राजधर्म बनाम प्रेम—यह सोपान साधक को ‘स्वत्व’ (अहं-हित) से उठाकर ‘धर्म-हित’ (ईश-आज्ञा) में स्थिर करता है। अयोध्या काण्ड में राम का राज्य-त्याग और वन-गमन बाह्य घटना नहीं, वैराग्य-दीक्षा है: आसक्ति का परित्याग, वचन-पालन, और लोक-कल्याण हेतु स्वेच्छा से कष्ट-स्वीकार। इस चरण पर साधक सीखता है कि मुक्ति-मार्ग में ‘उचित’ वही है जो ईश्वर-आज्ञा और सत्य-प्रतिज्ञा के साथ हो, चाहे मन-प्रिय न हो।
यह प्रकरण ‘राजधर्म बनाम प्रेम’ को साधना-सीढ़ी बनाता है: निजी अहं-हित (हठ, क्रोध, लोभ, भय) के सामने धर्म-हित (ईश-आज्ञा, सत्य-प्रतिज्ञा, लोक-कल्याण) खड़ा होता है। सखियों की नीति-वाणी ‘विवेक’ का प्रतीक है—क्रोध छोड़ना, कलंक से बचना, और राज्य-व्यवस्था को धर्मसम्मत रखना। अयोध्या का विलाप ‘समष्टि-चित्त’ का दर्पण है: जब आदर्श-पुरुष का वियोग होता है तो समाज का नैतिक-आधार डगमगाता है। राम का ‘राज के भूखे न होना’ निर्गुण-वैराग्य का संकेत है—अनासक्ति ही मुक्ति-मार्ग का शुद्ध तत्त्व। वहीं माता-पिता/मातृ-हृदय के चरणों में विनय सगुण-भक्ति का रस है—त्याग कठोरता नहीं, प्रेम का परिष्कृत रूप है। इस प्रकार वनगमन बाह्य घटना नहीं, वैराग्य-दीक्षा है: वचन-पालन के लिए स्वेच्छा से कष्ट-स्वीकार, और शोक को धर्म-तेज से रूपांतरित करना।
चौपाई 50.1-4
अस बिचारि उर छाड़हु कोहू।सोक कलंक कोठि जनि होहू।।
भरतहि अवसि देहु जुबराजू।कानन काह राम कर काजू।।
नाहिन रामु राज के भूखे।धरम धुरीन बिषय रस रूखे।।
गुर गृह बसहुँ रामु तजि गेहू।नृप सन अस बरु दूसर लेहू।।
जौं नहिं लगिहहु कहें हमारे।नहिं लागिहि कछु हाथ तुम्हारे।।
जौं परिहास कीन्हि कछु होई।तौ कहि प्रगट जनावहु सोई।।
राम सरिस सुत कानन जोगू।काह कहिहि सुनि तुम्ह कहुँ लोगू।।
उठहु बेगि सोइ करहु उपाई।जेहि बिधि सोकु कलंकु नसाई।।
asa bicāri ura chāṛahu kohū |soka kalaṁka koṭhi jani hohū ||
bharatahi avasi dehu jubarājū |kānana kāha rāma kara kājū ||
nāhina rāmu rāja ke bhūkhe |dharama dhurīna biṣaya rasa rūkhe ||
gura gṛha basahũ rāmu taji gehū |nṛpa sana asa baru dūsara lehū ||
jauṁ nahiṁ lagihahu kaheṁ hamāre |nahiṁ lāgihi kachu hātha tumhāre ||
jauṁ parihāsa kīnhi kachu hoī |tau kahi pragaṭa janāvahu soī ||
rāma sarisa suta kānana jogū |kāha kahihi suni tumha kahũ logū ||
uṭhahu begi soi karahu upāī |jehi bidhi soku kalaṁku nasāī ||
ऐसे सोच के अपने दिल से गुस्सा निकाल दो। और दुख और बदनामी का भंडार मत बनो। भरत को ज़रूर युवराज बना दो। पर राम का जंगल में क्या काम है? राम को राज की भूख नहीं है। वो धरम में आगे है और दुनिया के मज़े में उसकी कोई इंटरेस्ट नहीं। राम को महल छोड़ के अपने गुरु के घर में रहने दो। राजा से ये दूसरा वरदान माँगो। अगर तुम हमारी बात नहीं मानोगे, तोह तुम्हारे हाथ में कुछ नहीं आयेगा। अगर तुमने जो किया वो सिर्फ़ मज़ाक था, तोह खुलकर बोलो और सबको बता दो। राम जैसा बेटा जंगल के लायक है? लोग सुन के तुम्हे क्या बोलेंगे? जल्दी उठो और वो काम करो जिससे ये दुख और बदनामी मिट जाये।
छंद 50
जेहि भाँति सोकु कलंकु जाइ उपाय करि कुल पालही।हठि फेरु रामहि जात बन जनि बात दूसरि चालही।।
जिमि भानु बिनु दिनु प्रान बिनु तनु चंद बिनु जिमि जामिनी।तिमि अवध तुलसीदास प्रभु बिनु समुझि धौं जियँ भामिनी।।
