Opening the text
सोपान-प्रवेश: नाम-महिमा और ‘श्रवण–कीर्तन–स्मरण’ की साधना द्वारा चित्त-शुद्धि। बालकाण्ड यहाँ ‘भक्ति-जन्म’ का द्वार है—जहाँ कथा-रस से पहले नाम-तत्त्व स्थापित होता है, ताकि साधक का मन (मानस) कथा-सरिता में उतरते ही मोक्षाभिमुख हो जाए।
यह प्रकरण ‘सोपान-प्रवेश’ है: कथा-सरिता में उतरने से पहले मानस की भूमि को नाम-साधना से शुद्ध करना। ‘अक्षर’ की मधुरता केवल काव्य-गुण नहीं, साधना का उपकरण है—ध्वनि (श्रवण–कीर्तन) से चित्त-शोधन और स्मरण से स्थिरता। ‘नाम–नामी’ की प्रीति निर्गुण–सगुण का सेतु बनती है: नाम (अदृश्य/सूक्ष्म) और प्रभु (लीला/सगुण) एक-दूसरे में अभिन्न। कलियुग-प्रसंग में कर्म/योग की दुष्करता के बरअक्स ‘केवल नाम’ को करुणामय, सार्वजनीन, अहैतुक उपाय घोषित किया जाता है। प्रह्लाद-ध्रुव-गज-अजामिल-गनिका की शृंखला एक ही प्रतीक-तर्क रचती है: पात्रता नहीं, पुकार (नाम) निर्णायक है। अंत की आत्म-निन्दा ‘अहं’ का क्षय और अनन्य-आश्रय का चिह्न है—भक्ति का जन्म वहीं से होता है।
Verse 42 (दोहा/सोरठा)
एकु छत्रु एकु मुकुटमनि सब बरननि पर जोउ। तुलसी रघुबर नाम के बरन बिराजत दोउ।।20।।
eku chatru eku mukuṭa-maṇi saba baranani para jou | tulasī raghubara nāma ke barana birājata dou ||20||
एक छत्र है, एक मुकुट में मणि है, सब वर्णों पर जो है। तुलसीदास कहते हैं, रघुबर के नाम के दो अक्षर ऐसे ही शोभते हैं।
Verse 43 (चौपाई)
समुझत सरिस नाम अरु नामी। प्रीति परसपर प्रभु अनुगामी।। नाम रूप दुइ ईस उपाधी। अकथ अनादि सुसामुझि साधी।। को बड़ छोट कहत अपराधू। सुनि गुन भेद समुझिहहिं साधू।। देखिअहिं रूप नाम आधीना। रूप ग्यान नहिं नाम बिहीना।। रूप बिसेष नाम बिनु जानें। करतल गत न परहिं पहिचानें।। सुमिरिअ नाम रूप बिनु देखें। आवत हृदयँ सनेह बिसेषें।। नाम रूप गति अकथ कहानी। समुझत सुखद न परति बखानी।। अगुन सगुन बिच नाम सुसाखी। उभय प्रबोधक चतुर दुभाषी।।
samujhata sarisa nāma aru nāmī | prīti paraspara prabhu anugāmī || nāma rūpa dui īsa upādhī | akatha anādi su-sāmujhi sādhī || ko baṛa choṭa kahata aparādhū | suni guna bheda samujhihahiṃ sādhū || dekhiahia rūpa nāma ādhīnā | rūpa gyāna nahiṃ nāma bihīnā || rūpa biseṣa nāma binu jāneṃ | karatala-gata na parahiṃ pahicāneṃ || sumiri-a nāma rūpa binu dekheṃ | āvata hṛdayaṁ saneha biseṣeṃ || nāma rūpa gati akatha kahānī | samujhata sukhada na parati bakhānī || aguna saguna bica nāma su-sākhī | ubhaya prabodhaka catura dubhāṣī ||
नाम और नामी, यानी राम, दोनों समझ में एक जैसे हैं। दोनों में प्यार है, जो प्रभु के पीछे चलता है। नाम और रूप, यह दोनों भगवान के तरीके हैं। वह अनादि हैं और बता नहीं सकते, पर समझदार लोग इस्से समझते हैं। कौन बड़ा कौन छोटा, यह बोलना गलत है। गुणों का भेद सुन के साधु लोग समझते हैं। रूप नाम के आधीन है, यह देखा जाता है। नाम के बिना रूप का ज्ञान नहीं होता। नाम के बिना रूप को पहचाना नहीं जा सकता। जैसे हाथ में कुछ हो, पर पहचाना न जाए। नाम को याद करो, रूप को बिना देखे भी। दिल में खास प्यार आता है। नाम और रूप की यह कहानी बताई नहीं जा सकती। समझना सुखदायक है, पर पूरा बताना मुश्किल है। निर्गुण और सगुण के बीच नाम साक्षी है। यह दोनों तरफ समझ देता है, जैसे दुभाषी करता है।
Verse 44 (दोहा/सोरठा)
राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरी द्वार। तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजिआर।।21।।
