Varaha Purana - Adhyaya 21
Varaha PuranaAdhyaya 2185 Shlokas

Adhyaya 21: The Disruption of Dakṣa’s Sacrifice, the Hari–Hara Conflict, and the Establishment of Rudra’s Sacrificial Share

Dakṣayajña-vidhvaṃsaḥ, Harihara-yuddhaḥ, ca Rudrabhāga-pratiṣṭhā

Ritual-Mythology (Yajña-etiology) and Theological Reconciliation

वराह–पृथ्वी संवाद में बताया गया है कि प्रजापति ब्रह्मा को सृष्टि-उत्पत्ति में आरम्भ में कठिनाई हुई, तब क्रोध से रुद्र प्रकट हुए; गौरी से उनका विवाह हुआ, और पर्याप्त तप के बिना सृष्टि करने को कहे जाने पर वे विश्व-जल में लीन हो गए। फिर ब्रह्मा ने दक्ष आदि सात मानस-पुत्रों को उत्पन्न किया। दक्ष ने ब्रह्मा-पुत्रों को ऋत्विज बनाकर महान यज्ञ आरम्भ किया, पर रुद्र का भाग न रखे जाने से तप से उठे रुद्र क्रुद्ध हुए, उग्र गणों को रचा और यज्ञ पर चढ़ आए। संघर्ष बढ़कर हरि–हर का दीर्घ युद्ध बना, जिसे ब्रह्मा ने शांत कराया। अंत में रुद्र को यज्ञ में सर्वोच्च भाग दिया गया, व्यवस्था पुनः स्थापित हुई, रुद्र का ‘पशुपति’ रूप प्रतिष्ठित हुआ और गौरी सहित कैलास-निवास की पुष्टि हुई—यह पृथ्वी के हित हेतु यज्ञ-संतुलन और जगत-स्थैर्य का कारण बताया गया है।

Primary Speakers

VarāhaPṛthivī

Key Concepts

Dakṣayajña (sacrificial polity and entitlement to bhāga)Rudra’s emergence from kopa (cosmogonic affect and divine function)Tapas as prerequisite for sṛṣṭi (austerity–creation linkage)Rudrasarga (category of beings produced through Rudra’s agency)Harihara reconciliation (conflict resolution and theological integration)Rudrabhāga as ‘jyeṣṭhabhāga’ (Vedic legitimation of ritual share)Paśupati and Pāśupata-dīkṣā (identity, initiation, and authority over beings)Ritual disruption and restoration (yajña as ecological-cosmic regulator)
Sanskrit recitationVaraha Purana Adhyaya 21

Shlokas in Adhyaya 21

Verse 1

महातपा उवाच । पूर्वं प्रजापतिर्देवः सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः । चिन्तयामास धर्मात्मा यदा ता नाध्यगच्छत ॥ २१.२ ॥

महातपा बोले—पूर्वकाल में देव प्रजापति विविध प्रजाओं की सृष्टि करना चाहते थे; जब वे उन्हें प्रकट न कर सके, तब उस धर्मात्मा ने गहन चिंतन किया।

Verse 2

तदाऽस्य कोपात्संजज्ञे स च रुद्रः प्रतापवान् । रोदनात्तस्य रुद्रत्वं संजातं परमेष्ठिनः ॥ २१.३ ॥

तब उसके क्रोध से प्रतापवान रुद्र उत्पन्न हुए। उसके रोदन (रुदन) के कारण परमेष्ठी द्वारा उसके लिए ‘रुद्र’ नाम/भाव प्रकट हुआ।

Verse 3

तस्य ब्रह्मा शुभां कन्यां भार्यार्थं मूर्त्तिसम्भवाम् । गौरी नाम्ना स्वयं देवी भारती तां ददौ पिता ॥ २१.४ ॥

उसके लिए ब्रह्मा ने पत्नी हेतु मूर्ति से उत्पन्न शुभ कन्या दी। ‘गौरी’ नाम की वह देवी, पिता भारती द्वारा स्वयं प्रदान की गई।

Verse 4

रुद्रायामितदेहाय स्वयं ब्रह्मा प्रजापतिः । स तां लब्ध्वा वरारोहां मुदा परमया युतः ॥ २१.५ ॥

अमित देह वाले रुद्र को प्रजापति ब्रह्मा ने स्वयं उसे दिया। उस श्रेष्ठांगिनी को पाकर वह परम आनंद से युक्त हो गया।

Verse 5

सर्गकालेषु तं ब्रह्मा तपसा प्रत्युवाच ह । रुद्र प्रजाः सृजस्वेति पौनःपुन्येन चोदितः । असमर्थोऽहमिति जले निमज्जत महाबलः ॥ २१.६ ॥

सृष्टि के समय ब्रह्मा ने तपोबल से उससे कहा—“रुद्र, प्रजाओं की सृष्टि करो।” बार-बार प्रेरित किए जाने पर वह महाबली “मैं असमर्थ हूँ” कहकर जल में निमग्न हो गया।

Verse 6

तपोऽर्थित्वं तपोहीनः स्रष्टुं शक्नोति न प्रजाः । एवं चिन्त्य जले मग्नस्ततो रुद्रः प्रतापवान् ॥ २१.७ ॥

तपस्या से रहित होकर भी तप के फल की इच्छा करने वाला प्रजा की सृष्टि नहीं कर सकता। ऐसा विचार कर प्रतापी रुद्र जल में निमग्न हो गए।

