Setubandha Mahatmya
Brahma Khanda52 Adhyayas4490 Shlokas

Setu Khanda

Setubandha Mahatmya

Setukhaṇḍa is anchored in the sacred geography of Setu (Rāma-setu / Setubandha) and adjacent coastal-pilgrimage zones associated with the crossing to Laṅkā. The section treats the seashore as a ritual boundary-space where vows, propitiation of the ocean (Varuṇālaya), and tīrtha networks converge. It maps merit through named bathing-sites (tīrthas) and narratively legitimizes them via the Rāma-cycle, presenting the region as both an epic memorial landscape and a functional pilgrimage itinerary.

Adhyayas in Setubandha Mahatmya

52 chapters to explore.

Adhyaya 1

Adhyaya 1

सेतुमाहात्म्य-प्रस्तावना — Prologue to the Glory of Setu (Rāmasetu/Rāmeśvara)

अध्याय का आरम्भ मंगलाचरण से होता है। नैमिषारण्य में मोक्ष की कामना करने वाले ऋषि—संयमी, अपरिग्रही, सत्यनिष्ठ और विष्णुभक्त—एक विशाल सभा में पाप-नाशक कथाओं तथा लोक-कल्याण और मुक्ति के साधनों पर विचार करते हैं। उसी समय व्यास-शिष्य, पुराण-वक्ता सूत वहाँ आते हैं और शौनक आदि ऋषि उनका विधिपूर्वक सत्कार करते हैं। ऋषि उनसे पवित्र क्षेत्र-तीर्थों, संसार से मोक्ष, हरि-हर की भक्ति की उत्पत्ति और त्रिविध कर्म की प्रभावशीलता के विषय में प्रश्न करते हैं। सूत कहते हैं कि रामसेतु पर स्थित रामेश्वर सभी तीर्थों में श्रेष्ठ है। सेतु का दर्शन मात्र भी संसार-बन्धन को ढीला करता है; स्नान और स्मरण को शुद्धि के साधन बताया गया है। विस्तृत फलश्रुति में महापापों का नाश, दण्ड्य परलोक-स्थितियों से रक्षा, तथा यज्ञ, व्रत, दान और तप के तुल्य व्यापक पुण्य का वर्णन है। इसके साथ तीर्थयात्रा-नीति भी आती है—भाव की शुद्धता, यात्रा हेतु उचित सहायता लेना, दान-ग्रहण की मर्यादा, और सेतु-यात्रा के नाम पर धन में कपट करने की कठोर निन्दा। अंत में कहा गया है कि कृत में ज्ञान, त्रेता में यज्ञ, और उत्तर युगों में दान प्रशस्त है, पर सेतु-साधना सर्वयुगों में सर्वहितकारी मानी गई है।

103 verses

Adhyaya 2

Adhyaya 2

सेतुबंधनवर्णनम् (Setubandha—Account of the Bridge and the Setu Tīrthas)

इस अध्याय में ऋषि सूतजी से पूछते हैं कि अक्लिष्टकर्मा श्रीराम ने गहरे वरुणालय समुद्र पर सेतु कैसे बाँधा, और सेतु-क्षेत्र तथा गन्धमादन-प्रसंग में कितने तीर्थ हैं। सूतजी संक्षेप में रामकथा का क्रम बताते हैं—दण्डकारण्य व पंचवटी में निवास, मारीच के वेश से रावण द्वारा सीता-हरण, राम का अन्वेषण और हनुमान से मिलन, अग्नि-साक्षी से सुग्रीव से मैत्री, वालि-वध, सीता-उद्धार हेतु वानर-सेना का उद्योग, हनुमान का लंका-गमन और चूड़ामणि का प्रत्यावर्तन, महेन्द्र पर्वत की ओर प्रस्थान और चक्र-तीर्थ में निवास, तथा विभीषण का आगमन, परीक्षा और अभिषेक। समुद्र पार करने के उपायों पर विचार होता है—नौकाएँ, तैरते साधन, या समुद्र-देव की आराधना। श्रीराम कुश-शय्या पर तीन रात्रि नियमपूर्वक उपासना करते हैं; जब समुद्र प्रकट नहीं होता तो वे शस्त्रों से समुद्र को शोषित करने को उद्यत होते हैं। तब समुद्र-देव प्रकट होकर भक्तिपूर्ण स्तुति करते हैं, स्वभाव-नियम और मर्यादा बताते हैं, और उपाय देते हैं कि वानरों में शिल्पी नल के द्वारा फेंकी गई सामग्री तैरकर सेतु बन जाएगी। राम नल को आज्ञा देते हैं; वानर पर्वत, शिला, वृक्ष और लताएँ लाकर सेतु का निर्माण करते हैं, जिसका आदर्श माप-वर्णन भी आता है। फिर सेतु-स्नान की महान् पावनता कही जाती है और सेतु के प्रमुख चौबीस तीर्थों का निर्देश मिलता है—चक्र-तीर्थ, वेताल-वरद, सीता-सरोवर, मङ्गल-तीर्थ, अमृत-वापिका, ब्रह्म-कुण्ड, हनूमत्-कुण्ड, अगस्त्य-तीर्थ, राम-तीर्थ, लक्ष्मण-तीर्थ, जटा-तीर्थ, लक्ष्मी-तीर्थ, अग्नि-तीर्थ, शिव-तीर्थ, शङ्ख-तीर्थ, यमुना-तीर्थ, गङ्गा-तीर्थ, गया-तीर्थ, कोटि-तीर्थ, मानस-तीर्थ, धनुष्कोटि आदि। फलश्रुति में कहा है कि इस अध्याय का श्रवण-पाठ परलोक में विजय देता है और पुनर्जन्मजन्य क्लेश का शमन करता है।

112 verses

Adhyaya 3

Adhyaya 3

चक्रतीर्थ-धर्मपुष्करिणी-माहात्म्य (Cakratīrtha and Dharma Puṣkariṇī: Etiology and Merit)

अध्याय में ऋषि सूत से चौबीस सेतु-तीर्थों में श्रेष्ठ, परम्परा से प्रथम माने गए चक्रतीर्थ के विषय में पूछते हैं। सूत बताते हैं कि इसका पावन प्रभाव अद्वितीय है—केवल स्मरण, स्तुति या एक बार स्नान करने से भी संचित पाप नष्ट होते हैं और बार-बार गर्भवास (पुनर्जन्म) का भय मिटता है। फिर वे इसकी उत्पत्ति-कथा कहते हैं। विष्णुभक्त मुनि गालव दक्षिण समुद्र-तट पर धर्मपुष्करिणी के निकट कठोर तप करते हैं। भगवान विष्णु प्रकट होकर उन्हें वर देते हैं—अचल भक्ति, आश्रम-निवास की स्थिरता और अपने चक्र द्वारा संरक्षण का आश्वासन। साथ ही एक अंतर्कथा में धर्मदेव शिव की आराधना कर शिव के वाहन वृषभ बनने का वर पाते हैं और अक्षय फल देने वाली स्नान-स्थली ‘धर्मपुष्करिणी’ की स्थापना करते हैं। इसके बाद एक राक्षस गालव पर आक्रमण करता है; गालव नारायण की शरण लेते हैं। तब सुदर्शन चक्र आकर राक्षस का वध करता है और सरोवर के पास स्थायी रक्षा का वचन देता है। सुदर्शन की निरंतर सन्निधि से यह स्थान ‘चक्रतीर्थ’ कहलाता है; यहाँ स्नान और पितृतर्पण से वंशजों व पितरों दोनों का कल्याण बताया गया है। अंत में फलश्रुति है कि इस अध्याय का श्रवण-पाठ चक्रतीर्थ-स्नान के समान पुण्य देता है, इस लोक में मंगल और परलोक में शुभ गति प्रदान करता है।

