Ayodhya KandaPrakarana 420 Verses

Prakarana 4

त्याग-दीक्षा का सोपान: जहाँ ‘राज्य’ (भोग-धर्म) का मोह टूटकर ‘वन’ (वैराग्य-धर्म) का द्वार खुलता है। अयोध्या काण्ड साधक को यह सिखाता है कि धर्म केवल शुभ-घटना नहीं, बल्कि पीड़ा में सत्य-पालन, वचन-रक्षा, और ईश्वर-आज्ञा-स्वीकार की तपस्या है—यही मुक्ति-सीढ़ी का निर्णायक मोड़ है।

यह प्रकरण ‘अंतःपुर’ को ‘अंतःकरण’ का रूपक बनाता है: दशरथ का मन ‘मनहिं मन झाँकना’—धर्म-निर्णय से पहले आत्मा का अपने ही भीतर उतरना। ‘कुभाँति’ और ‘कुमति’ प्रतीक हैं उस विकृत दृष्टि के, जो सत्ता/स्वार्थ के कारण सत्य को उलटा दिखाती है; कैकेयी यहाँ व्यक्ति से अधिक ‘मोह-प्रेरित बुद्धि’ का प्रतीक बनती है। दशरथ का सत्यसंध होना राजधर्म का स्तम्भ है—वचन को ‘यज्ञ’ और पालन को ‘तप’ मानकर वे अपने प्रिय (राम) के विरुद्ध भी सत्य के पक्ष में खड़े होने को बाध्य हैं। ‘राज्य’ बनाम ‘वन’ का द्वैत इस खंड में भीतर ही भीतर घटता है: उत्सव का बाह्य प्रकाश, भीतर वैराग्य की छाया बन जाता है। संदेश यह कि मुक्ति का कठिन पायदान केवल वियोग नहीं, बल्कि ‘अहं-मोह’ का त्याग और सत्य के लिए स्वेच्छा-बलिदान है।

Verses

चौपाई 30.1-4

एहि बिधि राउ मनहिं मन झाँखा।देखि कुभाँति कुमति मन माखा।।

भरतु कि राउर पूत न होहीं।आनेहु मोल बेसाहि कि मोही।।

जो सुनि सरु अस लाग तुम्हारें।काहे न बोलहु बचनु सँभारे।।

देहु उतरु अनु करहु कि नाहीं।सत्यसंध तुम्ह रघुकुल माहीं।।

देन कहेहु अब जनि बरु देहू।तजहुँ सत्य जग अपजसु लेहू।।

सत्य सराहि कहेहु बरु देना।जानेहु लेइहि मागि चबेना।।

सिबि दधीचि बलि जो कछु भाषा।तनु धनु तजेउ बचन पनु राखा।।

अति कटु बचन कहति कैकेई।मानहुँ लोन जरे पर देई।।

ehi bidhi rāu manahiṁ mana jhā̃khā |dekhi kubhā̃ti kumati mana mākhā ||

bharatu ki rāura pūta na hohīṁ |ānehu mola besāhi ki mohī ||

jo suni saru asa lāga tumhāreṁ |kāhe na bolahu bacanu sãbhāre ||

dehu utaru anu karahu ki nāhīṁ |satyasaṁdha tumha raghukula māhīṁ ||

dena kahehu aba jani baru dehū |tajahũ satya jaga apajasu lehū ||

satya sarāhi kahehu baru denā |jānehu leihi māgi cabenā ||

sibi dadhīci bali jo kachu bhāṣā |tanu dhanu tajeu bacana panu rākhā ||

ati kaṭu bacana kahati kaikeī |mānahũ lona jare para deī ||

राजा अपने ही दिल में जल रहा था। कैकेई ने उसकी बुरी हालत देखी तो उसके मन में और बदमशी भर गई। भरत तुम्हारा बेटा नहीं है क्या? या तुमने मुझे मोल पर खरीदा, गुलाम बना के घर लाए? अगर मेरी बातें सुन कर तुम्हें तीर की तरह लगीं, तो ध्यान से क्यों नहीं बोले और अपना वादा क्यों नहीं रखा? जवाब दो: करोगे या नहीं? रघु कुल में तुम्हे अपना वादा निभाने वाला कहते हैं। तुमने वादा किया था कि दोगे, अब मत दो। सच छोड़ दो और दुनिया में बदनामी ले लो। तुमने सच की तारीफ की और कहा कि वादा पूरी करोगे, समझ के कि मैं सिर्फ मुट्ठी भर भुना हुआ अनाज माँगूँगी। सिबि, दधीचि और बलि ने जो भी वादा किया, अपनी जान और दौलत दे कर अपना वादा और कसम निभा ली। कैकेई बहुत कड़वे बोल बोल रही थी, जैसे किसी के जाले पर नमक मल दे।

