Opening the text
यह सोपान ‘वैराग्य-जन्य धर्म-निष्ठा’ का द्वार है: राज्य, परिवार, लोकमर्यादा और निजी प्रेम—इन सबके बीच राम का त्याग ‘धर्म की सर्वोच्चता’ को साधक के अंतःकरण में प्रतिष्ठित करता है। अयोध्या-काण्ड में भक्ति भावुकता नहीं, ‘मर्यादा-आधारित समर्पण’ बनती है; यहाँ साधक सीखता है कि ईश्वर-प्रसाद (आज्ञा/अनुशासन) ही मुक्ति-पथ का वास्तविक आलंबन है।
यह प्रसंग ‘वैराग्य-जन्य धर्म-निष्ठा’ का द्वार है: (1) राज्य/परिवार/निजी प्रेम—इन सबके ऊपर ‘आज्ञा’ और ‘मर्यादा’ की सर्वोच्चता; (2) करुणा का शोधन—रुलाई से विवेक-समर्थित समर्पण तक; (3) दास्य-भक्ति का परिष्कार—भरत की विनय भाषा सेवा को ‘अधिकार’ नहीं, ‘कर्तव्य’ बनाती है; (4) राम का उत्तर ‘धर्म-तत्त्व’ की स्थापना—गुरु-वचन, लोकलाज, प्रजा-पालन, अवसर-धर्म एक ही धुरी पर: सत्य-प्रतिज्ञा; (5) देवमाया/इन्द्र प्रसंग का संकेत—साधक को चेतावनी कि स्वार्थ-छल त्याग का मुखौटा पहन सकता है; अतः सच्ची भक्ति ‘स्वारथ छल फल चारि बिहाई’ होकर आज्ञा-पालन में टिकती है।
Verse 612 (दोहा/सोरठा)
अत्रि कहेउ तब भरत सन सैल समीप सुकूप। राखिअ तीरथ तोय तहँ पावन अमिअ अनूप।।309।।
फिर अत्रि ने भरत से कहा, पहाड़ के पास एक अच्छा कुआँ है। इस तीर्थ का पानी यहीं रख लो। यह पानी साफ करता है, अमृत जैसा है, और इसके जैसा कुछ नहीं।
Verse 613 (चौपाई)
भरत अत्रि अनुसासन पाई। जल भाजन सब दिए चलाई।। सानुज आपु अत्रि मुनि साधू। सहित गए जहँ कूप अगाधू।। पावन पाथ पुन्यथल राखा। प्रमुदित प्रेम अत्रि अस भाषा।। तात अनादि सिद्ध थल एहू। लोपेउ काल बिदित नहिं केहू।। तब सेवकन्ह सरस थलु देखा। किन्ह सुजल हित कूप बिसेषा।। बिधि बस भयउ बिस्व उपकारू। सुगम अगम अति धरम बिचारू।। भरतकूप अब कहिहहिं लोगा। अति पावन तीरथ जल जोगा।। प्रेम सनेम निमज्जत प्रानी। होइहहिं बिमल करम मन बानी।।
भरत ने अत्रि की बात मानी। सबको पानी के बर्तन दिए और चल दिए। अपने भाइयों, अत्रि रिशि और साधु लोगों के साथ वो उस गहरे कुआँ के पास गए। वो पानी और जगह को वहाँ रखा। अत्रि खुशी और प्यार से भरा हुआ बोला। बेटा, यह बहुत पुराना जगह है। इसमें सिद्धि है। काल ने इस्से छुपा दिया था, किसी को पता नहीं था। फिर नौकरों ने एक सुंदर जगह देखी और वहाँ एक खास कुआँ बनाया जिसमे अच्छा पानी था। ब्रह्मा की मर्ज़ी से यह दुनिया के लिए उपकारी बन गया। पहुँचने में आसान है, धरम का सही हिसाब है। लोग इस्से भरत का कुआँ कहेंगे। यह बहुत साफ करता है, तीर्थ है, पानी पूजा के काम का है। जो भी प्यार से इसमें नहाएगा, वो अपने करम, मन और बानी से साफ हो जाएगा।
Verse 614 (दोहा/सोरठा)
कहत कूप महिमा सकल गए जहाँ रघुराउ। अत्रि सुनायउ रघुबरहि तीरथ पुन्य प्रभाउ।।310।।
उसने कुआँ की महत्व बताया। फिर सब वहीं गए जहाँ रघु के राजा थे। अत्रि ने रघु के राजा को बताया कि उस तीर्थ में कितनी शक्ति है।
Verse 615 (चौपाई)