115 verses

Adhyaya 4

Adhyaya 4

Cakra-tīrtha Māhātmya and the Curse of Durdama (चक्रतीर्थमाहात्म्यं तथा दुर्दमशापवृत्तान्तः)

अध्याय प्रश्नोत्तर के रूप में चलता है। ऋषि सूत से पूछते हैं कि विष्णुभक्त मुनि गालव को कष्ट देने वाला राक्षस कौन था। सूत हालास्य-क्षेत्र की कथा सुनाते हैं, जहाँ वसिष्ठ आदि अनेक शिवभक्त ऋषि पूजा में लगे थे। वहीं दुर्दम नामक गन्धर्व अनेक स्त्रियों के साथ क्रीड़ा में मग्न था; ऋषियों को देखकर भी उसने लज्जा से अपने अंग नहीं ढँके। वसिष्ठ ने क्रोध में उसे राक्षस होने का शाप दिया; स्त्रियों के विनय करने पर शाप को सोलह वर्ष तक सीमित कर दिया और बाद में पूर्वरूप लौटने का वरदान भी बताया। दुर्दम भटकते हुए प्राणियों को सताता हुआ धर्म-तीर्थ पहुँचा और गालव पर आक्रमण कर बैठा। गालव ने विष्णु की स्तुति कर शरण ली; तब सुदर्शन-चक्र प्रकट होकर राक्षस का सिर काट देता है। दुर्दम फिर गन्धर्व रूप में आकर चक्र की स्तुति करता है और स्वर्ग लौट जाता है। गालव सुदर्शन से वहीं निवास करने की प्रार्थना करते हैं, जिससे चक्र-तीर्थ पाप-नाशक, भय-हर (भूत-पिशाच आदि के भय से भी) और मोक्षदायक तीर्थ के रूप में प्रसिद्ध होता है। अंत में बताया गया है कि प्राचीन काल में इन्द्र ने पंखों वाले पर्वतों को काटा; उनके कुछ अंश गिरकर भूभाग को बदलते हुए तीर्थ के मध्य भाग को आंशिक रूप से भर गए, इसलिए यह तीर्थ विभक्त-सा दिखाई देता है।

63 verses

Adhyaya 5

Adhyaya 5

Vidhūma–Alambusā Brahmaśāpa-nivṛttiḥ (Cakratīrtha Māhātmya) | Release from Brahmā’s Curse through Cakratīrtha

सूत मुनियों को चक्रतीर्थ की अद्भुत महिमा सुनाते हैं, जिसे पाप-विनाशक तीर्थ कहा गया है। ब्रह्मा की सभा में वायु से अलम्बुसा का वस्त्र हिल उठा; ब्रह्मा ने विधूम वसु के मन में उठी कामना देख कर उसे मनुष्य-योनि का शाप दिया और अलम्बुसा को उसकी भावी पत्नी ठहराया। विधूम के विनय करने पर ब्रह्मा ने शाप-निवृत्ति की सीमा बताई—राजा बनकर राज्य करे, पुत्र उत्पन्न करे, उसे सिंहासन पर बैठाए, फिर दक्षिण समुद्र-तट पर फुल्लग्राम के निकट चक्रतीर्थ में पत्नी सहित स्नान करे; तभी शाप कटेगा। कथा आगे सोमवंश से जुड़े राजा शतानिक और रानी विष्णुमती तक पहुँचती है; शाण्डिल्य ऋषि के अनुग्रह से सहस्रानीक (विधूम का ही अवतार) जन्म लेता है और उसके सेवक भी राजसहचर बनकर जन्म लेते हैं। अलम्बुसा राजा कृतवर्मा की पुत्री मृगावती बनती है। एक पक्षी उसे उठा ले जाता है; वह जमदग्नि के आश्रम में शरण पाकर उदयन को जन्म देती है। पहचान-चिह्नों और ऋषि की सहायता से पति-पत्नी का पुनर्मिलन होता है। उदयन को राज्य पर प्रतिष्ठित करके सहस्रानीक मृगावती और साथियों सहित चक्रतीर्थ की यात्रा करता है। वहाँ स्नान करते ही मनुष्य-भाव मिट जाता है, दिव्य रूप लौट आते हैं और स्वर्गारोहण का वर्णन होता है। अंत में फलश्रुति है कि इस अध्याय का पाठ-श्रवण मनोवांछित फल देता है और तीर्थ की मर्यादा को पुष्ट करता है।

167 verses

Adhyaya 6

Adhyaya 6

देवीपत्तन-चक्रतीर्थ-प्रश्नः तथा दुर्गोत्पत्तिः (Devīpattana & Cakratīrtha Inquiry; Manifestation of Durgā)

इस अध्याय में ऋषि सूत से पूछते हैं कि देवीपुर/देवीपत्तन का ठीक स्थान कहाँ है और पूज्य चक्रतीर्थ की सीमा क्या है—विशेषकर सेतु-मूल के निकट, जहाँ तीर्थयात्री स्नान करते हैं। सूत इसे श्रोताओं-पाठकों के लिए पावन कथा बताकर, राम द्वारा पत्थरों से सेतु-निर्माण के प्रथम कार्य का स्मरण कराते हुए उसी पुण्य क्षेत्र में देवीपुर की स्थिति स्थापित करते हैं। फिर देवी-कथा आरम्भ होती है। देवासुर संग्राम में शोकाकुल दिति अपने पुत्र-प्राप्ति हेतु अपनी पुत्री से कठोर तप कराती है। सुपार्श्व ऋषि वर देते हुए भविष्य के पुत्र महिष का वर्णन करते हैं—महिषमुख, पर मानव देह वाला, जो इन्द्रादि देवों को पीड़ित करेगा। महिष बलवान होकर असुरों को संगठित करता है और दीर्घ युद्ध में देवों को उनके पदों से विचलित कर देता है; तब देव ब्रह्मा की शरण लेते हैं। ब्रह्मा विष्णु और शिव के पास जाते हैं; उनके क्रोध तथा अनेक देवताओं के तेज के संयोग से तेजोमयी देवी दुर्गा प्रकट होती हैं, जिनके अंग-प्रत्यंग में देव-शक्तियों का विन्यास बताया गया है। देवगण उन्हें आयुध और आभूषण प्रदान करते हैं; उनकी गर्जना से जगत् काँप उठता है। युद्ध में दुर्गा अपने गणों सहित महिष की विशाल सेना और मंत्रियों का संहार करती हैं; उनके प्रभाव से देवों में पुनः साहस जागता है। इस प्रकार तीर्थ-भूगोल के साथ दैवी शक्ति, लोक-व्यवस्था और पुराण-श्रवण की पावनता का संदेश जुड़ता है।

76 verses

Adhyaya 7

Adhyaya 7

Chapter 7: Durgā’s Victory over Mahiṣāsura and the Setu-Tīrtha Itinerary (Dharmapuṣkariṇī–Cakratīrtha–Setumūla)