दोहा 30

धरम धुरंधर धीर धरि नयन उघारे रायँ।सिरु धुनि लीन्हि उसास असि मारेसि मोहि कुठायँ।।⁠30।।

dharama dhuraṁdhara dhīra dhari nayana ughāre rāyã |siru dhuni līnhi usāsa asi māresi mohi kuṭhāyã ||⁠30||

राजा जो धरम का बोझ उठाए बैठा था, उसने हिम्मत करके आँखें खोली। सिर हिलाते हुए एक लंबी साँस ली और बोला, उसने मुझे जान ले वाली जगह पे मारा है।

चौपाई 31.1-4

आगें दीखि जरत रिस भारी।मनहुँ रोष तरवारि उघारी।।

मूठि कुबुद्धि धार निठुराई।धरी कूबरीं सान बनाई।।

लखी महीप कराल कठोरा।सत्य कि जीवनु लेइहि मोरा।।

बोले राउ कठिन करि छाती।बानी सबिनय तासु सोहाती।।

प्रिया बचन कस कहसि कुभाँती।भीर प्रतीति प्रीति करि हाँती।।

मोरें भरतु रामु दुइ आँखी।सत्य कहउँ करि संकरू साखी।।

अवसि दूतु मैं पठइब प्राता।ऐहहिं बेगि सुनत दोउ भ्राता।।

सुदिन सोधि सबु साजु सजाई।देउँ भरत कहुँ राजु बजाई।।

āgeṁ dīkhi jarata risa bhārī |manahũ roṣa taravāri ughārī ||

mūṭhi kubuddhi dhāra niṭhurāī |dharī kūbarīṁ sāna banāī ||

lakhī mahīpa karāla kaṭhorā |satya ki jīvanu leihi morā ||

bole rāu kaṭhina kari chātī |bānī sabinaya tāsu sohātī ||

priyā bacana kasa kahasi kubhā̃tī |bhīra pratīti prīti kari hā̃tī ||

moreṁ bharatu rāmu dui ā̃khī |satya kahaũ kari saṁkarū sākhī ||

avasi dūtu maiṁ paṭhaiba prātā |aihahiṁ begi sunata dou bhrātā ||

sudina sodhi sabu sāju sajāī |deũ bharata kahũ rāju bajāī ||

राजा ने उसे सामने देखी, बहुत गुस्से में जलती हुई। जैसे गुस्से की खुली तलवार हो। तलवार की पकड़ बुरी समझ थी और धार बेदर्दी की। कुबरी ने उसे अपने पत्थर पर तेज़ करके तैयार किया। राजा ने उसे देखी, भयंकर और कठोर। सोचा, क्या सच में ये मेरी जान ले लेगी? राजा ने दिल स्ट्रॉंग करके नर्मी से बात की। ऐसे शब्द जो उसे पसंद आएँ। प्रिया, ऐसे बुरे शब्द क्यों बोलती हो? ये लोगों का भरोसा और हमारी मोहब्बत, दोनों को खत्म कर देते हैं। मेरे लिए भरत और राम मेरी दो आँखें हैं। मैं सच बोल रहा हूँ, शंकर को साक्षी मान कर। कल सुबह पक्का मैं दूत भेजूँगा। दोनों भाई सुनते ही जल्दी आ जाएँगे। अच्छा दिन देखकर सारी तैयारी करवाऊँगा। ढोल बजवा कर भरत को राज दूँगा।

दोहा 31

लोभु न रामहि राजु कर बहुत भरत पर प्रीति।मैं बड़ छोट बिचारि जियँ करत रहेउँ नृपनीति।।⁠31।।

lobhu na rāmahi rāju kara bahuta bharata para prīti |maiṁ baṛa choṭa bicāri jiyã karata raheũ nṛpanīti ||⁠31||

राम को राज पर कोई लालच नहीं है, और वो भरत से बहुत प्यार करता है. मैं बस राजा का रूल फॉलो कर रहा था, दिल में सोच रहा था कि कौन बड़ा है और कौन छोटा है.

