Adhyaya 34
Kashi KhandaUttara ArdhaAdhyaya 34

Adhyaya 34

इस अध्याय में स्कन्द अगस्त्य को काशी के तीर्थों का क्रम और उनके विधि-फल बताते हैं। आरम्भ में संगम की पवित्रता और ‘पादोदक’ (विष्णु के चरणों का जल) को मूल तीर्थ कहकर, फिर क्षीराब्धि, शंख, चक्र, गदा, पद्म, महालक्ष्मी, गारुड़मत, प्रह्लाद, अम्बरीष, आदित्यकेशव, दत्तात्रेय, नारद, वामन, नर-नारायण, यज्ञवाराह, (विदार)नरसिंह, गोपीगोविन्द, लक्ष्मीनृसिंह, शेष, शंखमाधव, नीलग्रीव, उद्दालक, सांख्य, स्वर्लीन, महीषासुर, बाण, गोप्रातार, हिरण्यगर्भ, प्रणव, पिशंगिला, पिलिपिल, नागेश्वर, कर्णादित्य, भैरव, खर्वनृसिंह, मृकण्डु और अंत में पंचनद—इन अनेक स्थलों का वर्णन आता है। प्रत्येक तीर्थ के साथ संक्षेप में पापक्षय, समृद्धि, दिव्य-दर्शन, लोक-प्राप्ति या पुनर्जन्म-क्षय जैसे फल बताए गए हैं। पंचनद को विशेष महाप्रभावी कहा गया है, विशेषतः कार्तिक मास और कुछ तिथि-नक्षत्र-योगों में। आगे ज्ञानह्रद को ज्ञानवर्धक तथा मंगल तीर्थ को शुभता और शांति का साधन बताया गया है; फिर मखा, बिन्दु, पिप्पलाद, ताम्रवराह, कालगंगा, इन्द्रद्युम्न, राम, ऐक्ष्वाक, मरुत्त, मैत्रावरुण, अग्नि/अंगार, कली, चन्द्र, वीर, विघ्नेश, हरिश्चन्द्र, पर्वत, कंबलाश्वतर, सारस्वत, उमा आदि तीर्थों का भी उल्लेख है। अंत में मणिकर्णिका की महिमा चरम पर पहुँचती है—वह त्रिलोकी-विख्यात, पाप-विनाशिनी और महान यज्ञों के समुच्चय के तुल्य (या उससे भी श्रेष्ठ) कही गई है। वहाँ स्मरण, दर्शन, स्नान और पूजन को ‘अक्षय फल’ देने वाला परम आदर्श कर्म बताकर अध्याय का भक्तिपूर्ण उपसंहार होता है।

Shlokas

Verse 1

स्कंद उवाच । आकर्णय क्षोणिसुर यथा स्थाणुरचीकरत् । गंगावरणयोः पुण्यात्संभेदात्तीर्थभूमिकाम्

स्कन्द बोले—हे क्षोणिसुर (राजन्), सुनो; गंगा और वरुणा के पवित्र संगम से उत्पन्न तीर्थ-भूमि को स्थाणु (शिव) ने कैसे स्थापित किया।

Verse 2

संगमे तत्र निष्णातः संगमेशं समर्च्य च । नरो न जातु जननी गर्भसंगमवाप्नुयात्

उस संगम में स्नान करके और संगमेश का विधिपूर्वक पूजन कर, मनुष्य फिर कभी माता के गर्भ से ‘संगम’ नहीं पाता—अर्थात पुनर्जन्म नहीं होता।

Verse 3

तत्र पादोदकं तीर्थं यत्र देवेन शार्ङ्गिणा । आदौ पादौ क्षलितौ तु मंदराच्चागतेन यत्

वहाँ ‘पादोदक’ नामक तीर्थ है, जहाँ शार्ङ्गिण (विष्णु) देव ने मन्दर पर्वत से आए जल से आरम्भ में अपने चरण धोए थे।

Verse 4

विप्णुपादोदके तीर्थे वारिकार्यं करोति यः । व्यतीपातेन नियतं भूयः सांसारिकी गतिः

जो विष्णु-पादोदक तीर्थ में जल-तर्पण आदि वारिकार्य करता है, यदि वह अशुभ व्यतीपात-काल में किया जाए, तो वह निश्चय ही फिर संसार-गति में गिरता है।

Verse 5

कृतपादोदक स्नानः कृतकेशवपूजनः । वीतसंसारवसतिः काश्यामासीन्नरोत्तमः

पादोदक में स्नान करके और केशव की पूजा करके, वह नरश्रेष्ठ संसार-वास से रहित होकर काशी में निवास करने लगा।

Verse 6

काश्यां सा भूमिरुद्दिष्टा श्वेतद्वीप इति द्विजैः । तत्र पुण्यार्जनं कृत्वा श्वेतद्वीपाधिपो भवेत्

काशी में उस भू-भाग को द्विज ‘श्वेतद्वीप’ कहते हैं; वहाँ पुण्य अर्जित करके मनुष्य श्वेतद्वीप का अधिपति होता है।

Verse 7

ततः पादोदकात्तीर्थात्तीर्थं क्षीराब्धिसंज्ञकम् । तत्रार्जित महापुण्यो वसेत्क्षीराब्धिरोधसि

फिर पादोदक तीर्थ से आगे ‘क्षीराब्धि’ नामक दूसरा तीर्थ है; वहाँ महान पुण्य अर्जित करने वाला क्षीराब्धि के तट पर निवास करता है।