jehi bhā̃ti soku kalaṁku jāi upāya kari kula pālahī |haṭhi pheru rāmahi jāta bana jani bāta dūsari cālahī ||
jimi bhānu binu dinu prāna binu tanu caṁda binu jimi jāminī |timi avadha tulasīdāsa prabhu binu samujhi dhauṁ jiyã bhāminī ||
कोई ऐसा तरीका सोचो जिससे ये दुख और बदनामी खत्म हो जाए, और अपने परिवार को बचाओ। राम को जबरदस्ती वापस मोड़ लो, वो जंगल जा रहा है, और कोई दूसरी बात मत उठाओ। जैसे दिन सूरज के बिना है, जैसे शरीर प्राण के बिना है, जैसे रात चाँद के बिना है, वैसे ही तुलसीदास कहते हैं कि अयोध्या अपने स्वामी के बिना है। सुनिए, ये बात अपने दिल में अच्छी तरह समझ लीजिए।
सोरठा 50
सखिन्ह सिखावनु दीन्ह सुनत मधुर परिनाम हित।तेइँ कछु कान न कीन्ह कुटिल प्रबोधी कूबरी।।50।।
sakhinha sikhāvanu dīnha sunata madhura parināma hita |teĩ kachu kāna na kīnha kuṭila prabodhī kūbarī ||50||
उसकी सहेलियां ने उसको ऐसी समझ दी थी जो सुनने मे मीठी थी और रिजल्ट मे भी उसके फायदे की थी। पर उसने एक कान नही सुना, क्यों कि टेढी कुबरी, मंथरा, पहले ही उसको भड़का चुकी थी।
चौपाई 51.1-4
उतरु न देइ दुसह रिस रूखी।मृगिन्ह चितव जनु बाघिनि भूखी।।
ब्याधि असाधि जानि तिन्ह त्यागी।चलीं कहत मतिमंद अभागी।।
राजु करत यह दैअँ बिगोई।कीन्हेसि अस जस करइ न कोई।।
एहि बिधि बिलपहिं पुर नर नारीं।देहिं कुचालिहि कोटिक गारीं।।
जरहिं बिषम जर लेहिं उसासा।कवनि राम बिनु जीवन आसा।।
बिपुल बियोग प्रजा अकुलानी।जनु जलचर गन सूखत पानी।।
अति बिषाद बस लोग लोगाई।गए मातु पहिं रामु गोसाई।।
मुख प्रसन्न चित चौगुन चाऊ।मिटा सोचु जनि राखै राऊ।।
utaru na dei dusaha risa rūkhī |mṛginha citava janu bāghini bhūkhī ||
byādhi asādhi jāni tinha tyāgī |calīṁ kahata matimaṁda abhāgī ||
rāju karata yaha daiã bigoī |kīnhesi asa jasa karai na koī ||
ehi bidhi bilapahiṁ pura nara nārīṁ |dehiṁ kucālihi koṭika gārīṁ ||
jarahiṁ biṣama jara lehiṁ usāsā |kavani rāma binu jīvana āsā ||
bipula biyoga prajā akulānī |janu jalacara gana sūkhata pānī ||
ati biṣāda basa loga logāī |gae mātu pahiṁ rāmu gosāī ||
mukha prasanna cita cauguna cāū |miṭā socu jani rākhai rāū ||
वो कोई जवाब नहीं दे रही थी। बहुत गुस्से में थी और सख्त हो गई थी। औरतों को देख रही थी ऐसे, जैसे भूखी शेरनी मृग को घूरती हो। उन लोगो ने समझ लिया कि इसकी बिमारी ठीक नहीं होगी। तो उनको छोड़ कर चले गए। बोले, ये मूरख और मनहूस औरत है। किस्मत ने बर्बाद कर दिया इसको, अभी राज करना वाला था। ऐसा काम किया है जैसा कोई और नहीं करता। शहर के आदमी और औरतों ने ऐसे ही रोया। और उस बुरे औरत को लाखों गालियां दी। लोग बहुत तेज़ बुखार से जल रहे थे और लंबी सांसें ले रहे थे। बोले, राम के बिना जीने की क्या आस है? प्रजा बिछड़ने के दर्द से परेशान थी, जैसे पानी सूखने पर पानी के जानवर परेशान हो जाते हैं। लोग बहुत दुख में डूब गए थे। तब राम अपनी माँ के पास गए। उनका चेहरा खुश था और दिल में चाहत चौगुनी थी। उनका चिंता गया, कि कहीं राजा उनको रोक ना ले।
दोहा 51
नव गयंदु रघुबीर मनु राजु अलान समान।छूट जानि बन गवनु सुनि उर अनंदु अधिकान।।51।।
nava gayaṁdu raghubīra manu rāju alāna samāna |chūṭa jāni bana gavanu suni ura anaṁdu adhikāna ||51||
