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सिद्धाश्रम-यज्ञरक्षणम् · Protection of Viśvāmitra’s Sacrifice at Siddhāśrama
बालकाण्ड
In this sarga, Rama and Lakshmana, described as discerning of proper time and place (deśa-kāla-jña) and skilled in speech, request Viśvāmitra to specify when the nocturnal rakṣasas will appear so the yajña can be protected. The sages instruct them to guard the rite for six nights while Viśvāmitra undertakes dīkṣā and silence. On the sixth day, ritual intensity heightens: the altar blazes amid priests, implements, kuśa, ladles, and offerings. A terrifying sound arises from the sky; Mārīca and Subāhu arrive with followers, using māyā to cover the heavens and defile the altar by raining blood. Rama immediately engages, instructing Lakshmana and deploying the Mānavāstra—portrayed as dharma-aligned and non-lethal in intent—casting Mārīca a hundred yojanas into the surging sea, unconscious yet alive. Rama then vows to destroy the remaining merciless yajña-ghnas, hurls the celestial Agneyāstra to strike Subāhu down, and uses the Vāyavyāstra to eliminate the rest. With the sacrifice completed and the directions cleared of harm, Viśvāmitra praises Rama: the guru’s command is fulfilled and “Siddhāśrama” is proven true to its name, while the sages honor Rama like Indra after victory.
Verse 1
अथ तौ देशकालज्ञौ राजापुत्रावरिन्दमौ।देशे काले च वाक्यज्ञावब्रूतां कौशिकं वच:।।।।
दोनों राजकुमार बहुत समझदार थे। वो जानते थे कि कौनसी जगह पे क्या बोलना चाहिए। उस हिसाब से उन्होंने विश्वामित्र से बात की।
Verse 2
भगवन् श्रोतुमिच्छावो यस्मिन् काले निशाचरौ।संरक्षणीयौ तौ ब्रह्मन्नातिवर्तेत तत्क्षणम्।।।।
ब्राह्मण जी, हम सुन्ना चाहते हैं कि वो दोनों राक्षस कब आयेंगे। हमें उनसे बचने का टाइम पता होना चाहिए। ऐसा मत होना कि वो वक्त निकल जाये।
Verse 3
एवं ब्रुवाणौ काकुत्स्थौ त्वरमाणौ युयुत्सया।सर्वे ते मुनय: प्रीता: प्रशशंसुर्नृपात्मजौ।।।।
दोनों भाई बात कर रहे थे। जल्दी में थे, लड़ने को तैयार थे। सब रिशि खुश हो गए। उन दोनों राजकुमार की तारीफ की।
Verse 4
अद्यप्रभृति षड्रात्रं रक्षतं राघवौ युवाम्।दीक्षां गतो ह्येष मुनिर्मौनित्वं च गमिष्यति।।।।
आज से छह दिन तक तुम दोनों राघवों को यह जगह संभालना है। यह रिशि अब व्रत में लगे हैं और कुछ टाइम तक बोलना भी बंद कर देंगे।
Verse 5
तौ तु तद्वचनं श्रुत्वा राजपुत्रौ यशस्विनौ।अनिद्रौ षडहोरात्रं तपोवनमरक्षताम्।।।।
दोनों राजकुमारों ने यह बात सुन ली। छह दिन और रात तक वो नींद नहीं ले सकते थे। वो तपोवन की रक्षा करते रहे।
Verse 6
उपासाञ्चक्रतुर्वीरौ यत्तौ परमधन्विनौ।ररक्षतुर्मुनिवरं विश्वामित्रमरिन्दमौ।।।।