rāma nāma manidīpa dharu jīha deharī dvāra | tulasī bhitara bāherahũ jaũ cāhasi ujiāra ||21||
राम नाम की मणि वाली दीया जीभ के द्वार पर रख दो। तुलसीदास कहते हैं, अगर अंदर और बाहर दोनों तरफ उजाला चाहिए, तो यह करो।
Verse 45 (चौपाई)
नाम जीहँ जपि जागहिं जोगी। बिरति बिरंचि प्रपंच बियोगी।। ब्रह्मसुखहि अनुभवहिं अनूपा। अकथ अनामय नाम न रूपा।। जाना चहहिं गूढ़ गति जेऊ। नाम जीहँ जपि जानहिं तेऊ।। साधक नाम जपहिं लय लाएँ। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएँ।। जपहिं नामु जन आरत भारी। मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी।। राम भगत जग चारि प्रकारा। सुकृती चारिउ अनघ उदारा।। चहू चतुर कहुँ नाम अधारा। ग्यानी प्रभुहि बिसेषि पिआरा।। चहुँ जुग चहुँ श्रुति ना प्रभाऊ। कलि बिसेषि नहिं आन उपाऊ।।
nāma jīhaṁ japi jāgahiṁ jogī | birati birañci prapañca biyogī || brahma-sukhahi anubhavahiṁ anūpā | akatha anāmay nāma na rūpā || jānā cahahiṁ gūṛha gati jeū | nāma jīhaṁ japi jānahiṁ teū || sādhaka nāma japahiṁ laya lāeṁ | hohiṁ siddha animādika pāeṁ || japahiṁ nāmu jana ārata bhārī | miṭahiṁ kusaṅkaṭa hohiṁ sukhārī || rāma bhagata jaga cāri prakārā | sukṛtī cāriu anagha udārā || cahū catura kahuṁ nāmu adhārā | gyānī prabhūhi biseṣi piārā || cahuṁ juga cahuṁ śruti nā prabhāū | kali biseṣi nahiṁ āna upāū ||
योगी लोग नाम जपसे रहते हैं, ब्रह्मा जैसे वैरागी हैं, दुनिया से अलग। वह ब्रह्मा के सुख को महसूस करते हैं, जो बता नहीं सकता, जहां न नाम है न रूप। जो गुढ्ड गति जानना चाहते हैं, वह भी नाम जप के जानते हैं। साधक नाम जपते हैं, मन को लय में लाके। वह सिद्ध हो जाते हैं, अणिमा जैसी शक्तियां पा जाते हैं। दुखी लोग भी नाम जपसे हैं, बड़े संकट मिट जाते हैं, सुख मिलता है। राम के भक्त चार प्रकार के हैं, सभी सुकृती, निर्दोष और उदार हैं। इन चारों के लिए नाम आधार है। ज्ञान वाले प्रभु को खास प्यारे हैं। चारों युगों और चारों वेदों में नाम की महिमा है। कलि युग में तो खास है, कोई और उपाय नहीं है।
Verse 46 (दोहा/सोरठा)
सकल कामना हीन जे राम भगति रस लीन। नाम सुप्रेम पियूष हद तिन्हहुँ किए मन मीन।।22।।
sakala kāmanā hīna je rāma bhagati rasa līna | nāma su-prema piyūṣa hada tinhahuṁ kiye mana mīna ||22||
जो लोग कोई भी इच्छा नहीं रखते, और राम की भक्ति में डूब गए हैं, उनके लिए राम का नाम अमृत जैसा है। वो अपने मन को मछली बना देते हैं जो उस अमृत में हमेशा रहती है। इस प्यार से वो सब इच्छा छोड़ देते हैं।
Verse 47 (चौपाई)
अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा। अकथ अगाध अनादि अनूपा।। मोरें मत बड़ नामु दुहू तें। किए जेहिं जुग निज बस निज बूतें।। प्रोढ़ि सुजन जनि जानहिं जन की। कहउँ प्रतीति प्रीति रुचि मन की।। एकु दारुगत देखिअ एकू। पावक सम जुग ब्रह्म बिबेकू।। उभय अगम जुग सुगम नाम तें। कहेउँ नामु बड़ ब्रह्म राम तें।। ब्यापकु एकु ब्रह्म अबिनासी। सत चेतन धन आनँद रासी।। अस प्रभु हृदयँ अछत अबिकारी। सकल जीव जग दीन दुखारी।। नाम निरूपन नाम जतन तें। सोउ प्रगटत जिमि मोल रतन तें।।