कहत धरम इतिहास सप्रीती। भयउ भोरु निसि सो सुख बीती।। नित्य निबाहि भरत दोउ भाई। राम अत्रि गुर आयसु पाई।। सहित समाज साज सब सादें। चले राम बन अटन पयादें।। कोमल चरन चलत बिनु पनहीं। भइ मृदु भूमि सकुचि मन मनहीं।। कुस कंटक काँकरीं कुराईं। कटुक कठोर कुबस्तु दुराईं।। महि मंजुल मृदु मारग कीन्हे। बहत समीर त्रिबिध सुख लीन्हे।। सुमन बरषि सुर घन करि छाहीं। बिटप फूलि फलि तृन मृदुताहीं।। मृग बिलोकि खग बोलि सुबानी। सेवहिं सकल राम प्रिय जानी।।
धरम की कहानी प्यार से सुनाते सुनाते रात गुज़र गई और सुबह हो गई। भरत और राम, दोनों भाई, रोज़ आते थे। अत्रि रिशि ने उनकी सेवा की। फिर राम ने रिशि की बात मानी। अपने सारे लोगों और सामान के साथ राम जंगल के लिए पैदल निकल पड़े। उनके नरम पैर चल रहे थे बिना चप्पल के। ज़मीन शर्मा गई और नरम हो गई। घास, काँटे, कंकर, सब जो तेज़ और सख्त थे, वो सब नरम हो गए। ज़मीन ने एक सुंदर और नरम रास्ता बना दिया। हवा चल रही थी और तीन तरह के दुख दूर कर रही थी। देवा फूल बरसा रहे थे और बादल छा रहे थे। पेड़ फूल रहे थे, फल रहे थे, घास नरम हो रही थी। हिरन देख के और चिड़िया की आवाज़ सुन के, सब जानवर राम की सेवा कर रहे थे, क्योंकि वो जानते थे कि राम उनको प्यारा है।
Verse 616 (दोहा/सोरठा)
सुलभ सिद्धि सब प्राकृतहु राम कहत जमुहात। राम प्रान प्रिय भरत कहुँ यह न होइ बड़ि बात।।311।।
राम कहते हैं कि काम आसानी से हो जाता है, आम आदमी के लिए भी। लेकिन यह कोई बड़ी बात नहीं है। भरत के लिए तो राम उसकी जान से भी ज़्यादा प्यारे हैं।
Verse 617 (चौपाई)
एहि बिधि भरतु फिरत बन माहीं। नेमु प्रेमु लखि मुनि सकुचाहीं।। पुन्य जलाश्रय भूमि बिभागा। खग मृग तरु तृन गिरि बन बागा।। चारु बिचित्र पबित्र बिसेषी। बूझत भरतु दिब्य सब देखी।। सुनि मन मुदित कहत रिषिराऊ। हेतु नाम गुन पुन्य प्रभाऊ।। कतहुँ निमज्जन कतहुँ प्रनामा। कतहुँ बिलोकत मन अभिरामा।। कतहुँ बैठि मुनि आयसु पाई। सुमिरत सीय सहित दोउ भाई।। देखि सुभाउ सनेहु सुसेवा। देहिं असीस मुदित बनदेवा।। फिरहिं गएँ दिनु पहर अढ़ाई। प्रभु पद कमल बिलोकहिं आई।।
इस तरह भरत जंगल में चलते रहे। उनकी व्रत और प्यार देख के रिशि भी शर्मा गए। ज़मीन अच्छी थी, पानी के पास, अलग-अलग जगह। चिड़िया, हिरन, पेड़, घास, पहाड़, जंगल, बगीचे। सब कुछ सुंदर था, अलग तरह की, और भगवान के लिए खास। भरत देखते रहे और सोचते रहे। रिशि ने कहा कि यह सब सुन के दिल खुश हो गया। इसका कारण, नाम, गुण, और पुण्य की ताकत है। कहीं वो नहाए, कहीं झुके, कहीं दिल से देखते रहे। कहीं वो बैठ गए जब रिशि ने कहा, और सीता और दोनों भाइयों को याद किया। भरत का स्वभाव, प्यार, और सेवा देख के जंगल के भगवान भी खुश हो गए और उन्हें आशीर्वाद दिया। आगे बढ़ते रहे, दिन के दो और आधा पहर बीत गया। फिर आके राम के चरण देखे।
Verse 618 (दोहा/सोरठा)
देखे थल तीरथ सकल भरत पाँच दिन माझ। कहत सुनत हरि हर सुजसु गयउ दिवसु भइ साँझ।।312।।