Verse 7

तस्मिन् निमग्ने देवेशे तां ब्रह्मा कन्यकां पुनः । अन्तःशरीरगां कृत्वा गौरीं परमशोभनाम् ॥ २१.८ ॥

जब देवेश्वर उस अवस्था में निमग्न हो गए, तब ब्रह्मा ने उस कन्या को फिर से अपने शरीर के भीतर प्रविष्ट कराया और उसे परम शोभामयी गौरी बनाया।

Verse 8

पुनः सिसृक्षुर्भगवानसृजत् सप्त मानसान् । दक्षं च तेषामारभ्य प्रजाः सम्यग्व्यवर्धिताः ॥ २१.९ ॥

फिर सृष्टि की इच्छा से भगवान ने सात मानसपुत्रों को उत्पन्न किया। उनमें दक्ष से आरम्भ करके प्रजाएँ उचित क्रम से बढ़ीं।

Verse 9

तत्र दाक्षायणीपुत्राः सर्वे देवाः सवासवाः । वसवोऽष्टौ च रुद्राश्च आदित्या मरुतस्तथा ॥ २१.१० ॥

वहाँ दक्षायणी के पुत्र रूप में इन्द्र सहित सभी देव कहे गए हैं—आठ वसु, रुद्र, आदित्य तथा मरुत भी।

Verse 10

सा अपि दक्षाय सुष्रोणी गौरी दत्ताथ ब्रह्मणा । दुहितृत्वे पुरा या हि रुद्रेणोढा महात्मना ॥ २१.११ ॥

वह सुष्रोणी गौरी भी ब्रह्मा द्वारा दक्ष को पुत्री रूप में दी गई; वही जो पूर्वकाल में पुत्री-रूप में महात्मा रुद्र से विवाहित हुई थी।

Verse 11

सा च दाक्षायणी देवी पुनर्भूता नृपोत्तम । ततो दक्षः प्रहृष्टात्मा दौहित्रान् स्वान् स वृद्धिकृत् । दृष्ट्वा यज्ञम् अथारेभे प्रीणनाय प्रजापतिः ॥ २१.१२ ॥

हे नृपोत्तम! वह दाक्षायणी देवी पुनः जन्मी। तब दक्ष प्रसन्नचित्त होकर अपने दौहित्रों को देखकर उनकी वृद्धि का हेतु बना और प्रजापति ने संतोष हेतु यज्ञ आरम्भ किया।

Verse 12

तत्र ब्रह्मसुताः सर्वे मरीच्यादय एव च । चक्रुरार्त्त्विज्यकं कर्म स्वे स्वे मार्गे व्यवस्थिताः ॥ २१.१३ ॥

वहाँ ब्रह्मा के सभी पुत्र—मरीचि आदि—अपने-अपने मार्ग में स्थित होकर ऋत्विज्य कर्म (याज्ञिक पुरोहित-कार्य) करने लगे।

Verse 13

ब्रह्मा स्वयं मरीच्यस्तु बभूव अन्ये तथापरे । अत्रिस्तु यज्ञकर्मस्थ आग्नीध्रस्त्वङ्गिरा भवत् ॥ २१.१४ ॥

ब्रह्मा स्वयं वहाँ उपस्थित थे; मरीचि तथा अन्य महात्मा भी थे। अत्रि यज्ञकर्म में लगे थे और आग्नीध्र (अग्नि-परिचारक) के रूप में अङ्गिरा नियुक्त हुए।

Verse 14

होता पुलस्त्यस्त्वभवदुद्गाता पुलहोऽभवत् । क्रतौ क्रतुस् तु प्रस्तोता तदा यज्ञे महातपाः ॥ २१.१५ ॥

उस यज्ञ में पुलस्त्य होता बने और पुलह उद्गाता हुए। उसी क्रतु (यज्ञ) में महातपस्वी क्रतु ही प्रस्तोता बने।

Verse 15

प्रतिहर्ता प्रचेतास्तु तस्मिन् क्रतुवरे बभौ । सुब्रह्मण्यो वसिष्ठस्तु सनकाद्याः सभासदः । तत्र याज्यः स्वयं ब्रह्मा स च इज्यस्तु पूज्यते ॥ २१.१६ ॥

उस श्रेष्ठ यज्ञ में प्रतिहर्ता के रूप में प्रचेतस हुए। वसिष्ठ सुब्रह्मण्य (सुब्रह्मण्य-पुरोहित) बने और सनक आदि सभासद रहे। वहाँ स्वयं ब्रह्मा याज्य (जिसको आहुति दी जाए) थे और वही इज्य (पूज्य) रूप में सम्मानित हुए।

Verse 16

पूज्या दक्षस्य दौहित्रा रुद्रादित्या ङ्गिरादयः । प्रत्यक्शपितरस्ते हि तैः प्रीतैः प्रीयते जगत् ॥ २१.१७ ॥

दक्ष के दौहित्र—रुद्र, आदित्य, अंगिरस आदि—पूज्य हैं। वे ही प्रत्यक्ष पितर हैं; उनके प्रसन्न होने से जगत् प्रसन्न होता है।

Verse 17

तत्र भागार्थिनो देवा आदित्या वसवस्तथा । विश्वेदेवाः सपितरो गन्धर्वाद्या मरुद्गणाः ॥ २१.१८ ॥

वहाँ अपने-अपने भाग के इच्छुक देव—आदित्य और वसु, विश्वेदेव पितरों सहित, तथा गन्धर्व आदि और मरुद्गण—एकत्र हुए।

Verse 18

जग्रिहुर्यज्ञभागान् स्वान् यावत् ते हविषोर्पितान् । तावत्कालं जलात् सद्य उत्तस्थौ ब्रह्मणः पुनः ॥ २१.१९ ॥

