Bala KandaPrakarana 221 Verses

Prakarana 2

सोपान-प्रवेश (Staircase-Threshold): नाम-कीर्ति-स्तुति के द्वारा चित्त-शुद्धि और श्रद्धा का जन्म। बालकाण्ड यहाँ ‘कथा आरंभ’ मात्र नहीं, बल्कि साधक के भीतर ‘राम-नाम’ को आधार (आलंबन) बनाकर कलि-मल-नाश और सत्संग-प्रवृत्ति की प्रथम सीढ़ी है—जहाँ प्राकृत/लोकभाषा भी वेद-सार बनकर उद्धार-मार्ग हो जाती है।

यह प्रकरण ‘सोपान-प्रवेश’ है—कथा का बाह्य आरम्भ नहीं, साधक के भीतर प्रवेश-द्वार। ‘रघुपति नाम उदारा’ यहाँ ब्रह्म-सेतु है: निर्गुण परमधाम की अनीह/अरूप व्यापकता वही है जो भक्त-हित हेतु सगुण होकर लीला में उतरती है; नाम दोनों को जोड़ने वाला आलंबन बनता है। ‘मंगल भवन अमंगल हारी’ नाम-कीर्ति को औषधि/रसायन की तरह प्रस्तुत करता है—कलि-मल का क्षय, भय-शोक का शमन, और अंतःकरण का परिष्कार। लोकभाषा/‘ग्राम्य गिरा’ का रूपक (मलय-संसर्ग से दारु सुगंधित) यह संकेत देता है कि माध्यम की ‘उच्च-नीच’ नहीं, संगति निर्णायक है: राम-जस का संसर्ग साधारण वाणी को भी वेद-सार बना देता है। कवि की आत्म-लघुता और कपट-भक्ति की आलोचना साधक में विवेक जगाती है—सच्ची भक्ति का चिह्न है विनय, निष्कपटता, और सत्संग की ओर मुड़ना।

Verses

चौपाई 10.1-5

एहि महँ रघुपति नाम उदारा।अति पावन पुरान श्रुति सारा।।

मंगल भवन अमंगल हारी।उमा सहित जेहि जपत पुरारी।।

भनिति बिचित्र सुकबि कृत जोऊ।राम नाम बिनु सोह न सोऊ।।

बिधुबदनी सब भाँति सँवारी।सोन न बसन बिना बर नारी।।

सब गुन रहित कुकबि कृत बानी।राम नाम जस अंकित जानी।।

सादर कहहिं सुनहिं बुध ताही।मधुकर सरिस संत गुनग्राही।।

जदपि कबित रस एकउ नाही।राम प्रताप प्रकट एहि माहीं।।

सोइ भरोस मोरें मन आवा।केहिं न सुसंग बडप्पनु पावा।।

धूमउ तजइ सहज करुआई।अगरु प्रसंग सुगंध बसाई।।

भनिति भदेस बस्तु भलि बरनी।राम कथा जग मंगल करनी।।

ehi mahã̃ raghupati nāma udārā |ati pāvana purāna śruti sārā ||

maṅgala bhavana amaṅgala hārī |umā sahita jehi japata purārī ||

bhaniti bicitra sukabi kṛta joū |rāma nāma binu soha na soū ||

bidhu-badanī saba bhā̃ti saṁvārī |sona na basana binā bara nārī ||

saba guna rahita kukabi kṛta bānī |rāma nāma jasa aṅkita jānī ||

sādara kahahiṁ sunahiṁ budha tāhī |madhukara sarisa santa guna-grāhī ||

jadapi kabita rasa ekau nāhī |rāma pratāpa prakaṭa ehi māhī ||

soi bharosa moreṁ mana āvā |kehiṁ na susaṅga baḍappanu pāvā ||

dhūmau tajai sahaja karuāī |agaru prasaṅga sugandha basāī ||

bhaniti bhadesa bastu bhali baranī |rāma kathā jaga maṅgala karanī ||

इस काव्य में राम का नाम है। बहुत पवित्र है। पुरान और वेदों का सार है। ये नाम मंगल का घर है। हर तरह के अमंगल को दूर करता है। शिव और पार्वती मिलकर इसे जपते हैं। कोई भी अच्हा कवि चाहे कितनी भी सुंदर रचना करे, राम के नाम के बिना उसमे चमक नहीं आती। एक सुंदर चेहरे वाली औरत को चाहे हर तरह से सजा लो, कपडे के बिना वो अच्छी नहीं लगती। लेकिन कोई साधारण कवि की लिखी हुई बात, जिसमे कोई गुण ना हो, अगर उसमे राम के नाम और जस लिखा हो। तोह समझदार लोग उसे इज्जत से पढते और सुनते हैं। क्योंकि संत भनवरे की तरह हैं, अच्छी चीज पकड लेते हैं। इस कविता में कोई काव्य रस नहीं है। फिर भी राम की महिमा इसमे साफ दिखती है। मेरे मन में ये भरोसा आया है। किसने अच्छी संगत से बडापन नहीं पाया? धुआं भी अपनी कडवी खुशबू छोड देता है। अगर अगर के पास रहे तोह महक जाता है। मेरी रचना तोह साधारण है। लेकिन इसका विषय बहुत अच्हा है। क्योंकि राम की कथा सुनाता है, जो जग को मंगल देता है।

छंद 10

मंगल करनि कलि मल हरनि तुलसी कथा रघुनाथ की।गति कूर कबिता सरित की ज्यों सरित पावन पाथ की।।

प्रभु सुजस संगति भनिति भलि होइहि सुजन मन भावनी।भव अंग भूति मसान की सुमिरत सुहावनि पावनी।।

maṅgala karani kali mala harani tulasī kathā raghunātha kī |gati kūra kabitā sarita kī jyoṃ sarita pāvana pātha kī ||

prabhu sujasa saṅgati bhaniti bhali hoihi sujana mana bhāvanī |bhava aṅga bhūti masāna kī sumirata suhāvani pāvanī ||