दोनों वीर धनुर्धर पूरा तैयार हो गए। उन्होंने विश्वामित्र रिशि की रक्षा की और उनकी सेवा में लगे रहे।
Verse 7
अथ काले गते तस्मिन् षष्ठेऽहनि समागते।सौमित्रिमब्रवीद्रामो यत्तो भव समाहित:।।।।
जब छठा दिन आ गया, राम ने लक्ष्मण से कहा कि तू रेडी रह। पूरा ध्यान रखना और सावधान रहना।
Verse 8
रामस्यैवं ब्रुवाणस्य त्वरितस्य युयुत्सया।प्रजज्वाल ततो वेदिस्सोपाध्यायपुरोहिता।।।।
राम के ऐसा बोलते ही, जैसे वो लड़ने को तैयार हो, अचानक यज्ञ की वेदी में आग भड़क उठी। पुरोहित और गुरु सब वहीं खड़े थे।
Verse 9
सदर्भचमसस्रुक्का ससमित्कुसुमोच्चया।विश्वामित्रेण सहिता वेदिर्जज्वाल सर्त्विजा।।।।
यज्ञ की वेदी चमक रही थी। उसमे कुश घास बिछी थी, प्याले और चमच थे, समिधा की पुड़िया और फूलों के ढेर थे। विश्वामित्र और पंडित सब साथ में खड़े थे।
Verse 10
मन्त्रवच्च यथान्यायं यज्ञोऽसौ सम्प्रवर्तते।आकाशे च महान् शब्द: प्रादुरासीद्भयानक:।।।।
यज्ञ सही तरीके से चल रहा था। मंत्र पढ़े जा रहे थे। अचानक आसमान में एक बहुत बड़ा डर्रोना आवाज़ आई।
Verse 11
आवार्य गगनं मेघो यथा प्रावृषि निर्गत:।तथामायां विकुर्वाणौ राक्षसावभ्यधावताम्।।।।
जैसे बारिश के मौसम में बादल आके पूरा आसमान ढक लेते हैं, वैसे ही दोनों राक्षस आए। उन्होंने अपनी माया से ऐसा दिखाया जैसे बादल छा गया हो।
Verse 12
मारीचश्च सुबाहुश्च तयोरनुचराश्च ये।आगम्य भीमसङ्काशा रुधिरौघमवासृजन्।।।।
मारिच और सुबाहु, और उनके साथ वाले सब राक्षस आए। वो सब बहुत डर लग रहे थे। उन्होंने वहां खून बरसा दिया, जैसे पानी बरस रहा हो।
Verse 13
सा तेन रुधिरौघेण वेदिर्जज्वाल मण्डिता।सहसाऽभिद्रुतो रामस्तानपश्य त्ततो दिवि।।।।
खून की बूंदें वेदी पर गिरी और वो ऐसे चमकने लगी जैसे अग्नि से सजी हो। राम तुरंत आगे बढ़ा और आसमान में उनको देखा।
Verse 14
तावापतन्तौ सहसा दृष्ट्वा राजीवलोचन:।लक्ष्मणं त्वभिसम्प्रेक्ष्य रामो वचनमब्रवीत्।।।।
दोनों अचानक आसमान से नीचे आते हुए देख के, राम ने लक्ष्मण की तरफ देखा। फिर उसने लक्ष्मण से कहा।
Verse 15
पश्य लक्ष्मण दुर्वृत्तान् राक्षसान् पिशिताशनान्।मानवास्त्रसमाधूताननिलेन यथा घनान्।।।।
राम ने कहा, "लक्ष्मण, देख, यह बुरी हरकत वाले राक्षस हैं, जो मास खाते हैं। मैं उनको अस्त्र से भगा दूंगा, जैसे हवा बादल को उड़ा देती है।"
Verse 16
मानवं परमोदारमस्त्रं परमभास्वरम्।चिक्षेप परमक्रुद्धो मारीचोरसि राघव:।।।।
राम बहुत गुस्सा हो गया। उसने एक ताकतवाला अस्त्र उठाया जो चमक रहा था। और उसे मारीच के सीने पर मारा।
Verse 17
स तेन परमास्त्रेण मानवेन समाहित:।संपूर्णं योजनशतं क्षिप्तस्सागरसम्प्लवे।।।।
वो अस्त्र मारीच के सीने पर लगा। वो इतनी ताकत से गिरा कि सौ योजन दूर समुंदर में जा गिरा।
Verse 18
विचेतनं विघूर्णन्तं शीतेषु बलताडितम्।निरस्तं दृश्य मारीचं रामो लक्ष्मणमब्रवीत्।।।।
मारीच बहुत दूर तक उड्ड गया है। वो होश में नहीं है, घूम रहा है, और तीर की मार से बिल्कुल दब गया है। राम ने लक्ष्मण को देख्खा के कहा।
Verse 19