राम के मन को एक नये हाथी जैसा समझो, और राज एक खूंटा जिस पे वो बंधा हुआ है। जब उन्होंने सुना कि अब बन जाना है, तो लगा जैसे बंधन टूट गया, और दिल मे बहुत खुशी आयी।
चौपाई 52.1-4
रघुकुलतिलक जोरि दोउ हाथा।मुदित मातु पद नायउ माथा।।
दीन्हि असीस लाइ उर लीन्हे।भूषन बसन निछावरि कीन्हे।।
बार बार मुख चुंबति माता।नयन नेह जलु पुलकित गाता।।
गोद राखि पुनि हृदयँ लगाए।स्रवत प्रेमरस पयद सुहाए।।
प्रेमु प्रमोदु न कछु कहि जाई।रंक धनद पदबी जनु पाई।।
सादर सुंदर बदनु निहारी।बोली मधुर बचन महतारी।।
कहहु तात जननी बलिहारी।कबहिं लगन मुद मंगलकारी।।
सुकृत सील सुख सीवँ सुहाई।जनम लाभ कइ अवधि अघाई।।
raghukulatilaka jori dou hāthā |mudita mātu pada nāyau māthā ||
dīnhi asīsa lāi ura līnhe |bhūṣana basana nichāvari kīnhe ||
bāra bāra mukha cuṁbati mātā |nayana neha jalu pulakita gātā ||
goda rākhi puni hṛdayã lagāe |sravata premarasa payada suhāe ||
premu pramodu na kachu kahi jāī |raṁka dhanada padabī janu pāī ||
sādara suṁdara badanu nihārī |bolī madhura bacana mahatārī ||
kahahu tāta jananī balihārī |kabahiṁ lagana muda maṁgalakārī ||
sukṛta sīla sukha sīvã suhāī |janama lābha kai avadhi aghāī ||
रघु कुल के तिलक ने दोनों हाथ जोड़ कर, खुशी से माँ के चरणों में मथा झुका। माँ ने आशीर्वाद दिया और उसे दिल से लगाया, और उसके लिए कपड़े और गहने नजर उतार दिए। माँ बार बार उसके चेहरे को चुमा, आँखों में प्यार के आँसू थे और शरीर खुशी से काँप रहा था। उसे गोद में रख कर फिर दिल से लगाया, और प्यार का रस उसकी सुंदर छाती से बहने लगा। उसका प्यार और खुशी कहे नहीं जा सकता, जैसे किसी गरीब को कुबेर का पद मिल गया हो। प्यार से उसके सुंदर चेहरे को देख कर माँ ने मीठी बातों में कहा। बोलो बेटा, तेरी माँ तेरे कुर्बान है, लगन कब लगेगी जो खुशी और मंगल लाए? तू पुण्य, अच्छा चरित्र और खुशी का प्यारा आखरी सीमा है, और इस जनम का लाभ पूरा हो गया जिसमें वो पूरी तरह खुश है।
दोहा 52
जेहि चाहत नर नारि सब अति आरत एहि भाँति।जिमि चातक चातकि तृषित बृष्टि सरद रितु स्वाति।।52।।
jehi cāhata nara nāri saba ati ārata ehi bhā̃ti |jimi cātaka cātaki tṛṣita bṛṣṭi sarada ritu svāti ||52||
सारे आदमी और औरतें उसे बहुत तड़प के बुला रही थी, बिल्कुल जैसे प्यासे चटक पक्षी और उसकी मादा बारिश के लिए तरसती है, जब स्वाति नक्षत्र की बारिस होती है सर्दी के मौसम में।
चौपाई 53.1-4
तात जाउँ बलि बेगि नहाहू।जो मन भाव मधुर कछु खाहू।।
पितु समीप तब जाएहु भैआ।भइ बड़ि बार जाइ बलि मैआ।।
मातु बचन सुनि अति अनुकूला।जनु सनेह सुरतरु के फूला।।
सुख मकरंद भरे श्रियमूला।निरखि राम मनु भवरुँ न भूला।।
धरम धुरीन धरम गति जानी।कहेउ मातु सन अति मृदु बानी।।
पिताँ दीन्ह मोहि कानन राजू।जहँ सब भाँति मोर बड़ काजू।।
आयसु देहि मुदित मन माता।जेहिं मुद मंगल कानन जाता।।
जनि सनेह बस डरपसि भोरें।आनँदु अंब अनुग्रह तोरें।।
tāta jāũ bali begi nahāhū |jo mana bhāva madhura kachu khāhū ||
pitu samīpa taba jāehu bhaiā |bhai baṛi bāra jāi bali maiā ||
mātu bacana suni ati anukūlā |janu saneha surataru ke phūlā ||
sukha makaraṁda bhare śriyamūlā |nirakhi rāma manu bhavarũ na bhūlā ||