इस अध्याय में दो धाराएँ मिलती हैं—देवी का युद्ध-विजय-चरित और तीर्थयात्रा का मार्ग-वर्णन। पहले सूत बताते हैं कि अम्बिका/चण्डिका/दुर्गा/भद्रकाली ने महिषासुर के मंत्रियों और वीरों (चण्डकोप, चित्रभानु, कराल आदि) को अस्त्र-शस्त्र, रणनीति और दिव्य शक्ति से पराजित किया। महिषासुर छल से रूप बदलता है—महिष, सिंह-सदृश, खड्गधारी पुरुष, गज और फिर महिष; देवी का वाहन सिंह भी युद्ध में सहभागी होता है। फिर ‘अशरीरी वाणी’ देवी को निर्देश देती है कि धर्मपुष्करिणी के जल में छिपे महिषासुर को निष्प्रभावी करें। सिंह जल को पीकर सरोवर को शुष्क कर देता है, असुर प्रकट होता है; देवी उसके सिर पर पाँव रखकर कंठ में शूल लगाती हैं और उसका शिरच्छेद करती हैं। इसके बाद देव-स्तुति, धर्म की पुनः स्थापना और जगत्-शांति का वर्णन आता है। दूसरे भाग में तीर्थ-माहात्म्य और यात्रा-क्रम है—देवी दक्षिण समुद्र-तट पर नगर स्थापित करती हैं; तीर्थों को नाम और वरदान मिलते हैं तथा अमृत-संबंध का उल्लेख होता है। नवपाषाण-प्रदेश में स्नान, चक्रतीर्थ में स्नान और संकल्पपूर्वक सेतुबन्ध की ओर प्रस्थान बताया गया है; नल और वानरों द्वारा श्रीराम के सेतु-निर्माण, उसकी मर्यादा और पवित्रता का प्रतिपादन है। अंत में भक्तिपूर्वक इस अध्याय के पठन-श्रवण से पुण्य और सिद्धि-प्राप्ति की फलश्रुति दी गई है।

71 verses

Adhyaya 8

Adhyaya 8

Vetalavaradā-Tīrtha Māhātmya (वेतालवरदातीर्थ-माहात्म्य) — The Origin of the Vetalavarada Sacred Ford

इस अध्याय में ऋषि सूत से पुनः पुण्यकथाएँ सुनाने का अनुरोध करते हैं और विशेषतः चक्रतीर्थ के दक्षिण में स्थित प्रसिद्ध वेतालवरदा-तीर्थ का माहात्म्य पूछते हैं। सूत कैलास में शम्भु द्वारा कही गई एक गूढ़ किन्तु लोकहितकारी कथा का आरम्भ करते हैं। कथा में महर्षि गालव और उनकी पुत्री कान्तिमती का वर्णन है, जो पिता-सेवा, संयम और मर्यादा से धर्म का आदर्श स्थापित करती है। उसे देखकर विद्याधर राजकुमार सुदर्शन और उसका कनिष्ठ साथी सुकर्ण मोहित होते हैं; सुदर्शन बलपूर्वक उसे पकड़ लेता है। कान्तिमती के सार्वजनिक आर्तनाद पर मुनि एकत्र होते हैं और गालव शाप देते हैं—सुदर्शन मनुष्य-योनि में गिरकर लोकनिन्दा भोगेगा और अंततः वेताल बनेगा; सुकर्ण भी मनुष्य बनेगा, पर कम दोष के कारण वेतालत्व से बचेगा, और आगे किसी विद्याधर-स्वामी की पहचान से मुक्ति का उपाय बताया जाता है। शाप के फलस्वरूप दोनों यमुना-तट पर विद्वान ब्राह्मण गोविन्दस्वामिन् के पुत्र बनकर जन्म लेते हैं, उस समय दीर्घ दुर्भिक्ष पड़ा होता है। एक संन्यासी का भयावह आशीर्वाद ज्येष्ठ पुत्र (विजयदत्त—जो सुदर्शन ही है) से वियोग का संकेत देता है। एक रात सूने देवालय में उसे शीत-ज्वर चढ़ता है और वह आग माँगता है; पिता श्मशान से अग्नि लाने जाता है, पुत्र भी पीछे-पीछे पहुँचकर चिता की आग के पास खोपड़ी पर प्रहार करता है, रक्त और मेद का स्वाद लेता है और क्षण में भयानक वेताल बन जाता है। दिव्य वाणी उसे पिता पर हिंसा से रोकती है; वह अन्य वेतालों में जाकर ‘कपालस्फोट’ नाम पाता है और संघर्षों के बाद वेतालों का नायक बनता है। इस प्रकार शापजन्य पतन से तीर्थ की पहचान जुड़ती है—अधर्ममय कामना से अवनति होती है और वही स्मृति इस पवित्र स्थल के नाम में प्रतिष्ठित रहती है।

94 verses

Adhyaya 9

Adhyaya 9

Aśokadatta’s Exploits and the Revelation of Vetalavaradā Tīrtha (अशोकदत्त-वीरचरितम् • वेतालवरदातीर्थ-माहात्म्यम्)

इस अध्याय में नीति-उदाहरणों के साथ एक महातीर्थ का प्रकाशन जुड़ा हुआ है। शोकग्रस्त ब्राह्मण गोविन्दस्वामी को दयालु व्यापारी समुद्रदत्त आश्रय देता है; उसका पुत्र अशोकदत्त शास्त्र और शस्त्र—दोनों में अद्भुत रूप से प्रशिक्षित होता है। काशी के राजा प्रतापमुकुट उसे दक्षिण के प्रबल मल्ल-राज को पराजित करने हेतु नियुक्त करते हैं; विजय से अशोकदत्त की लोक-प्रतिष्ठा और राजकृपा स्थापित होती है। आगे राजा और अशोकदत्त एक शूल पर चढ़े, प्यास से तड़पते व्यक्ति की करुण पुकार सुनते हैं। राजा जल देने की आज्ञा देकर राजधर्म में करुणा की प्रधानता दिखाते हैं। श्मशान में—जहाँ भूत, वेताल और पिशाचों का भयावह वातावरण है—एक सुंदरी स्वयं को उस पीड़ित की प्रेयसी बताकर अशोकदत्त से कंधा माँगती है; अशोकदत्त उसके हिंसक भाव को पहचानकर उसका रत्नजटित नूपुर छीन लेता है और घटना राजा को बताता है। राजा उसे सम्मान देते हैं और मदनलेखा से विवाह-संबंध कराते हैं। बाद में राजा वैसा ही नूपुर चाहें तो अशोकदत्त युक्ति से फिर श्मशान जाता है, ‘महामांस’ का प्रलोभन देकर राक्षसी को बुलाता है और दूसरा नूपुर, दूसरी पत्नी विद्युत्प्रभा तथा दिव्य सरोवर से जुड़ा स्वर्णकमल प्राप्त करता है। उसी सरोवर के प्रसंग में वेतालराज कपालविस्फोट का उल्लेख आता है; संघर्ष के बीच विद्याधर-नायक विज्ञप्तिकौतुक प्रकट होकर शाप-रहस्य बताता है—अशोकदत्त का भाई सुकरण अनुचित संसर्ग से वेताल बना, और अशोकदत्त भी शाप-प्रभाव से बँधा है। उपाय के रूप में दक्षिण समुद्र-तट पर चक्रतीर्थ के निकट परम तीर्थ बताया जाता है। वहाँ वायु से आई जल-बूँदों के स्पर्श मात्र से सुकरण वेताल-भाव से मुक्त हो जाता है; अशोकदत्त संकल्पपूर्वक स्नान कर दिव्य रूप पाता है। इस स्थान का नाम ‘वेतालवरदा’ कहा गया है, जिसकी महिमा अत्यन्त फलदायिनी बताई गई है; पितरों हेतु पिण्डदान आदि नियम भी कहे गए हैं और पाठ-श्रवण से मुक्ति का फलश्रुति में आश्वासन दिया गया है।