भरत ने रास्ते में सब तीरथ देखे, पाँच दिन बीत गए। दिन भर हरि और शिव की कथा सुनते और सुनाते रहे, शाम हो गई।
Verse 619 (चौपाई)
भोर न्हाइ सबु जुरा समाजू। भरत भूमिसुर तेरहुति राजू।। भल दिन आजु जानि मन माहीं। रामु कृपाल कहत सकुचाहीं।। गुर नृप भरत सभा अवलोकी। सकुचि राम फिरि अवनि बिलोकी।। सील सराहि सभा सब सोची। कहुँ न राम सम स्वामि सँकोची।। भरत सुजान राम रुख देखी। उठि सप्रेम धरि धीर बिसेषी।। करि दंडवत कहत कर जोरी। राखीं नाथ सकल रुचि मोरी।। मोहि लगि सहेउ सबहिं संतापू। बहुत भाँति दुखु पावा आपू।। अब गोसाइँ मोहि देउ रजाई। सेवौं अवध अवधि भरि जाई।।
सुबह सब लोग नहाए, सब जुड़ गए। भरत ज़मीन के राजा थे, तेरह राज्य संभालते थे। दिल में जान के कि आज अच्छा दिन है, राम ने शरम से बात की। गुरु, राजा भरत, और सब लोग देख रहे थे। राम शरमा के ज़मीन देखने लगे। सब ने उनकी बात सुनी और सोचा कि राम जैसा विनय कोई और नहीं है। भरत ने राम की बात समझ ली। प्यार से उठ के, अपनी हिम्मत संभाल के, झुक गए। हाथ जोड़ के कहा कि नाथ, मेरी सारी इच्छा आपके पास रखो। मेरे लिए आपने सब का दुख सहा, खुद भी बहुत दुख पाया। अब गोसाईं मुझे जाने दीजिये, मैं अयोध्या की जब तक जान है, तब तक सेवा करूंगा।
Verse 620 (दोहा/सोरठा)
जेहिं उपाय पुनि पाय जनु देखै दीनदयाल। सो सिख देइअ अवधि लगि कोसलपाल कृपाल।।313।।
जिस तरह से मैं फिर से दर्शन पा सकूं, वो उपाय बताए। जो गरीबों पे दया करते हैं, कोसल के स्वामी, मुझे वो रास्ता दिखाए, जब तक जान रहे।
Verse 621 (चौपाई)
पुरजन परिजन प्रजा गोसाई। सब सुचि सरस सनेहँ सगाई।। राउर बदि भल भव दुख दाहू। प्रभु बिनु बादि परम पद लाहू।। स्वामि सुजानु जानि सब ही की। रुचि लालसा रहनि जन जी की।। प्रनतपालु पालिहि सब काहू। देउ दुहू दिसि ओर निबाहू।। अस मोहि सब बिधि भूरि भरोसो। किएँ बिचारु न सोचु खरो सो।। आरति मोर नाथ कर छोहू। दुहुँ मिलि कीन्ह ढीठु हठि मोहू।। यह बड़ दोषु दूरि करि स्वामी। तजि सकोच सिखइअ अनुगामी।। भरत बिनय सुनि सबहिं प्रसंसी। खीर नीर बिबरन गति हंसी।।
शहर के लोग, अपने लोग, प्रजा और सब लोग, सब एक दूसरे से साफ प्यार से जुड़ गए थे। आपका भला सबसे बड़ा भला है, आपके बिना रहना जैसे आग जल रही हो। प्रभु के बिना वो परम पद नहीं मिलता। मेरा स्वामी सब जानता है, मेरा दिल क्या चाहता है, उसकी इच्छा क्या है। जो लोग शरण में आते हैं, वो सबकी रक्षा करता है, दोनों तरफ से भला करता है। इसलिए मुझे पूरा भरोसा है, मैंने सोच लिया, अब कोई चिंता नहीं। मेरा दुख तो कुछ भी नहीं है, हम दोनों ने ज़िद करके यह किया। यह बड़ा दोष दूर करके, स्वामी, सब शर्म छोड़के मुझे सिखाओ। भरत की यह विनय सुनके सबने उसकी तारीफ की, जैसे हंस दूध और पानी अलग कर लेते हैं।
Verse 622 (दोहा/सोरठा)
दीनबंधु सुनि बंधु के बचन दीन छलहीन। देस काल अवसर सरिस बोले रामु प्रबीन।।314।।
गरीबों का दोस्त अपने भाई की बात सुन रहा था, भाई बिल्कुल सीधा था, कोई चाल नहीं। देश का टाइम और मौका देखके राम ने बोला, बहुत ही सही शब्दों में।