पश्य लक्ष्मण शीतेषुं मानवं धर्मसंहितम्।मोहयित्वा नयत्येनं न च प्राणैर्व्ययुज्यत।।।।
लक्ष्मण, देख यह तीर क्या करता है। यह इंसान का काम करता है और धरम के हिसाब से चलता है। इसने मारीच को पागल कर दिया है और उसे ले जा रहा है, लेकिन जान नहीं ली।
Verse 20
इमानपि वधिष्यामि निर्घृणान् दुष्टचारिण:।राक्षसान् पापकर्मस्थान् यज्ञघ्नान् रुधिराशनान्।।।।
मैं इन बाकी राक्षसों को भी मार दूंगा। यह लोग बडे ज़ालिम हैं और गलत काम करते हैं। यह पाप में डूबे हैं, यज्ञ तोड़ते हैं, और खून पीते हैं।
Verse 21
सङ्गृह्यास्त्रं ततो रामो दिव्यमाग्नेयमद्भुतम्।सुबाहूरसि चिक्षेप सविद्ध: प्रापतद्भुवि।।।।
फिर राम ने आग वाला अस्त्र उठाया। वो बहुत खास था, आसमान से मिला हुआ। उसे सुबाहू की छाती में मारा। वो तीर लगा और सुबाहू ज़मीन पर गिर गया।
Verse 22
शेषान् वायव्यमादाय निजघान महायशा:।राघव: परमोदारो मुनीनां मुदमावहन्।।।।
फिर रघव ने वायव्य नाम का अस्त्र उठाया। वो बड़े दिल वाले थे। बाकी बचे हुए राक्षस को मार दिया। रिशियों को खुशी मिली।
Verse 23
स हत्वा राक्षसान् सर्वान् यज्ञघ्नान् रघुनन्दन:।ऋषिभि: पूजितस्तत्र यथेन्द्रो विजये पुरा।।।।
रघुनंदन ने सब राक्षस मार दिए। वो लोग यज्ञ खराब कर रहे थे। रिशि लोगों ने वहाँ उसकी तारीफ की। जैसे पुराने टाइम में इंद्र जीता था तो लोग करते थे।
Verse 24
अथ यज्ञे समाप्ते तु विश्वामित्रो महामुनि:।निरीतिका दिशो दृष्टवा काकुत्स्थमिदमब्रवीत्।।।।
जब यज्ञ पूरा हो गया, तब विश्वामित्र ने देखा। वो बड़े रिशि थे। चारों तरफ सब ठीक था, कोई तकलीफ नहीं थी। उन्होंने राघव से कहा।
Verse 25
कृतार्थोऽस्मि महाबाहो कृतं गुरुवचस्त्वया।सिद्धाश्रममिदं सत्यं कृतं राम महायश:।।।।
विश्वामित्र बोले, अब मेरा काम हो गया। तुमने अपने गुरु की बात मानी। यह सिद्धाश्रम सच में पूरा हुआ। राम, तुम्हारा नाम बड़ा हो।
The chapter frames a dharmic use-of-force problem: how to neutralize yajña-defilers without collapsing into indiscriminate violence. Rama’s Mānavāstra incapacitates and removes Mārīca while explicitly not taking his life, distinguishing restraint from weakness and aligning martial action with ritual protection.
Dharma is enacted through vigilance and proportionality: sacred social order (yajña) requires protection; speech and action must fit deśa-kāla; and power (astra) is legitimate when governed by righteousness and directed toward restoring harmony rather than personal rage.
Siddhāśrama is the focal sacred site, presented as a ritually charged āśrama-space where Vedic implements (kuśa, sruk, camasa), officiants (ṛtvij, purohita), and dīkṣā/mauna observances define cultural practice; the narrative also references the sky as the arena of attack and the far-off surging sea into which Mārīca is cast.
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