Opening the text

Book 11.1 treats the saṅgha as a high-value strategic asset or threat: its collective discipline makes it “adhṛṣya” (difficult to assail) and thus superior to ordinary gains from force (daṇḍa) or bilateral friendship (mitra). Kautilya’s pragmatic objective is to convert saṅgha-cohesion into Vijigīṣu-advantage by a two-track policy: (1) co-opt compatible saṅghas through conciliation and inducements; (2) when incompatible, fracture them through calibrated bheda, then finish with daṇḍa. The chapter operationalizes this with covert social engineering: spies identify latent rivalries, seed accusations, provoke quarrels in leisure spaces (schools, guild-arts, gambling, taverns), weaponize status hierarchies (marriage/commensality), and orchestrate nocturnal incidents around disputed property, cattle, or persons. Once a “hīna-pakṣa” (weaker faction) is produced, the king subsidizes it with treasury and force, using it to eliminate the opposing faction. This placement in the Vijigīṣu’s power-structure is classic mandala logic: dissolve federated resistance before it can stabilize as a rival limb (mitra/daṇḍa) for an enemy king.
Sutra 11
संघा हि संहतत्वादधृष्याः परेषाम् ॥ कZ_११.१.०२ ॥
जब लोग एक साथ मिलकर काम करते हैं, तो बाहर वाले उन्हें आसान से हरा नहीं सकते। एक जुट हो के चलना ही उनकी ताकत है।
Sutra 12
ताननुगुणान्भुञ्जीत सामदानाभ्याम् विगुणान्भेददण्डाभ्याम् ॥ कZ_११.१.०३ ॥
जो लोग तुम्हारे साथ हैं, उन्हे प्यार से समझाओ और इनाम दो। जो लोग तुम्हारे खिलाफ हैं, उन्हे अलग-अलग करो या ज़ोर से रोक लो।
Sutra 13
काम्बोजसुराष्ट्रक्षत्रियश्रेण्यादयो वार्त्तशस्त्रोपजीविनः ॥ कZ_११.१.०४ ॥
काम्बोज, सौराष्ट्र और क्षत्रिय लोग अपना काम चलाते हैं। यह लोग दुकान, खेती बाड़ी और शस्त्र दोनों से जीते हैं।
Sutra 14
लिच्छिविकवृजिकमल्लकमद्रककुकुरकुरुपाञ्चालादयो राजशब्दोपजीविनः ॥ कZ_११.१.०५ ॥
लिच्छिवि, कव्रिजिक, मल्लक, मद्रक, कुकुर, कुरु, पांचाल जैसे लोग हैं। यह सब अपने आप को राजा बोल के जीते हैं, सब मिलकर राज्य चलाते हैं।
Sutra 15
सर्वेषामासन्नाः सत्त्रिणः संघानां परस्परन्यङ्गद्वेषवैरकलहस्थानान्युपलभ्य क्रमाभिनीतं भेदमुपचारयेयुः असौ त्वा विजल्पति इति ॥ कZ_११.१.०६ ॥
हर तरफ अपने लोग बिठाओ जो देखें क्या हो रहा है। जब किसी ग्रुप में लड़ाई हो, दुश्मनी हो, तो धीरे-धीरे उनमें फूट डालो। किसी को बोल देना, देख वो तेरे खिलाफ बात कर रहा है।
Sutra 16
एवमुभयतोबद्धरोषाणां विद्याशिल्पद्यूतवैहारिकेष्वाचार्यव्यञ्जना बालकलहानुत्पादयेयुः ॥ कZ_११.१.०७ ॥
जब दोनों तरफ गुस्सा हो, तो टीचर बन के जाओ। पढ़ाई, काम, सट्टा और खेल के जगह पर लड़कों में लड़ाई करवा दो।
Sutra 17
वेशशौण्डिकेषु वा प्रतिलोमप्रशंसाभिः संघमुख्यमनुष्याणां तीक्ष्णाः कलहानुत्पादयेयुः कृत्यपक्षोपग्रहेण वा ॥ कZ_११.१.०८ ॥
या तो रंडीखाना और शराब घर के लोगों के बीच काम करो। वहाँ संघ के बड़े लोगों में झगड़ा करवाओ। किसी की तारीफ ऐसे करो कि दूसरा बुरा मान जाये। या फिर किसी ग्रुप को पकड़ के उसकी तरफ से लड़ाई करवाओ।
Sutra 18
कुमारकान्विशिष्टच्छिन्दिकया हीनच्छिन्दिकानुत्साहयेयुः ॥ कZ_११.१.०९ ॥
जवान लड़कों के एक ग्रुप को बड़ा बोल के चलाओ। फिर जो लोग छोटे समझे जाते हैं, उन्हें हिम्मत दो। उन्हें बोलो कि तुम भी बड़े बन सकते हो, डरो मत।
Sutra 19
विशिष्टानां चैकपात्रं विवाहं वा हीनेभ्यो वारयेयुः ॥ कZ_११.१.१० ॥
बड़े लोगों को रोको। उन्हें छोटे लोगों के साथ खाना नहीं खिलाना। ना ही उनकी शादी करवानी। बड़े लोग अलग रहेंगे, छोटे लोग अलग।