Verse 623 (चौपाई)
तात तुम्हारि मोरि परिजन की। चिंता गुरहि नृपहि घर बन की।। माथे पर गुर मुनि मिथिलेसू। हमहि तुम्हहि सपनेहुँ न कलेसू।। मोर तुम्हार परम पुरुषारथु। स्वारथु सुजसु धरमु परमारथु।। पितु आयसु पालिहिं दुहु भाई। लोक बेद भल भूप भलाई।। गुर पितु मातु स्वामि सिख पालें। चलेहुँ कुमग पग परहिं न खालें।। अस बिचारि सब सोच बिहाई। पालहु अवध अवधि भरि जाई।। देसु कोसु परिजन परिवारू। गुर पद रजहिं लाग छरुभारू।। तुम्ह मुनि मातु सचिव सिख मानी। पालेहु पुहुमि प्रजा रजधानी।।
पिता, आपके और मेरे परिजन की चिंता, गुरु, राजा, घर और बन, सब मेरे सिर पर है। गुरु, मुनि और मिथिला के राजा मेरे सिर पर हैं, हम दोनों को सपने में भी दुख न हो। मेरा और आपका बड़ा काम यह है, अपना भला, अच्छा नाम और धरम, यह सबसे बड़ा मक़सद है। दोनों भाई अपने पिता के हुकुम को मानेंगे, यह वेद और दुनिया के हिसाब से भला है, राजा के भी भला है। गुरु, पिता, माता और स्वामी की बात मानो, बेवक़ूफ़ की राह मत चलो, वरना गिर जाओगे। ऐसे सोचके सब चिंता छोड़ दो, अयोध्या को जब तक यहाँ रहो तब तक संभालो। देश, ख़ज़ाना, परिजन और परिवार, यह बड़ा बोझ है, गुरु के चरण की धूल में शरण लो। आप, मुनि, माता, सचिव और सब, इस राज्य को, प्रजा को और राजधानी को अच्छे से संभालो।
Verse 624 (दोहा/सोरठा)
मुखिआ मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक। पालइ पोषइ सकल अँग तुलसी सहित बिबेक।।315।।
मुखिया का मुँह चाहिए, खाना-पीने के लिए एक ही मुँह चाहिए। वो सारे अंगों को खिलाता-पिलाता है, तुलसीदास कहता है यह समझदारी से।
Verse 625 (चौपाई)
बिदा कीन्ह सनमानि निषादू। चलेउ हृदयँ बड़ बिरह बिषादू।। कोल किरात भिल्ल बनचारी। फेरे फिरे जोहारि जोहारी।। प्रभु सिय लखन बैठि बट छाहीं। प्रिय परिजन बियोग बिलखाहीं।। भरत सनेह सुभाउ सुबानी। प्रिया अनुज सन कहत बखानी।। प्रीति प्रतीति बचन मन करनी। श्रीमुख राम प्रेम बस बरनी।। तेहि अवसर खग मृग जल मीना। चित्रकूट चर अचर मलीना।। बिबुध बिलोकि दसा रघुबर की। बरषि सुमन कहि गति घर घर की।। प्रभु प्रनामु करि दीन्ह भरोसो। चले मुदित मन डर न खरो सो।।
निषाद को सम्मान दिया और विदाई ली, दिल में बड़ा दुख और विरह उठा। कोल, किरात, भील और बन के लोग, सब बार-बार हाथ जोड़के नमस्ते करके चले गए। प्रभु, सीता और लक्ष्मण बरगद के पेड़ की छाँव में बैठ गए, अपने प्यारों से जुदाई में रो रहे थे। भरत का स्वभाव प्यारा था, उसकी बोली भी प्यारी थी, अपने भाई और छोटे भाई की तारीफ में बात कर रहा था। प्यार, भरोसा, बातें, मन और करम, राम का प्यार जो प्रभु के मुँह से सुना था, उसको बता रहा था। उस वक़्त चित्रकूट के पक्षी, हिरण, पानी और मछली, सब चीज़ उदास हो गई। देव लोग रघु कुल के स्वामी की दशा देखके फूल बरसा रहे थे और हर घर में उसकी बात बता रहे थे। प्रभु को प्रणाम करके भरोसा दिया, खुशी से चले गए, कोई डर या शक नहीं थी।