जब तक हवि अर्पित होती रही, तब तक उन्होंने अपने-अपने यज्ञभाग ग्रहण किए। उतने ही समय में ब्रह्मा जल से तुरंत फिर उठ खड़े हुए।

Verse 19

रुद्रः कोपोद्भवो यस्तु पूर्वं मग्नो महाजले । स सहस्रार्कसंकाशो निष्चक्राम जलात् ततः ॥ २१.२० ॥

क्रोध से उत्पन्न रुद्र, जो पहले महाजल में मग्न थे, तब सहस्र सूर्य के समान तेजस्वी होकर जल से बाहर निकले।

Verse 20

सर्वज्ञाणमयो देवः सर्वदेवमयोऽमलः । प्रत्यक्षदर्शी सर्वस्य जगतस्तपसा बभौ ॥ २१.२१ ॥

वह देव सर्वज्ञानमय, सर्वदेवमय और निर्मल हैं। तप के प्रभाव से वे समस्त जगत् के प्रत्यक्षदर्शी होकर प्रकाशित हुए।

Verse 21

तस्मिंस्तु काले पञ्चानां जातः सर्गो नरोत्तम । दिव्यानां पृथिवीस्थानां चतुर्णामरजातिनाम् ॥ २१.२२ ॥

उस समय, हे नरश्रेष्ठ, पाँच प्रकार की सृष्टि उत्पन्न हुई—दिव्य प्राणियों की, पृथ्वी पर रहने वालों की, तथा ‘अर’ कुल/जाति के चार वर्गों की।

Verse 22

रौद्रसर्गस्य सम्भूतिस्तदा सद्योऽपि जायते । इदानीं रुद्रसर्गं त्वं शृणु पार्थिवसत्तम ॥ २१.२३ ॥

उस समय रौद्र-सर्ग की उत्पत्ति तत्काल ही हो जाती है। अब, हे पार्थिवसत्तम, तुम रुद्र-सर्ग का वर्णन सुनो।

Verse 23

दशवर्षसहस्राणि तपश्चीर्त्वा महज्जले । प्रतिबुद्धो यदा रुद्रस्तदा चोर्वीं सकाननाम् । दृष्ट्वा सस्यवतीं रम्यां मनुष्यपशुसंकुलाम् ॥ २१.२४ ॥

महाजल में दस सहस्र वर्षों तक तप करके, जब रुद्र जागे, तब उन्होंने वनों सहित पृथ्वी को देखा—जो अन्न-समृद्ध, रमणीय, तथा मनुष्यों और पशुओं से परिपूर्ण थी।

Verse 24

शुश्राव च तदा शब्दानृत्विजां दक्षसद्मनि । आश्रमे यज्ञिनां चोच्चैर्योगस्थैरिति कीर्तितम् ॥ २१.२५ ॥

तब उन्होंने दक्ष के सदन में ऋत्विजों के शब्द सुने; और यज्ञ करने वालों के आश्रम में योगस्थ जनों द्वारा ऊँचे स्वर से कीर्तन/घोष किया जा रहा था।

Verse 25

ततः श्रुत्वा महातेजाः सर्वज्ञः परमेश्वरः । चुकोप सुभृशं देवो वाक्यं चेदमुवाच ह ॥ २१.२६ ॥

यह सुनकर महातेजस्वी, सर्वज्ञ, परमेश्वर देव अत्यन्त क्रोधित हो उठे और उन्होंने यह वचन कहा।

Verse 26

अहं पूर्वं तु कविना सृष्टः सर्वात्मना विभुः । प्रजाः सृजस्वेति तदा वाक्यमेतत् तथोक्तवान् ॥ २१.२७ ॥

पूर्वकाल में मैं—सर्वव्यापी प्रभु—कवि-ऋषि द्वारा सम्पूर्ण भाव से सृजित किया गया; तब उसने यही वचन कहा— ‘प्रजाओं की सृष्टि करो।’

Verse 27

इदानीं केन तत्कर्म कृतं सृष्ट्यादिवर्णनम् । एवमुक्त्वा भृशं कोपान्ननाद परमेश्वरः ॥ २१.२८ ॥

अब वह कर्म किसने किया—यह सृष्टि-आदि का वर्णन? ऐसा कहकर परमेश्वर तीव्र क्रोध से गरज उठा।

Verse 28

तस्य नानदतो ज्वालाः श्रोत्रेभ्यो निर्ययुस्तदा । तत्र भूतानि वेतालाः उच्छ्रुष्माः प्रेतपूतनाः ॥ २१.२९ ॥

उसके गरजने पर उसके कानों से ज्वालाएँ निकल पड़ीं; वहाँ भूत, वेताल, उच्छ्रुष्म, प्रेत और पूतना आदि प्रकट हुए।

Verse 29

कूष्माण्डा यातुधानाश्च सर्वे प्रज्वलिताननाः । उत्तस्थुः कोटिशस्तत्र नानाप्रहरणावृताः ॥ २१.३० ॥

वहाँ कूष्माण्ड और यातुधान—सबके मुख प्रज्वलित थे—करोड़ों की संख्या में उठ खड़े हुए, नाना प्रकार के शस्त्रों से सुसज्जित।

Verse 30

ते दृिष्ट्वा भूतसङ्घाता विविधायुधपाणयः । ससर्ज वेदविद्याङ्गं रथं परमशोभनम् ॥ २१.३१ ॥