चौपाई 32.1-4

राम सपथ सत कहुउँ सुभाऊ।राममातु कछु कहेउ न काऊ।।

मैं सबु कीन्ह तोहि बिनु पूँछें।तेहि तें परेउ मनोरथु छूछें।।

रिस परिहरू अब मंगल साजू।कछु दिन गएँ भरत जुबराजू।।

एकहि बात मोहि दुखु लागा।बर दूसर असमंजस मागा।।

अजहुँ हृदय जरत तेहि आँचा।रिस परिहास कि साँचेहुँ साँचा।।

कहु तजि रोषु राम अपराधू।सबु कोउ कहइ रामु सुठि साधू।।

तुहूँ सराहसि करसि सनेहू।अब सुनि मोहि भयउ संदेहू।।

जासु सुभाउ अरिहि अनुकूला।सो किमि करिहि मातु प्रतिकूला।।

rāma sapatha sata kahuũ subhāū |rāmamātu kachu kaheu na kāū ||

maiṁ sabu kīnha tohi binu pū̃cheṁ |tehi teṁ pareu manorathu chūcheṁ ||

risa pariharū aba maṁgala sājū |kachu dina gaẽ bharata jubarājū ||

ekahi bāta mohi dukhu lāgā |bara dūsara asamaṁjasa māgā ||

ajahũ hṛdaya jarata tehi ā̃cā |risa parihāsa ki sā̃cehũ sā̃cā ||

kahu taji roṣu rāma aparādhū |sabu kou kahai rāmu suṭhi sādhū ||

tuhū̃ sarāhasi karasi sanehū |aba suni mohi bhayau saṁdehū ||

jāsu subhāu arihi anukūlā |so kimi karihi mātu pratikūlā ||

मैं राम की कसम खाता हूँ और सच बताता हूँ। राम की माँ ने कभी मुझे कुछ नहीं कहा। मैंने तुमसे पूछे बिना सब कर दिया। इसलिए मेरा प्लान खत्म हो गया। अब अपना गुस्सा छोड़ो और मंगल की तैयारी करो। कुछ दिन बाद भरत युवराज बनेगा। मुझे सिर्फ एक बात का दुख लगा। तुमने जो दूसरा बूँद माँगा, वो गलत और बेजा था। अभी भी तेरा दिल उस आग की गर्मी से जल रहा है। ये गुस्सा है, या मज़ाक, या सच में सच है? गुस्सा छोड़ो और बताओ राम ने क्या गलती की। सब कहते हैं राम बहुत अच्छा और नरम दिल का है। तुम भी उसे तारीफ करते थे और प्यार दिखाते थे। अब तुमसे ये सुन के मुझे डाउट हो गया है। जिसका स्वभाव दुश्मन के लिए भी अच्छा हो, वो अपनी माँ के लिए बुरा कैसे करेगा?

दोहा 32

प्रिया हास रिस परिहरहि मागु बिचारि बिबेकु।जेहिं देखाँ अब नयन भरि भरत राज अभिषेकु।।⁠32।।

priyā hāsa risa pariharahi māgu bicāri bibeku |jehiṁ dekhā̃ aba nayana bhari bharata rāja abhiṣeku ||⁠32||

प्यारी, हसी और गुस्सा छोड़ दे। अच्छे से सोच समझ कर कुछ माँग, ताकि मैं अब अपनी आँखों से देख सकूँ कि भरत को राजा बनाया जा रहा है।

