Opening the text

Rishi: Atharvanic/Aṅgiras-type attribution (hymn-level tradition; verse-specific r̥ṣi not isolated here).
Devata: Protective guardians (spáśaḥ), noose-bearers; broadly the apotropaic divine retinue.
Chandas: Triṣṭubh (11-syllable cadence typical of this style)
Mantra 1
ब्रह्मविद्या। ब्रह्म॑ जज्ञा॒नं प्र॑थ॒मं पु॒रस्ता॒द् वि सी॑म॒तः सु॒रुचो॑ वे॒न आ॑वः । स बु॒ध्न्याऽ उप॒मा अ॑स्य वि॒ष्ठाः स॒तश्च॒ योनि॒मस॑तश्च॒ वि वः॑
ब्रह्म का ग्यान, यह सबसे पहले था। वेन, जिसमें चमक थी, उसने सीमा से इसको बाहर लाया। इसकी नीव बहुत गेहरी है, इसकी जगह भी है। इसने जो है उसकी जोनि बनायी, और जो नहीं है उसकी भी।
Mantra 2
अना॑प्ता॒ ये वः॑ प्रथ॒मा यानि॒ कर्मा॑णि चक्रि॒रे। वी॒रान् नो॒ अत्र मा द॑भ॒न् तद् व॑ ए॒तत् पु॒रो द॑धे
जो लोग पहले काम करते थे लेकिन सक्सेस नहीं मिली, वो लोग हमारे वीरों को धोका नहीं देंगे। मैं यह बात आगे रख रहा हूँ ताकि तुम सेफ रहो। यह लोग पुराने काम करने वाले थे, लेकिन उनका काम पूरा नहीं हुआ। इसलिए वो हमारे लोगों को गलत रास्ते पे ले जा सकते हैं। मैं यह चीज़ तुम्हारे सामने रख दी है जैसे एक प्रोटेक्शन।
Mantra 3
स॒हस्र॑धार ए॒व ते सम॑स्वरन् दि॒वो नाके॒ मधु॑जिह्वा अस॒श्चतः॑ । तस्य॒ स्पशो॒ न नि मि॑षन्ति॒ भूर्ण॑यः प॒देप॑दे पा॒शिनः॑ सन्ति॒ सेत॑वे
आसमान में एक चीज़ है जिससे हज़ारों धारें निकलती हैं। वो मीठी ज़ुबान वाली है और कभी खत्म नहीं होती। उसके रक्षक आँख नहीं मारती, वो हर कदम पर पहरे में खड़े हैं।
Mantra 4
पर्यू॒ षु प्र ध॑न्वा॒ वाज॑सातये॒ परि॑ वृ॒त्राणि॑ स॒क्षणिः॑ । द्वि॒षस्तदध्य॑र्ण॒वेने॑यसे सनिस्र॒सो नामा॑सि त्रयोद॒शो मास॒ इन्द्र॑स्य गृ॒हः
इंद्र के लिए यह कहते हैं, आस-पास से आगे बढ़ो, जीत के लिए। रास्ते में जो रुकावटें हैं उनको पार करो। दुश्मनों के ऊपर तुम बड़ी ताकत से चलो। तेरा नाम सनिस्रस है, तुम तेरहवीं महीना हो, और इंद्र के घर का हिस्सा हो।
Mantra 5
न्वे॒३तेना॑रात्सीरसौ॑ स्वाहा॑ । ति॒ग्मायु॑धौ ति॒ग्महे॑ती सु॒शेवौ॒ सोमा॑रुद्रावि॒ह सु मृ॑डतं नः
अब इस मंत्र के साथ अरत्सिरसौ को पुकारो, स्वाहा! सोम और रुद्र, तुम दोनों के हाथ में तेज़ हथियार है, तीर भी तेज़ है, पर तुम बड़े दयालु हो। हमें आशीर्वाद दो और हमें आराम दिलाओ।
Mantra 6
अवै॒तेना॑रात्सीरसौ॒ स्वाहा॑ । ति॒ग्मायु॑धौ ति॒ग्महे॑ती सु॒शेवौ॒ सोमा॑रुद्रावि॒ह सु मृ॑डतं नः
अब नीचे की तरफ इस मंत्र के साथ अरत्सिरसौ को पुकारो, स्वाहा! सोम और रुद्र, तुम दोनों के हाथ में तेज़ हथियार है, तीर भी तेज़ है, पर तुम बड़े दयालु हो। हमें आशीर्वाद दो और हमें आराम दिलाओ।
Mantra 7
अपै॒तेना॑रात्सीरसौ॒ स्वाहा॑ । ति॒ग्मायु॑धौ ति॒ग्महे॑ती सु॒शेवौ॒ सोमा॑रुद्रावि॒ह सु मृ॑डतं नः
भगवान से दुआ है कि बुराई दूर हो जाए। सोम और रुद्र, तुम दोनों के पास तेज हथियार है, पर तुम बड़े दयालु हो। हमें आशीर्वाद दो और हम पे मेहरबानी रखो।
Mantra 8
मु॒मु॒क्तम॒स्मान् दु॑रि॒ताद॑व॒द्याज्जु॒षेथां य॒ज्ञम॒मृत॑म॒स्मासु॑ धत्तम्