Verse 8

क्षीरोदाद्दक्षिणेभागे तीर्थं शंखाख्यनुत्तमम् । तत्र स्नातो भवेन्नूनं नाशंखादिनिधेः पतिः

क्षीरोद के दक्षिण भाग में ‘शंख’ नाम का अनुपम तीर्थ है; वहाँ स्नान करने वाला निश्चय ही शंख आदि निधियों का स्वामी बनता है।

Verse 9

अर्वाक्च शंखतीर्थाद्वै चक्रतीर्थमनुत्तमम् । संसारचक्रे न पतेत्तत्तीर्थजलमज्जनात्

शंखतीर्थ के निकट ही अनुपम चक्रतीर्थ है। उस तीर्थ के जल में स्नान करने से जीव फिर संसार-चक्र में नहीं गिरता।

Verse 10

गदातीर्थं तदग्रे तु संसारगदनाशनम् । तत्र श्राद्धादिकरणात्पश्येद्देवं गदाधरम्

उसके आगे गदातीर्थ है, जो संसार-रूपी रोग का नाश करता है। वहाँ श्राद्ध आदि करने से भक्त देव गदाधर का दर्शन करता है।

Verse 11

पद्माकृत्पद्मतीर्थं च तदग्रे पितृतृप्तिकृत् । तत्र स्नानादिकरणात्प्राप्नुयादघसंक्षयम्

फिर कमलाकार पद्मतीर्थ है, जो पितरों को तृप्त करता है। वहाँ स्नान और विधि-पालन से पापों का क्षय प्राप्त होता है।

Verse 12

ततस्तीर्थं महालक्ष्म्या महापुण्यफलप्रदम् । तत्राभ्यर्च्य महालक्ष्मीं निर्वाणकमलां लभेत्

इसके बाद महालक्ष्मी का तीर्थ है, जो महापुण्य का फल देता है। वहाँ महालक्ष्मी की अर्चना करने से निर्वाण-रूपी कमल प्राप्त होता है।

Verse 13

ततो गारुत्मतं तीर्थं संसारगरनाशनम् । कृतोदकक्रियस्तत्र वैकुंठे वसतिं लभेत्

फिर गारुत्मत तीर्थ है, जो संसार-रूपी विष का नाश करता है। वहाँ उदक-क्रिया करने वाला वैकुण्ठ में निवास पाता है।

Verse 14

पंचतीर्थ्यां नरः स्नात्वा न देहं पांचभौतिकम् । गृह्णाति जातुचित्काश्यां पंचास्योवाथ जायते

पञ्चतीर्थी में स्नान करके मनुष्य काशी में फिर कभी पंचभौतिक देह धारण नहीं करता; अपितु वह ‘पंचास्य’ दिव्य रूप से युक्त हो जाता है।

Verse 15

प्रह्लादतीर्थं तद्याम्ये महाभक्तिफलप्रदम् । तत्र वै स्नानमात्रेण विष्णोः प्रियतरो भवेत्

उसके दक्षिण में प्रह्लाद-तीर्थ है, जो महाभक्ति का फल देने वाला है। वहाँ केवल स्नान करने से ही मनुष्य विष्णु को अत्यन्त प्रिय हो जाता है।

Verse 16

अंबरीषं ततस्तीर्थं महापातकनाशनम् । तत्र वै शुभकर्माणो जना नो गर्भभाजनम्

फिर अम्बरीष-तीर्थ है, जो महापातकों का नाश करने वाला है। वहाँ शुभ कर्म करने वाले जन फिर गर्भ-भाजन (पुनर्जन्म) नहीं होते।

Verse 17

आदित्यकेशवं नाम तदग्रे तीर्थमुत्तमम् । कृताभिषेकस्तत्रापि लभेत्स्वर्गाभिषेचनम्

इसके आगे ‘आदित्य-केशव’ नामक उत्तम तीर्थ है। वहाँ अभिषेक करने वाला प्राणी स्वर्ग में अभिषेक (दिव्य सम्मान) प्राप्त करता है।

Verse 18

दत्तात्रेयस्य तत्रास्ति तीर्थं त्रैलोक्यपावनम् । योगसिद्धिं लभे तत्र स्नानमात्रेण भावतः

वहाँ दत्तात्रेय का तीर्थ भी है, जो त्रैलोक्य को पावन करने वाला है। श्रद्धाभाव से वहाँ केवल स्नान करने पर योग-सिद्धि अवश्य प्राप्त होती है।

Verse 19

ततो नारदतीर्थं च ब्रह्मविद्यैककारणम् । तत्र स्नानेन मुक्तः स्याद्दृष्ट्वा नारदकेशवम्

तत्पश्चात् नारद-तीर्थ है, जो ब्रह्मविद्या का एकमात्र कारण कहा गया है। वहाँ स्नान करके और नारद-केशव के दर्शन से मनुष्य मोक्ष को प्राप्त होता है।

Verse 20

ततो वामनतीर्थं च विष्णुसान्निध्यहेतुकम् । तत्र श्राद्धविधानेन मुच्यते पितृजादृणात्

फिर वामन-तीर्थ है, जो विष्णु-सान्निध्य का हेतु है। वहाँ श्राद्ध-विधान करने से मनुष्य पितृ-ऋण से मुक्त हो जाता है।

Verse 21

नरनारायणाख्यं हि ततस्तीर्थं शुभप्रदम् । तत्तीर्थमज्जनात्पुंसां गर्भवासः सुदुर्लभः

उसके बाद नर-नारायण नामक तीर्थ है, जो शुभफल देने वाला है। उस तीर्थ में स्नान करने से लोगों के लिए गर्भवास (पुनर्जन्म) अत्यन्त दुर्लभ हो जाता है।

