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Ramcharitmanas: Bala Kanda, Prakarana 2

चौपाई 19.1-4

सोपान-प्रवेश (Staircase-Threshold): नाम-कीर्ति-स्तुति के द्वारा चित्त-शुद्धि और श्रद्धा का जन्म। बालकाण्ड यहाँ ‘कथा आरंभ’ मात्र नहीं, बल्कि साधक के भीतर ‘राम-नाम’ को आधार (आलंबन) बनाकर कलि-मल-नाश और सत्संग-प्रवृत्ति की प्रथम सीढ़ी है—जहाँ प्राकृत/लोकभाषा भी वेद-सार बनकर उद्धार-मार्ग हो जाती है।

बंदउँ नाम राम रघुवर को।हेतु कृसानु भानु हिमकर को।।

बिधि हरि हरमय बेद प्रान सो।अगुन अनूपम गुन निधान सो।।

महामंत्र जोइ जपत महेसू।कासीं मुकुति हेतु उपदेसू।।

महिमा जासु जान गनराउ।प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ।।

जान आदिकबि नाम प्रतापू।भयउ सुद्ध करि उलटा जापू।।

सहस नाम सम सुनि सिव बानी।जपि जेई पिय संग भवानी।।

हरषे हेतु हेरि हर ही को।किय भूषन तिय भूषन ती को।।

नाम प्रभाउ जान सिव नीको।कालकूट फलु दीन्ह अमी को।।

bandaū̃ nāma rāma raghuvara ko |hetu kṛsānu bhānu himakara ko ||

bidhi hari haramaya beda prāna so |aguna anūpama guna nidhāna so ||

mahāmantra joi japata mahesū |kāsī̃ mukuti hetu upadesū ||

mahimā jāsu jāna gaṇarāu |prathama pūjiata nāma prabhāū ||

jāna ādikabi nāma pratāpū |bhayau suddha kari ulaṭā jāpū ||

sahasa nāma sama suni siva bānī |japi jeī piya saṅga bhavānī ||

haraṣe hetu heri hara hī ko |kiya bhūṣana tiya bhūṣana tī ko ||

nāma prabhāu jāna siva nīko |kālakūṭa phalu dīnha amī ko ||

मैं राम के नाम को नमन करता हूं। राम रघु परिवार के सबसे अच्छे हैं, और उनका नाम आग, सूरज और चाँद का सोर्स है। यह नाम ब्रह्मा, विष्णु और शिव का अस्तित्व है, और वेद इसकी सांस है। यह बिना किसी गुण के है, इसका कोई कंपेरिज़न नहीं, और यह सारे गुण का खजाना है। यह एक बहुत बड़ा मंत्र है जो शिव खुद जाप करते हैं। यही वो उपदेश है जो वो काशी मे मुक्ति के लिए देते हैं। गणेश इसकी महिमा जानते हैं, और नाम की ताकत से उनकी पूजा सबसे पहले होती है। पहला कवि ने नाम की ताकत समझ ली थी। उन्होंने नाम उल्टा पढ़ा, फिर भी वो साफ हो गए। शिव की बात सुन के कि यह नाम हज़ार नाम के बराबर है, पार्वती ने इसका जाप किया और अपने पिया के साथ मिल गई। यह देख के कि वो सिर्फ शिव की थी, शिव खुश हो गए। उन्होंने उस औरत को, जो औरतों में गहना थी, अपने शरीर का गहना बना लिया। शिव ने नाम की ताकत अच्छे से जानी थी। उन्होंने जो कालकूट ज़हर पिया था, वो अमृत बन गया।