dharama dhurīna dharama gati jānī |kaheu mātu sana ati mṛdu bānī ||
pitā̃ dīnha mohi kānana rājū |jahã saba bhā̃ti mora baṛa kājū ||
āyasu dehi mudita mana mātā |jehiṁ muda maṁgala kānana jātā ||
jani saneha basa ḍarapasi bhoreṁ |ānãdu aṁba anugraha toreṁ ||
बेटा, मैं तुमसे बनी हूं. जल्दी जा के नहा लो, और फिर कुछ मीठा खा लो, जो भी तुम्हारा मन करे. फिर बेटा, अपने पिता के पास जाओ. बहुत देर हो गई है, तुम्हारी माँ तुमसे बनी है. अपनी माँ की बातें सुनकर, जो बहुत प्यारी थी, जैसे प्यार के पेड़ के फूल हों. जिनमे खुशी का रस भरा था और जिनकी जड़ खुशाली में थी, उन्हें देख के राम का मन भँवरे की तरह कहीं और नहीं भटका. राम, धरम के सबसे बड़े आदमी, धरम का रास्ता समझ के, अपनी माँ से बहुत नरम बातों में बोला. पिताजी ने मुझे जंगल का राजा पद दे दिया है, जहाँ हर तरह से मेरा बड़ा काम है. माँ, खुश मन से मुझे आदेश दो, ताकि मैं खुशी और मंगल के साथ जंगल में जा सकूँ. प्यार के मारे गलती से मत डरो. माँ, मेरी खुशी आपके आशीर्वाद पर है.
दोहा 53
बरष चारिदस बिपिन बसि करि पितु बचन प्रमान।आइ पाय पुनि देखिहउँ मनु जनि करसि मलान।।53।।
baraṣa cāridasa bipina basi kari pitu bacana pramāna |āi pāya puni dekhihaũ manu jani karasi malāna ||53||
मैं चार साल जंगल में रह कर पिताजी का वादा पूरा करूँगा, फिर वापस आ कर तुम्हारे पैर देखूँगा। अपने मन को उदास मत होना देना।
चौपाई 54.1-4
बचन बिनीत मधुर रघुबर के।सर सम लगे मातु उर करके।।
सहमि सूखि सुनि सीतलि बानी।जिमि जवास परें पावस पानी।।
कहि न जाइ कछु हृदय बिषादू।मनहुँ मृगी सुनि केहरि नादू।।
नयन सजल तन थर थर काँपी।माजहि खाइ मीन जनु मापी।।
धरि धीरजु सुत बदनु निहारी।गदगद बचन कहति महतारी।।
तात पितहि तुम्ह प्रानपिआरे।देखि मुदित नित चरित तुम्हारे।।
राजु देन कहुँ सुभ दिन साधा।कहेउ जान बन केहिं अपराधा।।
तात सुनावहु मोहि निदानू।को दिनकर कुल भयउ कृसानू।।
bacana binīta madhura raghubara ke |sara sama lage mātu ura karake ||
sahami sūkhi suni sītali bānī |jimi javāsa pareṁ pāvasa pānī ||
kahi na jāi kachu hṛdaya biṣādū |manahũ mṛgī suni kehari nādū ||
nayana sajala tana thara thara kā̃pī |mājahi khāi mīna janu māpī ||
dhari dhīraju suta badanu nihārī |gadagada bacana kahati mahatārī ||
tāta pitahi tumha prānapiāre |dekhi mudita nita carita tumhāre ||
rāju dena kahũ subha dina sādhā |kaheu jāna bana kehiṁ aparādhā ||
tāta sunāvahu mohi nidānū |ko dinakara kula bhayau kṛsānū ||
राम के नरम और मीठे बोल मा की छाती में तीर की तरह लग गए। वो ठंडे और नरम बोल सुन कर मा डर गई और सूख गई, जैसे बरसात में बारिश पड़ने से जवासा पौधा सूख जाता है। उसके दिल का दुख बता नहीं जा सकता, जैसे हिरन शेर की आवाज सुन कर हो जाता है। उसकी आँखों में आँसू आ गए और शरीर काँपने लगा, जैसे मछली पहली बारिश का जहर खा कर हो जाती है। हिम्मत करके उसने अपने बेटे का चेहरा देखा और मा ने रुली हुई आवाज में बोला। बेटा, तुम अपने पिता की जान से प्यारे हो, वो रोज तुम्हारे काम देख कर खुश होते हैं। उसने राज देने का शुभ दिन तय किया था, किस गुनाह के लिए अब तुम्हें बन भेज दिया? बेटा, मुझे पूरी वजह बताओ, सूर्यवंश के लिए आग कौन बन गया?