विविध शस्त्र धारण किए हुए भूत-समूहों को देखकर उसने वेद-विद्या और उसके अंगों से युक्त अत्यन्त शोभायमान रथ की रचना की।

Verse 31

तस्मिन्नृगादयस्त्वश्वास्त्रितत्त्वं च त्रिवेणुकम् । त्रिपूजकं त्रिषवणं धर्माक्षं मारुतध्वनिम् ॥ २१.३२ ॥

उस स्थान में ऋग आदि, अश्वास्त्रि, त्रितत्त्व, त्रिवेणुक, त्रिपूजक, त्रिषवण, धर्माक्ष और मारुतध्वनि—ये पवित्र नाम/लक्षण पाए जाते हैं।

Verse 32

अहोरात्रे पताके द्वे धर्माधर्मे तु दण्डके । शकटं सर्वविद्याश्च स्वयं ब्रह्मादिसारथिः ॥ २१.३३ ॥

दिन और रात दो पताकाएँ हैं; धर्म और अधर्म दो दण्ड हैं; रथ/शकट समस्त विद्याओं से बना है; और सारथी स्वयं ब्रह्मा आदि आद्य देव हैं।

Verse 33

गायत्री च धनुस्तस्य ओङ्कारो गुण एव च । स्वराः सप्त शरास्तस्य देवदेवस्य सुव्रत ॥ २१.३४ ॥

हे सुव्रता! गायत्री उसका धनुष है; ओंकार ही उसकी डोरी (गुण) है; और सात स्वर उस देवदेव के बाण हैं।

Verse 34

एवं कृत्वा स सामग्रीं देवदेवः प्रतापवान् । जगाम दक्षयज्ञाय कोपाद् रुद्रः प्रतापवान् ॥ २१.३५ ॥

इस प्रकार सामग्री तैयार करके, प्रतापवान देवदेव—क्रोध से उद्दीप्त प्रतापी रुद्र—दक्ष के यज्ञ की ओर गया।

Verse 35

गच्छतस्तस्य देवस्य अम्बराङ्गिरसं नयत् । ऋत्विजां मन्त्रनिचयो नष्टो रुद्रागमे तदा ॥ २१.३६ ॥

उस देव के जाते समय वह अम्बराङ्गिरस को साथ ले गया; तब रुद्रागम में ऋत्विजों का मंत्र-संग्रह नष्ट हो गया।

Verse 36

विपरीतमिदं दृष्ट्वा तदा सर्वे च ऋत्विजः । ऊचुः संनह्यतां देवा महद् वो भयमागतम् ॥ २१.३७ ॥

यह विपरीत दृश्य देखकर तब सभी ऋत्विजों ने कहा— “हे देवो, शस्त्र धारण कर सज्ज हो जाओ; तुम पर महान् भय आ पड़ा है।”

Verse 37

कश्चिदायाति बलवानसुरो ब्रह्मनिर्मितः । यज्ञभागार्थमेतस्मिन् क्रतौ परमदुर्लभम् ॥ २१.३८ ॥

ब्रह्मा-निर्मित कहा जाने वाला एक बलवान् असुर यहाँ आ रहा है; वह इस क्रतु में यज्ञ-भाग पाने के लिए आया है, जो अत्यन्त दुर्लभ है।

Verse 38

एवमुक्तास्ततो देवाः ऊचुर्मातामहं तदा । दक्ष तात किमत्रास्मत्कार्यं ब्रूहि विवक्षितम् ॥ २१.३९ ॥

ऐसा कहे जाने पर देवताओं ने तब मातामह से कहा— “हे दक्ष, प्रिय पिता, यहाँ हमारी ओर से क्या कार्य करना है? जो अभिप्रेत हो, बताइए।”

Verse 39

दक्ष उवाच । गृह्यन्तां द्रुतमस्त्राणि संग्रामोऽत्र विधीयताम् । एवमुक्ते तदा देवैर्विविधायुधधारिभिः । रुद्रस्यानुचरैः सार्धं महद्युद्धं प्रवर्तितम् ॥ २१.४० ॥

दक्ष ने कहा— “शीघ्र शस्त्र उठा लो; यहाँ युद्ध किया जाए।” ऐसा कहे जाने पर विविध आयुध धारण करने वाले देवताओं और रुद्र के अनुचरों के साथ महान् युद्ध छिड़ गया।

Verse 40

तत्र वेतालभूतानि कूष्माण्डा ग्रहपूतनाः । युयुधुर्लोकपालैश्च नानाशस्त्रधराणि च ॥ २१.४१ ॥

वहाँ वेताल-स्वरूप भूत, कूष्माण्ड, तथा ग्रह-पूतना युद्ध करने लगे; और वे नाना शस्त्र धारण कर लोकपालों से भी भिड़े।

Verse 41

देवा रौद्राणि भूतानि निरसन्तो यमालयम् । चिक्षिपुः सायकान् घोरान् असिंश्च सपरश्वधान् ॥ २१.४२ ॥

देवताओं ने रौद्र भूतों को हटाकर यम के धाम की ओर प्रस्थान किया। उन्होंने भयानक बाण छोड़े और तलवारें तथा परशु-धाराएँ चलायीं।

Verse 42

भूतान्यपि मृधे घोराण्युल्मुकैरस्थिभिः शरैः । जग्मुर्देवान्मृधे रोषाद्रुद्रस्य पुरतो बलात् ॥ २१.४३ ॥

उस भयानक युद्ध में वे घोर भूत भी उल्मुक, अस्थियाँ और बाण फेंकते हुए देवताओं पर चढ़ आए। क्रोध से भरे वे रुद्र के आगे-आगे बलपूर्वक बढ़े।