तुलसीदास कहते हैं कि राम की कहानी मंगल लाती है और कलि युग की गंदगी हटा देती है। मेरी कविता का रास्ता टेढ़ा है, जैसे नदी का रास्ता टेढ़ा होता है। पर जैसे नदी का पानी साफ होता है, वैसे ही ये कहानी भी साफ है। भगवान के अच्छे नाम की वजह से मेरी कविता, चाहे कितनी भी बेकार हो, अच्छी हो जाएगी और अच्छे लोगों के दिल को पसंद आएगी। जैसे मसान की राख शिव के शरीर पर सुंदर लगती है और पाक करती है जब याद की जाए, वैसे ही ये भी है।

दोहा 10(क)-(ख)

प्रिय लागिहि अति सबहि मम भनिति राम जस संग।दारु बिचारु कि करइ कोउ बंदिअ मलय प्रसंग।।⁠10(क)।।

स्याम सुरभि पय बिसद अति गुनद करहिं सब पान।गिरा ग्राम्य सिय राम जस गावहिं सुनहिं सुजान।।⁠10(ख)।।

priya lāgihi ati sabahi mama bhaṇiti rāma jasa saṅga |dāru bicāru ki karai kou bandia malaya prasaṅga ||⁠10(ka)||

syāma surabhi paya bisada ati gunada karahiṁ saba pāna |girā grāmya siya rāma jasa gāvahiṁ sunahiṁ sujāna ||⁠10(kha)||

मेरी कविता राम की महिमा के साथ जुडी है तो सबको बहुत प्यारी लगेगी। मलय पहाद से जब लकडी आती है तो कोई ये नहीं सोचता कि कौनसी लकडी है। चंदन के जंगल के साथ जुडने की वजह से उसकी इज्जत होती है। गाय का रंग काला हो सकता है पर उसका दूध बिलकुल साफ है और गुण से भरा है, सब लोग पीते हैं। वैसे ही मेरी भाषा सिंपल है पर ये सीता और राम की महिमा गाती है, और समझदार लोग इसे सुनेंगे और गायेंगे।

चौपाई 11.1-5

मनि मानिक मुकुता छबि जैसी।अहि गिरि गज सिर सोह न तैसी।।

नृप किरीट तरुनी तनु पाई।लहहिं सकल सोभा अधिकाई।।

तैसेहिं सुकबि कबित बुध कहहीं।उपजहिं अनत अनत छबि लहहीं।।

भगति हेतु बिधि भवन बिहाई।सुमिरत सारद आवति धाई।।

राम चरित सर बिनु अन्हवाएँ।सो श्रम जाइ न कोटि उपाएँ।।

कबि कोबिद अस हृदयँ बिचारी।गावहिं हरि जस कलि मल हारी।।

कीन्हें प्राकृत जन गुन गाना।सिर धुनि गिरा लगत पछिताना।।

हृदय सिंधु मति सीप समाना।स्वाति सारदा कहहिं सुजाना।।

जौं बरषइ बर बारि बिचारू।होहिं कबित मुकुतामनि चारू।।

mani mānika mukutā chabi jaisī |ahi giri gaja sira soha na taisī ||

nṛpa kirīṭa tarunī tanu pāī |lahahiṃ sakala sobhā adhikāī ||

taisehiṃ su-kabi kabita budha kahaḥīṃ |upajahiṃ anata-anata chabi lahahīṃ ||

bhagati hetu bidhi bhavana bihāī |sumirata sāradā āvati dhāī ||

rāma carita sara binu anhavāeṃ |so śrama jāi na koṭi upāeṃ ||

kabi kobida asa hṛdayã bicārī |gāvahiṃ hari jasa kali mala hārī ||

kīnhēṃ prākṛta jana guna gānā |sira dhuni girā lagata pachitānā ||

hṛdaya sindhu mati sīpa samānā |svāti sāradā kahahiṃ sujānā ||

jauṃ baraṣai bara bāri bicārū |hohiṃ kabita mukutāmani cārū ||

मनि, लाल और मोति अपनि जगह पर जब होते हैं तो कितनी खूबसूरत लगति है, लेकिन नाग के सिर पर, पहाड पर या हाथी के सिर पर इतनी सूबहत नहीं होति। लेकिन जब ये राजा के ताज में या किसी जवान औरत के शरीर पर आ जाते हैं, तो इनकी चमक काफी बढ जाति है। बिलकुल वैसे ही समझदार लोग कहते हैं कि अच्हे कवि की कविता एक जगह पैदा होति है और दूसरी जगह अपनी खूबसूरती पकडति है। भक्ति के लिए सरस्वती को याद किया जाता है तो वो ब्रह्मा की दुनिया छोड कर दौडती हुई आ जाति है। राम के काम के तालाब में नहाए बिना, वो मेहनत लाख कोशिशों से भी जाति नहीं है। कवि और पंडित अपने दिल में ऐसा सोच कर, हरि की महिमा गाते हैं जो कलि युग की गंदगी मिटा देति है। जब आम आदमी की तारीफ लिखी जाति है, तो सरस्वती अपना सिर पीटति है और पछताने लगति है। समझदार लोग कहते हैं कि दिल समंदर है, समझ सीप की खोली है, और सरस्वती स्वाति नक्षत्र की बारिश है। अगर अच्छा खयाल उस बारिश की तरह बरसा, तो कविता खूबसूरत मोती बन जाति है।

दोहा 11

जुगुति बेधि पुनि पोहिअहिं रामचरित बर ताग।पहिरहिं सज्जन बिमल उर सोभा अति अनुराग।।⁠11।।

juguti bedhi puni pohiahiṁ rāmacarita bara tāga |pahirahiṁ sajjana bimala ura sobhā ati anurāga ||⁠11||

कविता के मोती को कुशलती से बेध कर, फिर राम की कहानी के अच्छे धागे में पिरोया गया है। अच्छे लोग उन्हें अपने साफ दिल पे पेहनते हैं। वहां से बहुत सुंदरता आती है और दिल को बहुत खुशी मिलती है।