91 verses

Adhyaya 10

Adhyaya 10

गन्धमादन-सेतुरूप-वर्णनम् तथा पापविनाशन-तीर्थमाहात्म्यम् (Gandhamādana as Setu-form and the Glory of Pāpavināśana Tīrtha)

अध्याय का आरम्भ सूत के यात्रा-विधान से होता है—वेतालवरदा तीर्थ में स्नान करके यात्री धीरे-धीरे गन्धमादन की ओर बढ़े। गन्धमादन को समुद्र के बीच ‘सेतु-रूप’ में स्थित, ब्रह्मलोक से सम्बद्ध दिव्य मार्ग के समान बताया गया है। वहाँ सरोवर, नदियाँ, समुद्र, वन, आश्रम और वैदिक-धामों की घनी पवित्रता है; वसिष्ठ आदि ऋषि, सिद्ध, चारण, किन्नर तथा अनेक देवता दिन-रात निवास करते हैं। कहा गया है कि गन्धमादन की वायु महान पाप-संचय को हर लेती है और केवल दर्शन से मन को शान्ति मिलती है। यात्री को सेतु-धारक पर्वत से क्षमा माँगते हुए उस पर पाँव रखना चाहिए, शिखर पर विराजमान शंकर के दर्शन की प्रार्थना करनी चाहिए और मृदु चरणों से आगे बढ़ना चाहिए। गन्धमादन में समुद्र-स्नान तथा सरसों के दाने जितना भी पिण्डदान करने से पितरों की दीर्घकाल तक तृप्ति बताई गई है। फिर ऋषि ‘पापविनाशन’ तीर्थ का माहात्म्य पूछते हैं। सूत हिमवत् के निकट एक आश्रम का वर्णन करते हैं जहाँ अनुशासित वैदिक साधक रहते हैं। दृढ़मति नामक शूद्र दीक्षा और शिक्षा चाहता है, पर कुलपति सामाजिक-वैदिक मर्यादा बताकर मना कर देता है। दृढ़मति अलग कुटी बनाकर भक्ति से अतिथि-सत्कार करता है। सुमति नामक ब्राह्मण स्नेहवश उसे गुप्त वैदिक कर्म (हव्य-कव्य, श्राद्ध, महालय आदि) सिखा देता है, जिससे सुमति को भारी कर्म-पतन, नरक-भोग और आगे जन्म में ब्रह्मराक्षस-दोष भोगना पड़ता है। पीड़ित पुत्र को अगस्त्य के पास ले जाया जाता है। अगस्त्य कारण बताकर एकमात्र उपाय कहते हैं—सेतु-प्रदेश में गन्धमादन के ऊपर स्थित पापविनाशन तीर्थ में तीन दिन स्नान। अनुष्ठान से दोष मिटता है, आरोग्य-समृद्धि लौटती है और मृत्यु पर मोक्ष का आश्वासन मिलता है। अंत में पापविनाशन को सर्वपाप-नाशक, स्वर्ग-मोक्षदायक तथा ब्रह्मा-विष्णु-महेश द्वारा पूजित तीर्थ कहा गया है, और यह कथा अनधिकृत को कर्म-ज्ञान देने की सावधानी तथा विधिपूर्वक तीर्थयात्रा द्वारा शुद्धि का मार्ग दिखाती है।

97 verses

Adhyaya 11

Adhyaya 11

सीतासरः-माहात्म्यं (Sītāsaras / Sītākuṇḍa Māhātmya: Indra’s Purification Narrative)

इस अध्याय में सूत मुनि जिज्ञासु ऋषियों को सीतासर/सीताकुण्ड का तीर्थ-माहात्म्य सुनाते हैं। कहा गया है कि पहले पापनाश तीर्थ में स्नान करके, नियम-पालन सहित यात्री को सीतासर में स्नान करना चाहिए, जिससे पूर्ण शुद्धि होती है। यहाँ समस्त प्रमुख तीर्थों का पुण्य एकत्र रूप से विद्यमान है—इसलिए यह सरोवर विशेष पवित्र माना गया है। फिर इन्द्र (पुरन्दर) पर ब्रह्महत्या-दोष कैसे आया और कैसे छूटा—यह प्रसंग आता है। वरदानों से सुरक्षित राक्षस कपालाभरण अमरावती पर चढ़ आया; दीर्घ युद्ध के बाद इन्द्र ने वज्र से उसका वध किया। “राक्षस-वध से ब्रह्महत्या क्यों?”—इसका समाधान यह है कि कपालाभरण की उत्पत्ति ब्राह्मण-बीज से जुड़ी थी: वह ऋषि शुचि के सुसिला (राक्षस त्रिवक्र की पत्नी) के साथ अपराध से उत्पन्न हुआ था; इसलिए उसके वध से ब्रह्महत्या इन्द्र का पीछा करने लगी। इन्द्र ब्रह्मा की शरण में गए। ब्रह्मा ने गन्धमादन पर्वत पर स्थित सीताकुण्ड में सदाशिव-पूजन और सरोवर-स्नान का विधान बताया; उससे इन्द्र का दोष नष्ट हुआ और वे अपने लोक में प्रतिष्ठित हुए। अंत में सीता के सान्निध्य से तीर्थ-नाम और महिमा का कारण बताया गया तथा फलश्रुति दी गई—यहाँ स्नान, दान और कर्मकाण्ड से अभीष्ट फल व शुभ परलोक-गति मिलती है; इस कथा का श्रवण-पाठ भी लोक-परलोक में कल्याणकारी है।

74 verses

Adhyaya 12

Adhyaya 12

मंगलतीर्थमाहात्म्यम् (Mangalatīrtha Māhātmya: The Glory of the Auspicious Tīrtha)

इस अध्याय में सूतजी ‘मंगलतीर्थ’ का माहात्म्य कहते हैं। सीताकुण्ड में स्नान करके भक्त को शांतचित्त होकर मंगलतीर्थ जाना चाहिए; वहाँ कमला-लक्ष्मी का नित्य वास है, देवगण सदा एकत्र होते हैं और यह स्थान अलक्ष्मी व दुर्भाग्य को दूर करने वाला माना गया है। फिर सोमवंशी राजा मनोजव का इतिवृत्त आता है। वह पहले धर्मपरायण, यज्ञकर्ता, पितृ-तर्पण करने वाला और शास्त्राध्यायी था; पर अहंकार से लोभ, काम, क्रोध, हिंसा और ईर्ष्या बढ़ी। उसने ब्राह्मणों का अपमान किया, देवद्रव्य का अपहरण किया और भूमियाँ छीन लीं; फलतः शत्रु गोलभ से पराजित होकर पत्नी सुमित्रा और पुत्र चन्द्रकान्त सहित भयानक वन में निर्वासित हुआ। वन में बालक की भूख देखकर राजा को गहरा पश्चात्ताप होता है। वह दान, शिव-विष्णु-पूजन, श्राद्ध, उपवास, नामकीर्तन, तिलक-धारण, जप तथा लोकहित के कार्य—वृक्षारोपण और जलस्रोत-निर्माण—इन सबकी उपेक्षा को अपने दुःख का कारण बताता है। तभी ऋषि पराशर आते हैं, सुमित्रा को ढाढ़स देते हैं, त्र्यम्बक-भक्ति और मंत्र से मूर्च्छित राजा को उठाते हैं और गन्धमादन पर रामसेतु के निकट स्थित मंगलतीर्थ की यात्रा, स्नान-श्राद्ध और संयम का विधान बताते हैं। मनोजव चालीस दिन एकाक्षर मंत्र-जप करता है; तीर्थ-प्रभाव और ऋषि-कृपा से दिव्यास्त्र व राजचिह्न प्रकट होते हैं। पराशर उसका अभिषेक कर अस्त्रविद्या का उपदेश देते हैं। राजा लौटकर ब्रह्मास्त्र से गोलभ को जीतता है और फिर अहंकार-रहित होकर राज्य करता है; अंत में वैराग्य लेकर पुनः मंगलतीर्थ में शिव-ध्यान सहित तप करता है और देहांत पर शिवलोक को प्राप्त होता है, सुमित्रा भी अनुगामिनी होती है। फलश्रुति में कहा है कि यह तीर्थ लौकिक कल्याण और मोक्ष-मार्ग दोनों देता है तथा सूखे तिनके को अग्नि की भाँति पापों को जला देता है।