Verse 22

यज्ञवाराहतीर्थं च ततो दक्षिणतः शुभम् । यत्र स्नातस्य वै पुंसां राजसूयफलं ध्रुवम्

उससे दक्षिण दिशा में शुभ यज्ञ-वाराह-तीर्थ है। जहाँ स्नान करने वाले पुरुष को राजसूय यज्ञ का फल निश्चय ही प्राप्त होता है।

Verse 23

विदारनारसिंहाख्यं तीर्थं तत्रास्ति पावनम् । यत्रैकस्नानतो नश्येदघ जन्मशतार्जितम्

वहाँ विदार-नारसिंह नामक पावन तीर्थ भी है। जहाँ एक बार स्नान करने मात्र से सौ जन्मों में अर्जित पाप नष्ट हो जाता है।

Verse 24

गोपीगोविंदतीर्थं च ततो वैष्णवलोकदम् । यस्मिन्स्नातो नरो विद्वान्न विंद्याद्गर्भवेदनम्

इसके बाद गोपी-गोविंद तीर्थ है, जो वैष्णव लोक प्रदान करता है। उसमें स्नान करने वाला विद्वान पुरुष फिर गर्भ की पीड़ा नहीं पाता।

Verse 25

लक्ष्मीनृसिंहतीर्थं च गोपीगोविंद दक्षिणे । निर्वाणलक्ष्म्या यत्रत्यो व्रियते तु नरोत्तमः

गोपी-गोविंद के दक्षिण में लक्ष्मी-नृसिंह तीर्थ भी है। वहाँ देह त्यागने वाला नरश्रेष्ठ निर्वाण-लक्ष्मी (मोक्ष-सम्पदा) को प्राप्त होता है।

Verse 26

तद्दक्षिणायां काष्ठायां शेषतीर्थमनुत्तमम् । महापापौघ शेषोपि न तिष्ठेद्यन्निमज्जनात्

उसके दक्षिण भाग की काष्ठा में अनुपम शेष-तीर्थ है। वहाँ डुबकी लगाने से महापापों के प्रवाह का शेष अंश भी टिक नहीं पाता।

Verse 27

शंखमाधवतीर्थं च तद्याम्यां दिशि चोत्तमम् । तत्तीर्थसेवनान्नृणां कुतः पापभयं महत्

और दक्षिण दिशा में उत्तम शंख-माधव तीर्थ है। उस तीर्थ का सेवन-सेवा करने वाले मनुष्यों को फिर महान पाप-भय कहाँ?

Verse 28

ततोपि पावनतरं तीर्थं तत्क्षणसिद्धिदम् । नीलग्रीवाख्यमतुलं तत्स्नायी सर्वदा शुचिः

उनसे भी अधिक पावन एक तीर्थ है, जो क्षणमात्र में सिद्धि देता है। वह अतुल ‘नीलग्रीव’ नामक है; वहाँ स्नान करने वाला सदा शुद्ध रहता है।

Verse 29

तत्रोद्दालकतीर्थं च सर्वाघौघ विनाशनम् । ददाति महतीमृद्धिं स्नानमात्रेण तन्नृणाम्

वहाँ उद्‍दालक तीर्थ है, जो पाप-समूह के प्रवाह का नाश करने वाला है। वहाँ केवल स्नान करने से मनुष्यों को महान् समृद्धि और कल्याण प्राप्त होता है।

Verse 30

ततः सांख्याख्य तीर्थं च सांख्येश्वर समीपतः । तत्तीर्थसेवनात्पुंसां सांख्ययोगः प्रसीदति

इसके बाद सांख्य नामक तीर्थ है, जो सांख्येश्वर के समीप स्थित है। उस तीर्थ का सेवन-सेवा करने से मनुष्य का सांख्ययोग (विवेकमार्ग) प्रसन्न और स्पष्ट होता है।

Verse 31

स्वर्लोकाद्यत्र संलीनः स्वयं देव उमापतिः । अतः स्वर्लीनतीर्थं च स्वर्लीनेश्वर सन्निधौ

जहाँ स्वर्लोक से ही स्वयं देव उमापति (शिव) लीन हुए कहे जाते हैं। इसलिए स्वर्लीनेश्वर के सन्निधि में वह ‘स्वर्लीन तीर्थ’ कहलाता है।

Verse 32

तत्र स्नानेन दानेन श्रद्धया द्विजभोजनैः । जपहोमार्चनैः पुंसामक्षयं सर्वमेव हि

वहाँ स्नान, दान, श्रद्धापूर्वक किए कर्म, द्विजों का भोजन, तथा जप-होम और अर्चन से—मनुष्य के लिए सब कुछ निश्चय ही अक्षय पुण्य बन जाता है।

Verse 33

महिषासुरतीर्थं च तत्समीपेति पावनम् । यत्र तप्त्वा स दैत्येंद्रो विजिग्ये सकलान्सुरान्

उसके समीप पावन ‘महिषासुर तीर्थ’ है, जहाँ तप करके उस दैत्येन्द्र ने समस्त देवताओं को जीत लिया था।

Verse 34

तत्तीर्थसेवकोद्यापि नारिभिः परिभूयते । न पातकैर्महद्भिश्च प्रार्थितं च फलं लभेत्

उस तीर्थ का सेवक यदि स्त्रियों द्वारा भी तिरस्कृत हो, तो भी वह महापातकों से लिप्त नहीं होता; और जो फल वह प्रार्थना करता है, वही प्राप्त करता है।