चौपाई 12.1-6

जे जनमे कलिकाल कराला।करतब बायस बेष मराला।।

चलत कुपंथ बेद मग छाँड़े।कपट कलेवर कलि मल भाँड़ें।।

बंचक भगत कहाइ राम के।किंकर कंचन कोह काम के।।

तिन्ह महँ प्रथम रेख जग मोरी।धींग धरमध्वज धंधक धोरी।।

जौं अपने अवगुन सब कहऊँ।बाढ़इ कथा पार नहिं लहऊँ।।

ताते मैं अति अलप बखाने।थोरे महुँ जानिहहिं सयाने।।

समुझि बिबिधि बिधि बिनती मोरी।कोउ न कथा सुनि देइहि खोरी।।

एतेहु पर करिहहिं जे असंका।मोहि ते अधिक ते जड़ मति रंका।।

कबि न होउँ नहिं चतुर कहावउँ।मति अनुरूप राम गुन गावउँ।।

कहँ रघुपति के चरित अपारा।कहँ मति मोरि निरत संसारा।।

जेहिं मारुत गिरि मेरु उड़ाहीं।कहहु तूल केहि लेखे माहीं।।

समुझत अमित राम प्रभुताई।करत कथा मन अति कदराई।।

je janame kalikāla karālā |karataba bāyasa beṣa marālā ||

calata kupantha beda maga chāṃṛe |kapaṭa kalevara kali mala bhāṃṛe ||

baṃcaka bhagata kahāi rāma ke |kiṃkara kaṃcana koha kāma ke ||

tinha maham̐ prathama rekha jaga morī |dhīṃga dharamadhvaja dhaṃdhaka dhorī ||

jauṃ apane avaguna saba kahauṃ |bāṛhai kathā pāra nahiṃ lahauṃ ||

tāte maiṃ ati alapa bakhāne |thore mahuṃ jānihahiṃ sayāne ||

samujhi bibidhi bidhi binatī morī |kou na kathā suni deihi khorī ||

etehu para karihahiṃ je asaṃkā |mohi te adhika te jaṛa mati raṃkā ||

kabi na houṃ nahiṃ catura kahāvaũ |mati anurūpa rāma guna gāvaũ ||

kaham̐ raghupati ke carita apārā |kaham̐ mati mori nirata saṃsārā ||

jehiṃ māruta giri meru uṛāhīṃ |kahahu tūla kehi lekhe māhīṃ ||

samujhata amita rāma prabhutāī |karata kathā mana ati kadarāī ||

जो लोग इस खतरनाक कलि युग में पैदा होते हैं, उनके काम करने का तरीका कौवे जैसा है, बस दिखने में हंस जैसे लगते हैं। ये लोग बुरा रास्ता पकड़ते हैं, वेदों का रास्ता छोड़ देते हैं। ये धोखे का पिंड हैं और कलि युग की गंदगी के भंडार हैं। ये लोग धोखेबाज़ हैं जो खुद को राम के भक्त बोलते हैं। असल में ये पैसा, गुस्सा और हवस के गुलाम हैं। इन सब में दुनिया मुझे सबसे ऊपर रखती है, जो एक दिखावे वाला धोंगी है और दुनियादारी के झंझट में सबसे आगे है। अगर मैं अपने सारे खराबियां बताने लगूं, तो कहानी इतनी लंबी हो जाएगी कि मुझे इसका अंत तक नहीं पहुंचना मिलेगा। इसलिए मैं बहुत थोड़ा ही बताया है। समझदार लोग थोड़ी बातों से ही समझ जाएंगे। मेरी अलग अलग तरह से की गई मिनत को समझ कर, कोई भी जो ये कहानी सुनेगा, मुझे दोषी नहीं मानेगा। इसके बाद भी जो लोग शक करते हैं, वो मुझसे भी ज़्यादा मूरख और समझ में कम हैं। मैं कोई कवि नहीं हूं, ना खुद को चलक बोलता हूं। मैं अपनी समझ जितनी है, उतना ही राम के गुण गाते हूं। रघुकुल के स्वामी के करने कितने असीमित हैं, और मेरा दिमाग कितना छोटा है, जो पूरी तरह दुनिया में फंसा हुआ है। बताओ, जब हवा मेरु जैसे पहाड़ को उड़ा कर ले जाए, तो एक रूई का टुकड़ा क्या औकात रखता है? जब मैं राम के अनंत महिमा को सोचता हूं, तो उनकी कहानी शुरू करते वक्त मेरा मन बहुत डर जाता है।

दोहा 12

सारद सेस महेस बिधि आगम निगम पुरान।नेति नेति कहि जासु गुन करहिं निरंतर गान।।⁠12।।

sārada sesa mahesa bidhi āgama nigama purāna |neti neti kahi jāsu guna karahiṁ nirantara gāna ||⁠12||

सारस्वती, शेष, शिव और ब्रह्मा, और सारी आगम, निगम और पुरान, बिना रुके उसके गुन गाते रहते हैं, और कहते हैं कि उसको अलग अलग तरीके से भी नहीं समझा सकते।