चौपाई 33.1-4

जिऐ मीन बरू बारि बिहीना।मनि बिनु फनिकु जिऐ दुख दीना।।

कहउँ सुभाउ न छलु मन माहीं।जीवनु मोर राम बिनु नाहीं।।

समुझि देखु जियँ प्रिया प्रबीना।जीवनु राम दरस आधीना।।

सुनि म्रदु बचन कुमति अति जरई।मनहुँ अनल आहुति घृत परई।।

कहइ करहु किन कोटि उपाया।इहाँ न लागिहि राउरि माया।।

देहु कि लेहु अजसु करि नाहीं।मोहि न बहुत प्रपंच सोहाहीं।।

रामु साधु तुम्ह साधु सयाने।राममातु भलि सब पहिचाने।।

जस कौसिलाँ मोर भल ताका।तस फलु उन्हहि देउँ करि साका।।

jiai mīna barū bāri bihīnā |mani binu phaniku jiai dukha dīnā ||

kahaũ subhāu na chalu mana māhīṁ |jīvanu mora rāma binu nāhīṁ ||

samujhi dekhu jiyã priyā prabīnā |jīvanu rāma darasa ādhīnā ||

suni mradu bacana kumati ati jaraī |manahũ anala āhuti ghṛta paraī ||

kahai karahu kina koṭi upāyā |ihā̃ na lāgihi rāuri māyā ||

dehu ki lehu ajasu kari nāhīṁ |mohi na bahuta prapaṁca sohāhīṁ ||

rāmu sādhu tumha sādhu sayāne |rāmamātu bhali saba pahicāne ||

jasa kausilā̃ mora bhala tākā |tasa phalu unhahi deũ kari sākā ||

मछली शायद पानी के बिना जी सकती है, और सांप अपने मनि के बिना दुखी होकर जी सकता है। मैं अपनी असली बात बता रहा हूँ, दिल में कोई चाल नही है। मेरा जीवन राम के बिना कुछ नही है। दिल से सोच लो, मेरी समझदार प्रिया। मेरा जीवन राम को देखने पर निर्भर है। ये नरम बातें सुनकर खराब सोच वाली कैकेयी बहुत जल उठी, जैसे आग में घी डाल दिया हो। उसने कहा, करोड़ों तरीके क्यों ना ट्राय करो? तुम्हारी चाल यहाँ मेरे ऊपर नही चलेगी। या तो दे दो, या मना कर दो और बदनामी उठाओ। मुझे इतना लंबा चक्कर पसंद नही है। राम अच्छा है, तुम भी अच्छे और समझदार हो, और राम की माता भी अच्छी है, सबको पता है। जैसे कौसल्या ने मेरा बुरा किया है, मैं भी उसे वही फल दूँगी, वैसा ही बदला लूँगी।

दोहा 33

होत प्रात मुनिबेष धरि जौं न रामु बन जाहिं।मोर मरनु राउर अजस नृप समुझिअ मन माहिं।।⁠33।।

hota prāta munibeṣa dhari jauṁ na rāmu bana jāhiṁ |mora maranu rāura ajasa nṛpa samujhia mana māhiṁ ||⁠33||

अगर सुबह होते ही राम साधु बन के जंगल नही जाते, तो मैन मर जाउंगा और राजा आपकी बदनामी होगी. ये बात अपने दिमाग में अच्छे से समझ लीजिये.

चौपाई 34.1-4

अस कहि कुटिल भई उठि ठाढ़ी।मानहुँ रोष तरंगिनि बाढ़ी।।

पाप पहार प्रगट भइ सोई।भरी क्रोध जल जाइ न जोई।।

दोउ बर कूल कठिन हठ धारा।भवँर कूबरी बचन प्रचारा।।

ढाहत भूपरूप तरु मूला।चली बिपति बारिधि अनुकूला।।

लखी नरेस बात फुरि साँची।तिय मिस मीचु सीस पर नाची।।

गहि पद बिनय कीन्ह बैठारी।जनि दिनकर कुल होसि कुठारी।।

मागु माथ अबहीं देउँ तोही।राम बिरहँ जनि मारसि मोही।।

राखु राम कहुँ जेहि तेहि भाँती।नाहिं त जरिहि जनम भरि छाती।।

asa kahi kuṭila bhaī uṭhi ṭhāṛhī |mānahũ roṣa taraṁgini bāṛhī ||

pāpa pahāra pragaṭa bhai soī |bharī krodha jala jāi na joī ||

dou bara kūla kaṭhina haṭha dhārā |bhavãra kūbarī bacana pracārā ||

ḍhāhata bhūparūpa taru mūlā |calī bipati bāridhi anukūlā ||

lakhī naresa bāta phuri sā̃cī |tiya misa mīcu sīsa para nācī ||

gahi pada binaya kīnha baiṭhārī |jani dinakara kula hosi kuṭhārī ||

māgu mātha abahīṁ deũ tohī |rāma birahã jani mārasi mohī ||

rākhu rāma kahũ jehi tehi bhā̃tī |nāhiṁ ta jarihi janama bhari chātī ||

ये सब बोल के कैकेयी उठ खड़ी हो गई। जैसे गुस्से की नदी बाढ़ पर हो। वो नदी पाप के पहाड़ से निकली थी। गुस्से के पानी से इतनी भरी थी कि कोई उसको देख भी नहीं सकता था। उसके दोनों किनारे वो दो वरदान थे। उसका बहाव उसकी कठिन ज़िद था। और कुबड़ी मंथरा के शब्द भंवर थे, जो अपनी सलाह फैला रही थी। राजा को पेड़ की तरह जड़ से उखाड़ती हुई, वो मुसीबत के समुंदर की तरफ बह निकली। राजा ने देखा कि उसकी बातें सच और सीरियस हैं। मौत औरत के रूप में उसके सिर पर नाच रही थी। राजा ने उसके पैर पकड़ के मिन्नत की और उसे बिठाया। बोला, सूर्य वंश के लिए कुल्हाड़ी मत बन। मेरा सर माँग, मैं अभी दे दूँ तुझे। पर मुझे राम से बिछड़ के मत मार। राम को जैसे भी हो यहाँ रख। वरना तेरा दिल सारी ज़िंदगी जलेगा।

दोहा 34

देखी ब्याधि असाध नृपु परेउ धरनि धुनि माथ।कहत परम आरत बचन राम राम रघुनाथ।।⁠34।।

dekhī byādhi asādha nṛpu pareu dharani dhuni mātha |kahata parama ārata bacana rāma rāma raghunātha ||⁠34||