aguna saguna dui brahma sarūpā | akatha agādha anādi anūpā || moreṁ mata baṛa nāmu duhū teṁ | kie jehiṁ juga nija basa nija būteṁ || proṛhi sujana jani jānahĩ jana kī | kahuṁ pratīti prīti ruci mana kī || eku dārugata dekhi-a ekū | pāvaka sama juga brahma bibekū || ubhay agama juga sugama nāma teṁ | kaheuँ nāmu baṛa brahma rāma teṁ || byāpaku eku brahma abināsī | sata cetana dhana ānaṁda rāsī || asa prabhu hṛdayaṁ achata abikārī | sakala jīva jaga dīna dukhārī || nāma nirūpana nāma jatana teṁ | sou pragaṭata jimi mola ratana teṁ ||
भगवान की दोनों शक्तियाँ हैं, एक जिसमें कोई गुण नहीं दिखता, दूसरी जिसमें गुण दिखते हैं। दोनों ही अलग-अलग तरह से वही एक भगवान हैं। कोई उन्हें पूरा समझ नहीं सकता, ना शुरू पता है ना किसी से मिलता जुलता है। मेरे हिसाब से राम का नाम दोनों से बड़ा है। क्योंकि नाम ने दोनों को अपने में समेट लिया है। बड़े लोग इसको सिंपल बात मत समझो। मैं जो बोल रहा हूँ वो दिल से आता है, प्यार से आता है। जैसे लकड़ी में आग छुपा होता है, वैसे ही बुद्धि से देखो तो दोनों में वही एक भगवान दिखता है। दोनों ताकत आसान नहीं मिलता, लेकिन नाम से दोनों मिल जाते हैं। इसलिए मैं बोलता हूँ, नाम राम से भी बड़ा है। वो एक भगवान सब में फैला हुआ है, कभी खत्म नहीं होता। वो ही है, वो ही जानता है, वो ही खुशियों का ढेर है। ऐसा भगवान सबके दिल में बैठा है, कभी बदलता नहीं। फिर भी सब जीव और दुनिया दुखी है। नाम को समझाओ, नाम को जपो, तब वो दिखता है। जैसे हीरा रगड़ने से चमकता है।
Verse 48 (दोहा/सोरठा)
निरगुन तें एहि भाँति बड़ नाम प्रभाउ अपार। कहउँ नामु बड़ राम तें निज बिचार अनुसार।।23।।
niragun teṃ ehi bhā̃ti baṛa nāma prabhāu apāra | kahaũ nāmu baṛa rāma teṃ nija bicāra anusāra ||23||
जिस भगवान में कोई गुण नहीं दिखता, उससे भी नाम का पावर बहुत बड़ा है। मैं अपने हिसाब से बोलता हूँ, नाम राम से भी बड़ा है।
Verse 49 (चौपाई)
राम भगत हित नर तनु धारी। सहि संकट किए साधु सुखारी।। नामु सप्रेम जपत अनयासा। भगत होहिं मुद मंगल बासा।। राम एक तापस तिय तारी। नाम कोटि खल कुमति सुधारी।। रिषि हित राम सुकेतुसुता की। सहित सेन सुत कीन्ह बिबाकी।। सहित दोष दुख दास दुरासा। दलइ नामु जिमि रबि निसि नासा।। भंजेउ राम आपु भव चापू। भव भय भंजन नाम प्रतापू।। दंडक बनु प्रभु कीन्ह सुहावन। जन मन अमित नाम किए पावन।। निसिचर निकर दले रघुनंदन। नामु सकल कलि कलुष निकंदन।।
rāma bhagata hita nara tanu dhārī | sahi saṅkaṭa kiye sādhu sukhārī || nāmu sa-prema japata anāyāsā | bhagata hohiṃ muda maṅgala bāsā || rāma eka tāpasa tiya tārī | nāma koṭi khala kumati sudhārī || ṛṣi hita rāma suketu-sutā kī | sahita sena-suta kīnha bibākī || sahita doṣa dukha dāsa durāsā | dalai nāmu jimi rabi nisi nāsā || bhaṃjeu rāma āpu bhava cāpū | bhava-bhaya-bhañjana nāma pratāpū || daṇḍaka banu prabhu kīnha suhāvana | jana mana amita nāma kiye pāvana || nisi-cara nikara dale raghunaṃdana | nāmu sakala kali-kaluṣa nikaṃdana ||
राम ने अपने भक्तों के लिए इंसान की बॉडी ली। कितनी तकलीफ सही, और साधु लोगों को खुश कर दिया। जो भी राम का नाम प्यार से लेता है, आसानी से, वो भक्त खुश रहते हैं, मंगल में। राम ने एक तपस्वी की औरत को भी उजाड़ दिया। नाम ने करोड़ों बुरे लोगों का मन ठीक कर दिया। रिशियों के लिए राम ने सुका की बेटी और सेना के बेटे को बुद्धि दी। साथ ही दोष, दुख और बुरे काम, नाम सब को कुचल देता है, जैसे सूरज रात को खत्म करता है। राम ने खुद धनुष तोड़ा, और नाम का पावर संसार का डर तोड़ देता है। प्रभु ने दंडक वन को अच्छा बना दिया। नाम ने लोगों के मन को साफ कर दिया। रघुनंदन ने राक्षसों की फौज को भगा दिया। नाम कलि युग की गंदगी को साफ करता है।