दोहा 54
निरखि राम रुख सचिवसुत कारनु कहेउ बुझाइ।सुनि प्रसंगु रहि मूक जिमि दसा बरनि नहिं जाइ।।54।।
nirakhi rāma rukha sacivasuta kāranu kaheu bujhāi |suni prasaṁgu rahi mūka jimi dasā barani nahiṁ jāi ||54||
मंत्री का बेटा राम के चेहरे को देखकर उसको वजह समझा कर बताई। सब सुनकर वो बिलकुल चुप हो गई, जैसे बोल ना सकी। उसकी हालत को लफजों में बयान नहीं किया जा सकता।
चौपाई 55.1-4
राखि न सकइ न कहि सक जाहू।दुहूँ भाँति उर दारुन दाहू।।
लिखत सुधाकर गा लिखि राहू।बिधि गति बाम सदा सब काहू।।
धरम सनेह उभयँ मति घेरी।भइ गति साँप छुछुंदरि केरी।।
राखउँ सुतहि करउँ अनुरोधू।धरमु जाइ अरु बंधु बिरोधू।।
कहउँ जान बन तौ बड़ि हानी।संकट सोच बिबस भइ रानी।।
बहुरि समुझि तिय धरमु सयानी।रामु भरतु दोउ सुत सम जानी।।
सरल सुभाउ राम महतारी।बोली बचन धीर धरि भारी।।
तात जाउँ बलि कीन्हेहु नीका।पितु आयसु सब धरमक टीका।।
rākhi na sakai na kahi saka jāhū |duhū̃ bhā̃ti ura dāruna dāhū ||
likhata sudhākara gā likhi rāhū |bidhi gati bāma sadā saba kāhū ||
dharama saneha ubhayã mati gherī |bhai gati sā̃pa chuchuṁdari kerī ||
rākhaũ sutahi karaũ anurodhū |dharamu jāi aru baṁdhu birodhū ||
kahaũ jāna bana tau baṛi hānī |saṁkaṭa soca bibasa bhai rānī ||
bahuri samujhi tiya dharamu sayānī |rāmu bharatu dou suta sama jānī ||
sarala subhāu rāma mahatārī |bolī bacana dhīra dhari bhārī ||
tāta jāũ bali kīnhehu nīkā |pitu āyasu saba dharamaka ṭīkā ||
वो उसे रोक नहीं सकती थी, और जाने को भी नहीं कह सकती थी। दोनो तरफ से दिल मे बुरा आग जल रहा था। जैसे कोई चाँद लिखने बैठा और राहु लिख दिया। किस्मत के रास्ते सबके लिए हमेशा उलटे होते हैं। धरम और प्यार दोनो ने साथ मे उसके दिमाग को घेर लिया। उसकी हालत उस साँप जैसी हो गई जिसके मुह मे चुचुंदर है। अगर मैं अपने बेटे को रुक कर समझाऊं, तो धरम चला जाएगा और अपने लोग मेरे खिलाफ हो जाएंगे। अगर मैं उसे वन जाने को कहूं, तो बहुत बड़ा नुकसान होगा। रानी इस चिंता और परेशानी मे फंस गई थी। फिर उस समझदार औरत ने पत्नी के धरम के बारे मे सोचा, और राम और भरत दोनो को बराबर के बेटे मान के। राम की मा, जिसका स्वभाव सीधा और नरम था, बड़ा हौसला करके ये बातें बोली। "बेटा, मैं तुमपे बली हूं, तुमने अच्छा किया। पिताजी का आदेश सबसे बड़ा धरम है।"
दोहा 55
राजु देन कहि दीन्ह बनु मोहि न सो दुख लेसु।तुम्ह बिनु भरतहि भूपतिहि प्रजहि प्रचंड कलेसु।।55।।
rāju dena kahi dīnha banu mohi na so dukha lesu |tumha binu bharatahi bhūpatihi prajahi pracaṁḍa kalesu ||55||
उन्होने कहा था कि आपको राज्य देंगे, फिर आपको जंगल दे दिया। इस बात का मुझे थोड़ा भी दुख नहीं है। लेकिन आपके बिना भरत को, राजा को और प्रजा को बहुत बड़ा तकलीफ पड़े गी।
चौपाई 56.1-4
जौं केवल पितु आयसु ताता।तौ जनि जाहु जानि बड़ि माता।।
जौं पितु मातु कहेउ बन जाना।तौं कानन सत अवध समाना।।
पितु बनदेव मातु बनदेवी।खग मृग चरन सरोरुह सेवी।।
अंतहुँ उचित नृपहि बनबासू।बय बिलोकि हियँ होइ हराँसू।।
बड़भागी बनु अवध अभागी।जो रघुबंसतिलक तुम्ह त्यागी।।
जौं सुत कहौ संग मोहि लेहू।तुम्हरे हृदयँ होइ संदेहू।।
पूत परम प्रिय तुम्ह सबही के।प्रान प्रान के जीवन जी के।।