राजा देखा कि ये बिमारी अब किसी से ठीक नहीं होगी। ज़मीन पर गिर गया, अपना सिर पटकने लगा। बहुत दर्द भरी आवाज़ में बोला, राम, राम, रघु कुल के स्वामी।

चौपाई 35.1-4

ब्याकुल राउ सिथिल सब गाता।करिनि कलपतरु मनहुँ निपाता।।

कंठु सूख मुख आव न बानी।जनु पाठीनु दीन बिनु पानी।।

पुनि कह कटु कठोर कैकेई।मनहुँ घाय महुँ माहुर देई।।

जौं अंतहुँ अस करतबु रहेऊ।मागु मागु तुम्ह केहिं बल कहेऊ।।

दुइ कि होइ एक समय भुआला।हँसब ठठाइ फुलाउब गाला।।

दानि कहाउब अरु कृपनाई।होइ कि खेम कुसल रौताई।।

छाड़हु बचनु कि धीरजु धरहू।जनि अबला जिमि करुना करहू।।

तनु तिय तनय धामु धनु धरनी।सत्यसंध कहुँ तृन सम बरनी।।

byākula rāu sithila saba gātā |karini kalapataru manahũ nipātā ||

kaṁṭhu sūkha mukha āva na bānī |janu pāṭhīnu dīna binu pānī ||

puni kaha kaṭu kaṭhora kaikeī |manahũ ghāya mahũ māhura deī ||

jauṁ aṁtahũ asa karatabu raheū |māgu māgu tumha kehiṁ bala kaheū ||

dui ki hoi eka samaya bhuālā |hãsaba ṭhaṭhāi phulāuba gālā ||

dāni kahāuba aru kṛpanāī |hoi ki khema kusala rautāī ||

chāṛahu bacanu ki dhīraju dharahū |jani abalā jimi karunā karahū ||

tanu tiya tanaya dhāmu dhanu dharanī |satyasaṁdha kahũ tṛna sama baranī ||

राजा बिलकुल परेशान हो गया, उनका पूरा जिस्म ढीली पड़ गया, जैसे हाथी ने कल्पवृक्ष उखाड़ दिया हो। गला सूख गया, मुँह से कोई बात नहीं निकली, जैसे पानी के बिना मछली प्यासी हो। फिर कैकेई ने कड़वा और सख्त बात कही, जैसे ज़ख्म में ज़हर डाल रही हो। अगर आखिर में ऐसा ही करना था, तो किस बल पे कहा था, माँगो, माँगो? राजा, क्या एक टाइम पे दो चीज़ें हो सकती हैं? पूरा हँस नहीं सकते और साथ में मुँह फूला भी नहीं सकते। क्या दानी कहलायेंगे और कंजूस भी? कोई राजा बन कर आराम से जी सकता है क्या? या अपना वचन छोड़ो या हिम्मत रखो। कमज़ोर औरत की तरह दया मत दिखाओ। जिस्म, पत्नी, बेटा, घर, पैसा और ज़मीन, जो अपने वचन पे सच्चा हो उसके लिए ये सब एक घास की पत्ती के बराबर हैं।

दोहा 35

मरम बचन सुनि राउ कह कहु कछु दोषु न तोर।लागेउ तोहि पिसाच जिमि कालु कहावत मोर।।⁠35।।

marama bacana suni rāu kaha kahu kachu doṣu na tora |lāgeu tohi pisāca jimi kālu kahāvata mora ||⁠35||

राजा ने दिल पे लगती बात सुनी। फिर बोले, तुम्हारा कोई दोष नहीं। मेरा खुद का काल पिसाच की तरह तुम पर चढ़ गया है और तुम्हारे मुँह से ये बातें करवा रहा है।

