायँ चितवहिं हितु जानी।सो जानइ जनु आइ खुटानी।।

जनक बहोरि आइ सिरु नावा।सीय बोलाइ प्रनामु करावा।।

आसिष दीन्हि सखीं हरषानीं।निज समाज लै गई सयानीं।।

बिस्वामित्रु मिले पुनि आई।पद सरोज मेले दोउ भाई।।

रामु लखनु दसरथ के ढोटा।दीन्हि असीस देखि भल जोटा।।

रामहि चितइ रहे थकि लोचन।रूप अपार मार मद मोचन।।

dekhata bhṛgupati beṣu karālā |uṭhe sakala bhaya bikala bhuālā ||

pitu sameta kahi kahi nija nāmā |lage karana saba daṁḍa pranāmā ||

jehi subhāyã citavahiṁ hitu jānī |so jānai janu āi khuṭānī ||

janaka bahori āi siru nāvā |sīya bolāi pranāmu karāvā ||

āsiṣa dīnhi sakhīṁ haraṣānīṁ |nija samāja lai gaī sayānīṁ ||

bisvāmitru mile puni āī |pada saroja mele dou bhāī ||

rāmu lakhanu dasaratha ke ḍhoṭā |dīnhi asīsa dekhi bhala joṭā ||

rāmahi citai rahe thaki locana |rūpa apāra māra mada mocana ||

परशुराम का डरावना रूप देख कर सारे राजा उठ गए, डर से काँप रहे थे और घबरा गए थे। हर एक अपना नाम और अपने पिता का नाम लेकर सब उसके आगे दंडवत प्रणाम करने लगे। जिस तरफ उसकी नज़र वैसा नॉर्मल झुकी, समझ के कि ये दोस्त है, उस आदमी को लगा जैसे जान ही निकल गई। फिर जनक आए और सर झुकाया, सीता को बुलाया और उससे प्रणाम करवाया। रिशि ने उन्हें आशीर्वाद दिया, सहेलियाँ खुश हुई, समझदार लड़कियाँ सीता को अपनी ग्रुप में ले गई। फिर विश्वामित्र आए और मिले, दोनों भाइयों को उनके चरण कमल में रखवाया। बोले, ये राम और लक्ष्मण दशरथ के बेटे हैं। दोनों को देख कर रिशि खुश होकर आशीर्वाद दिया। राम को देखते ही उनकी आँखें थक गई, नहीं हिल रही थी, क्योंकि राम का रूप तो अनोखा था और कामदेव का घमंड तोड़ दिया।

दोहा 269

बहुरि बिलोकि बिदेह सन कहहु काह अति भीर।पूछत जानि अजान जिमि ब्यापेउ कोपु सरीर।।⁠269।।

bahuri biloki bideha sana kahahu kāha ati bhīra |pūchata jāni ajāna jimi byāpeu kopu sarīra ||⁠269||

फिर उसने जनक को देखा और बोला, बताओ, इतनी भीड़ क्यों है? ऐसे पूछा जैसे उसको नहीं पता, पर उसको सब पता था, और गुस्सा पूरे जिस्म में फैल गया।

Inside Prakarana 27

Compositional abstract

In this Bālakāṇḍa segment (Sītā-svayaṃvara and Śiva-dhanuṣ-bhaṅga), the dominant rasa is adbhuta shaded by śṛṅgāra and vīra, quickly turning to hāsya/raudra as petty kings flare in wounded pride. Tulasīdāsa choreographs emotion as a spiritual pedagogy: wonder opens the heart (लोक सब चित्र लिखे से), प्रेम becomes palpable in Sītā’s inner turmoil, and the Lord’s līlā resolves cosmic and social tension in one sound—the कठोर धुनि that fills the worlds. Theologically, the scene is a miniature Manas: Śiva’s bow is ‘the ocean/ship’ and Rāma’s arm is the pāra-gāmī power; crossing is possible only by surrender, not by worldly ‘kड़हारू’ (ferryman). The episode also prepares the next stair: Paraśurāma’s arrival tests whether vīrya is rooted in अहंकार or in dharma-bhakti. Thus Bālakāṇḍa here establishes the Manas’s core claim: the Saguna Lord’s beauty and play are themselves liberating knowledge.

The dialogue

  • Yajñavalkya (via Tulasīdāsa’s framing of the Manas-kathā)Bhāradvāja · Prayāga-ghāṭ: the ‘jñāna-to-bhakti’ bank where inquiry ripens into devotion; the bow episode is narrated as a revelatory proof (pramāṇa) of Rāma-tattva.

Frequently Asked Questions

Paramparā holds that Śiva-dhanuṣ-bhaṅga and Sītā-Rāma jaymāl pāṭha grants saubhāgya, dṛḍha-bhakti, and ahaṅkāra-kṣaya: the listener’s ‘inner bow’ (pride/saṃśaya) breaks, making the heart fit for Rāma-nāma and for vivāha-maṅgal/gaurī-pūjā contexts.

A common samput used in many Manas-kathā lineages for auspicious stabilization is: “सीता राम चरन रति मोरे। अनुदिन बढ़उ अनुग्रह तोरे॥” (inserted after each doha in the run), especially during vivaah-maṅgal recitations.

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