चौपाई 13.1-5

सब जानत प्रभु प्रभुता सोई।तदपि कहें बिनु रहा न कोई।।

तहाँ बेद अस कारन राखा।भजन प्रभाउ भाँति बहु भाषा।।

एक अनीह अरूप अनामा।अज सच्चिदानंद पर धामा।।

ब्यापक बिस्वरूप भगवाना।तेहिं धरि देह चरित कृत नाना।।

सो केवल भगतन हित लागी।परम कृपाल प्रनत अनुरागी।।

जेहि जन पर ममता अति छोहू।जेहिं करुना करि कीन्ह न कोहू।।

गई बहोर गरीब नेवाजू।सरल सबल साहिब रघुराजू।।

बुध बरनहिं हरि जस अस जानी।करहि पुनीत सुफल निज बानी।।

तेहिं बल मैं रघुपति गुन गाथा।कहिहउँ नाइ राम पद माथा।।

मुनिन्ह प्रथम हरि कीरति गाई।तेहिं मग चलत सुगम मोहि भाई।।

sab jānat prabhu prabhutā soī |tadapi kahẽ binu rahā na koī ||

tahā̃ beda asa kārana rākhā |bhajana prabhāu bhā̃ti bahu bhāṣā ||

eka anīha arūpa anāmā |aja saccidānanda para dhāmā ||

byāpaka bisvarūpa bhagavānā |tehã dhari deha carita kṛta nānā ||

so kevala bhagatan hita lāgī |parama kṛpāla pranata anurāgī ||

jehi jana para mamatā ati choū |jehiṁ karunā kari kīnha na kohū ||

gaī bahora garība nevājū |sarala sabala sāhiba raghurājū ||

budha baranahiṁ hari jasa asa jānī |karahiṁ punīta suphala nija bānī ||

tehiṁ bala maiṁ raghupati guna gāthā |kahihauṁ nāi rāma pada māthā ||

muninha prathama hari kīrati gāī |tehiṁ maga calata sugama mohi bhāī ||

सबको पता है भगवान कितने बड़े हैं, फिर भी कोई चुप नहीं रह पाया, सब उनकी तारीफ करते ही रहते हैं। इसलिए वेदों में यह बात लिखी गयी है कि भक्ति की ताकत कितनी बड़ी है, और इसको बहुत तरीके से बताया गया है। एक ऐसा है जो कोई चाहत नहीं रखता, जिसका कोई रूप नहीं, कोई नाम नहीं, जो पैदा नहीं हुआ, जो सचेतन है, आनंद है, और सबसे ऊपर का आशियाना है। वही भगवान हर जगह मौजूद है, जिसका रूप ही यह पूरी दुनिया है, उसने एक शरीर लिया और बहुत काम किए। यह सब सिर्फ अपने भक्तों के भलाई के लिए किया, क्योंकि वो बहुत दयालु हैं और जो उनके आगे झुकते हैं उनसे वो बहुत प्यार करते हैं। जिसे वो अपना मानते हैं उससे बहुत लगाव और नर्मी रखते हैं, उस पर दया करते हैं, कभी उससे गुस्सा नहीं करते। जो खो गया है उसको वापस ला देते हैं, गरीबों का दोस्त हैं, रघुकुल के राजा राम सिंपल भी हैं और ताकतवर भी हैं। यह बात जान कर समझदार लोग हरि की तारीफ गाते हैं, और अपनी बात को पवित्र और सफल बना लेते हैं। उसी ताकत का सहारा लेके मैं राम के चरणों में सर झुकाता हूं और रघु के स्वामी के गुणों की कहानी सुनाऊंगा। पहले रिशियों ने हरि की कीर्ति गायी थी, उसी रास्ते पर चलते हुए मुझे आसान और अच्छा लगा।

दोहा 13

अति अपार जे सरित बर जौं नृप सेतु कराहिं।चढि पिपीलिकउ परम लघु बिनु श्रम पारहि जाहिं।।⁠13।।

ati apāra je sarita bara jaũ nr̥pa setu karāhĩ |caṛhi pipīlikaũ parama laghu binu śrama pārahi jāhĩ ||⁠13||

अगर राजा लोग किसी बहुत बड़ी और खत्म न होने वाली नदी पर पुल बनवा दें, तो सबसे छोटी चींटी भी उस पर चढ़ के बिना कोई मेहनत किये पार कर सकती है।

चौपाई 14.1-6

एहि प्रकार बल मनहि देखाई।करिहउँ रघुपति कथा सुहाई।।

ब्यास आदि कबि पुंगव नाना।जिन्ह सादर हरि सुजस बखाना।।

चरन कमल बंदउँ तिन्ह केरे।पुरवहुँ सकल मनोरथ मेरे।।

कलि के कबिन्ह करउँ परनामा।जिन्ह बरने रघुपति गुन ग्रामा।।

जे प्राकृत कबि परम सयाने।भाषाँ जिन्ह हरि चरित बखाने।।

भए जे अहहिं जे होइहहिं आगें।प्रनवउँ सबहिं कपट सब त्यागें।।

होहु प्रसन्न देहु बरदानू।साधु समाज भनिति सनमानू।।

जो प्रबंध बुध नहिं आदरहीं।सो श्रम बादि बाल कबि करहीं।।

कीरति भनिति भूति भलि सोई।सुरसरि सम सब कहँ हित होई।।

राम सुकीरति भनिति भदेसा।असमंजस अस मोहि अँदेसा।।

तुम्हरी कृपा सुलभ सोउ मोरे।सिअनि सुहावनि टाट पटोरे।।

ehi prakāra bala manahi dekhāī |karihaũ raghupati kathā suhāī ||

byāsa ādi kabi puṅgava nānā |jinha sādhara hari sujasa bakhānā ||

carana-kamala bandaũ tinh kere |puravahũ sakala manoratha mere ||

kali ke kabinha karaũ paranāmā |jinha barane raghupati guna-grāmā ||

je prākṛta kabi parama sayāne |bhāṣā̃ jinha hari carita bakhāne ||

bhae je ahahĩ je hoihahĩ āgẽ |pranavaũ sabahĩ kapaṭa saba tyāgẽ ||

hohu prasanna dehu baradānū |sādhu samāja bhaṇiti sanamānū ||

jo prabandha budha nahĩ ādarahī̃ |so śrama bādi bāla kabi karahī̃ ||

kīrati bhaṇiti bhūti bhali soī |surasari sama saba kahã hita hoī ||

rāma su-kīrati bhaṇiti bhadesā |asamañjasa asa mohi aṁdesā ||

tumharī kṛpā sulabha soũ more |sīa-ni suhāvani ṭāṭa paṭore ||

ऐसे ही अपने मन को बल दिखाता हुआ, मैं रघु के स्वामी की सुंदर कथा सुनाऊँगा। बहुत से बड़े कवि हुए, व्यास आदि, जिन्होंने हरि की महिमा श्रद्धा से बयान की। मैं उनके चरण कमल को प्रणाम करता हूँ। मेरे सारे मन पूरे करो। कलि युग के कवि जिन्होंने रघु के स्वामी के बहुत सारे गुण बताए, उनको मैं प्रणाम करता हूँ। जिन बहुत समझदार कवि ने प्राकृत भाषा में हरि के किस्से बयान किए, उनको भी मैं प्रणाम करता हूँ। जो हो चुके, जो अब हैं, और जो आगे होंगे, सबको मैं प्रणाम करता हूँ, सब दिखावा छोड़ कर। खुश हो जाओ और मुझे ये वरदान दो कि मेरी कविता अच्छे लोगों की सभा में इज्जत मिले। जो लिखा हुआ समझदार लोग इज्जत नहीं देते, वो बेवकूफ कवि की मेहनत बर्बाद है। वो कीर्ति, वो कविता, और वो दौलत ही अच्छी है जो गंगा की तरह सबको फायदा दे। राम की कीर्ति बहुत अच्छी है, पर मेरी कविता गाँव की है। दोनों में जो फरक है, वही मुझे चिंता देता है। पर आप की कृपा से ये भी आसान है, क्योंकि मोटा कपड़ा भी रेशम की सुंदर कढ़ाई से सुंदर बन जाता है।