चौपाई 36.1-4

चहत न भरत भूपतहि भोरें।बिधि बस कुमति बसी जिय तोरें।।

सो सबु मोर पाप परिनामू।भयउ कुठाहर जेहिं बिधि बामू।।

सुबस बसिहि फिरि अवध सुहाई।सब गुन धाम राम प्रभुताई।।

करिहहिं भाइ सकल सेवकाई।होइहि तिहुँ पुर राम बड़ाई।।

तोर कलंकु मोर पछिताऊ।मुएहुँ न मिटहि न जाइहि काऊ।।

अब तोहि नीक लाग करु सोई।लोचन ओट बैठु मुहु गोई।।

जब लगि जिऔं कहउँ कर जोरी।तब लगि जनि कछु कहसि बहोरी।।

फिरि पछितैहसि अंत अभागी।मारसि गाइ नहारु लागी।।

cahata na bharata bhūpatahi bhoreṁ |bidhi basa kumati basī jiya toreṁ ||

so sabu mora pāpa parināmū |bhayau kuṭhāhara jehiṁ bidhi bāmū ||

subasa basihi phiri avadha suhāī |saba guna dhāma rāma prabhutāī ||

karihahiṁ bhāi sakala sevakāī |hoihi tihũ pura rāma baṛāī ||

tora kalaṁku mora pachitāū |muehũ na miṭahi na jāihi kāū ||

aba tohi nīka lāga karu soī |locana oṭa baiṭhu muhu goī ||

jaba lagi jiauṁ kahaũ kara jorī |taba lagi jani kachu kahasi bahorī ||

phiri pachitaihasi aṁta abhāgī |mārasi gāi nahāru lāgī ||

भरत को राज कभी चाहिए नहीं था, सपने में भी नहीं। ये सब किस्मत का बस है, तेरा मन बुरे सलाह से भर गया है। ये सब मेरे खुद के पाप का फल है, जिसकी वजह से किस्मत ने ऐसे बुरे वक्त और जगह पर मुझे फेर दिया। अयोध्या फिर से खुशल और शांति से बसने वाली है, राम के राज में, जिसमे हर गुन है। सारे भाई उसकी सेवा करेंगे, और राम की बड़ाई तीनो लोक में फैलेगी। पर तेरा कलंक और मेरा पछतावा मरने के बाद भी मिट नहीं पायेगा, कभी नहीं जाएगा। अब जो तुझे ठीक लगे वो कर, मेरी आँखों के सामने से हट, मुह छुपा कर बैठ। हाथ जोड़ के बोल रहा हूँ, जब तक जिंदा हूँ, मुझे दोबारा कुछ मत बोलना। तू अभागी, अंत में पछतावेगी, क्योंकि तू नस के लिए गाय मार रही है।

दोहा 36

परेउ राउ कहि कोटि बिधि काहे करसि निदानु।कपट सयानि न कहति कछु जागति मनहुँ मसानु।।⁠36।।

pareu rāu kahi koṭi bidhi kāhe karasi nidānu |kapaṭa sayāni na kahati kachu jāgati manahũ masānu ||⁠36||

राजा ज़मीन पर गिर गए। उन्होंने करोड़ तरह से उससे समझाया। पूछा, "तू मेरी बर्बादी क्यों कर रही है?" पर वो औरत चलाक और कपटी थी। उसने कुछ भी नहीं कहा। जैसे मसान की जगह अपने जलते हुए चिताओं से जगी रहती है, वैसे ही वो चुप रही।