Verse 43

ततस्तस्मिन् महारौद्रे संग्रामे भीमरूपिणि । रुद्रो भगस्य नेत्रे तु बिभेदैकॆषुणा मृधे ॥ २१.४४ ॥

तब उस अत्यन्त रौद्र, भयानक रूप वाले संग्राम में रुद्र ने युद्धस्थल पर एक ही बाण से भग के नेत्रों को बेध दिया।

Verse 44

रुद्रस्य शरपातेन नष्टनेत्रं भगं तदा । दृष्ट्वास्य क्रोधात् तेजस्वी पूषा रुद्रमयोद्धयत् ॥ २१.४५ ॥

तब रुद्र के बाण-वर्षा से भग का नेत्र नष्ट हो गया। यह देखकर तेजस्वी पूषा क्रोधवश रुद्र से युद्ध करने लगा।

Verse 45

सृजन्तमिषुजालानि पूषणं तु महामृधे । दृष्ट्वा रुद्रोऽस्य दन्तांस्तु चकर्ष परवीरहा ॥ २१.४६ ॥

महायुद्ध में पूषा को बाणों के जाल छोड़ते देखकर, शत्रुवीर-हन्ता रुद्र ने उसके दाँत उखाड़ लिए।

Verse 46

तस्य दन्तांस्तदा दृष्ट्वा पूष्णो रुद्रेण पातितान् । दुद्रुवुः वसवो दिक्षु रुद्रास्त्वेकादश द्रुतम् ॥ २१.४७ ॥

तब रुद्र द्वारा पूषा के दाँत गिराए हुए देखकर वसु दिशाओं में भाग गए और ग्यारह रुद्र भी शीघ्र ही पलायन कर गए।

Verse 47

तान् भग्नान् सहसा दिक्षु दृष्ट्वा विष्णुः प्रतापवान् । आदित्यावरजो वाक्यमुवाच स्वबलं तदा ॥ २१.४८ ॥

उन्हें दिशाओं में सहसा पराजित होकर भागते देख, प्रतापी विष्णु—अदिति के बाद उत्पन्न—ने तब अपनी सेना से आदेशात्मक वचन कहा।

Verse 48

क्व यात पौरुषं त्यक्त्वा दर्पं माहात्म्यमेव च । व्यवसायं कुलं भूतिṃ कथं न स्मर्यते द्रुतम् ॥ २१.४९ ॥

पुरुषार्थ, दर्प और अपना माहात्म्य तक छोड़कर ये कहाँ चले गए? अपना उद्योग, कुल और समृद्धि इन्हें शीघ्र क्यों नहीं स्मरण होती?

Verse 49

परमेष्ठिगुणैर्युक्तो लघुवद्भीतितः पुरा । नमस्कं कुरुते मोघं पृथिव्यां पद्मजः स्वयम् ॥ २१.५० ॥

परमेष्ठी के गुणों से युक्त पद्मज ब्रह्मा स्वयं भी, पूर्वकाल में तुच्छ-सा भय मानकर, पृथ्वी पर व्यर्थ ही नमस्कार करता है।

Verse 50

एवमुक्त्वा गरुत्मन्तमारुरोह हरिस्तदा । शङ्खचक्रगदापाणिः पीतवासाः जनार्दनः ॥ २१.५१ ॥

ऐसा कहकर हरि तब गरुत्मान पर आरूढ़ हुए; शंख-चक्र-गदा धारण किए, पीताम्बरधारी जनार्दन।

Verse 51

ततो हरिहरं युद्धमभवल्लोमहर्षणम् । रुद्रः पाशुपतास्त्रेण विव्याध हरिमोजसा । हरिर्नारायणास्त्रेण रुद्रं विव्याध कोपवान् ॥ २१.५२ ॥

तब हरि और हर के बीच रोमांचकारी युद्ध छिड़ गया। रुद्र ने पाशुपत अस्त्र से बलपूर्वक हरि को बेधा; और क्रुद्ध हरि ने नारायण अस्त्र से रुद्र को बेधा।

Verse 52

नारायणं पाशुपतमुभेऽस्त्रे व्योम्नि रोषिते । युयुधाते भृशं दिव्यं परस्परजिघांसया । दिव्यं वर्षसहस्रं तु तयोर्युद्धमभूत् तदा ॥ २१.५३ ॥

तब आकाश में नारायण और पाशुपत—ये दोनों दिव्य अस्त्र क्रुद्ध होकर, एक-दूसरे का विनाश करने की इच्छा से, अत्यन्त घोर युद्ध करने लगे। उस समय उनका संग्राम एक सहस्र दिव्य वर्षों तक चला।

Verse 53

तत्रैकं मुकुटोद्बद्धं मूर्द्धन्यं जटजालकम् । एकं प्रध्मापयच्छङ्खमन्यड्डुमरुकं शुभम् ॥ २१.५४ ॥

वहाँ एक के मस्तक पर मुकुट से बँधा हुआ जटाजाल था। एक शंख फूँक रहा था; और दूसरा शुभ डमरू धारण किए था।

Verse 54

एकं खङ्गकरं तत्र तथान्यं दण्डधारिणम् । एकं कौस्तुभदीप्ताङ्गमन्यं भूतिविभूषितम् ॥ २१.५५ ॥

वहाँ एक के हाथ में खड्ग था, और दूसरा दण्ड धारण किए था। एक का शरीर कौस्तुभ मणि से दीप्त था, और दूसरा भस्म-विभूति से अलंकृत था।