दोहा 14(क)-(ग), सोरठा 14(घ), दोहा 14(ङ)-(छ)

सरल कबित कीरति बिमल सोइ आदरहिं सुजान।सहज बयर बिसराइ रिपु जो सुनि करहिं बखान।।⁠14(क)।।

सो न होइ बिनु बिमल मति मोहि मति बल अति थोर।करहु कृपा हरि जस कहउँ पुनि पुनि करउँ निहोर।।⁠14(ख)।।

कबि कोबिद रघुबर चरित मानस मंजु मराल।बाल बिनय सुनि सुरुचि लखि मोपर होहु कृपाल।।⁠14(ग)।।

बंदउँ मुनि पद कंजु रामायन जेहिं निरमयउ।सखर सुकोमल मंजु दोष रहित दूषन सहित।।⁠14(घ)।।

बंदउँ चारिउ बेद भव बारिधि बोहित सरिस।जिन्हहि न सपनेहुँ खेद बरनत रघुबर बिसद जसु।।⁠14(ङ)।।

बंदउँ बिधि पद रेनु भव सागर जेहि कीन्ह जहँ।संत सुधा ससि धेनु प्रगटे खल बिष बारुनी।।⁠14(च)।।

बिबुध बिप्र बुध ग्रह चरन बंदि कहउँ कर जोरि।होइ प्रसन्न पुरवहु सकल मंजु मनोरथ मोरि।।⁠14(छ)।।

sarala kabita kīrati bimala soi ādarahiṁ sujāna |sahaja bayara bisarāi ripu jo suni karahiṁ bakhāna ||⁠14(ka)||

so na hoi binu bimala mati mohi mati bala ati thora |karahu kṛpā hari jasa kahaũ puni puni karaũ nihora ||⁠14(kha)||

kabi kobida raghubara carita mānasa mañju marāla |bāla binaya suni suruci lakhi mopara hohu kṛpāla ||⁠14(ga)||

bandaũ muni pada kañju rāmāyana jehiṁ niramayau |sakhara sukomala mañju doṣa rahita dūṣana sahita ||⁠14(gha)||

bandaũ cāriu beda bhava bāridhi bohita sarisa |jinhahi na sapanehũ kheda baranata raghubara bisada jasu ||⁠14(ṅa)||

bandaũ bidhi pada renu bhava sāgara jehi kīnha jahã |santa sudhā sasi dhenu pragaṭe khala biṣa bārunī ||⁠14(ca)||

bibudha bipra budha graha carana bandi kahaũ kara jori |hoi prasanna puravahu sakala mañju manoratha mori ||⁠14(cha)||

समझदार लोग उसी कविता को इज्जत देते हैं जो सिंपल हो और जिसकी कीर्ति पर कोई दाग न हो. ऐसा होता है कि दुश्मन भी अपनी दुश्मनी भूल कर उसे सुनता है और तारीफ में बोलता है. ये तब नहीं हो सकता जब तक दिल साफ न हो. मेरे दिमाग और ताकत बहुत कम है. इसलिए मैं बार बार आपसे गुजारिश करता हूं, मुझ पे दया करो ताकि मैं हरि की महिमा कह सकूं. कवि और पंडित लोग, तुम सब राम के काम के रूप एक सरोवर में होंगे. एक बच्चे की गुजारिश सुन कर और उसकी नियत अच्छी देख कर, मुझ पे दया करो. मैं उस रिशि के चरण कमल को प्रणाम करता हूं जिसने रामायण बनाई. वो कठिन है फिर भी बहुत नरम और सुंदर है, खोत भरे लोगों की बात बताती है पर खुद खोत से फ्री है. मैं चारो वेद को प्रणाम करता हूं जो इस दुनिया के समुंदर पार करने के जहाज जैसे हैं. राम की जैसी दाग रहित महिमा बताते हैं, उनको सपने में भी थकन नहीं होती. मैं विधि के चरणों की धूल को प्रणाम करता हूं जिसने इस दुनिया का समुंदर बनाया. इसी में संत, अमृत, चांद और कामधेनु पैदा हुए, और बुरे लोग, जहर और शराब भी. देवताएं, ब्राह्मण, समझदार और ग्रहों के चरण प्रणाम करके मैं हाथ जोड के कहता हूं. तुम सब खुश हो जाओ और मेरे सारे मन का काम पूरा करो.