Verse 35

बाणतीर्थं च तस्यारात्तत्सहस्रभुजप्रदम् । तत्र स्नातो नरो भक्तिं प्राप्नुयाच्छांभवीं स्थिराम्

उसके निकट बाणतीर्थ है, जो ‘सहस्रभुज’—अर्थात् अद्भुत सामर्थ्य—प्रदान करता है। वहाँ स्नान करने वाला मनुष्य शम्भु (शिव) की स्थिर भक्ति प्राप्त करता है।

Verse 36

गोप्रतारेश्वरं नाम तदग्रे तीर्थमुत्तमम् । अपुत्रोपि तरेद्यत्र स्नातो वैतरणीं सुखम्

उसके आगे ‘गोप्रतारेश्वर’ नाम का उत्तम तीर्थ है। वहाँ स्नान करने से पुत्रहीन पुरुष भी वैतरणी को सुखपूर्वक पार कर लेता है।

Verse 37

तीर्थं हिरण्यगर्भाख्यं तद्याम्ये सर्वपापहृत् । तत्र स्नातो हिरण्येन मुच्यते न कदाचन

दक्षिण दिशा में ‘हिरण्यगर्भ’ नाम का तीर्थ है, जो सब पापों का हरण करता है। वहाँ स्नान करने वाला मनुष्य ‘हिरण्य’—धन-आसक्ति के बंधन—से फिर कभी नहीं बँधता।

Verse 38

ततः प्रणवतीर्थं च सर्वतीर्थोत्तमोत्तमम् । जीवन्मुक्तो भवेत्तत्र स्नानमात्रेण मानवः

तदनंतर ‘प्रणवतीर्थ’ है, जो समस्त तीर्थों में उत्तमोत्तम है। वहाँ केवल स्नान मात्र से मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है।

Verse 39

ततः पिशंगिला तीर्थं दर्शनादपि पापहृत् । मुने ममाधिष्ठानं वै तदगस्तेऽति सिद्धिदम्

तत्पश्चात् पिशंगिला नाम तीर्थ आता है; उसका केवल दर्शन भी पाप हर लेता है। हे मुने, वह स्थान वास्तव में मेरा ही अधिष्ठान है—हे अगस्त्य, तुम्हें विदित—परम सिद्धि देने वाला।

Verse 40

स्नात्वा पिशंगिला तीर्थे दत्त्वा दानं च किंचन । किं शोचति कृतात्पापादन्यत्रापि मृतो यदि

पिशंगिला तीर्थ में स्नान करके और कुछ दान देकर, पूर्वकृत पापों के लिए मनुष्य क्यों शोक करे? यदि वह कहीं और भी मर जाए, तब भी शोक का कारण नहीं।

Verse 41

यो वै पिशंगिला तीर्थे स्नात्वा मामर्चयिष्यति । भविष्यति स मे मित्त्रं मित्रतेजः समप्रभम्

जो पिशंगिला तीर्थ में स्नान करके वहाँ मेरी पूजा करेगा, वह मेरा मित्र बन जाएगा—मित्रता के तेज के समान दीप्तिमान।

Verse 42

ततस्त्रैविष्टपीदृष्टि निर्मलीकृत पुष्कलम् । तीर्थं पिलिपिलाख्यं वै मनोमलविनाशनम्

तत्पश्चात् ‘पिलिपिला’ नामक पुष्कल तीर्थ है, जो स्वर्गदेवताओं के दर्शन से निर्मल हुआ है और मन के मल को नष्ट करता है।

Verse 43

तत्र श्राद्धादिकरणाद्दीनानाथ प्रतर्पणात् । महतीं श्रियमाप्नोति मानवोतीव निश्चलाम्

वहाँ श्राद्ध आदि कर्म करने से और दीन-निर्बलों को तृप्त करने से मनुष्य महान् श्री को प्राप्त होता है—अत्यन्त स्थिर और चिरस्थायी।

Verse 44

ततो नागेश्वरं तीर्थं महाघपरिशोधनम् । तत्तीर्थमज्जनादेव भवेत्सर्वाघसंक्षयः

तत्पश्चात् नागेश्वर तीर्थ आता है, जो महापापों का शोधन करने वाला है। उस पवित्र जल में केवल स्नान करने से ही समस्त पापों का नाश हो जाता है।

Verse 45

तद्दक्षिणे महापुण्यं कर्णादित्याख्यमुत्तमम् । तीर्थं यत्राप्लुतो मर्त्यो भास्करीं श्रियमावहेत्

उसके दक्षिण में महापुण्यदायक, परम उत्तम ‘कर्णादित्य’ नामक तीर्थ है। जहाँ स्नान करने वाला मनुष्य सूर्य-तेज और समृद्धि को प्राप्त करता है।

Verse 46

ततो भैरवतीर्थं च महाघौघक्षयप्रदम् । चतुरर्थोदयकरं सर्वविघ्ननिवारणम्

तत्पश्चात् भैरव तीर्थ है, जो महापापों के प्रवाह का नाश करने वाला है। वह धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष—चारों पुरुषार्थों का उदय कराता और समस्त विघ्नों को दूर करता है।

Verse 47

भौमाष्टम्यां तत्र नरः स्नात्वा संतर्पयेत्पितॄन् । दृष्ट्वा च भैरवं कालं कलिं कालं च संजयेत्

भौमाष्टमी के दिन वहाँ मनुष्य स्नान करके पितरों का तर्पण करे। और कालस्वरूप भैरव के दर्शन से वह कलियुग को भी जीत लेता है तथा काल पर भी विजय पाता है।

Verse 48

तीर्थं खर्वनृसिंहाख्यं तीर्थाद्भरवतः पुरः । तत्र स्नातस्य वै पुंसः कुतोघजनितं भयम्

भैरव तीर्थ के सामने ‘खर्व-नृसिंह’ नामक तीर्थ है। वहाँ स्नान करने वाले पुरुष को पापजन्य भय कहाँ रह सकता है?