Verse 50 (दोहा/सोरठा)
सबरी गीध सुसेवकनि सुगति दीन्हि रघुनाथ। नाम उधारे अमित खल बेद बिदित गुन गाथ।।24।।
sabarī gīdha su-sevakanī su-gati dīnhi raghunātha | nāma udhāre amita khala beda bidita guna gātha ||24||
रघुनाथ ने सबरी और जटायु को अच्छी जगह पहुँचा दिया, क्योंकि वो सच्चे सेवक थे। और उनके नाम से कितने बुरे लोग भी उद्धार गए। वेद खुद उनके गुणों की कथा बताते हैं।
Verse 51 (चौपाई)
राम सुकंठ बिभीषन दोऊ। राखे सरन जान सबु कोऊ।। नाम गरीब अनेक नेवाजे। लोक बेद बर बिरिद बिराजे।। राम भालु कपि कटकु बटोरा। सेतु हेतु श्रमु कीन्ह न थोरा।। नामु लेत भवसिंधु सुखाहीं। करहु बिचारु सुजन मन माहीं।। राम सकुल रन रावनु मारा। सीय सहित निज पुर पगु धारा।। राजा रामु अवध रजधानी। गावत गुन सुर मुनि बर बानी।। सेवक सुमिरत नामु सप्रीती। बिनु श्रम प्रबल मोह दलु जीती।। फिरत सनेहँ मगन सुख अपनें। नाम प्रसाद सोच नहिं सपनें।।
rāma sukaṇṭha bibhīṣana doū | rākhē saraṇa jāni sabu koū || nāma garība anēka nēvājē | loka bēda bara birida birājē || rāma bhālu kapi kaṭaku baṭōrā | sētu hētu śramu kīnha na thōrā || nāmu lēta bhava-siṃdhu sukha āhīṃ | karahu bicāru sujana mana māhīṃ || rāma sakula rana rāvaṇu mārā | sīya sahita nija pura pagu dhārā || rājā rāmu avadha raja-dhānī | gāvata guna sura muni bara bānī || sēvaka sumirata nāmu sa-prītī | binu śrama prabala mōha dalu jītī || phirata sanēhaṁ magana sukha apanēṃ | nāma prasāda sōca nahiṃ sapanēṃ ||
राम ने शिव और विभीषण दोनों को बचा लिया, क्योंकि वो जानते थे कि वो उनकी शरण में आ गए हैं। राम का नाम कितने गरीब लोगों को उठा चुका है, कोई गिनती नहीं। लोगों की याद में और वेदों में यह नाम की बात चमकती है। राम ने भालू और बंदर का एक पूरा सेना बना लिया। सेतु बनाने के लिए उन्होंने बहुत मेहनत की, थोड़ा भी शर्म नहीं की। लेकिन बस नाम लेते ही भवसागर सुख हो जाता है। अच्छे लोग अपने मन में सोचो इस बारे में। राम ने युद्ध में रावण को मारा। सीता के साथ वापस अयोध्या आए और अपने शहर में पैर रखा। राम अयोध्या के राजा बन गए। देवी और रिशि उनकी महिमा गाते हैं। जो सेवक प्यार से नाम याद करता है, बिना मेहनत के मोह को हरा देता है। वो प्यार में खोया रहता है, अपने सुख में। नाम की कृपा से न सपने में कोई चिंता आती है।
Verse 52 (दोहा/सोरठा)
ब्रह्म राम तें नामु बड़ बर दायक बर दानि। रामचरित सत कोटि महँ लिय महेस जियँ जानि।।25।।
brahma rāma teṁ nāmu baṛa bara dāyaka bara dāni | rāmacarita sata koṭi mahaṁ liya mahesa jiyaṁ jāni ||25||
राम का नाम ब्रह्मन से भी बड़ा है, और राम के रूप से भी बड़ा है। यह नाम जो माँगता है वो देता है, बहुत देनेवाला है। शिव ने यह बात अपने मन में रखी। करोड़ों कथाओं में से उन्होंने राम की कथा चुनी।
Verse 53 (चौपाई)
नाम प्रसाद संभु अबिनासी। साजु अमंगल मंगल रासी।। सुक सनकादि सिद्ध मुनि जोगी। नाम प्रसाद ब्रह्मसुख भोगी।। नारद जानेउ नाम प्रतापू। जग प्रिय हरि हरि हर प्रिय आपू।। नामु जपत प्रभु कीन्ह प्रसादू। भगत सिरोमनि भे प्रहलादू।। ध्रुवँ सगलानि जपेउ हरि नाऊँ। पायउ अचल अनूपम ठाऊँ।। सुमिरि पवनसुत पावन नामू। अपने बस करि राखे रामू।। अपतु अजामिलु गजु गनिकाऊ। भए मुकुत हरि नाम प्रभाऊ।। कहौं कहाँ लगि नाम बड़ाई। रामु न सकहिं नाम गुन गाई।।
