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मर्गनिर्माणम् (Roadworks and the Royal Route Prepared for Bharata)
अयोध्याकाण्ड
Sarga 80 presents a logistical and architectural interlude: authorized officials dispatch specialized guilds—surveyors, measurers, excavators, engineers, architects, carpenters, road-workers, woodcutters, well-diggers, plasterers/whitewashers, bamboo-workers, and supervisors—to prepare Bharata’s route and encampments in advance. The workforce clears vegetation and boulders, levels impassable ground, fills wells and chasms, bridges necessary crossings, crushes and splits obstructive stones to manage drainage, and rapidly constructs water-courses/reservoirs. In arid stretches they dig ornamented drinking wells with circular embankments. The road is then aestheticized as a royal processional way: mosaic paving, blossoming avenues, birdsong, banners, sandal-water sprinkling, and floral strewing—likened to a divine path and to a night sky adorned with moon and stars. Resting-places (nivēśa) are selected in fertile, pleasant tracts and established at astrologically auspicious constellations and muhūrtas; fortified camp-features appear—sand-heaps, moats, walls, mansions, and flag-topped peaks—making the encampments resemble Indra’s city. The sequence culminates as the party reaches the river Jāhnavī (Gaṅgā), described with cool clear waters, abundant fish, and wooded banks, anchoring the narrative in a concrete sacred geography.
Verses 1-3
अथ भूमिप्रदेशज्ञास्सूत्रकर्मविशारदाः ।स्वकर्माभिरताश्शूराः खनका यन्त्रकास्तथा ॥१॥कर्मान्तिकाः स्थपतयः पुरुष यन्त्रकोविदाः ।तथा वार्धकयश्चैव मार्गिणो वृक्षतक्षकाः ॥२॥कूपकारास्सुधाकारार्वंशकर्मकृतस्तथा ।समर्था ये च द्रष्टारः पुरतस्ते प्रतस्थिरे ॥३॥
उसके बाद आगे बढ़ने वाले लोग निकले। ज़मीन नापने वाले, नाप-तौल करने वाले थे। खोदने वाले और मशीन चलाने वाले थे। कारीगर, आर्किटेक्ट और मैकेनिक थे। लकड़हारे, रास्ते बनाने वाले और पेड़ काटने वाले थे। कुआँ खोदने वाले, चूना लगाने वाले और बाँस से काम करने वाले थे। सब अपना काम जानते थे और आगे निकल पड़े।
Verse 4
स तु हर्षात्तमुद्देशं जनौघो विपुलः प्रयान् ।अशोभत महावेगस्समुद्र इव पर्वणि ॥४॥
इतने लोग एक साथ चले जा रहे थे, खुशी से। जैसे समुंदर में टाइड आती है फुल मून के दिन, वैसे ही वो लोग बड़ी तेज़ी से चले जा रहे थे। देखने में बड़ा अच्छा लग रहा था।
Verse 5
ते स्ववारं समास्थाय वर्त्मकर्मणि कोविदाः ।करणैर्विविधोपेतैः पुरस्तात्सम्प्रतस्थिरे ॥५॥
जिन्हें रास्ता बनाने का काम आता था, वो सब आगे चले गए। अपनी-अपनी टीम में बात कर के, अपने सामान ले कर। उनके पास अलग-अलग टूल्स थे काम के लिए।
Verse 6
लतावल्ली श्च गुल्मांश्च स्थाणूनश्मन एव च ।जनायांचक्रिरे मार्गं छिन्दन्तो विविधान्द्रुमान् ॥६॥
रास्ते से पेड़ काट दिए, लट्टे-पत्ते साफ किए। बड़े पत्थर और लकड़ियाँ हटा दी। अब रास्ता साफ हो गया है, लोग आराम से जा सकते हैं।
Verse 7
अवृक्षेषु च देशेषु केचिद्वृक्षानरोपयन् ।केचित्कुठारैष्टङ्कैश्च दात्रैश्चिन्दन्क्वचित्क्वचित् ॥७॥
जहां-जहां पेड़ नहीं थे, वहां लोग नए पेड़ लगाने लगे। और कुछ लोग वहीं थे जहां रास्ता बंद हो रहा था। उन्होंने कुल्हाड़ी, हथौड़ा और दर्न्ती से वो पेड़ काट दिए।
Verse 8
अपरे वीरणस्तम्भान्बलिनो बलवत्तराः ।विधमन्ति स्म दुर्गाणि स्थलानि च ततस्ततः ॥८॥
और भी टगड़े आदमी थे जो बहुत ताकतवर थे। उन्होंने वीरना घास के वो पक्के टुकड़े उखाड़ दिए। और जहां-जहां ज़मीन अनइवन थी, उसे सीधा कर दिया।
Verse 9
अपरेऽपूरयन्कूपान्पांसुभि श्श्वभ्रमायतम् ।निम्नभागान्स्ततः केचित्समान्श्चक्रु स्समन्ततः ॥९॥
कुछ लोग ने कुएं और बड़े गड्ढों को मिट्टी से भर दिया। फिर दूसरे लोग आए और निचली ज़मीन को पूरा लेवल कर दिया। चारों तरफ से साफ और सीधा कर दिया।
Verse 10