ते तुम्ह कहहु मातु बन जाऊँ।मैं सुनि बचन बैठि पछिताऊँ।।
jauṁ kevala pitu āyasu tātā |tau jani jāhu jāni baṛi mātā ||
jauṁ pitu mātu kaheu bana jānā |tauṁ kānana sata avadha samānā ||
pitu banadeva mātu banadevī |khaga mṛga carana saroruha sevī ||
aṁtahũ ucita nṛpahi banabāsū |baya biloki hiyã hoi harā̃sū ||
baṛabhāgī banu avadha abhāgī |jo raghubaṁsatilaka tumha tyāgī ||
jauṁ suta kahau saṁga mohi lehū |tumhare hṛdayã hoi saṁdehū ||
pūta parama priya tumha sabahī ke |prāna prāna ke jīvana jī ke ||
te tumha kahahu mātu bana jāū̃ |maiṁ suni bacana baiṭhi pachitāū̃ ||
अगर सिर्फ पापा का ऑर्डर है बेटा, तो मत जा। माँ को बड़ा मान। लेकिन अगर दोनों, पापा और माँ, ने कहा है जंगल जा, तो तेरे लिए जंगल अयोध्या के बराबर है, सौ गुना। जंगल के देवता तेरे पापा होंगे, जंगल की देवियाँ तेरी माँ, और पक्षी और हिरण तेरे चरण सेवा करेंगे। आखिर में राजा का जंगल में रहना ठीक ही है। पर तेरी छोटी उमर देख कर मेरा दिल दुखी होता है। जंगल भाग वाला है और अयोध्या अभाग वाली, अगर तू रघु वंस का तिलक होकर उसे छोड़ दे। अगर मैं कहूँ, बेटा मुझे भी साथ ले चल, तो तेरे दिल में शक पैदा हो जाएगा। बेटा, तू सबको सबसे प्यारा है, हमारी जान की जान है, आत्मा का जीवन है। फिर भी तू कहता है, माँ मैं जंगल जा रहा हूँ। तेरे बात सुन कर मैं बैठ कर पछतावा करता हूँ।
दोहा 56
यह बिचारि नहिं करउँ हठ झूठ सनेहु बढ़ाइ।मानि मातु कर नात बलि सुरति बिसरि जनि जाइ।।56।।
yaha bicāri nahiṁ karaũ haṭha jhūṭha sanehu baṛhāi |māni mātu kara nāta bali surati bisari jani jāi ||56||
ये सब सोच कर मैं ज़िद नहीं करती, और झूठा प्यार बढ़ा कर नहीं दिखाती। मैं खुद को तुम्हारे आगे रख देती हूँ। मान लो मैं तुम्हारी माँ हूँ, और ये बात याद रखो, मुझे भूल कर मत जाना।
चौपाई 57.1-4
देव पितर सब तुन्हहि गोसाई।राखहुँ पलक नयन की नाई।।
अवधि अंबु प्रिय परिजन मीना।तुम्ह करुनाकर धरम धुरीना।।
अस बिचारि सोइ करहु उपाई।सबहि जिअत जेहिं भेंटेहु आई।।
जाहु सुखेन बनहि बलि जाऊँ।करि अनाथ जन परिजन गाऊँ।।
सब कर आजु सुकृत फल बीता।भयउ कराल कालु बिपरीता।।
बहुबिधि बिलपि चरन लपटानी।परम अभागिनि आपुहि जानी।।
दारुन दुसह दाहु उर ब्यापा।बरनि न जाहिं बिलाप कलापा।।
राम उठाइ मातु उर लाई।कहि मृदु बचन बहुरि समुझाई।।
deva pitara saba tunhahi gosāī |rākhahũ palaka nayana kī nāī ||
avadhi aṁbu priya parijana mīnā |tumha karunākara dharama dhurīnā ||
asa bicāri soi karahu upāī |sabahi jiata jehiṁ bheṁṭehu āī ||
jāhu sukhena banahi bali jāū̃ |kari anātha jana parijana gāū̃ ||
saba kara āju sukṛta phala bītā |bhayau karāla kālu biparītā ||
bahubidhi bilapi carana lapaṭānī |parama abhāgini āpuhi jānī ||
dāruna dusaha dāhu ura byāpā |barani na jāhiṁ bilāpa kalāpā ||
rāma uṭhāi mātu ura lāī |kahi mṛdu bacana bahuri samujhāī ||