nāma prasāda sambhu abināsī | sāju amangala mangala rāsī || suka sanakādi siddha muni jogī | nāma prasāda brahma-sukha bhogī || nārada jāneu nāma pratāpū | jaga priya hari-hari hari priya āpū || nāmu japata prabhu kīnha prasādū | bhagata siromani bhe prahalādū || dhruvaṁ sagalāni japeu hari nāū̃ | pāyu acala anūpama ṭhāū̃ || sumiri pavanasuta pāvana nāmū | apane basa kari rākhe rāmū || apatu ajāmilu gaju ganikāū | bhe mukuta hari nāma prabhāū || kahauṁ kahām̐ lagi nāma baṛāī | rāmu na sakahiṁ nāma guna gāī ||
नाम की कृपा से शिव कभी नहीं मरते। नाम बुरा काम को अच्छा बना देता है, जैसे स्टॉक में अच्छी चीज़ जमा हो। सुक, सनक और सिद्ध रिशि और योगी, सब नाम की कृपा से ब्रह्मन के सुख का आनंद लेते हैं। नारद ने नाम की ताकत जानी। दुनिया हरि को प्यारी है, और हरि को दुनिया प्यारी है, यह सब नाम की वजह से। प्रह्लाद ने नाम जपा और प्रभु ने उसे अपना दिया। वो भक्तों में सबसे बड़ा बन गया। ध्रुव ने हरि का नाम लिया और ऐसा स्थान मिला जो कभी हिलता नहीं, कोई और जैसा नहीं। हनुमान ने पवित्र नाम याद किया और राम को अपने बस में कर लिया। अजामिल, हाथी और गणिका जैसे गिर गए थे, वो भी हरि के नाम की ताकत से मुक्त हो गए। मैं कहाँ तक बताऊँ नाम की बड़ाई? राम भी नाम के गुण नहीं गा सकते।
Verse 54 (दोहा/सोरठा)
नामु राम को कलपतरु कलि कल्यान निवासु। जो सुमिरत भयो भाँग तें तुलसी तुलसीदासु।।26।।
nāmu rāma ko kalpataru kali kalyāna nivāsu | jo sumirata bhayo bhāṅga teṁ tulasī tulasīdāsu ||26||
राम का नाम कल्पतरु है, जो कुछ माँगो वो देता है। कलि युग में यह सुख का घर है। तुलसीदास कहते हैं, मैं तो भाँग जैसा खराब था। नाम याद करके मैं तुलसी बन गया।
Verse 55 (चौपाई)
चहुँ जुग तीनि काल तिहुँ लोका। भए नाम जपि जीव बिसोका।। बेद पुरान संत मत एहू। सकल सुकृत फल राम सनेहू।। ध्यानु प्रथम जुग मखबिधि दूजें। द्वापर परितोषत प्रभु पूजें।। कलि केवल मल मूल मलीना। पाप पयोनिधि जन मन मीना।। नाम कामतरु काल कराला। सुमिरत समन सकल जग जाला।। राम नाम कलि अभिमत दाता। हित परलोक लोक पितु माता।। नहिं कलि करम न भगति बिबेकू। राम नाम अवलंबन एकू।। कालनेमि कलि कपट निधानू। नाम सुमति समरथ हनुमानू।।
cahũ juga tīni kāla tihũ lokā | bhae nāma japi jīva bisokā || beda purāna santa mata ehū | sakala sukṛta phala rāma sanehū || dhyānu prathama juga makha-bidhi dūjẽ | dvāpara paritoṣata prabhu pūjẽ || kali kevala mala mūla malīnā | pāpa payonidhi jana mana mīnā || nāma kāmataru kāla karālā | sumirata samana sakala jaga jālā || rāma nāma kali abhimata dātā | hita paraloka loka pitu mātā || nahiṁ kali karama na bhagati bibekū | rāma nāma avalambana ekū || kālanemi kali kapaṭa nidhānū | nāma sumati samaratha hanumānū ||
चारों युग में, तीन समय में, तीनों दुनिया में, जिन्होंने नाम जपा वो जीव दुख से आज़ाद हो गए। वेद, पुरान और संत सब कहते हैं, अच्छे काम का फल राम का प्यार है। पहले युग में ध्यान था, दूसरे में यज्ञ, तीसरे में पूजा से प्रभु खुश होते थे। लेकिन कलि युग बिल्कुल गंदा है, जैसे गंदगी का जड़। पाप का समुंदर है, और मन मछली की तरह उसमें तैरता है। नाम कल्पतरु है, भयंकर काल को भी शांत करता है। इस्से याद करने से दुनिया की पूरी जाल कटी जाती है। कलि युग में राम का नाम जो मन चाहता है वो देता है। इस दुनिया में और उस दुनिया में भी हित करता है, जैसे माँ बाप करते हैं। कलि युग में न कर्म की शक्ति है न भक्ति का समझ। सिर्फ एक सहारा है, राम का नाम। कलि युग धोखे का खज़ाना है। लेकिन नाम सही सलाह देता है, और हनुमान की शक्ति इस्से काम करती है।