Verse 626 (दोहा/सोरठा)
सानुज सीय समेत प्रभु राजत परन कुटीर। भगति ग्यानु बैराग्य जनु सोहत धरें सरीर।।321।।
प्रभु अपने भाई और सीता के साथ पत्तों की एक छोटी झुग्गी में रहते थे। वहाँ वो इतने चमक रहे थे मानो कोई राजा हो। उनके शरीर पर भक्ति, ज्ञान और वैराग्य चमक रहा था, जैसे यह तीन चीज़ें उनके ऊपर सजी हुई हों।
Verse 627 (चौपाई)
मुनि महिसुर गुर भरत भुआलू। राम बिरहँ सबु साजु बिहालू।। प्रभु गुन ग्राम गनत मन माहीं। सब चुपचाप चले मग जाहीं।। जमुना उतरि पार सबु भयऊ। सो बासरु बिनु भोजन गयऊ।। उतरि देवसरि दूसर बासू। रामसखाँ सब कीन्ह सुपासू।। सई उतरि गोमतीं नहाए। चौथें दिवस अवधपुर आए। जनकु रहे पुर बासर चारी। राज काज सब साज सँभारी।। सौंपि सचिव गुर भरतहि राजू। तेरहुति चले साजि सबु साजू।। नगर नारि नर गुर सिख मानी। बसे सुखेन राम रजधानी।।
मुनि, बड़े लोग, गुरु और भरत के घर वाले सब राम के लिए उदास थे। वो सब चुप-चाप चल रहे थे और मन में राम के गुण गा रहे थे। जमुना पार करके वो दूसरे किनारे पहुँच गए। उस दिन वो कुछ खाया भी नहीं। एक और नदी पार करके उन्होंने वहाँ रात गुज़ारी। राम के दोस्त सब ठीक-ठाक रहे। औरतों ने गोमती नदी में नहा लिया। चौथें दिन वो अयोध्या पहुँच गए। जनक चार दिन वहाँ रहा और राज काम संभाला। उसने भरत को सब ज़िम्मेदारी दे दी और तिरहुत चला गया। शहर के लोग सब ने उसकी बात मानी। राम की राजधानी में सब सुखी से रहने लगे।
Verse 628 (दोहा/सोरठा)
राम दरस लगि लोग सब करत नेम उपबास। तजि तजि भूषन भोग सुख जिअत अवधि कीं आस।।322।।
सब लोग राम को देखने के लिए व्रत और उपवास रख रहे थे। वो अपने गहने, सुख और खुशियों को छोड़के बस अयोध्या की आस में जी रहे थे।
Verse 629 (चौपाई)
सचिव सुसेवक भरत प्रबोधे। निज निज काज पाइ पाइ सिख ओधे।। पुनि सिख दीन्ह बोलि लघु भाई। सौंपी सकल मातु सेवकाई।। भूसुर बोलि भरत कर जोरे। करि प्रनाम बय बिनय निहोरे।। ऊँच नीच कारजु भल पोचू। आयसु देब न करब सँकोचू।। परिजन पुरजन प्रजा बोलाए। समाधानु करि सुबस बसाए।। सानुज गे गुर गेहँ बहोरी। करि दंडवत कहत कर जोरी।। आयसु होइ त रहौं सनेमा। बोले मुनि तन पुलकि सपेमा।। समुझव कहब करब तुम्ह जोई। धरम सारु जग होइहि सोई।।
मंत्री और नौकर भरत को समझा रहे थे और उसे उसका काम सिखा रहे थे। उसने अपने छोटे भाइयों को भी समझाया और माओं की सेवा का काम उनके हवाले कर दिया। ब्राह्मण लोग भरत के सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गए। उन्होंने नमस्कार किया और बड़े विनम्र से कहा कि बड़ा काम हो या छोटा, अच्छा हो या बुरा, हम आपको बताएंगे और कोई झिझक नहीं होगी। भरत ने अपने रिश्तेदार, शहर वाले और प्रजा को बुलाया। उन्हें समझाया और सब को खुश किया। भाइयों के साथ वो गुरु के घर गया। हाथ जोड़कर दंडवत किया और कहा कि अगर आप हुकुम दें तो मैं यहीं रहूँ। मुनि ने प्यार से कहा कि जो आप कहेंगे मैं समझाऊंगा, बोलूंगा और करूंगा। वो ही धरम का सार होगा।