Verse 49

मृकंडस्य मुनेस्तीर्थं तद्याम्यामतिनिर्मलम । तत्र स्नानेन मर्त्यानां नापायमरणं क्वचित्

दक्षिण दिशा में मृकण्ड मुनि का अत्यन्त निर्मल तीर्थ है। वहाँ स्नान करने से मनुष्यों को कभी भी अपायकारी, अशुभ मृत्यु नहीं होती।

Verse 50

ततः पंचनदाख्यं वै सर्वतीर्थनिषेवितम् । तीर्थं यत्र नरः स्नात्वा न संसारी पुनर्भवेत्

इसके बाद ‘पञ्चनद’ नामक तीर्थ आता है, जिसे समस्त तीर्थ सेवन करते हैं। वहाँ स्नान करके मनुष्य फिर संसार-बन्धन में नहीं पड़ता।

Verse 51

ब्रह्मांडोदरवर्तीनि यानि तीर्थानि सर्वतः । ऊर्जे यत्र समायांति स्वाघौघ परिनुत्तये

ब्रह्माण्ड के भीतर जहाँ-जहाँ तीर्थ हैं, वे सब ऊर्ज (कार्तिक) मास में वहाँ एकत्र होते हैं, अपने संचित पाप-समूह को दूर करने के लिए।

Verse 52

सर्वदा यत्र सर्वाणि दशम्यादिदिनत्रयम् । तिष्ठंति तीर्थवर्याणि निजनैर्मल्यहेतवे

वह स्थान ऐसा है जहाँ सदा दशमी से आरम्भ होने वाले तीन दिनों तक श्रेष्ठ तीर्थ अपने ही नैर्मल्य (शुद्धि) के लिए निवास करते हैं।

Verse 53

भूरिशः सर्वतीर्थानि मध्य काशि पदेपदे । परं पांचनदः कैश्चिन्महिमानापि कुत्रचित्

काशी के मध्य में पग-पग पर असंख्य तीर्थ हैं; तथापि पञ्चनद परम है—कुछ लोग उसकी महिमा को कहीं भी अनुपम कहते हैं।

Verse 54

अप्येकं कार्तिकस्याहस्तत्र वै सफलीकृतम् । जपहोमार्चनादानैः कृतकृत्यास्त एव हि

वहाँ कार्तिक का एक भी दिन बिताया जाए तो वह निश्चय ही सफल हो जाता है। जप, होम, पूजन और दान से वे जन कृतकृत्य हो जाते हैं।

Verse 55

सर्वाण्यपि च तीर्थानि युगपत्तुलितान्यपि । नाधिजन्मुः पंचनद्याः कलाया अपि तुल्यताम्

यदि समस्त तीर्थों को एक साथ तौल भी दिया जाए, तब भी वे पंचनदा के पुण्य-प्रभाव की एक कला के भी तुल्य नहीं हो सकते।

Verse 56

स्नात्वा पांचनदे तीर्थे दृष्ट्वा वै बिंदुमाधवम् । न जातु जायते धीमाञ्जननी जठराजिरे

पंचनदा तीर्थ में स्नान करके और बिंदुमाधव के दर्शन कर, बुद्धिमान पुरुष फिर कभी माता के गर्भ—उस उदर-कारागार—में जन्म नहीं लेता।

Verse 57

ततो ज्ञानहदं तीर्थं जडानामपि जाड्यहृत् । तत्र स्नातो नरो जातु ज्ञानभ्रंशं न चाप्नुयात्

तदनंतर ‘ज्ञानहद’ नामक तीर्थ है, जो जड़ों की भी जड़ता हर लेता है। वहाँ स्नान करने वाला मनुष्य कभी ज्ञान-भ्रंश को प्राप्त नहीं होता।

Verse 58

तत्र ज्ञानह्रदे स्नात्वा दृष्ट्वा ज्ञानेश्वरं नरः । ज्ञानं तदधिगच्छेद्वै येन नो बाध्यते पुनः

वहाँ ज्ञानह्रद में स्नान करके और ज्ञानेश्वर के दर्शन कर, मनुष्य उस ज्ञान को निश्चय ही प्राप्त करता है, जिससे वह फिर कभी बाधित नहीं होता।

Verse 59

ततोस्ति मंगलं तीर्थं सर्वामंगलनाशनम् । तत्रावगाहनं कृत्वा भवेन्मंगलभाजनम्

तत्पश्चात ‘मङ्गल’ नाम तीर्थ है, जो समस्त अमंगल का नाश करता है। वहाँ अवगाहन करके स्नान करने से मनुष्य मंगल का पात्र बनता है।

Verse 60

अमंगलानि नश्येयुर्भवेयुर्मंगलानि च । स्नातुर्वै मंगले तीर्थे नमस्कर्तुश्च मंगलम्

अमंगल नष्ट हो जाते हैं और मंगल फल प्रकट होते हैं। मङ्गल-तीर्थ में स्नान करने वाले तथा वहाँ नमस्कार करने वाले को अवश्य मंगल प्राप्त होता है।