Verse 56 (दोहा/सोरठा)
राम नाम नरकेसरी कनककसिपु कलिकाल। जापक जन प्रहलाद जिमि पालिहि दलि सुरसाल।।27।।
rāma nāma narakesarī kanakakasipu kalikāla | jāpaka jana prahalāda jimi pālihi dali surasāla ||27||
राम का नाम इस कलयुग के लिए शेर जैसा है। जैसे नरसिंह ने हिरण्यकशिपु को मारा था, वैसे ही राम का नाम बुराई को मारता है। जैसे नरसिंह ने प्रह्लाद को बचाया था, वैसे ही यह नाम अपने भक्तों को बचाएगा और देवताओं के दुश्मन को कुचल देगा।
Verse 57 (चौपाई)
भायँ कुभायँ अनख आलसहूँ। नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ।। सुमिरि सो नाम राम गुन गाथा। करउँ नाइ रघुनाथहि माथा।। मोरि सुधारिहि सो सब भाँती। जासु कृपा नहिं कृपाँ अघाती।। राम सुस्वामि कुसेवकु मोसो। निज दिसि दैखि दयानिधि पोसो।। लोकहुँ बेद सुसाहिब रीतीं। बिनय सुनत पहिचानत प्रीती।। गनी गरीब ग्रामनर नागर। पंडित मूढ़ मलीन उजागर।। सुकबि कुकबि निज मति अनुहारी। नृपहि सराहत सब नर नारी।। साधु सुजान सुसील नृपाला। ईस अंस भव परम कृपाला।। सुनि सनमानहिं सबहि सुबानी। भनिति भगति नति गति पहिचानी।। यह प्राकृत महिपाल सुभाऊ। जान सिरोमनि कोसलराऊ।। रीझत राम सनेह निसोतें। को जग मंद मलिनमति मोतें।।
bhāyã kubhāyã anakh ālasahū̃ | nāma japat maṅgala disi dasahū̃ || sumiri so nāma rāma guna gāthā | karaũ nāi raghunāthahi māthā || mori sudhārihi so saba bhā̃tī | jāsu kṛpā nahĩ kṛpā̃ aghātī || rāma susvāmi kusevaku moso | nija disi daikhi dayānidhi poso || lokahū̃ beda susāhiba rītī̃ | binaya sunata pahicānata prītī || ganī garība grāmanara nāgara | paṇḍita mūṛha malīna ujāgara || sukabi kukabi nija mati anuhārī | nṛpahi sarāhata saba nara nārī || sādhu sujāna susīla nṛpālā | īsa aṁsa bhava parama kṛpālā || suni sanamānahĩ sabahi subānī | bhaniti bhagati nati gati pahicānī || yaha prākṛta mahipāla subhāū | jāna siromani kosalarāū || rījhata rāma saneha nisotẽ | ko jaga manda malinmati motẽ ||
डर में हो या गुस्से में, आलसी हो या बुरा मन में, जो भी राम का नाम लेता है उसके लिए अच्छा होता है, हर तरफ से। मैं उस नाम को याद करके राम के गुण गाता हूँ और रघुनाथ के आगे सिर झुकाता हूँ। वो मुझे ठीक कर देगा हर तरह से। उनकी कृपा कभी कम नहीं होती। राम एक अच्छा मालिक है और मैं कोई खास नौकर नहीं हूँ। फिर भी वो दया के खजाने हैं, मुझे देख के पोशेंगे। दुनिया और वेद दोनों में यह बात है कि अच्छा मालिक जब कोई शर्त मनवाता है तो प्यार समझता है। अमीर हो या गरीब, गाँव का हो या शहर का, पढ़ा-लिखा हो या सीधा-साधा, हर कोई अपने राजा की तारीफ करता है। अच्छा कवि हो या बुरा, अपनी समझ के हिसाब से, मर्द और औरत दोनों राजा की सिफारिश करते हैं। जो राजा संत, समझदार और अच्छे स्वभाव का होता है, वो भगवान जैसा दयालु बन जाता है। सुनके वो सबकी इज्जत करता है, अच्छे बोल बोलके। इससे मेरा भक्ति और झुकना समझ में आता है। यह आम राजा का स्वभाव है, कोसल के राजा सबसे बड़े हैं। राम सिर्फ प्यार से खुश होते हैं। दुनिया में मुझसे ज़्यादा मंद और मैला दिमाग कौन होगा?