चौपाई 15.1-6

पुनि बंदउँ सारद सुरसरिता।जुगल पुनीत मनोहर चरिता।।

मज्जन पान पाप हर एका।कहत सुनत एक हर अबिबेका।।

गुर पितु मातु महेस भवानी।प्रनवउँ दीनबंधु दिन दानी।।

सेवक स्वामि सखा सिय पी के।हित निरुपधि सब बिधि तुलसीके।।

कलि बिलोकि जग हित हर गिरिजा।साबर मंत्र जाल जिन्ह सिरिजा।।

अनमिल आखर अरथ न जापू।प्रगट प्रभाउ महेस प्रतापू।।

सो उमेस मोहि पर अनुकूला।करिहिं कथा मुद मंगल मूला।।

सुमिरि सिवा सिव पाइ पसाऊ।बरनउँ रामचरित चित चाऊ।।

भनिति मोरि सिव कृपाँ बिभाती।ससि समाज मिलि मनहुँ सुराती।।

जे एहि कथहि सनेह समेता।कहिहहिं सुनिहहिं समुझि सचेता।।

होइहहिं राम चरन अनुरागी।कलि मल रहित सुमंगल भागी।।

puni bandaũ sārada sura-saritā |jugala punīta manohara caritā ||

majjana pāna pāpa-hara ekā |kahata sunata eka-hara abibekā ||

gur pitu mātu mahesa bhavānī |pranavaũ dīna-bandhu dina-dānī ||

sevaka svāmi sakhā siya-pī ke |hita nirupadhi saba bidhi tulasīke ||

kali biloki jaga-hita-hara girijā |sābara mantra-jāla jinha sirijā ||

anamil ākhar aratha na jāpū |pragaṭa prabhāu mahesa pratāpū ||

so umesa mohi para anukūlā |karihiṃ kathā muda maṅgala-mūlā ||

sumiri sivā siva pāi pasāū |barnaũ rāmacarita cita-cāū ||

bhaniti mori siva-kripā̃ bibhātī |sasi samāja mili manahũ surātī ||

je ehi kathahi saneha sametā |kahihahiṃ sunihahiṃ samujhi sacetā ||

hoihahiṃ rāma carana anurāgī |kali-mala rahita sumaṅgala-bhāgī ||

फिर मैं सरस्वती और गंगा को मथा टेकता हूं। सरस्वती बोलने की देवी हैं और गंगा देवताओं की नदी हैं। दोनों पाक हैं और दोनों के काम प्यारे हैं। एक से नहाने और पानी पीने से पाप खतम हो जाता है। दूसरी को बताने और सुनने से समझ-बुद्धि की कमी दूर हो जाती है। मैं महेश और भवानी को प्रणाम करता हूं। वो मेरे गुरु, पिता और मां हैं। गरीबों के दोस्त हैं और रोज देते हैं। वो सीता के पति के सेवक, स्वामी और दोस्त हैं। और बिना किसी चल के, हर तरह से तुलसीदास का भला चाहते हैं। कलि युग को देख कर, हर और गिरिजा ने जग के भले के लिए शबर मंत्र का जाल बनाया। उसके अक्षर जुड़ते नहीं हैं, शब्द का कोई मतलब नहीं होता, और ना ही उसका जाप होता है। फिर भी उसका असर साफ दिखता है, महेश की ताकत से। वो उमा के पति मुझ पर मेहरबान हैं। वो इस कथा को खुशी और मंगल का आधार बनायेंगे। शिव और पार्वती को याद करके और शिव की कृपा पाकर, मैं राम की कथा बता रहा हूं, दिल की लगन से। शिव की कृपा से मेरी कविता चमकेगी, जैसे रात में चांद और तारे जब साथ आ जाते हैं। जो इस कथा को प्यार से बतायेंगे या सुनेंगे, समझ के ध्यान से, वो राम के चरणों के अनुरागी बन जायेंगे। कलि युग के दाग से आज़ाद हो जायेंगे और सबसे बड़ा मंगल पायेंगे।

दोहा 15

सपनेहुँ साचेहुँ मोहि पर जौं हर गौरि पसाउ।तौ फुर होउ जो कहेउँ सब भाषा भनिति प्रभाउ।।⁠15।।

sapanehũ sacehũ mohi para jaũ hara gauri pasāu |tau phura hou jo kaheũ saba bhāṣā bhaṇiti prabhāu ||⁠15||

अगर शिव और गौरी मुझ पर खुश हो जाएँ, सपने में हो या सच में, तो जो मैंने कहा है वो तुरंत सच हो जाए, और मेरी भाषा में लिखी कविता का असर रहे।

चौपाई 16.1-4

बंदउँ अवध पुरी अति पावनि।सरजू सरि कलि कलुष नसावनि।।

प्रनवउँ पुर नर नारि बहोरी।ममता जिन्ह पर प्रभुहि न थोरी।।

सिय निंदक अघ ओघ नसाए।लोक बिसोक बनाइ बसाए।।

बंदउँ कौसल्या दिसि प्राची।कीरति जासु सकल जग माची।।

प्रगटेउ जहँ रघुपति ससि चारू।बिस्व सुखद खल कमल तुसारू।।

दसरथ राउ सहित सब रानी।सुकृत सुमंगल मूरति मानी।।

करउँ प्रनाम करम मन बानी।करहु कृपा सुत सेवक जानी।।

जिन्हहि बिरचि बड़ भयउ बिधाता।महिमा अवधि राम पितु माता।।

bandaũ avadha purī ati pāvani |sarajū sari kali kaluṣa nasāvani ||

pranavaũ pura nara nāri bahorī |mamatā jinha para prabhuhi na thorī ||

siya nindaka agha ogha nasāe |loka bisoka banāi basāe ||

bandaũ kausalayā disi prācī |kīrati jāsu sakala jaga mācī ||

pragaṭeu jahã raghupati sasi cārū |bisva sukhada khala kamala tusārū ||

dasaratha rāu sahita saba rānī |sukṛta sumaṅgala mūrati mānī ||

karaũ pranāma karama mana bānī |karahu kṛpā suta sevaka jānī ||

jinhahi biraci baṛa bhayau bidhātā |mahimā avadhi rāma pitu mātā ||

मैं अयोध्या शहर को नहीं झुकता हूं, बहुत पावनी है, और सरयू नदी को भी झुकता हूं जो कलि युग के सारे पाप मिटा देती है। फिर शहर के आदमी और औरतों को भी प्रणाम करता हूं, क्योंकि भगवान की इन पर कोई छोटी मोहब्बत नहीं थी, बहुत प्यार था। सीता की निंदा करने वालों को उनके पाप के पहाड़ से आज़ाद कर दिया, और उन्हें दुख से दूर करके अपने लोक में बसा दिया। कौसल्या को नहीं झुकता हूं, वो पूरब दिशा की तरह है, उनकी कीर्ति पूरे जग में फैली हुई है। वहां रघु के स्वामी राम, एक सुंदर चाँद की तरह प्रगट हुए, दुनिया को सुख दिया और बुरे लोगों के कमल को सुखाकर सूखा दिया। राजा दशरथ को सारी रानियों के साथ प्रणाम करता हूं, जिन्हें मैं अच्छे करम और भाग्य की मूरत मानता हूं। करम, मन और बानी से प्रणाम करता हूं, मुझ पर कृपा करो, मुझे अपने बेटे का सेवक जानो। इन्हें बनाने में ब्रह्मा बड़ा बन गया, यही राम के माता पिता की महिमा की हद है।

सोरठा 16

बंदउँ अवध भुआल सत्य प्रेम जेहि राम पद।बिछुरत दीनदयाल प्रिय तनु तृन इव परिहरेउ।।⁠16।।

bandauṁ avadha bhuāla satya prema jehi rāma pada |bichurata dīnadayāla priya tanu tṛna iva parihareu ||⁠16||