117 verses

Adhyaya 13

Adhyaya 13

Amṛtavāpikā-Māhātmya and the Origin of Ekāntarāmanātha-kṣetra (अमृतवापिकामाहात्म्यं तथा एकांतरामनाथक्षेत्रोत्पत्तिः)

इस अध्याय में श्रीसूत तीर्थ-माहात्म्य का वर्णन करते हैं। मङ्गलाख्य महातीर्थ में स्नान करके यात्री एकान्तरामनाथ-क्षेत्र जाता है, जहाँ जगन्नाथ-स्वरूप श्रीराम सीता, लक्ष्मण, हनुमान और वानरों सहित सदा विराजमान बताए गए हैं; इससे उस क्षेत्र की निरन्तर पवित्रता और दिव्य संरक्षण प्रकट होता है। फिर अमृतवापिका नामक पुण्य-सरोवर का माहात्म्य कहा गया है। श्रद्धापूर्वक किया गया स्नान जरा-मरण के भय को हरने वाला, पापों को शुद्ध करने वाला और शंकर की कृपा से ‘अमृतत्व’ देने वाला बताया गया है। ऋषियों के पूछने पर ‘अमृतवापिका’ नाम का कारण बताया जाता है—हिमालय के निकट अगस्त्य के अनुज ने सन्ध्या, जप, अतिथि-पूजन, पञ्चयज्ञ और श्राद्ध आदि नित्यकर्मों सहित दीर्घकाल तक कठोर तप किया। शिव प्रकट होकर सेतु/गन्धमादन के पास मङ्गलाख्य तीर्थ में स्नान को शीघ्र मोक्ष का उपाय बताते हैं; वह तपस्वी तीन वर्ष नियमपूर्वक स्नान करता है और चौथे वर्ष ब्रह्मरन्ध्र से योगपूर्वक देह त्यागकर दुःख से मुक्त हो जाता है। इसी से सरोवर ‘अमृतवापिका’ प्रसिद्ध हुआ और तीन वर्ष का स्नान-व्रत अमृतत्व का साधन कहा गया। अन्त में एकान्तरामनाथ नाम की उत्पत्ति आती है—सेतु-निर्माण के समय समुद्र की गर्जना के कारण श्रीराम ने रावण-वध की योजना पर सहयोगियों से एकान्त में परामर्श किया; वही स्थान एकान्तरामनाथ-क्षेत्र कहलाया। निष्कर्ष यह कि गूढ़ दर्शन-ज्ञान या विधि-कौशल न होने पर भी यहाँ स्नान से ‘अमृत’ की प्राप्ति बताई गई है।

53 verses

Adhyaya 14

Adhyaya 14

Brahmakūṇḍa-māhātmya and the Liṅga-Origin Discourse (ब्रह्मकुण्ड-माहात्म्य तथा लिङ्गोद्भव-प्रसङ्ग)

इस अध्याय में दो भागों में धर्म-तत्त्व और अनुष्ठान का निरूपण है। पहले सूत सेतु-केन्द्रित पवित्र-मानचित्र में गन्धमादन स्थित ब्रह्मकुण्ड तक की तीर्थ-यात्रा-क्रमावली बताते हैं। ब्रह्मकुण्ड का दर्शन और स्नान सर्वपाप-नाशक तथा वैकुण्ठ-प्राप्ति का कारण कहा गया है। विशेष रूप से ब्रह्मकुण्ड-उद्भव भस्म का माहात्म्य है—उसका त्रिपुण्ड्र रूप में या ललाट पर एक कण मात्र धारण भी तत्काल मोक्षाभिमुख करने वाला बताया गया है; उसकी निन्दा या अस्वीकार को घोर धर्म-भ्रंश और परलोक में दुष्फल देने वाला कहा गया है। दूसरे भाग में ऋषियों के प्रश्न पर सूत ब्रह्मा–विष्णु के अहंकार-विवाद और अनादि-अनन्त स्वयंज्योतिर्लिङ्ग के प्राकट्य का वर्णन करते हैं। विष्णु सत्य स्वीकार करते हैं, ब्रह्मा मिथ्या दावा करते हैं; तब शिव न्याय करते हुए ब्रह्मा की प्रतिमा-पूजा को सीमित करते हैं, पर वैदिक/स्मार्त पूजन की मर्यादा रहने देते हैं, और दोष-शान्ति हेतु गन्धमादन में महान् यज्ञ करने का आदेश देते हैं। वही यज्ञ-स्थल ‘ब्रह्मकुण्ड’ कहलाता है, जो मोक्ष के ‘किवाड़ की कुंडी’ तोड़ने का प्रतीक माना गया है; यहाँ की भस्म महापातकों और दुष्ट शक्तियों का शमन करती है। अंत में देव-ऋषियों की निरन्तर उपस्थिति और वहाँ सतत यज्ञ-प्रवृत्ति की अनुशंसा की गई है।

65 verses

Adhyaya 15

Adhyaya 15

हनूमत्कुण्डमाहात्म्यं तथा धर्मसखराजचरितम् (Glory of Hanumat-Kuṇḍa and the Account of King Dharmasakha)

सूत कहते हैं कि अत्यन्त पुण्यदायक ब्रह्मकुण्ड में स्नान करके नियमशील यात्री को हनूमत्-कुण्ड जाना चाहिए। यह तीर्थ मारुतात्मज हनुमान ने लोककल्याण हेतु स्थापित किया है; इसे अद्वितीय प्रभावशाली, सर्वोत्तम तीर्थ और रुद्र द्वारा भी सेवित बताया गया है। यहाँ स्नान करने से महापाप नष्ट होते हैं, शिवलोक आदि शुभ लोकों की प्राप्ति होती है और नरक-फल क्रमशः क्षीण होते हैं। फिर राजा धर्मसख का प्रसंग आता है। केकयवंशी यह धर्मपरायण, विजयी राजा अनेक रानियों के होते हुए भी पुत्रहीनता से दुखी था। उसने दान, यज्ञ (अश्वमेध), अन्नदान, श्राद्ध और मंत्र-जप आदि बहुत किए; दीर्घकाल बाद उसे एक पुत्र सुचन्द्र मिला, पर बिच्छू के डंक से वंश-भंग का भय जाग उठा। उसने ऋत्विजों और पुरोहित से धर्मसम्मत उपाय पूछा; उन्होंने गन्धमादन/सेतु-प्रदेश के हनूमत्-कुण्ड में स्नान और तट पर पुत्रीयेष्टि करने का विधान बताया। राजा परिवार व यज्ञ-सामग्री सहित वहाँ गया, निरन्तर स्नान और यज्ञ किया, प्रचुर दक्षिणा-दान देकर लौटा। समय आने पर प्रत्येक रानी से पुत्र उत्पन्न हुआ—सौ से अधिक। उसने सबको राज्य बाँट दिए, फिर सेतु-प्रदेश में हनूमत्-कुण्ड पर तप करके शांतिपूर्वक देह त्यागा और वैकुण्ठ को प्राप्त हुआ; पुत्र बिना वैर के राज्य करते रहे। अंत में फलश्रुति है कि एकाग्र होकर इसका श्रवण-पठन करने से इहलोक-परलोक का सुख और दिव्य सान्निध्य मिलता है।