Sutra 20
हीनान्वा विशिष्टैरेकपात्रे विवाहे वा योजयेयुः ॥ कZ_११.१.११ ॥
या फिर उल्टा करो। छोटे लोगों को बड़े लोगों के साथ मिला दो। एक ही प्लेट में खाना खिलाओ। शादियाँ करवाओ। इससे ग्रुप का हिसाब बदल जायेगा।
Sutra 42
आढ्यविधवा गूढाजीवा योगस्त्रियो वा दायनिक्षेपार्थं विवदमानाः संघमुख्यानुन्मादयेयुः अदितिकौशिकस्त्रियो नर्तकीगायना वा ॥ कZ_११.१.४२ ॥
अमीर विधवा और छुपी हुई एजेंट्स और संन्यासिन औरतें झगड़ा करवा सकती हैं। पैसा और जायदाद के झगड़े से दुश्मन के सरदार पागल कर सकते हैं। नाचने वाली और गाने वाली औरतें भी काम आती हैं।
Sutra 43
प्रतिपन्नान् गूढवेश्मसु रात्रिसमागमप्रविष्टांस्तीक्ष्णा हन्युर्बद्ध्वा हरेयुर्वा ॥ कZ_११.१.४३ ॥
जब दुश्मन फंस के रात को छुपे घरों में आ जाए, तो एजेंट्स उनको मार सकते हैं। या फिर बाँध के ले जा सकते हैं।
Sutra 44
सत्त्री वा स्त्रीलोलुपं संघमुख्यं प्ररूपयेत् अमुष्मिन् ग्रामे दरिद्रकुल्लमपसृतम् तस्य स्त्री राजार्हा गृहाणैनामिति ॥ कZ_११.१.४४ ॥
एक औरत एजेंट देखे कि दुश्मन का सरदार औरतों पे लाइन मारता है। उसको यह कह के फंसाओ, उस गाँव में एक गरीब आदमी भगा दिया गया है। उसकी बीवी रानी जैसी है, उसको ले लो।
Sutra 45
गृहीतायामर्धमासानन्तरं सिद्धव्यञ्जनो दूष्यसंघमुख्यमध्ये प्रक्रोशेत् असौ मे मुख्यो भार्यां स्नुषां भगिनीं दुहितरं वाधिचरति इति ॥ कZ_११.१.४५ ॥
जब वो औरत वहाँ पोहँच जाए, पंद्रह दिन बाद एक अपना आदमी चिल्लाके बोले। वो सरदार मेरी बीवी के साथ गलत काम करता है, या मेरी बेटी के साथ, या बहन के साथ।
Sutra 46
तं चेत्संघो निगृह्णीयात् राजैनमुपगृह्य विगुणेषु विक्रमयेत् ॥ कZ_११.१.४६ ॥
अगर दुश्मन उस सरदार को पकड़ ले, तो राजा उसको अपने पास ले ले। फिर उसको दुश्मन के कमज़ोर हिसाब से इस्तेमाल करो।
Sutra 47
अनिगृहीते सिद्धव्यञ्जनं रात्रौ तीक्ष्णाः प्रवासयेयुः ॥ कZ_११.१.४७ ॥
अगर वो सरदार को नहीं पकड़ा, तो रात को एजेंट्स उस अपने आदमी को वहाँ से निकाल ले।
Sutra 48
ततस्तद्व्यञ्जनाः प्रक्रोशेयुः असौ ब्रह्महा ब्राह्मणीजारश्च इति ॥ कZ_११.१.४८ ॥
फिर वो लोग चिल्लाके बोलेंगे कि यह आदमी ब्राह्मण का खूनी है। और वो ब्राह्मण की औरत के साथ गलत काम कर रहा है।
Sutra 49
कार्तान्तिकव्यञ्जनो वा कन्यामन्येन वृतामन्यस्य प्ररूपयेत् अमुष्य कन्या राजपत्नी राजप्रसविनी च भविष्यति सर्वस्वेन प्रसह्य वैनां लभस्व इति ॥ कZ_११.१.४९ ॥
या फिर कोई ज्योतिषी बनके आदमी किसी दूसरे को बोल सकता है। वो उसकी बेटी लेके भाग जाए। बोलता है कि यह लड़की रानी बनेगी और राजा पैदा करेगी। जल्दी से उसको ले लो।
Sutra 50
अलभ्यमानायां परपक्षमुद्धर्षयेत् ॥ कZ_११.१.५० ॥
अगर वो लड़की नहीं मिलती, तो दूसरी तरफ के लोगों को भड़काना पड़ेगा।
Sutra 51
लब्धायां सिद्धः कलहः ॥ कZ_११.१.५१ ॥
जब वो लड़की मिल जाती है, तो झगड़ा हो जाता है। काम बन जाता है।
By preventing cohesive hostile confederacies from forming an external ‘hard shell,’ the Vijigīṣu reduces frontier insecurity, lowers the cost of open war, and stabilizes trade routes and revenue—welfare achieved through preemptive political neutralization.
This chapter does not specify a codified penalty; enforcement is strategic. Non-compliance by agents implies royal sanction under espionage discipline (removal, punishment, or covert disposal as per broader guḍha-puruṣa regulations), while hostile factions face targeted elimination once isolated (pratipakṣa-vadha) backed by kośa and daṇḍa.
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