मैं उन अवध के राजा को प्रणाम करता हूँ। उनका राम के चरणों के लिए प्यार सच्हा था। जब राम से बिछड़ गए, तो अपनी जान से प्यारी अपनी बॉडी को ऐसे छोड़ दिया जैसे कोई घास की पत्ती हटा दे।

चौपाई 17.1-5

प्रनवउँ परिजन सहित बिदेहू।जाहि राम पद गूढ़ सनेहू।।

जोग भोग महँ राखेउ गोई।राम बिलोकत प्रगटेउ सोई।।

प्रनवउँ प्रथम भरत के चरना।जासु नेम ब्रत जाइ न बरना।।

राम चरन पंकज मन जासू।लुबुध मधुप इव तजइ न पासू।।

बंदउँ लछिमन पद जलजाता।सीतल सुभग भगत सुख दाता।।

रघुपति कीरति बिमल पताका।दंड समान भयउ जस जाका।।

सेष सहस्रसीस जग कारन।जो अवतरेउ भूमि भय टारन।।

सदा सो सानुकूल रह मो पर।कृपासिंधु सौमित्रि गुनाकर।।

रिपुसूदन पद कमल नमामी।सूर सुसील भरत अनुगामी।।

महावीर बिनवउँ हनुमाना।राम जासु जस आप बखाना।।

pranavaũ parijana sahita bidehū |jāhi rāma pada gūṛha sanehū ||

yoga bhoga maṁ rākhēu goī |rāma bilokata pragaṭēu soī ||

pranavaũ prathama bharata kē caranā |jāsu nema vrata jāi na baranā ||

rāma carana paṅkaja mana jāsū |lubudha madhupa iva tajai na pāsū ||

bandauṁ lachimana pada jalajātā |sītala subhaga bhagata sukha dātā ||

raghupati kīrati bimala patākā |daṇḍa samāna bhayau jasa jākā ||

sēṣa sahasra-sīsa jaga kārana |jō avatarēu bhūmi bhaya ṭārana ||

sadā sō sānukūla raha mō para |kṛpāsiṁdhu saumitri guṇākara ||

ripu-sūdana pada kamala namāmī |sūra susīla bharata anugāmī ||

mahāvīra binavaũ hanumānā |rāma jāsu jasa āpa bakhānā ||

मैं जनक और उनके परिवार को प्रणाम करता हूँ, जिन्हें राम के चरणों के लिए गेहरा छिपा प्यार था। उन्होंने इस प्यार को योग और राजा के सुख दोनों के बीच छिपा रखा, पर राम को देखते ही वो सब सामने आ गया। सबसे पहले मैं भरत के चरणों को प्रणाम करता हूँ, जिनके व्रत और नियम का वर्णन नहीं हो सकता। उनका मन राम के कमल जैसे चरणों के पास ललचेला मक्खी की तरह है, और कभी उनसे दूर नहीं जाता। मैं लक्ष्मण के कमल जैसे चरणों को प्रणाम करता हूँ, जो ठंडे सुंदर हैं और अपने भक्तों को सुख देते हैं। रघुकुल के भगवान की निर्मल कीर्ति एक झंडा है, और जिसकी कीर्ति उसके डंडे जैसी है, उसकी बधाई फैल गई है। वो ही शेष है, हज़ार सिर वाला, दुनिया का आधार, जो धरती से डर का बोझ उतारने के लिए ज़मीन पर पैदा हुए। सुमित्रा के बेटा, दया का सागर और गुणों की खान, वो हमेशा मेरे ऊपर मेहरबान रहे। मैं शत्रुघ्न के कमल जैसे चरणों को प्रणाम करता हूँ, जो बहादुर और सीधे हैं, और भरत के पीछे चलते थे। मैं महान वीर हनुमान से प्रार्थना करता हूँ, जिसकी कीर्ति राम ने खुद बयान की।

सोरठा 17

प्रनवउँ पवनकुमार खल बन पावक ग्यानधन।जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर।।⁠17।।

pranavauṁ pavanakumāra khala bana pāvaka gyānadhana |jāsu hṛdaya āgāra basahiṁ rāma sara cāpa dhara ||⁠17||

मैं हनुमान को प्रणाम करता हूँ। वो पवन के बेटे हैं। बुरे लोगों का एक जंगल है, और हनुमान उसको जलाने वाली आग है। वो ज्ञान का खजाना है। उनके दिल में राम बसते हैं, धनुष और तीर लेकर।