Verse 61

मयूखमालिनस्तीर्थं तदग्रे मलनाशनम् । तत्राप्लुतो गभस्तीशं विलोक्य विमलो भवेत्

‘मयूखमालिन्’ नामक तीर्थ है; उसके आगे ‘मलनाशन’ नाम का (दूसरा) तीर्थ है। वहाँ स्नान करके और गभस्तीश का दर्शन करने से मनुष्य निर्मल हो जाता है।

Verse 62

मखतीर्थं तु तत्रैव मखैश्वर समीपतः । मखजं पुण्यमाप्नोति तत्र स्नातो नरोत्तमः

वहीं मखेेश्वर के समीप ‘मख-तीर्थ’ है। वहाँ स्नान करने वाला श्रेष्ठ पुरुष यज्ञजन्य पुण्य को प्राप्त करता है।

Verse 63

तत्पार्श्वे बिंदुतीर्थं च परमज्ञानकारणम् । तत्र श्राद्धादिकं कृत्वा लभेत्सुकृतमुत्तमम्

उसके पार्श्व में ‘बिन्दु-तीर्थ’ है, जो परम ज्ञान का कारण है। वहाँ श्राद्ध आदि कर्म करके मनुष्य उत्तम सुकृत (श्रेष्ठ पुण्य) प्राप्त करता है।

Verse 64

पिप्पलादस्य च मुनेस्तीर्थं तद्याम्यदिक्स्थितम् । स्नात्वा शनेर्दिने तत्र दृष्ट्वावै पिप्पलेश्वरम्

दक्षिण दिशा में मुनि पिप्पलाद का तीर्थ स्थित है। शनिवासर को वहाँ स्नान करके और पिप्पलेश्वर के दर्शन करके साधक फल प्राप्त करता है।

Verse 65

पिप्पलं तत्र सेवित्वा अश्वत्थ इति मंत्रतः । शनिपीडां न लभते दुःस्वप्नं चापि नाशयेत्

वहाँ ‘अश्वत्थ’ मंत्र का जप करते हुए पिप्पल की सेवा करने से शनि की पीड़ा नहीं होती और दुःस्वप्न भी नष्ट हो जाते हैं।

Verse 66

ततस्ताम्रवराहाख्यं तीर्थं चैवातिपावनम् । यत्र स्नानेन दानेन न मज्जेदघसागरे

इसके बाद ‘ताम्र-वराह’ नाम का अत्यन्त पावन तीर्थ है। जहाँ स्नान और दान करने से मनुष्य पाप-सागर में नहीं डूबता।

Verse 67

तदग्रे कालगंगा च कलिकल्मषनाशिनी । तस्यां स्नात्वा नरो धीमांस्तत्क्षणान्निरघो भवेत्

उसके आगे ‘कालगंगा’ है, जो कलियुग के कल्मष का नाश करती है। उसमें स्नान करके बुद्धिमान मनुष्य उसी क्षण निष्पाप हो जाता है।

Verse 68

इंद्रद्युम्नं महातीर्थमिंद्रद्युम्नेश्वराग्रतः । तोयकृत्यं तत्र कृत्वा लोकमैंद्रमवाप्नुयात

इन्द्रद्युम्नेश्वर के सम्मुख ‘इन्द्रद्युम्न’ नाम का महातीर्थ है। वहाँ जल-कृत्य (तर्पणादि) करके साधक इन्द्रलोक को प्राप्त कर सकता है।

Verse 69

ततस्तु रामतीर्थं च वीररामेश्वराग्रतः । तत्तीर्थस्नानमात्रेण वैष्णवं लोकमाप्नुयात्

इसके बाद वीर रामेश्वर के सामने रामतीर्थ स्थित है। उस तीर्थ में स्नान मात्र से मनुष्य वैष्णव लोक (विष्णु धाम) को प्राप्त करता है।

Verse 70

तत ऐक्ष्वाकवं तीर्थं सर्वाघौघविनाशनम् । तत्र स्नानेन पूतात्मा जायते मनुजोत्तमः

इसके बाद समस्त पापों के समूह का नाश करने वाला ऐक्ष्वाकव तीर्थ है। वहाँ स्नान करने से मनुष्य पवित्र आत्मा होकर नरोत्तम बन जाता है।

Verse 71

मरुत्ततीर्थं तत्प्रांते मरुत्तेश्वरसन्निधो । तत्र स्नात्वा तमर्च्येशं महदैश्वर्यमाप्नुयात्

उसके समीप मरुत्तेश्वर के सान्निध्य में मरुत्ततीर्थ है। वहाँ स्नान करके उस ईश्वर की पूजा करने से महान ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।

Verse 72

मैत्रावरुणतीर्थं च ततः पातकनाशनम् । तत्र पिंडप्रदानेन पितॄणां भवति प्रियः

तदनन्तर पापों का नाश करने वाला मैत्रावरुण तीर्थ है। वहाँ पिंडदान करने से मनुष्य पितरों का प्रिय हो जाता है।

Verse 73

ततोग्नितीर्थविमलमग्नीश पुरतो महत् । अग्निलोकमवाप्नोति तत्तीर्थपरिमज्जनात्

इसके बाद अग्नीश के सामने निर्मल और महान अग्नितीर्थ है। उस तीर्थ में डुबकी लगाने से अग्निलोक की प्राप्ति होती है।

Verse 74

अंगारतीर्थं तत्रैव अंगारेश्वरसन्निधौ । तत्रांगार चतुर्थ्यां नु स्नात्वा निष्पापतामियात्

वहीं अंगारेश्वर के समीप अंगारतीर्थ है। वहाँ अंगारकी चतुर्थी को स्नान करने से मनुष्य पापमुक्त हो जाता है।