बबन्धुर्बन्धनीयांश्च क्षोद्यान्सञ्चुक्षुदुस्तदा ।बिभिदुर्भेदनीयांश्च तांस्तान्देशान्नरा स्तदा ॥१०॥
लोगों ने पुल बनाए जहाँ ज़रूरत थी। पत्थर तोड़ दिए जहाँ रास्ता साफ करना था। जहाँ चीज़ें तोड़नी थी, तोड़ दी। ऐसे ही रास्ता साफ करते चले गए।
Verse 11
अचिरेणैव कालेन परिवाहान्बहूदकान् ।चक्रुर्बहुविधाकारान् सागरप्रतिमान्बहून् ॥११॥
थोड़े ही टाइम में उन्होंने बहुत पानी बना दिया। नाले और तालाब बनाए। पानी इतना था जैसे सागर हो। हर तरह के डिज़ाइन थे।
Verse 12
निर्जलेषु च देशेषु खानयामासुरुत्तमान् ।उदपानान्बहुविधान्वेदिकापरिमण्डितान् ॥१२॥
जहाँ पानी नहीं था, वहाँ उन्होंने अच्छे कुआँ खुदवाए। हर तरह के कुआँ थे। चारों तरफ प्लेटफ़ॉर्म बनाई और बाउंड्री दी।
Verses 13-14
ससुधाकुट्टिमतलः प्रपुष्पितमहीरुहः ।मत्तोद्घुष्ट द्विजगणः पताकाभिरलङ्कृतः ॥१३॥चन्दनोदकसंसिक्तो नानाकुसुमभूषितः ।बह्वशोभत सेनायाः पन्था स्सुरपथोपमः ॥१४॥
सेना की सड़क बहुत चमक रही थी। रास्ता पूरा पक्का और स्मूथ था। पेड़ फूलों से भरे थे। पक्षियों की आवाज़ गूँज रही थी। पट्टे और झंडे सजी हुई थी। चंदन वाला पानी बिखरा हुआ था। फूल भी उसे सजा रहे थे। यह रास्ता देवों की सड़क जैसा दिखता था।
Verses 15-16
आज्ञाप्याथ यथाऽज्ञप्ति युक्तास्तेऽधिकृता नराः ।रमणीयेषु देशेषु बहुस्वादुफलेषु च ॥१५॥यो निवेशस्त्वभिप्रेतो भरतस्य महात्मनः ।भूयस्तं शोभयामासुर्भूषाभिर्भूषणोपमम् ॥१६॥
भरत के लोगों ने हुक्म के हिसाब से काम किया। उन्होंने अच्छी जगह चुनी थी। वहाँ मीठी फल भी थे। भरत के लिए रुकने की जगह बना रहे थे। उसे इतना सजाया कि वो खुद एक गहना जैसी दिखती थी।
Verse 17
नक्षत्रेषु प्रशस्तेषु मुहूर्तेषु च तद्विदः ।निवेशान् स्थापयामासुर्भरतस्य महात्मनः ॥१७॥
पंडित लोगों ने अच्छे नक्षत्र देखे। मुहूरत भी सही लिया। भरत के लिए रुकने की जगह का टाइम फिक्स किया। ताकि सफलता मिले और सब सही रहे।
Verses 18-20
बहुपांसुचयाश्चापि परिखापरिवारिताः ।तत्रेन्द्रकीलप्रतिमाः प्रतोलीवरशोभिताः ॥१८॥प्रासादमालावितता स्सौधप्राकारसंवृताः ।पताकाशोभिता स्सर्वे सुनिर्मितमहापथाः ॥१९॥विसर्पद्भिरिवाऽकाशे विटङ्काग्रविमानकैः ।समुच्छ्रितैर्निवेशास्ते बभुश्शक्रपुरोपमाः ॥२०॥
उस जगह कुआँ खोदे थे, और उनके आस-पास मिट्टी का ढेर लगा दिया। बड़े-बड़े बिल्डिंग बनाए, जो पहाड़ जैसी ऊँची थी। उनके आस-पास दीवार भी थी। हर जगह झंडा लगा हुआ था। रास्ते भी अच्छे से बनाए थे। बिल्डिंग इतनी ऊँची थी कि आसमान को छू रही थी। देखने में इंद्र की सिटी जैसी लग रही थी।
Verse 21
जाह्नवीं तु समासाद्य विविधद्रुमकाननाम् ।शीतलामलपानीयां महामीनसमाकुलाम् ॥२१॥
वो लोग गंगा के पास पहुँच गए। नदी के किनारे अलग-अलग पेड़ों के जंगल थे। पानी ठंडा और साफ था। बड़े-बड़े मछलियाँ उसमें भरी हुई थी।
Verse 22
सचन्द्रतारागणमण्डितं यथा नभः क्षपायाममलं विराजते ।नरेन्द्रमार्गस्स तथा व्यराजत क्रमेण रम्यः शुभशिल्पिनिर्मितः ॥२२॥
जैसे रात को आसमान में चाँद और तारे चमकते हैं, वैसे ही राजा का रास्ता चमक रहा था। वो रास्ता बहुत अच्छा था। काम करने वाले लोगों ने उसे प्यारा बनाया था।
The chapter emphasizes a collective civic action rather than a debate: the state mobilizes skilled labor to ensure safe passage and dignified reception for Bharata, presenting governance as dharma expressed through public works, safety, and ordered planning.
Dharma is operational: legitimacy and virtue are supported by disciplined institutions—measurement, supervision, timely execution, and care for water and roads—showing that ethical kingship includes infrastructure, aesthetics, and ritual auspiciousness.
Key landmarks include the royal road (नरेन्द्रमार्ग) engineered and beautified for procession, the fortified encampments likened to Śakra’s city, and the river Jāhnavī (Gaṅgā), described as cool, clear, fish-rich, and bordered by diverse tree-groves.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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