चौपाई 18.1-5

कपिपति रीछ निसाचर राजा।अंगदादि जे कीस समाजा।।

बंदउँ सब के चरन सुहाए।अधम सरीर राम जिन्ह पाए।।

रघुपति चरन उपासक जेते।खग मृग सुर नर असुर समेते।।

बंदउँ पद सरोज सब केरे।जे बिनु काम राम के चेरे।।

सुक सनकादि भगत मुनि नारद।जे मुनिबर बिग्यान बिसारद।।

प्रनवउँ सबहिं धरनि धरि सीसा।करहु कृपा जन जानि मुनीसा।।

जनकसुता जग जननि जानकी।अतिसय प्रिय करुना निधान की।।

ताके जुग पद कमल मनावउँ।जासु कृपाँ निरमल मति पावउँ।।

पुनि मन बचन कर्म रघुनायक।चरन कमल बंदउँ सब लायक।।

राजिवनयन धरें धनु सायक।भगत बिपति भंजन सुख दायक।।

kapipati rīcha nisācara rājā |aṅgadādi je kīsa samājā ||

bandauṁ saba ke carana suhāe |adhama sarīra rāma jinha pāe ||

raghupati carana upāsaka jete |khaga mṛga sura nara asura samete ||

bandauṁ pada saroja saba kere |je binu kāma rāma ke cere ||

suka sanakādi bhagata muni nārada |je munibara bigyāna bisārada ||

pranavauṁ sabahiṁ dharani dhari sīsā |karahu kṛpā jana jāni munīsā ||

janakasutā jaga janani jānakī |atisaya priya karunā nidhāna kī ||

tāke juga pada kamala manāvauṁ |jāsu kṛpā̃ niramala mati pāvauṁ ||

puni mana bacana karma raghunāyaka |carana kamala bandauṁ saba lāyaka ||

rājivanayana dhareṁ dhanu sāyaka |bhagata bipati bhañjana sukha dāyaka ||

बंदरों के राजा, भालूओं के राजा, राक्षसों के राजा, और अंगद और बाकी सारे बंदर। मैं सब के खूबसूरत पैरों को नमन करता हूँ। उनका शरीर नीचा था फिर भी उन्हें राम मिल गए। रघु के स्वामी के पैरों के सारे भक्त, यानी पक्षी, जानवर, देवता, इंसान और राक्षस सब। मैं सब के पैरों को नमन करता हूँ जो बिना किसी चाहत के राम के सेवक हैं। शुक, सनक और दूसरे भक्त, रिशि नारद, और वो बड़े रिशि जो अध्यात्मिक ज्ञान में माहिर हैं। मैं सब को धरती पर सिर रख के नमन करता हूँ। हे रिशियों के स्वामी, मुझे अपना भक्त जान कर कृपा करो। जानकी, जनक की बेटी और दुनिया की माँ, राम को बहुत प्यारी हैं, जो दया का घर हैं। मैं उनके दोनों पैरों से विनती करता हूँ, जिनकी कृपा से मुझे साफ समझ मिल जाए। फिर से मन, बानी और करम से, रघु के स्वामी राम के पैरों को नमन करता हूँ, जो हर तरह की भक्ति के लायक हैं। उनकी आँखें कमल जैसी हैं, हाथ में धनुष और तीर हैं, वो अपने भक्तों की तकलीफ दूर करते हैं और खुशी देते हैं।

दोहा 18

गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न।बदउँ सीता राम पद जिन्हहि परम प्रिय खिन्न।।⁠18।।

girā aratha jala bīci sama kahiyata bhinna na bhinna |badauṁ sītā rāma pada jinhahi parama priya khinna ||⁠18||

बोल और उसका अर्थ, पानी और उसकी लहर, लोग अलग अलग कहते हैं, पर सच मे अलग नहीं हैं. मैं सीता और राम के चरणों को नही झुकती हूं, जिन्हे दुखी लोग सबसे ज्यादा प्यारे हैं.

चौपाई 19.1-4

बंदउँ नाम राम रघुवर को।हेतु कृसानु भानु हिमकर को।।

बिधि हरि हरमय बेद प्रान सो।अगुन अनूपम गुन निधान सो।।

महामंत्र जोइ जपत महेसू।कासीं मुकुति हेतु उपदेसू।।

महिमा जासु जान गनराउ।प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ।।

जान आदिकबि नाम प्रतापू।भयउ सुद्ध करि उलटा जापू।।

सहस नाम सम सुनि सिव बानी।जपि जेई पिय संग भवानी।।

हरषे हेतु हेरि हर ही को।किय भूषन तिय भूषन ती को।।

नाम प्रभाउ जान सिव नीको।कालकूट फलु दीन्ह अमी को।।

bandaū̃ nāma rāma raghuvara ko |hetu kṛsānu bhānu himakara ko ||

bidhi hari haramaya beda prāna so |aguna anūpama guna nidhāna so ||

mahāmantra joi japata mahesū |kāsī̃ mukuti hetu upadesū ||

mahimā jāsu jāna gaṇarāu |prathama pūjiata nāma prabhāū ||

jāna ādikabi nāma pratāpū |bhayau suddha kari ulaṭā jāpū ||

sahasa nāma sama suni siva bānī |japi jeī piya saṅga bhavānī ||

haraṣe hetu heri hara hī ko |kiya bhūṣana tiya bhūṣana tī ko ||

nāma prabhāu jāna siva nīko |kālakūṭa phalu dīnha amī ko ||

मैं राम के नाम को नमन करता हूं। राम रघु परिवार के सबसे अच्छे हैं, और उनका नाम आग, सूरज और चाँद का सोर्स है। यह नाम ब्रह्मा, विष्णु और शिव का अस्तित्व है, और वेद इसकी सांस है। यह बिना किसी गुण के है, इसका कोई कंपेरिज़न नहीं, और यह सारे गुण का खजाना है। यह एक बहुत बड़ा मंत्र है जो शिव खुद जाप करते हैं। यही वो उपदेश है जो वो काशी मे मुक्ति के लिए देते हैं। गणेश इसकी महिमा जानते हैं, और नाम की ताकत से उनकी पूजा सबसे पहले होती है। पहला कवि ने नाम की ताकत समझ ली थी। उन्होंने नाम उल्टा पढ़ा, फिर भी वो साफ हो गए। शिव की बात सुन के कि यह नाम हज़ार नाम के बराबर है, पार्वती ने इसका जाप किया और अपने पिया के साथ मिल गई। यह देख के कि वो सिर्फ शिव की थी, शिव खुश हो गए। उन्होंने उस औरत को, जो औरतों में गहना थी, अपने शरीर का गहना बना लिया। शिव ने नाम की ताकत अच्छे से जानी थी। उन्होंने जो कालकूट ज़हर पिया था, वो अमृत बन गया।

दोहा 19

बरषा रितु रघुपति भगति तुलसी सालि सुदास॥

राम नाम बर बरन जुग सावन भादव मास॥⁠19॥

baraṣā ritu raghupati bhagati tulasī sāli sudāsa.rāma nāma bara barana juga sāvana bhādava māsa..⁠19..

राम की भक्ति बारिश का मौसम है। अच्छे भक्त उसमे उगती धान की फसल हैं, तुलसी कहते हैं। राम नाम के दो अक्षर सावन और भादों के दो महीने हैं।

Frequently Asked Questions

परंपरागत मान्यता अनुसार यह मंगलाचरण-प्रस्तावना ‘कलि-मल-हरण’ और ‘बिमल मति’ की प्राप्ति में सहायक है: राम-नाम/राम-जस के श्रवण-कीर्तन से पाप-क्षय, सत्संग-रुचि, और कथा-श्रवण की अधिकारिता (श्रद्धा, विनय) बढ़ती है—‘कहत सुनत एक हर अबिबेका’ के भाव से।

सामान्यतः मंगलाचरण में ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ या ‘राम राम’ नाम-जप को संपुट-रूप में जोड़ा जाता है; कुछ परंपराओं में ‘मंगल भवन अमंगल हारी’ पंक्ति को भी आवृत्ति/संपुट की तरह लिया जाता है, विशेषकर पाठ-आरंभ और आरती/कीर्तन संदर्भ में।

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