Verse 75

ततो वै कलितीर्थं च कलशेश्वरसन्निधौ । स्नात्वा तल्लिंगमभ्यर्च्य कलिकालान्न बिभ्यति

तत्पश्चात् कलशेश्वर के समीप कलितीर्थ है। वहाँ स्नान करके उस लिंग की पूजा करने से कलिकाल का भय नहीं रहता।

Verse 76

चंद्रतीर्थं च तत्रैव चंद्रेश्वरसमीपतः । तत्र स्नात्वार्च्य चंद्रेशं चंद्रलोकमवाप्नुयात्

वहीं चंद्रेश्वर के समीप चंद्रतीर्थ है। वहाँ स्नान करके चंद्रेश्वर की पूजा करने से चंद्रलोक की प्राप्ति होती है।

Verse 77

तदग्रे वीरतीर्थं च वीरेश्वर समीपतः । यदुक्तं प्राक्तवपुरस्तीर्थानामुत्तमं परम्

उसके आगे वीरेश्वर के समीप वीरतीर्थ है, जिसे पहले तीर्थों में परम उत्तम कहा गया है।

Verse 78

विघ्नेशतीर्थं च ततः सर्वविघ्नविघातकृत् । जातुचित्तत्र संस्नातो न विघ्नैरभिभूयते

तदनन्तर सर्वविघ्ननाशक विघ्नेशतीर्थ है। वहाँ स्नान करने वाला कभी भी विघ्नों से पराजित नहीं होता।

Verse 79

हरिश्चंद्रस्य राजर्षस्ततस्तीर्थमनुत्तमम् । यत्र स्नातो नरो जातु न सत्याच्चयवते कचित्

इसके बाद राजर्षि हरिश्चन्द्र का अनुपम तीर्थ है। वहाँ स्नान करने वाला मनुष्य कभी भी सत्य से विचलित नहीं होता।

Verse 80

हरिश्चंद्रस्य तीर्थे तु यच्छ्रेयः समुपार्जितम् । तदक्षयफलं वीर इह लोके परत्र च

हे वीर! हरिश्चन्द्र के तीर्थ में जो भी पुण्य अर्जित होता है, उसका फल अक्षय होता है—इस लोक में भी और परलोक में भी।

Verse 81

ततः पर्वततीर्थं च पर्वतेश समीपतः । सर्वपर्वफलं तस्य स्नात्वा पर्वण्यपर्वणि

फिर पर्वतेश के समीप पर्वत-तीर्थ है। वहाँ स्नान करने से—पर्व के दिन हो या न हो—सभी पर्वों का फल प्राप्त होता है।

Verse 82

कंबलाश्वतरं तीर्थं तत्र सर्वविषापहम् । तत्र स्नातो भवेन्मर्त्यो गीतविद्याविशारदः

इसके बाद कंबलाश्वतर नामक तीर्थ है, जो समस्त विषों का नाश करने वाला है। वहाँ स्नान करने वाला मनुष्य गीत-विद्या में निपुण हो जाता है।

Verse 83

ततः सारस्वतं तीर्थं सर्वविद्योपपादकम् । तिष्ठेयुः पितरस्तत्र सह देवर्षिमानवैः

फिर सारस्वत तीर्थ है, जो समस्त विद्याओं को प्रदान करने वाला है। वहाँ पितृगण देवर्षियों और श्रेष्ठ मानवों के साथ निवास करते हैं।

Verse 84

उमातीर्थं तु तत्रैव सर्वशक्तिसमन्वितम् । औमेयलोकप्राप्त्यै स्यात्स्नानमात्रेण निश्चितम्

वहीं उमातीर्थ है, जो समस्त शक्तियों से युक्त है। केवल स्नान मात्र से ही उमा के दिव्य लोक की प्राप्ति निश्चय होती है।

Verse 85

ततस्त्रिलोकी विख्यातं त्रिलोक्युद्धरणक्षमम् । तीर्थं श्रेष्ठतरं वीर यदाख्या मणिकर्णिका

तदनन्तर वह परम श्रेष्ठ तीर्थ आता है, जो त्रिलोकी में विख्यात और त्रिलोकी का उद्धार करने में समर्थ है—हे वीर—जिसका नाम मणिकर्णिका है।

Verse 86

चक्रपुष्करिणीतीर्थं तदादौ विष्णुना कृतम् । तदाख्या कर्णनादेव सर्वैः पापैः प्रमुच्यते

चक्रपुष्करिणी नामक तीर्थ प्राचीन काल में विष्णु द्वारा निर्मित किया गया। उसका नाम मात्र सुनने से ही मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

Verse 87

स्वर्गौकसस्त्रिसंध्यं वै जपंति मणिकर्णिकाम् । यन्नामग्रहणं पुंसां श्रेयसं परमाय हि

स्वर्गवासी त्रिसंध्या में निश्चय ही ‘मणिकर्णिका’ का जप करते हैं। उसके नाम का उच्चारण मनुष्यों को परम कल्याण की ओर ले जाता है।

Verse 88

यैः श्रुता यैः स्मृता वीर यैर्दृष्टा मणिकर्णिका । त एव कृतिनो लोके कृतकृत्यास्त एव हि

हे वीर, जिनके द्वारा मणिकर्णिका का श्रवण, स्मरण या दर्शन किया गया है—वही इस लोक में धन्य हैं; वही कृतकृत्य हैं।

Verse 89

त्रिलोके ये जपंतीह मानवा मणिकर्णिकाम् । जपामि तानहं वीर त्रिकालं पुण्यकर्मणः

हे वीर! त्रिलोकों में जो मनुष्य यहाँ मणिकर्णिका का जप करते हैं, उन पुण्यकर्मा जनों को मैं स्वयं त्रिकाल स्मरण कर जपता हूँ।