Verse 55

एकं गदां भ्रामयति द्वितीयं दण्डमेव च । एकं शोभति कण्ठस्थैर्मणिभिस्त्वस्थिभिः परम् । एकं पीताम्बरं तत्र द्वितीयं सर्पमेखलम् ॥ २१.५६ ॥

एक गदा घुमाता है, और दूसरा केवल दण्ड धारण करता है। एक कंठस्थ मणियों से शोभित है, और दूसरा अस्थियों से परम शोभा पाता है। एक पीताम्बरधारी है, और दूसरा सर्प-मेखला धारण किए है।

Verse 56

एवं तौ स्पर्धिनावस्त्रौ रौद्रनारायणात्मकौ । अन्योऽन्यातिशयोपेतौ तदालोक्य पितामहः ॥ २१.५७ ॥

इस प्रकार वे दोनों प्रतिद्वन्द्वी अस्त्र—रुद्र और नारायण-शक्ति के स्वरूप—एक-दूसरे से बढ़कर सामर्थ्य से युक्त थे; यह देखकर पितामह ब्रह्मा ने स्थिति को देखा।

Verse 57

उवाच शम्यतामस्त्रौ स्वस्वभावेन सुव्रतौ । एवं ते ब्रह्मणा चोक्तौ शान्तभावं प्रजग्मतुः ॥ २१.५८ ॥

उन्होंने कहा—“हे सुव्रतों! ये दोनों अस्त्र अपने-अपने स्वभाव के अनुसार शान्त हो जाएँ।” ब्रह्मा के ऐसा कहने पर वे दोनों शान्तभाव को प्राप्त हुए।

Verse 58

तथा विष्णुहरौ ब्रह्मा वाक्यमेतदुवाच ह । उभौ हरिहरौ देवौ लोके ख्यातिं गमिष्यथः ॥ २१.५९ ॥

तदनन्तर ब्रह्मा ने विष्णु और हर से यह वचन कहा—“तुम दोनों हरि-हर, दोनों देव, लोक में ख्याति को प्राप्त होओगे।”

Verse 59

अयं च यज्ञो विध्वस्तः सम्पूर्णत्वं गमिष्यति । दक्षस्य ख्यातिमाँल्लोकः सन्तत्या अयं भविष्यति ॥ २१.६० ॥

“और यह यज्ञ, यद्यपि विध्वस्त हुआ है, फिर भी पूर्णता को प्राप्त होगा। यह लोक दक्ष की सन्तति (वंश-परम्परा) के द्वारा ख्यातिमान होगा।”

Verse 60

एवमुक्त्वा हरिहरौ तदा लोकपितामहः । ब्रह्मा लोकानुवाचेदं रुद्रभागोऽस्य दीयताम् ॥ २१.६१ ॥

हरि-हर से ऐसा कहकर, तब लोकपितामह ब्रह्मा ने लोकों से यह कहा—“इस विषय में रुद्र का भाग दिया जाए।”

Verse 61

रुद्रभागो ज्येष्ठभाग इतीयं वैदिकी श्रुतिः । स्तुतिं च देवाः कुरुत रुद्रस्य परमेष्ठि नः ॥ २१.६२ ॥

“रुद्र का भाग ही श्रेष्ठ भाग है”—यह वैदिक श्रुति है। इसलिए, हे देवो, हमारे परमेष्ठी रुद्र की स्तुति करो।

Verse 62

भगनेत्रहरं देवं पूष्णो दन्तविनाशनम् । स्तुतिं कुरुतमा शीघ्रं गीतैरेतैस्तु नामभिः । येनायं वः प्रसन्नात्मा वरदत्वं भजेत ह ॥ २१.६३ ॥

जिस देव ने भग का नेत्र हर लिया और पूषा के दाँत तोड़ दिए, उन देव की इन नाम-गीतों से शीघ्र स्तुति करो, जिससे वह प्रसन्न होकर तुम्हें वर देने वाला बने।

Verse 63

एवमुक्तास्तु ते देवाः स्तोत्रं शम्भोर्महात्मनः । चक्रुः परमया भक्त्या नमस्कृत्य स्वयम्भुवे ॥ २१.६४ ॥

ऐसा कहे जाने पर उन देवों ने महात्मा शम्भु का स्तोत्र रचा और स्वयम्भू को नमस्कार करके परम भक्ति से उसे गाया।

Verse 64

देवा ऊचुः । नमो विषमनेत्राय नमस्ते त्र्यम्बकाय च । नमः सहस्रनेत्राय नमस्ते शूलपाणये ॥ २१.६५ ॥

देव बोले—विषम नेत्र वाले को नमस्कार, त्र्यम्बक को नमस्कार। सहस्रनेत्र को नमस्कार, शूलपाणि को नमस्कार।

Verse 65

नमः खट्वाङ्गहस्ताय नमो दण्डभृते करे । त्वं देव हुतभुग्ज्वालाकोतिभानुसमप्रभः ॥ २१.६६ ॥

खट्वाङ्ग धारण करने वाले को नमस्कार, दण्ड धारण करने वाले हाथ को नमस्कार। हे देव, आपकी प्रभा हुतभुज की ज्वाला और करोड़ों सूर्यों के समान है।

Verse 66

अदर्शनेऽनयद् देव मूढविज्ञानतोऽधुना । कृतमस्माभिरेवेश तदत्र क्षम्यतां प्रभो ॥ २१.६७ ॥

हे देव! भ्रमित बुद्धि के कारण हमने अब इस विषय को अस्पष्टता में डाल दिया है। हे ईश्वर, हमसे जो कुछ हुआ है, उसे यहाँ क्षमा करें, प्रभो।

Verse 67

नमस्त्रिनेत्रार्त्तिहाराय शम्भो त्रिशूलपाणे विकृतास्यरूप । समस्तदेवेश्वर शुद्धभाव प्रसीद रुद्राच्युत सर्वभाव ॥ २१.६८ ॥

हे शम्भु! त्रिनेत्र, दुःखहारी—आपको नमस्कार। हे त्रिशूलधारी, भयानक रूप धारण करने वाले! समस्त देवों के ईश्वर, शुद्ध भाव वाले—प्रसन्न हों; हे रुद्र, हे अच्युत, सर्वभावस्वरूप!