Verse 58 (दोहा/सोरठा)
सठ सेवक की प्रीति रुचि रखिहहिं राम कृपालु। उपल किए जलजान जेहिं सचिव सुमति कपि भालु।।28(क)।। हौहु कहावत सबु कहत राम सहत उपहास। साहिब सीतानाथ सो सेवक तुलसीदास।।28(ख)।।
saṭha sevaka kī prīti ruci rakhihahiṁ rāma kṛpālu | upala kiye jalajāna jehiṁ saciva sumati kapi bhālu ||28(ka)|| hauhu kahāvata sabu kahata rāma sahata upahāsa | sāhiba sītānātha so sevaka tulasīdāsa ||28(kha)||
दयालु राम बेवकूफ नौकर का भी प्यार रखते हैं। जिसने पत्थर को फूल बना दिया, जिसका मंत्री समझदारी खुद है, और जिसके साथी बंदर और भालू हैं। पूरी दुनिया कुछ भी कहे, मैं बदनाम हो जाऊँ, राम सब हंसी उठाते हैं। मेरा मालिक सिर्फ सीता के पति हैं, यह नौकर तुलसीदास है।
Verse 59 (चौपाई)
अति बड़ि मोरि ढिठाई खोरी। सुनि अघ नरकहुँ नाक सकोरी।। समुझि सहम मोहि अपडर अपनें। सो सुधि राम कीन्हि नहिं सपनें।। सुनि अवलोकि सुचित चख चाही। भगति मोरि मति स्वामि सराही।। कहत नसाइ होइ हियँ नीकी। रीझत राम जानि जन जी की।। रहति न प्रभु चित चूक किए की। करत सुरति सय बार हिए की।। जेहिं अघ बधेउ ब्याध जिमि बाली। फिरि सुकंठ सोइ कीन्ह कुचाली।। सोइ करतूति बिभीषन केरी। सपनेहुँ सो न राम हियँ हेरी।। ते भरतहि भेंटत सनमाने। राजसभाँ रघुबीर बखाने।।
ati baṛi mori ḍhiṭhāī khorī | suni agh narakahum̐ nāka sakorī || samujhi saham mohi apaḍara apanem̐ | so sudhi rāma kīnhi nahiṃ sapanem̐ || suni avaloki sucita cakha cāhī | bhagati mori mati svāmi sarāhī || kahata nasāi hoi hiyam̐ nīkī | rījhata rāma jāni jana jī kī || rahati na prabhu cita cūka kiē kī | karata surati saya bāra hiē kī || jehim̐ agh badheu byādha jimi bālī | phiri sukanṭha soi kīnha kucālī || soi karatūti bibhīṣana kerī | sapanem̐hu so na rāma hiyam̐ herī || te bharatahi bheṃṭata sanamāne | rājasabhām̐ raghubīra bakhāne ||
मेरी ज़िद बहुत बड़ी है, बहुत खराब। यह सुनके नरक भी नाक फेर लेगा। फिर भी राम ने मुझे अपना समझ के डर नहीं दिया। उन्होंने मेरे उस गुनाह को सपने में भी याद नहीं रखा। मेरा मालिक ने मुझे सुना और अच्छी नज़रों से देखा, मेरा भक्ति और इरादा सराहा। जब मैंने कहा तो मेरा दिल साफ हो गया। राम तब खुश होते हैं जब वो अपने नौकर का दिल समझते हैं। प्रभु किसी गलती को याद नहीं रखते जो एक बार हो गई। वो दिल में प्यार को सौ बार याद करते हैं। उसी गलती से जैसे शिकारी ने बाली को मारा, वैसे ही शिव ने उसको उलट कर दिया। पर वही बात विभीषण के बारे में, राम ने सपने में भी उसको गलती नहीं माना। जब उन्होंने भरत की इज्जत की, तो रघुवीर ने राज सभा में यह बताया।
Verse 60 (दोहा/सोरठा)
प्रभु तरु तर कपि डार पर ते किए आपु समान। तुलसी कहूँ न राम से साहिब सीलनिधान।।29(क)।। राम निकाईं रावरी है सबही को नीक। जों यह साँची है सदा तौ नीको तुलसीक।।29(ख)।। एहि बिधि निज गुन दोष कहि सबहि बहुरि सिरु नाइ। बरनउँ रघुबर बिसद जसु सुनि कलि कलुष नसाइ।।29(ग)।।
prabhu taru-tara kapi ḍāra para te kiye āpu samāna | tulasī kahū̃ na rāma se sāhiba sīla-nidhāna ||29(ka)|| rāma nikāī̃ rāvarī hai sabahī ko nīka | joṁ yaha sā̃cī hai sadā tau nīko tulasīka ||29(kha)|| ehi bidhi nija guna doṣa kahi sabahi bahuri siru nāi | baranaũ raghubara bisada jasu suni kali kaluṣa nasāi ||29(ga)||