सारे देवता और पित्र आपको बचाएं, जैसे पलकें आंख को बचाती हैं। वनवास का वक्त पानी जैसा है, और आपके अपने उस पानी में मछली जैसे हैं। आप दया के भंडार हैं और धरम का बोझ उठाते हैं। ये सोच कर कोई ऐसी तरकीब निकालो जिससे आप वापस आ सकें और सब से मिल सकें जब तक सब जिंदा हैं। खुशी से बन चले जाओ, मैं आपकी हूँ। आप अपने नौकरों को, अपनों को और शहर को अनाथ छोड़ रहे हैं। आज सबके पुण्य का फल खत्म हो गया, और खतरनाक किस्मत उल्ट पड़ी है। बहुत तरह से रो कर उनके पैर पकड़े, अपने आपको सबसे बदकिस्मत औरत मानी। एक दर्द भरी आग उनके दिल में फैल गई, और उनका रोना बताया नहीं जा सकता। राम ने अपनी मां को उठाया और छाती से लगा लिया, और नरम बातें कह कर उन्हें फिर समझाया।
दोहा 57
समाचार तेहि समय सुनि सीय उठी अकुलाइ।जाइ सासु पद कमल जुग बंदि बैठि सिरु नाइ।।57।।
samācāra tehi samaya suni sīya uṭhī akulāi |jāi sāsu pada kamala juga baṁdi baiṭhi siru nāi ||57||
सीता ने उस वक्त ये खबर सुनी, तो घबरा के उठ गई। फिर वो अपनी सास के पास गई, उनके दोनों पैरों को छू के मथा टेका, और सिर झुका के बैठ गई।
चौपाई 58.1-4
दीन्हि असीस सासु मृदु बानी।अति सुकुमारि देखि अकुलानी।।
बैठि नमितमुख सोचति सीता।रूप रासि पति प्रेम पुनीता।।
चलन चहत बन जीवननाथू।केहि सुकृती सन होइहि साथू।।
की तनु प्रान कि केवल प्राना।बिधि करतबु कछु जाइ न जाना।।
चारु चरन नख लेखति धरनी।नूपुर मुखर मधुर कबि बरनी।।
मनहुँ प्रेम बस बिनती करहीं।हमहि सीय पद जनि परिहरहीं।।
मंजु बिलोचन मोचति बारी।बोली देखि राम महतारी।।
तात सुनहु सिय अति सुकुमारी।सासु ससुर परिजनहि पिआरी।।
dīnhi asīsa sāsu mṛdu bānī |ati sukumāri dekhi akulānī ||
baiṭhi namitamukha socati sītā |rūpa rāsi pati prema punītā ||
calana cahata bana jīvananāthū |kehi sukṛtī sana hoihi sāthū ||
kī tanu prāna ki kevala prānā |bidhi karatabu kachu jāi na jānā ||
cāru carana nakha lekhati dharanī |nūpura mukhara madhura kabi baranī ||
manahũ prema basa binatī karahīṁ |hamahi sīya pada jani pariharahīṁ ||
maṁju bilocana mocati bārī |bolī dekhi rāma mahatārī ||
tāta sunahu siya ati sukumārī |sāsu sasura parijanahi piārī ||
सासुमा ने नरम बोली में आशीर्वाद दिया, पर सीता को इतना कोमल देख के परेशान हो गई। सीता बहुत सुंदर थी और अपने पति से सच्ची प्रेम करती थी। वो मुँह झुकाए बैठी सोच में लगी। मेरी ज़िंदगी का मालिक बन जाना चाहता है। कौन किस्मत वाला उनका साथी बनेगा? शरीर और जान दोनों साथ जाएंगी, या सिर्फ जान? भगवान के काम कुछ समझ नहीं आते। उसने अपने सुंदर पैरों के नाखून से ज़मीन खोदी, और उसके पायल मीठी आवाज़ दे रहे थे, जैसे कवि ने लिखा है। ऐसा लग रहा था जैसे प्रेम में आकर पायल मिन्नत कर रहे हों, सीता के पैर हमें कभी न छोड़े। उसके सुंदर आँखों से आँसू गिरते देख, राम की मा ने कहा। सुन बेटा, सीता बहुत कोमल है, और सासुमा, ससुर और सारे परिवार की प्यारी है।
दोहा 58
पिता जनक भूपाल मनि ससुर भानुकुल भानु।पति रबिकुल कैरव बिपिन बिधु गुन रूप निधानु।।58।।
pitā janaka bhūpāla mani sasura bhānukula bhānu |pati rabikula kairava bipina bidhu guna rūpa nidhānu ||58||
इसका बाप जनक है, जो राजाओं में सबसे आगे है. ससुर सूर्यवंश के घर का है, जैसे सूरज ही उनकी पहचान है. और पति भगवान राम है, सूर्यवंश में जो कमल की तरह है, वही चांद है. राम में गुण और सुंदरता दोनों भंडार भरा हुआ है.