Verse 90

इष्टं तेन महायज्ञैः सहस्रशतदक्षिणैः । पंचाक्षरी महाविद्या येनोक्ता मणिकर्णिका

उसने सहस्रों-शतों दक्षिणाओं सहित महायज्ञों का यथाविधि अनुष्ठान किया है; और उसी ने पंचाक्षरी महाविद्या—‘मणिकर्णिका’—का उच्चारण किया है।

Verse 91

महादानानि दत्तानि तेन वै पुण्यकर्मणा । येनाहमर्चितो वीर संप्राप्य मणिकर्णिकाम्

उस पुण्यकर्मा ने निश्चय ही महादान दिए हैं; क्योंकि, हे वीर, मणिकर्णिका को प्राप्त होकर उसने मेरी पूजा की।

Verse 92

मणिकर्ण्यंबुभिर्येन तर्पिताः प्रपितामहाः । तेन श्राद्धानि दत्तानि गयायां मधुपायसैः

जिसने मणिकर्णिका के जल से पितामहों को तृप्त किया है, उसने मानो गया में मधु-पायस से श्राद्ध अर्पित कर दिया।

Verse 93

मणिकर्णीजलं येन संपीतं शुद्धबुद्धिना । किं तस्य सोमपानैस्तैः पुनरावृत्तिलक्षणैः

जिसने शुद्ध बुद्धि से मणिकर्णिका का जल पी लिया, उसे पुनर्जन्म-चिह्न वाले उन सोमपानों की क्या आवश्यकता?

Verse 94

ते स्नाताः सर्वतीर्थेषु महापर्वसुभूरिशः । तथा च सर्वावभृथैर्यैः स्नाता मणिकर्णिका

जिन्होंने मणिकर्णिका में स्नान किया है, उन्होंने मानो सभी तीर्थों में स्नान कर लिया; असंख्य महापर्वों में स्नान किया और समस्त अवभृथ-स्नान भी कर लिए।

Verse 95

तैः सुराः पूजिताः सर्वे ब्रह्मविष्णुमुखा मखैः । यैः स्वर्णकुसुमैरत्नैरर्चिता मणिकर्णिका

जिन्होंने स्वर्ण-पुष्पों और रत्नों से मणिकर्णिका की अर्चना की है, उन्होंने यज्ञों द्वारा ब्रह्मा-विष्णु आदि समस्त देवताओं की पूजा कर ली है।

Verse 96

अहं तेनोमया सार्धं दीक्षां संप्राप्य शांभवीम् । अर्चितः प्रत्यहं येन पूजिता णिकर्णिका

उमा के साथ शांभवी दीक्षा प्राप्त करके वह मुझे प्रतिदिन पूजता है; और उसी के द्वारा मणिकर्णिका भी पूजित होती है।

Verse 97

तपांसि तेन तप्तानि शीर्णपर्णादिना चिरम् । सेविता श्रद्धया येन श्रीमती मणिकर्णिका

जिसने सूखे पत्तों आदि पर निर्वाह करते हुए दीर्घकाल तक तप किया, उसने श्रद्धा से श्रीसम्पन्न मणिकर्णिका की सेवा की है।

Verse 98

दत्त्वा दानानि भूरीणि मखानिष्ट्वा तु भूरिशः । चिरं तप्त्वाप्यरण्येषु स्वर्गैश्वर्यान्महीं पुनः

बहुत-से दान देकर, अनेक यज्ञ करके और वनों में दीर्घ तप करने पर भी, स्वर्ग के ऐश्वर्य भोगकर जीव फिर पृथ्वी पर लौट आता है।

Verse 99

विपुलेत्र महीपृष्ठे पंचक्रोश्यां मनोहरा । संश्रिता मणिकर्णीयैस्ते याताश्चानिवर्तकाः

इस विशाल पृथ्वी-प्रदेश में, काशी की मनोहर पंचक्रोशी-परिक्रमा के भीतर, जो मणिकर्णिका के भक्तों की शरण लेते हैं, वे अनिवर्तक होकर आगे बढ़ते हैं—मोक्ष पाकर फिर लौटते नहीं।

Verse 100

दानानां च व्रतानां च क्रतूनां तपसामपि । इदमेव फलं मन्ये यदाप्या मणिकर्णिका

दान, व्रत, यज्ञ और तप—इन सबका सच्चा फल मैं यही मानता हूँ कि मणिकर्णिका की प्राप्ति हो और उसके पावन जल का स्पर्श-लाभ मिले।

Verse 110

एतेषामपि तीर्थानां चतुर्णामपि सत्तम । पंचमं मणिकर्ण्याख्यं मनावेयवशुद्धिदम्

हे सत्पुरुषश्रेष्ठ! इन चार तीर्थों के बीच भी एक पाँचवाँ तीर्थ है, जिसे मणिकर्णी (मणिकर्णिका) कहते हैं; वह मन और देह के सूक्ष्मतम अंश तक शुद्धि प्रदान कर पूर्ण निर्मलता देता है।

Verse 117

इति वीरेश्वराख्यानं तीर्थाख्यानप्रसंगतः । कथितं ते पुरागस्ते कामेशं कथयाम्यतः

इस प्रकार तीर्थों के वर्णन-प्रसंग में, हे अगस्त्य, तुम्हें वीरेश्वर की कथा कह दी गई। अब इसके बाद मैं कामेश का माहात्म्य सुनाता हूँ।