प्रभु पेड़ से पेड़ पर कूद के बंदर की डाल पर गए और उनको अपने बराबर बना दिया। तुलसीदास कहते हैं, मैं राम की इतनी तारीफ नहीं कर सकता, मेरा मालिक अच्छे स्वभाव का खजाना है। राम, तुम्हारी अच्छाई सबके लिए अच्छी है। अगर यह सच है तो तुलसीदास के लिए बहुत अच्छा है। इस तरह अपने गुण और दोष बताके मैं सबके आगे फिर से सिर झुकाता हूँ। और रघुवर की सफेद कीर्ति बताता हूँ, सुनके कलि की गंदगी दूर हो जाती है।
Verse 61 (चौपाई)
जागबलिक जो कथा सुहाई। भरद्वाज मुनिबरहि सुनाई।। कहिहउँ सोइ संबाद बखानी। सुनहुँ सकल सज्जन सुखु मानी।। संभु कीन्ह यह चरित सुहावा। बहुरि कृपा करि उमहि सुनावा।। सोइ सिव कागभुसुंडिहि दीन्हा। राम भगत अधिकारी चीन्हा।। तेहि सन जागबलिक पुनि पावा। तिन्ह पुनि भरद्वाज प्रति गावा।। ते श्रोता बकता समसीला। सवँदरसी जानहिं हरिलीला।। जानहिं तीनि काल निज ग्याना। करतल गत आमलक समाना।। औरउ जे हरिभगत सुजाना। कहहिं सुनहिं समुझहिं बिधि नाना।।
jāgabalika jo kathā suhāī | bharadvāja munibarahi sunāī || kahihauṁ soi saṁbāda bakhānī | sunahuṁ sakala sajjana sukhu mānī || saṁbhu kīnha yaha carita suhāvā | bahuri kṛpā kari umahi sunāvā || soi siva kāga-bhusuṁḍihi dīnhā | rāma-bhagata adhikārī cīnhā || tenhi sana jāgabalika puni pāvā | tinh puni bharadvāja prati gāvā || te śrotā bakatā sama-sīlā | savaṁda-rasī jānahim hari-līlā || jānahim tīni kāla nija gyānā | karatala-gata āmalaka samānā || aurau je hari-bhagata sujānā | kahahim sunahim samujhahim bidhi nānā ||
यह जो अच्छी कथा है, याज्ञवल्क्य ने भरद्वाज रिशि को सुनाई थी। मैं अब उसी बात को सही ऑर्डर में बताऊंगा। सुनो सब अच्छे लोग, और खुश रहो। शिव ने पहले यह कथा बनाई थी। फिर उन्होंने उमा को दया करके सुनाई। उसके बाद शिव ने यह कथा कागभूषुण्डि को दिया, क्योंकि वो राम के सच्चे भक्त थे। उनसे याज्ञवल्क्य ने फिर से यह कथा पाई। और उन्होंने भरद्वाज को सुनाई। जो सुनने वाले थे और जो बोलने वाले थे, दोनों एक जैसे थे। वो हरि की लीला जानते थे। अपने ज्ञान से वो तीनों काम जानते थे, जैसे हाथ में आमला रखा हो। और जो और भी हरि के वाइज भक्त हैं, वो भी इसको बोलते हैं, सुनते हैं, और समझते हैं।
परंपरानुसार यह खंड ‘नाम-दीप’ प्रज्वलित करता है: श्रवण–कीर्तन–स्मरण से लोक में मंगल, अंतःकरण-शुद्धि, और परलोक में सद्गति का हेतु माना गया है—विशेषतः कलियुग में ‘राम नाम अवलंबन एकू’ के भाव से।
सामान्य सत्संग-परंपरा में नाम-महिमा प्रसंगों पर ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ अथवा ‘राम राम’ का जप-सम्पुट जोड़ा जाता है; कई पाठ-परंपराएँ ‘राम नाम’/‘सियाराम’ को ही सम्पुट-रूप में रखती हैं।
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
A free sign-in with Google or Apple keeps your chat saved across web and the app.
Read Ramcharitmanas in the Vedapath app
Scan the QR code to open this directly in the app, with word-by-word meanings, Sanskrit recitation where available, and more.