73 verses

Adhyaya 16

Adhyaya 16

अगस्त्यतीर्थमहिमा तथा कक्षीवान्-स्वनय-कथा (Glory of Agastya Tīrtha and the Kakṣīvān–Svanaya Narrative)

सूता हनुमान् के कुण्ड में स्नान से आरम्भ होने वाली तीर्थयात्रा का वर्णन करते हैं और फिर अगस्त्यतीर्थ की महिमा कहते हैं, जिसे कुम्भयोनि (अगस्त्य) ने स्थापित किया। प्राचीन काल में मेरु और विन्ध्य के प्रसंग में विन्ध्य का बढ़ना जगत्-संतुलन को डगमगाने लगता है; तब शिव की आज्ञा से अगस्त्य मुनि विन्ध्य को रोककर धर्म-व्यवस्था स्थिर करते हैं। आगे गन्धमादन प्रदेश में वे अपने नाम से अत्यन्त पुण्यदायक तीर्थ की स्थापना करते हैं। ग्रन्थ में फलश्रुति दृढ़ रूप से कही गई है—उस तीर्थ में स्नान और पान करने से पुनर्जन्म का क्षय, लौकिक सिद्धि तथा मोक्षोपयोगी फल प्राप्त होते हैं; तीनों कालों में यह तीर्थ अनुपम बताया गया है। इसके बाद दृष्टान्त-कथा आती है: दीर्घतमस के पुत्र कक्षीवान् उदङ्क के पास विस्तृत वैदिक अध्ययन पूर्ण करते हैं। उन्हें आदेश मिलता है कि अगस्त्यतीर्थ में तीन वर्ष नियमपूर्वक निवास करें; फलस्वरूप चार दाँतों वाला हाथी वाहन रूप में प्रकट होगा। राजा स्वनय की कन्या ने व्रत लिया था कि वह केवल ऐसे ही हाथी पर आने वाले से विवाह करेगी; कक्षीवान् के व्रत-पालन से यह शर्त पूरी होती है और धर्मसम्मत विवाह सम्पन्न होता है। सुदर्शन दूत द्वारा दीर्घतमस से औपचारिक अनुमति ली जाती है; वे स्वीकृति देकर तीर्थ पर आते हैं, जिससे विवाह-अनुमति, व्रत-पालन और तीर्थ-नियम की मर्यादा पुष्ट होती है।

100 verses

Adhyaya 17

Adhyaya 17

कक्षीवद्विवाहः — Kakṣīvān’s Marriage at Agastya-tīrtha (Rituals, Gifts, and Phalaśruti)

इस अध्याय में सेतुखण्ड के अंतर्गत अगस्त्य-तीर्थ पर कक्षीवान के विवाह का प्रसंग वर्णित है। सूत कहते हैं कि गुरु की आज्ञा से विवाह का उचित उपाय खोजते हुए कक्षीवान तीर्थ पर पहुँचे। वहाँ नदी-तट पर पुत्र सहित दीर्घतमस ऋषि का समाचार पाकर राजा स्वनय ने श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया; उडंक भी शिष्यों सहित रामसेतु/धनुष्कोटि में स्नान हेतु आकर यज्ञकर्म के आचार्य रूप में उपस्थित हुए। अतिथि-सत्कार की मर्यादा—अभिवादन, आशीर्वचन, अर्घ्य—पूरी हुई; शुभ मुहूर्त में विवाह निश्चित किया गया और राजमहल से कन्या को लाने की व्यवस्था हुई। फिर मंगलमय सार्वजनिक विधियों के साथ वर-यात्रा, नीराजन, वरमाला, अग्नि-स्थापन, लाजा-होम आदि तथा उडंक के निर्देशन में पाणिग्रहण सम्पन्न हुआ। इसके बाद राजा ने ब्राह्मणों को विशाल भोजन कराया, दान दिए और पुत्री को पर्याप्त स्त्रीधन तथा उपहार प्रदान किए। ऋषि वेदारण्य आश्रम लौटे, राजा अपनी नगरी गया। अंत में फलश्रुति है कि इस प्राचीन, वेद-आधारित कथा का श्रवण/पाठ कल्याण बढ़ाता है और कष्ट व दरिद्रता का शमन करता है।

59 verses

Adhyaya 18

Adhyaya 18

रामतीर्थ-रघुनाथसरः-माहात्म्य तथा धर्मपुत्रप्रायश्चित्तवर्णनम् (Rāma-tīrtha and Raghunātha-saras Māhātmya; Yudhiṣṭhira’s Expiation Narrative)

अध्याय का आरम्भ तीर्थ-यात्रा से होता है—कुम्भसम्भव-तीर्थ में स्नान करके रामकुण्ड जाना, जहाँ स्नान से पापों का नाश बताया गया है। फिर रघुनाथ-सरः की महिमा कही गई है कि यह पापहरण तीर्थ है; वेदज्ञों को किया गया अल्प दान भी अनेक गुना फल देता है, और यहाँ स्वाध्याय तथा जप विशेष फलदायी होते हैं। सूता सुतीक्ष्ण ऋषि का पवित्र इतिहास सुनाते हैं—अगस्त्य के शिष्य, रामचरण-भक्त सुतीक्ष्ण रामचन्द्र-सरः के तट पर कठोर तप करते हैं, निरन्तर षडाक्षर राम-मन्त्र का जप करते हुए राम के नामों और लीलाओं का नमस्कार-स्तोत्र से स्तवन करते हैं। दीर्घ अभ्यास और तीर्थ-सेवा से उनकी भक्ति स्थिर व निर्मल होती है; अद्वैत-बोध और योगसिद्धियाँ गौण फल के रूप में वर्णित हैं। आगे तीर्थ की मोक्षदायिनी शक्ति का विस्तार है—राम प्राणियों के कल्याण हेतु तट पर महान् लिङ्ग की स्थापना करते हैं; स्नान और लिङ्ग-दर्शन को मुक्ति का कारण कहा गया है। फिर धर्मपुत्र युधिष्ठिर का प्रसंग आता है: असत्य से उत्पन्न दोष से वे तत्काल मुक्त बताए गए; ऋषियों के पूछने पर सूता महाभारत में द्रोण-वध, ‘अश्वत्थामा’ वाले रणनीतिक वचन और उससे उत्पन्न नैतिक भार का वर्णन करते हैं। बाद में अशरीरी वाणी प्रायश्चित्त बिना राज्य न करने की चेतावनी देती है; व्यास आकर दक्षिण समुद्र के रामसेतु-आश्रित प्रायश्चित्त का विधान बताते हैं। अंत में फलश्रुति है—इसका श्रवण-पाठ कैलास-प्राप्ति और पुनर्जन्म से मुक्ति की ओर ले जाता है।