Verse 68

पूष्णोऽस्य दन्तान्तक भीमरूप प्रलम्बभोगीन्द्रलुलन्तकण्ठ । विशालदेहाच्युत नीलकण्ठ प्रसीद विश्वेश्वर विश्वमूर्त्ते ॥ २१.६९ ॥

हे पूषा के दाँत का संहारक, भीमरूप! हे लम्बे फणों वाले नागराज की लटकती कुंडलियों से शोभित कंठ वाले! हे विशालदेह अच्युत, हे नीलकंठ—प्रसन्न हों, हे विश्वेश्वर, हे विश्वमूर्ति!

Verse 69

भगाक्षिसंस्फोटनदक्षकर्मा गृहाण भागं मखतः प्रधानम् । प्रसीद देवेश्वर नीलकण्ठ प्रपाहि नः सर्वगुणोपपन्न ॥ २१.७० ॥

हे भग के नेत्रों को फोड़ने वाले समर्थ कर्मवीर! इस यज्ञ का प्रधान भाग स्वीकार करें। हे देवेश्वर नीलकंठ, प्रसन्न हों; सर्वगुणसम्पन्न प्रभु, हमारी रक्षा करें।

Verse 70

सिताङ्गरागाप्रतिपन्नमूर्ते कपालधारिं त्रिपुरघ्न देव । प्रपाहि नः सर्वभयेषु चैव उमापते पुष्करनालजन्म ॥ २१.७१ ॥

हे श्वेत लेप से विभूषित मूर्ते, कपालधारी, त्रिपुरघ्न देव! समस्त भय में हमारी रक्षा करें। हे उमापति, कमलनाल-जन्मा, हमें सुरक्षित रखें।

Verse 71

पश्याम ते देहगतान् सुरेश सर्गादयो वेदवराननन्त । साङ्गान् सविद्यान् सपदक्रमांश्च सर्वान् निलीनांस्त्वयि देवदेव ॥ २१.७२ ॥

हे सुरेश, हे अनन्त देवदेव! हम आपके ही शरीर में सृष्टि आदि सहित श्रेष्ठ वेदों को, उनके अंगों, विद्याओं तथा पद-पद और क्रम-पाठ सहित—सबको आप में लीन हुआ देखते हैं।

Verse 72

भव शर्व महादेव पिनाकिन् रुद्र ते हर । नताः स्म सर्वे विश्वेश त्राहि नः परमेश्वर ॥ २१.७३ ॥

हे भव, शर्व, महादेव, पिनाकी, रुद्र, हर! हे विश्वेश्वर, हम सब आपको नमस्कार करते हैं; हे परमेश्वर, हमारी रक्षा कीजिए।

Verse 73

इत्थं स्तुतस्तदा देवैर्देवदेवो महेश्वरः । तुतोष सर्वदेवानां वाक्यं चेदमुवाच ह ॥ २१.७४ ॥

इस प्रकार देवताओं द्वारा स्तुत होकर उस समय देवदेव महेश्वर प्रसन्न हुए और उन्होंने समस्त देवताओं से ये वचन कहे।

Verse 74

रुद्र उवाच । भगस्य नेत्रं भवतु पूष्णो दन्तास्तथा मखः । दक्षस्याच्छिद्रतां यातु यज्ञश्चाप्यदितेः सुताः । पशुभावं तथा चापि अपनेष्यामि वो सुराः ॥ २१.७५ ॥

रुद्र बोले—‘भग का नेत्र हो जाए; पूषा के दाँत तथा मख भी वैसे ही (पुनः) हो जाएँ। दक्ष की विकृति दूर हो; यज्ञ तथा अदिति के पुत्र भी (पुनः) यथावत हों। और हे देवो, मैं तुमसे पशुभाव भी दूर कर दूँगा।’

Verse 75

मद्दर्शनॆन यो जातः पशुभावो दिवौकसाम् । स मयाऽपहृतः सद्यः पतित्वं वो भविष्यति ॥ २१.७६ ॥

‘मेरे दर्शन से स्वर्गवासियों में जो पशुभाव उत्पन्न हुआ था, उसे मैंने तुरंत हटा दिया है; और तुम्हारे लिए पतित-भाव (अधःस्थिति) होगा।’

Verse 76

अहं च सर्वविद्यानां पति॒राद्यः सनातनः । अहं वै पतिभावेन पशुमध्ये व्यवस्थितः ॥ २१.७७ ॥

मैं ही समस्त विद्याओं का आद्य और सनातन स्वामी हूँ; और मैं ही स्वामित्व-भाव से समस्त प्राणियों के बीच प्रतिष्ठित हूँ।

Verse 77

अतः पशुपतिर्नाम मम लोके भविष्यति । ये मां यजन्ति तेषां स्याद् दीक्षा पाशुपती भवेत् ॥ २१.७८ ॥