चौपाई 37.1-4

राम राम रट बिकल भुआलू।जनु बिनु पंख बिहंग बेहालू।।

हृदयँ मनाव भोरु जनि होई।रामहि जाइ कहै जनि कोई।।

उदउ करहु जनि रबि रघुकुल गुर।अवध बिलोकि सूल होइहि उर।।

भूप प्रीति कैकइ कठिनाई।उभय अवधि बिधि रची बनाई।।

बिलपत नृपहि भयउ भिनुसारा।बीना बेनु संख धुनि द्वारा।।

पढ़हिं भाट गुन गावहिं गायक।सुनत नृपहि जनु लागहिं सायक।।

मंगल सकल सोहाहिं न कैसें।सहगामिनिहि बिभूषन जैसें।।

तेहिं निसि नीद परी नहि काहू।राम दरस लालसा उछाहू।।

rāma rāma raṭa bikala bhuālū |janu binu paṁkha bihaṁga behālū ||

hṛdayã manāva bhoru jani hoī |rāmahi jāi kahai jani koī ||

udau karahu jani rabi raghukula gura |avadha biloki sūla hoihi ura ||

bhūpa prīti kaikai kaṭhināī |ubhaya avadhi bidhi racī banāī ||

bilapata nṛpahi bhayau bhinusārā |bīnā benu saṁkha dhuni dvārā ||

paṛhahiṁ bhāṭa guna gāvahiṁ gāyaka |sunata nṛpahi janu lāgahiṁ sāyaka ||

maṁgala sakala sohāhiṁ na kaiseṁ |sahagāminihi bibhūṣana jaiseṁ ||

tehiṁ nisi nīda parī nahi kāhū |rāma darasa lālasā uchāhū ||

राजा परेशन हो के बार बार राम राम बोल रहा था। जैसे बिना पंख वाला पक्षी बेसहारा और तबाह हो रहा हो। दिल में उसने यही मांगा कि सुबह ना हो, और कोई जा के राम को ना बता दे। सूरज से उसने कहा, हे सूरज, रघु कुल के गुरु, तू उगे मत। जब तू अयोध्या को देखेगा तो तेरा दिल में भी दर्द चुभ जाएगा। राजा का प्यार और कैकेयी का कठोरपन, ब्रह्मा ने दोनों को अपनी अपनी हद तक बनाया था। राजा अभी रो रहा था तभी दिन निकल आया, और उसके दरवाजे पर बीन, बांसुरी और शंख की आवाज उठने लगी। भाट लोग पढ़ रहे थे और गायक उसकी तारीफ गा रहे थे। लेकिन राजा को सुनते हुए लग रहा था जैसे तीर लग रहे हो। किसी भी मंगल की तैयारी से उसको कोई खुशी नहीं हुई। जैसे सती होने वाली औरत को जेवर पसंद नहीं आते। उस रात किसी को नींद नहीं आई, सबको राम को देखने की बड़ी तड़प और खुशी थी।

दोहा 37

द्वार भीर सेवक सचिव कहहिं उदित रबि देखि।जागेउ अजहुँ न अवधपति कारनु कवनु बिसेषि।।⁠37।।

dvāra bhīra sevaka saciva kahahiṁ udita rabi dekhi |jāgeu ajahũ na avadhapati kāranu kavanu biseṣi ||⁠37||

सेवक और मंत्री दरवाजे पर इकट्ठे हो गए। सूरज निकल गया देख कर बोले, अयोध्या के स्वामी अभी तक नहीं जागे। कोई खास वजह क्या हो सकती है?

चौपाई 38.1-4

पछिले पहर भूपु नित जागा।आजु हमहि बड़ अचरजु लागा।।

जाहु सुमंत्र जगावहु जाई।कीजिअ काजु रजायसु पाई।।

गए सुमंत्रु तब राउर माही।देखि भयावन जात डेराहीं।।

धाइ खाइ जनु जाइ न हेरा।मानहुँ बिपति बिषाद बसेरा।।

पूछें कोउ न ऊतरु देई।गए जेंहिं भवन भूप कैकैई।।

कहि जयजीव बैठ सिरु नाई।दैखि भूप गति गयउ सुखाई।।

सोच बिकल बिबरन महि परेऊ।मानहुँ कमल मूलु परिहरेऊ।।

सचिउ सभीत सकइ नहिं पूँछी।बोली असुभ भरी सुभ छूछी।।

pachile pahara bhūpu nita jāgā |āju hamahi baṛa acaraju lāgā ||

jāhu sumaṁtra jagāvahu jāī |kījia kāju rajāyasu pāī ||

gae sumaṁtru taba rāura māhī |dekhi bhayāvana jāta ḍerāhīṁ ||

dhāi khāi janu jāi na herā |mānahũ bipati biṣāda baserā ||

pūcheṁ kou na ūtaru deī |gae jeṁhiṁ bhavana bhūpa kaikaiī ||

kahi jayajīva baiṭha siru nāī |daikhi bhūpa gati gayau sukhāī ||

soca bikala bibarana mahi pareū |mānahũ kamala mūlu parihareū ||

saciu sabhīta sakai nahiṁ pū̃chī |bolī asubha bharī subha chūchī ||

राजा तो हमेशा रात के आखिरी पहर उठता था। आज हमें बहुत अजीब लग रहा है कि आज नहीं उठे। सुमंत्र, जा के उन्हें जगाओ, ताकि राजा का आदेश मिलते ही अपना काम कर सकें। फिर सुमंत्र पैलेस के अंदर गया, पर जाते हुए उस जगह का डरावना लुक उसके अंदर डर भर गया। ऐसा लग रहा था जैसे वो उस पर टूट पड़ेगा और खा जाएगा, और उसने उस तरफ देखना भी बर्दाश्त नहीं किया। बिल्कुल ऐसी जगह जहान मुसीबत और दुख बसा हो। उसने पूछा पर किसी ने जवाब नहीं दिया, और वो उस कमरे में पहुंच गया जहान राजा और कैकयी थे। जय हो, लंबी उमर हो, ये बोलके उसने सिर झुकाया और बैठ गया। पर राजा की हालत देखके वो भी सोख गया। सोच में डूबे और चेहरा उड़ गया, राजा जमीन पर गिर पड़ा था, जैसे कोई कमल जड़ से उखाड़ दिया गया हो। वजीर डर गया, कुछ पूछ नहीं पा रहा था। फिर उसने बात की, जो बिल्कुल बुरा था और जिसमें कोई अच्छाई नहीं थी।

दोहा 38

परी न राजहि नीद निसि हेतु जान जगदीसु।रामु रामु रटि भोरु किय कहइ न मरमु महीसु।।⁠38।।

parī na rājahi nīda nisi hetu jāna jagadīsu |rāmu rāmu raṭi bhoru kiya kahai na maramu mahīsu ||⁠38||