104 verses

Adhyaya 19

Adhyaya 19

श्रीलक्ष्मणतीर्थ-माहात्म्य एवं बलभद्र-ब्रह्महत्या-शोधन (Lakṣmaṇa-tīrtha Māhātmya and Balabhadra’s Expiation Narrative)

इस अध्याय में सूत जी श्रीलक्ष्मण-तीर्थ के स्नान-माहात्म्य का वर्णन करते हैं। वहाँ स्नान पाप-नाशक, दरिद्रता-हर, तथा आयु, विद्या और संतान-प्राप्ति को बढ़ाने वाला कहा गया है। तट पर मंत्र-जप से शास्त्र-प्रवीणता मिलती है, और लक्ष्मण द्वारा स्थापित महान लिंग ‘लक्ष्मणेश्वर’ के कारण यह क्षेत्र जल-तीर्थ और लिंग-पूजा का संयुक्त पुण्य-स्थान बन जाता है। फिर ऋषि पूछते हैं कि बलभद्र को ब्रह्महत्या कैसे लगी और उसका शोधन कैसे हुआ। सूत बताते हैं कि बलभद्र कुरुक्षेत्र-युद्ध में तटस्थ रहकर तीर्थ-यात्रा के बहाने अनेक तीर्थों में गए और नैमिषारण्य पहुँचे। वहाँ ऊँचे आसन पर बैठे सूत ने न उठकर न प्रणाम किया, इससे क्रुद्ध होकर बलभद्र ने कुश की धार से उसे मार डाला; ऋषियों ने इसे घोर ब्रह्म-वध बताया और लोक-संग्रह हेतु प्रायश्चित्त का आदेश दिया। उन्होंने यज्ञ-दूषक दैत्य बल्वल का वध कराने को कहा; बलभद्र ने बल्वल का संहार किया और एक वर्ष का तीर्थ-व्रत किया, पर काली छाया-रूप अशुद्धि पीछे लगी रही और वाणी हुई कि पाप पूर्णतः नहीं मिटा। तब ऋषियों के निर्देश से वे रामसेतु के गंधमादन-प्रदेश में लक्ष्मण-तीर्थ में स्नान कर लक्ष्मणेश्वर को प्रणाम करते हैं; तब देहधारी वाणी पूर्ण शुद्धि की घोषणा करती है। अंत में फलश्रुति है कि इस अध्याय का एकाग्र होकर पाठ या श्रवण करने से अपुनर्भव-लक्षण मोक्ष की ओर गति होती है।

75 verses

Adhyaya 20

Adhyaya 20

जटातीर्थमाहात्म्य (Jatātīrtha Māhātmya: The Glory of Jatātīrtha)

यह अध्याय ‘जटातीर्थ-माहात्म्य’ के रूप में अंतःशुद्धि और अज्ञान-निवारण का उपदेश देता है। सूत ब्राह्मणों से कहते हैं कि साधक लक्ष्मण के महान तीर्थ (ब्रह्महत्या-नाशक) से आगे बढ़कर चित्त-शुद्धि हेतु जटातीर्थ जाएँ। केवल वाचिक वेदान्त-चर्चा, वाद-विवाद और पाण्डित्य-प्रदर्शन यदि विवाद-प्रधान हो जाए, तो मन को शुद्ध नहीं करता—इसकी आलोचना की गई है; इसके स्थान पर ‘लघु उपाय’ के रूप में जटातीर्थ-स्नान को अंतःकरण-शुद्धि, अज्ञान-नाश, ज्ञानोदय और अंततः मोक्ष तथा अखण्ड सच्चिदानन्द की अनुभूति का साधन बताया गया है। तीर्थ की प्रतिष्ठा उत्पत्ति-कथाओं से की गई है—शम्भु ने लोक-कल्याण हेतु इसकी स्थापना की, और रावण-वध के बाद श्रीराम ने यहाँ जल में अपनी जटाएँ धोईं, जिससे इसका नाम जटातीर्थ पड़ा। पुण्य-फल की तुलना प्रसिद्ध स्नान-व्रतों से की गई है और कहा गया है कि यहाँ एक बार स्नान भी अत्यन्त फलदायक है। दृष्टान्त में शुकदेव व्यास से गुप्त उपाय पूछते हैं जो चित्त-शुद्धि, ज्ञान और मुक्ति दे; व्यास जटातीर्थ का विधान करते हैं। भृगु को वरुण का उपदेश, दुर्वासा और दत्तात्रेय के प्रसंग भी बताते हैं कि यज्ञ, जप, उपवास या कठिन नियमों के बिना केवल स्नान से बुद्धि-शुद्धि होती है। अंत में फलश्रुति है कि इस अध्याय का पाठ या श्रवण पापों का क्षय कर वैष्णव-गति/पद प्रदान करता है।

52 verses

Adhyaya 21

Adhyaya 21

लक्ष्मीतीर्थमाहात्म्य (Laxmī-tīrtha Māhātmya) — The Glory of Lakṣmī Tīrtha

इस अध्याय में सूत ऋषियों से तीर्थों का क्रम बताते हुए लक्ष्मी-तीर्थ की महिमा का विशेष वर्णन करते हैं। पहले जटा-तीर्थ में स्नान को पाप-नाशक कहा गया है; फिर शुद्ध यात्री लक्ष्मी-तीर्थ में जाकर संकल्पपूर्वक स्नान करे तो इच्छित फल सिद्ध होते हैं। इसके बाद महाभारत-प्रसंग आता है। इन्द्रप्रस्थ में रहने वाले युधिष्ठिर (धर्मपुत्र) श्रीकृष्ण से पूछते हैं कि मनुष्य महान राज्य, ऐश्वर्य और समृद्धि किस धर्म से पाते हैं। कृष्ण उन्हें गन्धमादन पर्वत-प्रदेश में स्थित लक्ष्मी-तीर्थ का निर्देश देते हैं और कहते हैं कि वहाँ स्नान से धन-धान्य बढ़ता है, शत्रु घटते हैं, क्षात्र-बल दृढ़ होता है, पाप कटते हैं और रोग शांत होते हैं। युधिष्ठिर एक मास तक नियमपूर्वक बार-बार स्नान करते हैं, फिर ब्राह्मणों को बड़े दान देकर राजसूय करने योग्य बनते हैं। कृष्ण आगे बताते हैं कि राजसूय से पहले दिग्विजय और कर/उपहार-संग्रह आवश्यक है। पाण्डव दिग्विजय कर अपार धन लेकर लौटते हैं और युधिष्ठिर विशाल दान-दक्षिणा सहित राजसूय यज्ञ सम्पन्न करते हैं। अंत में कहा गया है कि यह सब लक्ष्मी-तीर्थ के माहात्म्य से संभव हुआ; इसके श्रवण-पाठ से दुष्ट स्वप्न नष्ट होते हैं, मनोवांछित फल मिलता है, इस लोक में समृद्धि होती है और अंत में भोग के बाद मोक्ष प्राप्त होता है।

62 verses

Adhyaya 22

Adhyaya 22

अग्नितीर्थमहात्म्य (Agnitīrtha Māhātmya: The Glory and Origin of Agni Tīrtha)