बंदउँमैं वंदना करता हूँ
बंदउँ:
नामभगवान का नाम; यहाँ ‘राम-नाम’
नाम:
रघुवररघुकुल-श्रेष्ठ श्रीराम
रघुवर:
हेतुकारण; निमित्त
हेतु:
कृसानुअग्नि
कृसानु:
भानुसूर्य
भानु:
हिमकरचंद्रमा
हिमकर:
बिधिब्रह्मा
बिधि:
हरिविष्णु
हरि:
हरमयशिव-स्वरूप/शिवमय
हरमय:
बेद प्रानवेदों का प्राण/सार-तत्त्व
बेद प्रान:
अगुननिर्गुण (गुणातीत)
अगुन:
अनूपमअतुलनीय
अनूपम:
गुन निधानसगुण गुणों का भंडार (परस्पर-विरोध का समन्वय)
गुन निधान:
महेसूमहेश (शिव)
महेसू:
कासींकाशी
कासीं:
मुकुतिमोक्ष
मुकुति:
उपदेसूउपदेश
उपदेसू:
गनराउगणों के राजा; गणपति (गणेश)
गनराउ:
प्रथम पूजिअतसबसे पहले पूजे जाते हैं
प्रथम पूजिअत:
आदिकबिआदि कवि (वाल्मीकि)
आदिकबि:
उलटा जापूउलटा जप (मरा→राम) द्वारा नाम-स्मरण
उलटा जापू:
सहस नामहज़ार नाम (विष्णु-सहस्रनाम/नाम-माहात्म्य का बोध)
सहस नाम:
सिव बानीशिव-वाणी/शिव का कथन
सिव बानी:
भवानीपार्वती
भवानी:
हरशिव
हर:
भूषनआभूषण; शोभा-वर्धक
भूषन:
कालकूटहलाहल विष
कालकूट:
अमीअमृत
अमी:

Speaker

Tulsidas (mangalacharan: Nama-mahatmya stuti)

Listener

Tulsi-Sant (symbolic ghat: the poet addressing the saintly community and readers)

Shanta (with Dasya undertone: reverential bowing to the Name)

The prasanga

बालकाण्ड के आरम्भ में नाम-वंदना: कथा-प्रवेश से पूर्व ‘राम-नाम’ की सर्व-प्रधानता और मुक्तिदायिनी शक्ति का प्रतिपादन।

Themes
राम नाम की महिमा, नाम की सर्वोपरिता: ब्रह्मा, विष्णु, शिव और वेदों का प्राण, शिव द्वारा नाम-जप और काशी में मुक्ति का उपदेश, उलटे जाप से भी शुद्धि, निर्गुण और सगुण गुणों का एक नाम में समाहार, नाम के प्रभाव से विष का अमृत होना

For right living (Ramrajya ethics)

नाम-स्मरण को सार्वजनिक-नीति का आधार: वाणी-शुद्धि, मन-नियमन, और विष (क्रोध/अहं/द्वेष) को अमृत (क्षमा/मर्यादा/करुणा) में बदलने का आदर्श—जो रामराज्य की ‘आत्म-शासन’ (self-governance) की नींव है।

Nirguna and saguna

नाम को ‘अगुन’ (निर्गुण, निरुपाधिक) कहकर भी ‘गुन निधान’ (सगुण-लीला के सद्गुणों का भंडार) कहा गया है—अर्थात् एक ही परम-तत्त्व नाम-रूप से भक्त के लिए सुलभ होता है, पर स्वरूपतः गुणातीत रहता है।

FAQs

तुलसीदास नाम को अग्नि, सूर्य और चंद्रमा का हेतु (कारण) कहते हैं। वे उसे ब्रह्मा, विष्णु और शिव का स्वरूप तथा वेदों का प्राण भी बताते हैं। नाम अगुण और अनुपम है, फिर भी समस्त गुणों का भंडार है। इस प्रकार निर्गुण और सगुण दोनों रूप एक नाम में आ जाते हैं।

शिव स्वयं राम नाम को महामंत्र मानकर जपते हैं और काशी में मुक्ति के लिए इसी का उपदेश देते हैं। शिव से यह सुनकर कि यह नाम हज़ार नामों के बराबर है, भवानी ने उसे जपा और अपने प्रिय के साथ एक हो गईं। शिव उनकी अनन्य भक्ति देखकर प्रसन्न हुए और उन्हें अपने अंग का भूषण बना लिया।

आदिकवि नाम का प्रताप जानते थे, इसलिए उलटा जाप करके भी वे शुद्ध हो गए। इससे दिखता है कि नाम की शक्ति जपने के क्रम पर नहीं, नाम पर निर्भर है। गणेश नाम की महिमा जानते हैं, इसीलिए नाम के प्रभाव से देवताओं में उनकी पूजा सबसे पहले होती है। अंत में कहा गया है कि शिव ने नाम का प्रभाव भली-भाँति जाना, इसी से कालकूट विष का फल उनके लिए अमृत हो गया।

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