चौपाई 59.1-4
मैं पुनि पुत्रबधू प्रिय पाई।रूप रासि गुन सील सुहाई।।
नयन पुतरि करि प्रीति बढ़ाई।राखेउँ प्रान जानिकिहिं लाई।।
कलपबेलि जिमि बहुबिधि लाली।सींचि सनेह सलिल प्रतिपाली।।
फूलत फलत भयउ बिधि बामा।जानि न जाइ काह परिनामा।।
पलँग पीठ तजि गोद हिंड़ोरा।सियँ न दीन्ह पगु अवनि कठोरा।।
जिअनमूरि जिमि जोगवत रहऊँ।दीप बाति नहिं टारन कहऊँ।।
सोइ सिय चलन चहति बन साथा।आयसु काह होइ रघुनाथा।।
चंद किरन रस रसिक चकोरी।रबि रुख नयन सकइ किमि जोरी।।
maiṁ puni putrabadhū priya pāī |rūpa rāsi guna sīla suhāī ||
nayana putari kari prīti baṛhāī |rākheũ prāna jānikihiṁ lāī ||
kalapabeli jimi bahubidhi lālī |sīṁci saneha salila pratipālī ||
phūlata phalata bhayau bidhi bāmā |jāni na jāi kāha parināmā ||
palãga pīṭha taji goda hiṁṛorā |siyã na dīnha pagu avani kaṭhorā ||
jianamūri jimi jogavata rahaū̃ |dīpa bāti nahiṁ ṭārana kahaū̃ ||
soi siya calana cahati bana sāthā |āyasu kāha hoi raghunāthā ||
caṁda kirana rasa rasika cakorī |rabi rukha nayana sakai kimi jorī ||
और मैं ने सीता को बहुत प्यारी बहू पाई। रूप, गुण और नरम स्वभाव की खजाना है। मैं ने उसे आँख का तारा बनाया, प्यार बढ़ाया। अपनी जान सीता से बंधी रखी। कल्पबेली की तरह उसे हर तरह से लाड प्यार किया। प्यार के पानी से सींचा और पाला। अब जब वो फूल और फल देने वाली है, भाग्य ने विरोध किया। क्या होगा पता नहीं चल पाता। पलंग आसन छोड़ कर मेरे गोदी में झूले की तरह आई। सीता ने कभी अपना पैर सख्त ज़मीन पर नहीं रखा। जीवन जड़ी की तरह उसे संभाला। कभी दिये की बाती ठीक करने को भी नहीं कहा। वही सीता तुम्हारे साथ बन जाना चाहती है। रघुनाथ, आपका क्या आदेश है? चकोरी जो चांद की किरण पीने में खुश है, वो सूर्य के चेहरे की तरफ आँख कैसे मोड़ सकती है?
दोहा 59
करि केहरि निसिचर चरहिं दुष्ट जंतु बन भूरि।बिष बाटिकाँ कि सोह सुत सुभग सजीवनि मूरि।।59।।
kari kehari nisicara carahiṁ duṣṭa jaṁtu bana bhūri |biṣa bāṭikā̃ ki soha suta subhaga sajīvani mūri ||59||
जंगल में हाथी, शेर, राक्षस और बहुत सारे बुरे जानवर घूमते हैं। मेरे बेटा, जहर के बगीचे में एक सुंदर जान देने वाली जड़ी अच्छी लगेगी क्या?
परंपरा में इन पदों का पाठ ‘धर्म-स्थिरता’ और ‘वियोग-सहन’ की शक्ति देता माना जाता है—विशेषतः पितृ-आज्ञा, सत्य-पालन, और गृहस्थ-धर्म में वैराग्य-बुद्धि जगाने हेतु। अयोध्या काण्ड का श्रवण/पाठ शोक में भी राम-आश्रय (नाम-स्मरण) को दृढ़ करता है।
सामान्यतः ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ (राम-नाम तारक मंत्र) या ‘राम’ नाम-संपुट का प्रयोग किया जाता है; व्रत/अनुष्ठान में ‘सीता-राम’ नाम-संपुट भी प्रचलित है, विशेषकर कौसल्या–सीता प्रसंगों में।
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