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Rishi: Atharvanic tradition (often treated as Atharvan/Angiras-type for such charms; specific r̥ṣi not supplied in the input)
Devata: Darbha (personified as a power/implement); indirectly the cosmic order it spans (heavens/earths)
Chandas: Anuṣṭubh (probable; many AV 19.x charms are in anuṣṭubh-like cadence)
Mantra 1
दर्भः। श॒तका॑ण्डो दुश्च्यव॒नः स॒हस्र॑पर्ण उत्ति॒रः । द॒र्भो य उ॒ग्र ओष॑धि॒स्तं ते॑ बध्ना॒म्यायु॑षे
यह दर्भ घास है। इसकी सौ डालें हैं, हिलाना मुश्किल है, हज़ार पत्तियाँ हैं, और यह सबसे ऊपर है। यह एक ताकतवर जड़ी-बूटी है। मैं इसको तुम्हारे लिए ज़िन्दगी के लिए बाँध रहा हूँ।
Mantra 2
नास्य॒ केशा॒न् प्र वप॑न्ति॒ नोर॑सि॒ ताड॒मा घ्न॑ते । यस्मा॑ अछिन्नप॒र्णेन॑ द॒र्भेण॒ शर्म॑ यच्छति
जिस आदमी के लिए यह काट-दर्भ से रक्षा होती है, उसके बाल नहीं काटे जाते। उसकी छाती पर कोई मार नहीं पड़ती। वो सेफ रहता है।
Mantra 3
दि॒वि ते॒ तूल॑मोषधे पृथि॒व्याम॑सि॒ निष्ठि॑तः । त्वया॑ स॒हस्र॑काण्डे॒नायुः॒ प्र व॑र्धयामहे
यह जड़ी-बूटी आसमान में अपना फैलाव रखती है, और धरती पर मज़बूती से जमती है। इसके हज़ारों डालों के साथ हम अपनी उमर बढ़ा लेते हैं।
Mantra 4
ति॒स्रो दि॒वो अत्य॑तृणत् ति॒स्र इ॒माः पृ॑थि॒वीरु॒त॑। त्व॑याहं दु॒र्हार्दो॑ जि॒ह्वां नि तृ॑णद्मि॒ वचां॑सि
यह ताकत तीन आसमान को जीत चुकी है और तीन धरती को भी। मैं तुम्हे लेकर बुरी नीयत वाले की जीभ दबाता हूँ। मैं उसकी बातें नीचे कर देता हूँ।
Mantra 5
त्वम॑सि॒ सह॑मानो॒ऽहम॑स्मि॒ सह॑स्वान्। उ॒भौ सह॑स्वन्तौ भू॒त्वा स॒पत्ना॑न्सहिषीवहि
तुम जीतने वाले हो और मैं भी ताकत वाला हूँ। दोनों मिलकर ताकत रख के अपने दुश्मनों को जीत लेते हैं। हम दोनों मिलके उनको पीछे कर देते हैं।
Mantra 6
सह॑स्व नो अ॒भिमा॑तिं॒ सह॑स्व पृतनाय॒तः । सह॑स्व॒ सर्वा॑न् दु॒र्हार्दः॑ सु॒हार्दो॑ मे ब॒हून् कृ॑धि
हमारे दुश्मनों की ताकत को तोड़ दो। लढ़ने वाले दुश्मन को भी जीत दो। बुरी नीयत वाले सबको खत्म करो। मेरे लिए अच्छे लोगों की टोली बना दो।
Mantra 7
द॒र्भेण॑ दे॒वजा॑तेन दि॒वि ष्ट॒म्भेन॒ शश्व॒दित्। तेना॒हं शश्व॑तो॒ जनाँ॒ अस॑नं॒ सन॑वानि च
दर्भा घास देवता की तरह पैदा हुई है। यह आसमान में हमेशा के लिए खड़ी रहती है। मैं इस्से हमेशा के लिए लोगों को जीत लेता हूँ। मुझे अपनी जगह भी बना लेते हैं।
Mantra 8
प्रि॒यं मा॑ दर्भ कृणु ब्रह्मराज॒न्याऽभ्यां शू॒द्राय॒ चार्या॑य च । यस्मै॑ च का॒मया॑महे॒ सर्व॑स्मै च वि॒पश्य॑ते
हे दर्भ, मुझे सबसे प्यारा बना दे। ब्राह्मण हो या राजा-वर्ग के लोग, शूद्र हो या आर्य, सबको मैं पसंद आऊँ। जिसको भी हम जीतना चाहें, वो मुझपे दिल दे दे। जो भी मुझे देख रहा हो, उसकी नज़र में मैं अच्छा लगूँ।
Mantra 9
यो जाय॑मानः पृथि॒वीमदृं॑ह॒द् यो अस्त॑भ्नाद॒न्तरि॑क्षं॒ दिवं॑ च । यं बिभ्र॑तं न॒नु पा॒प्मा वि॑वेद॒ स नो॒ऽयं द॒र्भो वरु॑णो दि॒वा कः॑
जब यह पैदा हुआ, उसने धरती को पक्का किया। आसमान को भी सहारा दिया। कोई बुराई उसको नहीं पकड़ सकती। यह दर्भ घास हमारे लिए वरुण जैसी शक्ति लाती है।
Mantra 10
स॒प॒त्न॒हा श॒तका॑ण्डः॒ सह॑स्वा॒नोष॑धीनां प्रथ॒मः सं ब॑भूव । स नो॒ऽयं द॒र्भः परि॑ पातु वि॒श्वत॒स्तेन॑ साक्षीय॒ पृत॑नाः पृतन्य॒तः
यह घास दुश्मन को हराती है। इसकी बहुत डालें हैं, बहुत ताकतवली है। सारी जड़ी-बूटी में यह सबसे ऊपर है। यह हमें हर तरफ से बचाए। इससे मैं जंग में जीतूँगा।
It empowers darbha (kuśa grass) as a bound-on protective force: it guards the user, supports longevity, and subjugates rivals—especially by restraining hostile speech such as curses, slander, or accusation.
In Atharvanic practice certain plants are personified as oṣadhis with agency. Darbha is praised as cosmically expansive and ‘first among herbs,’ so it can function as both protection and an instrument to bind or silence harm.
A clean tuft of darbha is braided or held while the verses are recited, then tied on as an amulet or placed around the person/space for encircling protection; for speech-binding intent, the recitation emphasizes pressing down the opponent’s tongue and words (not physical harm).
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