राजा को रात भर नींद नहीं आई। वजह सिर्फ भगवान जानते हैं। वो रात भर राम राम कहते रहे और सुबह हो गई। राजा अपना राज किसी को नहीं बताते।

चौपाई 39.1-4

आनहु रामहि बेगि बोलाई।समाचार तब पूँछेहु आई।।

चलेउ सुमंत्र राय रूख जानी।लखी कुचालि कीन्हि कछु रानी।।

सोच बिकल मग परइ न पाऊ।रामहि बोलि कहिहि का राऊ।।

उर धरि धीरजु गयउ दुआरें।पूछँहिं सकल देखि मनु मारें।।

समाधानु करि सो सबही का।गयउ जहाँ दिनकर कुल टीका।।

रामु सुमंत्रहि आवत देखा।आदरु कीन्ह पिता सम लेखा।।

निरखि बदनु कहि भूप रजाई।रघुकुलदीपहि चलेउ लेवाई।।

रामु कुभाँति सचिव सँग जाहीं।देखि लोग जहँ तहँ बिलखाहीं।।

ānahu rāmahi begi bolāī |samācāra taba pū̃chehu āī ||

caleu sumaṁtra rāya rūkha jānī |lakhī kucāli kīnhi kachu rānī ||

soca bikala maga parai na pāū |rāmahi boli kahihi kā rāū ||

ura dhari dhīraju gayau duāreṁ |pūchãhiṁ sakala dekhi manu māreṁ ||

samādhānu kari so sabahī kā |gayau jahā̃ dinakara kula ṭīkā ||

rāmu sumaṁtrahi āvata dekhā |ādaru kīnha pitā sama lekhā ||

nirakhi badanu kahi bhūpa rajāī |raghukuladīpahi caleu levāī ||

rāmu kubhā̃ti saciva sãga jāhīṁ |dekhi loga jahã tahã bilakhāhīṁ ||

राम को जल्दी बुलाओ और यहाँ लाओ। फिर तुम आ कर राजा से पूछ सकते हो कि क्या हुआ है। सुमंत्र राजा की बात समझ कर निकल पड़ा। उसने देखा कि रानी ने कुछ बुरी साजिश की है। बहुत चिंता में था, पैरों को रास्ता भी नहीं मिल रहा था। सोच रहा था, राजा ने राम को बुलाया है, अब वो उन्हें क्या कहेगा। दिल में हिम्मत बांध के वो दरवाजे तक पहुंचा। सब लोग जो उसे उदास देख रहे थे, पूछने लगे कि क्या हुआ। सब को जवाब दे के समझा दिया, और वहाँ चला गया जहाँ राम थे, सूर्य वंश के नगीना। राम ने देखा सुमंत्र आ रहा है। उन्होंने इज्जत से स्वागत किया, अपने पिता जैसा मान कर। राम के चेहरे को देख कर सुमंत्र ने राजा का संदेश दिया, और उन्हें ले कर चल पड़ा, रघु वंश के दीपक को। लोग देख रहे थे राम सचिव के साथ ऐसे बुरे हाल में जा रहे हैं, हर तरफ लोग रोने लगे।

दोहा 39

जाइ दीख रघुबंसमनि नरपति निपट कुसाजु।सहमि परेउ लखि सिंघिनिहि मनहुँ बृद्ध गजराजु।।⁠39।।

jāi dīkha raghubaṁsamani narapati nipaṭa kusāju |sahami pareu lakhi siṁghinihi manahũ bṛddha gajarāju ||⁠39||

राम वहाँ गए और राजा को बहुत बुरी हालत में देखा, बिल्कुल बेकरार था। कैकेयी को देखते ही राजा पीछे खिसक गया और गिर पड़ा, जैसे कोई बूढ़ा हाथी राजा शेरनी को देखकर डर से गिरता है।

Frequently Asked Questions

परंपरागत मान्यता में यह खंड ‘सत्य-पालन’ और ‘राम-नाम-स्मरण’ की सिद्धि देता है: वचन-बंधन, गृहस्थ-धर्म, और विषाद में भी राम-आश्रय की शिक्षा से श्रोता/पाठक के भीतर धैर्य, वैराग्य और शरणागति बढ़ती है—विशेषतः संकट-काल में ‘राम राम’ का जप स्वाभाविक बनता है।

सामान्य सत्संग-परंपरा में ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ या ‘राम राम’ का नाम-संपुट (विशेषकर दोहा-स्थलों पर) जोड़ा जाता है; कुछ परंपराओं में ‘सियाराममय सब जग जानी’ को भाव-संपुट की तरह लिया जाता है—पर यह स्थान-विशेष/आचार्य-परंपरा पर निर्भर है।

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