हमें बुरी किस्मत से आज़ाद करो, जो गलती हो वो माफ करो। यह यज्ञ क़ुबूल करो, जो कभी खत्म नहीं होता। हमें अंदर तक शक्ति दो।
Mantra 9
चक्षु॑षो हेते॒ मन॑सो हेते॒ ब्रह्म॑णो हेते॒ तप॑सश्च हेते । मे॒न्या मे॒निर॑स्यमे॒नय॒स्ते स॑न्तु॒ ये॒३स्माँ अ॑भ्यघा॒यन्ति॑
आँख का हथियार, मन का हथियार, मंत्र का हथियार, तपस्या का हथियार। तू गुस्सा है, तू प्रतिशोध है। जो लोग हमारे खिलाफ बुरा सोचते हैं, उनका गुस्सा खत्म कर दो।
Mantra 10
यो॒३ऽस्मांश्चक्षु॑षा॒ मन॑सा॒ चित्त्याकू॑त्या च॒ यो अ॑घा॒युर॑भि॒दासा॑त्। त्वं तान॑ग्ने मे॒न्यामे॒नीन् कृ॑णु॒ स्वाहा॑
जो आँख से, मन से, सोच से हमारे पीछे पड़ता है, बुरी नीयत से हमारे पीछे पड़ता है। अग्नि, तुम उन गुस्से वाले लोगों का गुस्सा खत्म कर दो। स्वाहा।
Mantra 11
इन्द्र॑स्य गृ॒होऽसि । तं त्वा॒ प्र प॑द्ये॒ तं त्वा॒ प्र वि॑शामि॒ सर्व॑गुः॒ सर्व॑पूरु॒षः सर्वा॑त्मा॒ सर्व॑तनूः स॒ह यन्मेऽस्ति॒ तेन॑
तू इंद्र का घर है। मैं तुझ पास आता हूँ, मैं तुझमें घुस जाता हूँ। सब पास है, सब लोग पास हैं, पूरा खुद है, पूरा बदन है। जो भी मेरा है वो साथ ले के आया हूँ।
Mantra 12
इन्द्र॑स्य॒ शर्मा॑सि ।तं त्वा॒ प्र प॑द्ये॒ तं त्वा॒ प्र वि॑शामि॒ सर्व॑गुः॒ सर्व॑पूरु॒षः सर्वा॑त्मा॒ सर्व॑तनूः स॒ह यन्मेऽस्ति॒ तेन॑
यह मंत्र इंद्र की शरण में जाने के लिए है। मैं तुम्हारे पास आ रहा हूँ, तुम में समा रहा हूँ। तुम पास सब गायों के हो, सब लोगों के हो, पूरे हो, शरीर से भी पूरे हो। जो भी मेरा है, वो सब लेकर आ रहा हूँ।
Mantra 13
इन्द्र॑स्य॒ वर्मा॑सि ।तं त्वा॒ प्र प॑द्ये॒ तं त्वा॒ प्रवि॑शामि॒ सर्व॑गुः॒ सर्व॑पूरु॒षः सर्वा॑त्मा॒ सर्व॑तनूः स॒ह यन्मेऽस्ति॒ तेन॑
तू इंद्र की कवच है। मैं तुझ में आके दाखिल हो जाता हूँ। तू पास है, गाय-भैंस में, आदमियों में, जान में, शरीर में। जो भी मेरा है, सब लेकर मैं तुझ में समा जाता हूँ।
Mantra 14
इन्द्र॑स्य॒ वरू॑थमसि । तं त्वा॒ प्र प॑द्ये॒ तं त्वा॒ प्रवि॑शामि॒ सर्व॑गुः॒ सर्व॑पूरु॒षः सर्वा॑त्मा॒ सर्व॑तनूः स॒ह यन्मेऽस्ति॒ तेन॑
तू इंद्र की सुरक्षा है, उसकी छाया है। मैं तुझ में आके दाखिल हो जाता हूँ। तू पास है, गाय-भैंस में, आदमियों में, जान में, शरीर में। जो भी मेरा है, सब लेकर मैं तुझ में समा जाता हूँ।
It creates a protective perimeter by invoking unblinking divine watchers and noose-bearers who stop hostile forces at thresholds and along paths, and it seals protection by entering Indra’s shelter (varūtha).
No specific substance is required by the hymn itself. Practitioners may optionally use water-sprinkling or a boundary cord as a support, but the core efficacy is in the posted-guard and refuge formulas.
In Atharvanic protection, harm is not only external (intruders, sorcery) but also internalized as mischance and ritual-moral fault. The hymn asks that these be loosened, while ‘amṛta’—enduring protective vitality—be established in the client.
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