इसलिए मेरे लोक में मेरा नाम ‘पशुपति’ प्रसिद्ध होगा। जो मेरी उपासना करते हैं, उनके लिए दीक्षा होगी—वह पाशुपत दीक्षा होगी।

Verse 78

एवमुक्तेऽथ रुद्रेण ब्रह्मा लोकपितामहः । उवाच रुद्रं सस्नेहं स्मितपूर्वमिदं वचः ॥ २१.७९ ॥

रुद्र के ऐसा कहने पर, लोकपितामह ब्रह्मा ने स्नेहपूर्वक, पहले मुस्कराकर, रुद्र से ये वचन कहे।

Verse 79

ध्रुवं पाशुपतिर्देव त्वं लोके ख्यातिमेष्यति । अयं च देवस्त्वन्नाम्ना लोके ख्यातिं गमिष्यति । आराध्यश्च समस्तानां देवादीनां गमिष्यसि ॥ २१.८० ॥

निश्चय ही, हे देव, तुम ‘पाशुपति’ के रूप में लोक में ख्याति पाओगे। और यह देव भी तुम्हारे ही नाम से लोक में प्रसिद्ध होगा। तथा तुम देवों आदि समस्त के आराध्य बनोगे।

Verse 80

एवमुक्त्वा तदा ब्रह्मा दक्षं प्रोवाच बुद्धिमान् । गौरीं प्रयच्छ रुद्राय पूर्वमेवोपपादिताम् ॥ २१.८१ ॥

ऐसा कहकर तब बुद्धिमान ब्रह्मा ने दक्ष से कहा—“गौरी को रुद्र को दे दो, जो पहले ही उसके लिए निश्चित (या वचनबद्ध) की जा चुकी है।”

Verse 81

एवमुक्त्वा तदा दक्षस्तां कन्यां ब्रह्मसन्निधौ । ददौ रुद्राय महते गौरीं परमशोभनाम् ॥ २१.८२ ॥

ऐसा कहकर तब दक्ष ने ब्रह्मा के सान्निध्य में उस कन्या, परम शोभामयी गौरी को महान रुद्र को प्रदान किया।

Verse 82

स तां जग्राह विधिवद् रुद्रः परमशोभनाम् । दक्षस्य च प्रियं कुर्वन् बहुमानपुरःसरम् ॥ २१.८३ ॥

रुद्र ने उस परम शोभामयी को विधिपूर्वक ग्रहण किया और दक्ष को प्रसन्न करने हेतु आदर को अग्रभाग में रखकर आचरण किया।

Verse 83

गृहीतायां तु कन्यायां दाक्षायण्यां पितामहः । ददौ रुद्रस्य निलयं कैलासं सुरसन्निधौ ॥ २१.८४ ॥

कन्या दाक्षायणी के ग्रहण किए जाने पर पितामह ने देवसमूह के सान्निध्य में रुद्र को निवास-स्थान—कैलास—प्रदान किया।

Verse 84

रुद्रोऽपि प्रययौ भूतैः समं कैलासपर्वतम् । देवाś्चापि यथास्थानं स्वं स्वं जग्मुर्मुदान्विताः । ब्रह्माऽपि दक्षसहितः प्राजापत्यं पुरं ययौ ॥ २१.८५ ॥

रुद्र भी भूतगणों सहित कैलास पर्वत को चले गए। देवता भी आनंदित होकर यथास्थान अपने-अपने धाम को गए। ब्रह्मा भी दक्ष के साथ प्राजापत्य पुर को गए।

Verse 85

तत्र दाक्षायणीपुत्राः सर्वे देवाः सवासवाः । वसवोऽष्टौ च रुद्राश्च आदित्या मरुतस्तथा ॥

वहाँ दाक्षायणी के पुत्र—इन्द्र सहित—समस्त देव थे: आठ वसु, रुद्र, आदित्य तथा मरुतगण।

Frequently Asked Questions

The narrative frames yajña as a system requiring inclusion and proportional distribution (bhāga) to maintain social and cosmic stability; exclusion produces disorder, while negotiated recognition—here, Rudra’s jyeṣṭhabhāga—restores equilibrium. It also presents tapas as a necessary condition for legitimate creation and authority.

No tithi, nakṣatra, or seasonal calendrics are specified. The principal temporal marker is Rudra’s austerity duration described as ‘daśavarṣasahasrāṇi’ (ten thousand years) in the cosmic waters before re-emergence.

Environmental balance is implied through yajña as a regulator of cosmic order that indirectly stabilizes Pṛthivī: when ritual order collapses through conflict, destructive beings proliferate and violence spreads; when the rite is reconciled and shares are properly assigned, the narrative signals a return to orderly functioning of the world and its inhabitants.

The chapter references Brahmā/Prajāpati, Rudra (Śiva), Gaurī/Dākṣāyaṇī, Dakṣa, Viṣṇu (Hari), and Brahmā’s sons/sages as ritual functionaries (Marīci, Atri, Aṅgiras, Pulastya, Pulaha, Kratu, Vasiṣṭha, and others), along with divine collectives (Ādityas, Vasus, Maruts, Viśvedevās, Pitṛs, Gandharvas).

Ask anything about Adhyaya 21 of the Varaha Purana

Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.

Not sure where to start?

A free Google sign-in keeps your chat saved across web and the app.

Read Varaha Purana in the Vedapath app

Scan the QR code to open this directly in the app, with word-by-word meanings, Sanskrit recitation where available, and more.

Continue reading in the Vedapath app

Open in App