Verse 630 (दोहा/सोरठा)
सुनि सिख पाइ असीस बड़ि गनक बोलि दिनु साधि। सिंघासन प्रभु पादुका बैठारे निरुपाधि।।323।।
भरत ने गुरु की बात सुनी और उनसे आशीर्वाद लिया। गणक ने एक अच्छा दिन निकाला और बोला। फिर प्रभु की पादुका को सिंहासन पर बिठा दिया, बिना किसी शर्त के।
Verse 631 (चौपाई)
राम मातु गुर पद सिरु नाई। प्रभु पद पीठ रजायसु पाई।। नंदिगावँ करि परन कुटीरा। कीन्ह निवासु धरम धुर धीरा।। जटाजूट सिर मुनिपट धारी। महि खनि कुस साँथरी सँवारी।। असन बसन बासन ब्रत नेमा। करत कठिन रिषिधरम सप्रेमा।। भूषन बसन भोग सुख भूरी। मन तन बचन तजे तिन तूरी।। अवध राजु सुर राजु सिहाई। दसरथ धनु सुनि धनदु लजाई।। तेहिं पुर बसत भरत बिनु रागा। चंचरीक जिमि चंपक बागा।। रमा बिलासु राम अनुरागी। तजत बमन जिमि जन बड़भागी।।
राम ने अपनी माँ और गुरु के पाँव में सर झुकाया। फिर उनसे फॉरेस्ट जाने की परमिशन ली। नंदिग्राम में उसने पत्तों का एक छोटा सा घर बनाया। भरत वहाँ रहने लगा, अपने धरम पर पक्का। उसके बाल जड़े हुए थे, रिशियों की तरह कपड़े पहने थे। ज़मीन पर कुश घास बिछा के उसने सोने का जगह बना ली। खाने पहने रहने सब में उसने रिशियों की तरह सख्त नियम फॉलो किए। गेहने, अच्छे कपड़े, सुख सब छोड़ दिया। दिल से, बात से, काम से सब छोड़ दिया। अयोध्या की शान इतनी थी जैसे देवता लोगों की शान। दशरथ की दौलत सुन के कुबेर भी शर्मा जाता। उस शहर में भरत रहता था, किसी चीज़ का मोह नहीं। जैसे चंपा के फूलों के बगीचे में मधुमक्खी रहता है। लक्ष्मी के सुख भी उसने छोड़ दिए, क्योंकि उसका दिल राम में था। जैसे कोई नसीब वाला इंसान किसी गंदी औरत के उपहार को ठुकरा देता है।
Verse 632 (दोहा/सोरठा)
राम पेम भाजन भरतु बड़े न एहिं करतूति। चातक हंस सराहिअत टेंक बिबेक बिभूति।।324।।
भरत में राम के लिए बहुत प्यार है। ऐसा करने वाला कोई बड़ा नहीं है। चातक पक्षी और हंस दोनों अच्छे माने जाते हैं। लेकिन असली समझदारी यही है, यह असली बात है।
परंपरानुसार इस प्रसंग का पाठ ‘सेवक-धर्म’ (आज्ञापालन), ‘प्रजा/परिवार में शान्ति’ और ‘मन के उचाट-द्विविधा’ के शमन का फल देता है; विशेषतः भरत-विनय का श्रवण/कीर्तन दास्य-भक्ति को निर्मल कर ‘अहं-त्याग’ की सिद्धि में सहायक माना जाता है।
सामान्य वैष्णव-परंपरा में दास्य-विनय प्रसंगों पर ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ (नाम-संपुट) या ‘राम रामेति रामेति’ (नाम-स्मरण) जोड़ा जाता है; कुछ रामानंदी पाठ-परंपराओं में ‘सीता-राम’ नाम-संपुट भी प्रचलित है।
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
A free sign-in with Google or Apple keeps your chat saved across web and the app.
Read Ramcharitmanas in the Vedapath app
Scan the QR code to open this directly in the app, with word-by-word meanings, Sanskrit recitation where available, and more.