अध्याय का आरम्भ श्रीसूत के उपदेश से होता है, जहाँ वे लक्ष्मीतīर्थ से यात्रियों को अग्नितीर्थ की ओर ले जाते हैं और बताते हैं कि यह परम पुण्यदायक है तथा भक्ति से जाने पर बड़े-बड़े पापों का नाश करता है। ऋषि उसके उद्गम, स्थान और विशेष महिमा के विषय में प्रश्न करते हैं। सूत रामकथा का प्रसंग सुनाते हैं—रावण-वध के बाद विभीषण को लंका का राजा बनाकर श्रीराम सीता और लक्ष्मण सहित सेतु-मार्ग से लौटते हैं; देव, ऋषि, पितर और वानर भी साथ होते हैं। लक्ष्मीतīर्थ पर अनेक साक्षियों के सामने सीता की शुद्धि के लिए राम अग्नि का आवाहन करते हैं; अग्निदेव जल से प्रकट होकर सीता के पतिव्रत की प्रशंसा करते हैं और बताते हैं कि सीता विष्णु की नित्य दिव्य सहचरी हैं, जो अवतारों में सदा साथ रहती हैं। जहाँ अग्नि जल से प्रकट हुए, वही स्थान ‘अग्नितीर्थ’ कहलाया। इसके बाद तीर्थ-आचरण बताया गया—भक्ति से स्नान, उपवास, विद्वान ब्राह्मणों का सत्कार, वस्त्र-धन-भूमि का दान तथा सुशोभित कन्या-दान; इनसे पाप-क्षय और विष्णु-सायुज्य का फल कहा गया है। फिर दृष्टान्त आता है—व्यापारी-पुत्र दुष्पण्य बार-बार बालहत्या करता है, निर्वासित होकर ऋषि के शाप से ग्रस्त होता है, डूबकर मरता है और दीर्घकाल तक पिशाच-योनि भोगता है; अंत में करुणा और प्रायश्चित्त के मार्ग से, अग्नितीर्थ-सेवा द्वारा शुद्धि और पुनर्स्थापन का संदेश पुष्ट किया जाता है।

104 verses

Adhyaya 23

Adhyaya 23

चक्रतीर्थमाहात्म्य (Glory of Chakratīrtha): Sudarśana’s Protection and Savitṛ’s Restoration

इस अध्याय में सूत तीर्थयात्रा का क्रम बताते हैं। अग्नितीर्थ में स्नान—जो ‘सर्व-पातक-नाशन’ कहा गया है—करके शुद्ध यात्री को चक्रतीर्थ जाने की आज्ञा है। चक्रतीर्थ में जिस उद्देश्य से संकल्प करके स्नान किया जाए, उसी के अनुरूप फल मिलता है; इस प्रकार यह तीर्थ धर्मयुक्त कामना-पूर्ति का स्थान माना गया है। तीर्थ की प्रतिष्ठा एक प्राचीन घटना से होती है। गन्धमादन पर्वत पर अहिर्बुध्न्य ऋषि तप करते हैं, पर घोर राक्षस तपोविघ्न के लिए उन्हें सताते हैं। तब सुदर्शन प्रकट होकर उन विघ्नकारियों का नाश करते हैं और भक्तों की प्रार्थना से वहीं स्थायी रूप से स्थित रहते हैं—इसी से नाम ‘चक्रतीर्थ’ पड़ा और वहाँ राक्षसजन्य उपद्रव नहीं होता। दूसरी कथा में सावितृ/आदित्य के ‘छिन्न-पाणि’ नाम का कारण बताया गया है। दैत्यों से पीड़ित देव बृहस्पति की सलाह से ब्रह्मा के पास जाते हैं; ब्रह्मा गन्धमादन में सुदर्शन-रक्षा सहित माहेश्वर महायज्ञ का विधान करते हैं और होतृ, अध्वर्यु आदि ऋत्विजों की व्यवस्था विस्तार से कही जाती है। प्राशित्र भाग बाँटते समय सावितृ के हाथ स्पर्श मात्र से कट जाते हैं; संकट में अष्टावक्र उन्हें उसी स्थानीय तीर्थ (पूर्व का मुनितीर्थ, अब चक्रतीर्थ) में स्नान करने को कहते हैं। स्नान के बाद सावितृ के स्वर्णमय हाथ पुनः प्रकट होते हैं। फलश्रुति में कहा है कि इस अध्याय का पाठ-श्रवण देह-पूर्णता, इच्छित सिद्धि और मोक्षार्थी को मुक्ति देता है।

63 verses

Adhyaya 24

Adhyaya 24

शिवतीर्थमाहात्म्ये कालभैरवब्रह्महत्याशमनवृत्तान्तः (Śivatīrtha Māhātmya: The Kālabhairava Narrative of Brahmahatyā Pacification)

इस अध्याय में तीर्थयात्रा का विधान है—चक्रतीर्थ में स्नान करके शिवतीर्थ जाना चाहिए; वहाँ अवगाहन से भारी पाप-संचय भी नष्ट हो जाता है। कालभैरव पर ब्रह्महत्या-दोष क्यों आया, यह पूछे जाने पर सूत ब्रह्मा और विष्णु के बीच जगत्-कर्तृत्व को लेकर हुए विवाद का वर्णन करते हैं। वेद बीच में आकर दोनों से परे परमेश्वर का प्रतिपादन करते हैं और प्रणव (ॐ) शिव की परात्परता तथा गुण-व्यवस्था बताता है—रजोगुण से ब्रह्मा सृष्टि करते हैं, सत्त्व से विष्णु पालन करते हैं और तमोगुण से रुद्र संहार करते हैं। मोहग्रस्त ब्रह्मा अग्निमय पाँचवाँ सिर प्रकट करते हैं; तब शिव के आदेश से कालभैरव उस सिर को काट देते हैं, जिससे ब्रह्महत्या की मलिनता व्यक्त रूप में भैरव के पीछे लग जाती है। शिव शुद्धि का मार्ग बताते हैं—कपाल-पात्र लेकर भिक्षुक की भाँति भ्रमण, वाराणसी में प्रवेश कर दोष का क्षय, और अंत में दक्षिण समुद्र के निकट गंधमादन के पास स्थित शिवतीर्थ में स्नान करके शेष दोष का नाश। स्नान के बाद शिव पूर्ण शुद्धि की पुष्टि करते हैं और भैरव को काशी में कपाल स्थापित करने की आज्ञा देते हैं, जिससे कपालतिथि/कपालतीर्थ की उत्पत्ति होती है। अंत में फलश्रुति है कि इस माहात्म्य का पाठ और श्रवण दुःख-निवारक तथा महादोष-हर है।

71 verses

Adhyaya 25

Adhyaya 25

Śaṅkhatīrtha Māhātmya (शंखतीर्थमाहात्म्य) — Purification from Kṛtaghnatā (Ingratitude)

सूतजी शंखतीर्थ का माहात्म्य बताते हैं। गंधमादन पर्वत पर स्थित इस तीर्थ में स्नान करने से बड़े-बड़े पाप भी नष्ट होते हैं, विशेषकर कृतघ्नता—माता, पिता और गुरु के प्रति किए गए अपराध तथा उपकार-भंग—से उत्पन्न दोषों की शुद्धि होती है। इसी संदर्भ में एक इतिहासनुमा कथा आती है। ऋषि वत्सनाभ दीर्घकाल तक अचल देह से तप करते-करते वल्मीकों से ढक जाते हैं। तभी क्षेत्र में सात दिनों तक भयंकर आँधी-वर्षा चलती रहती है। धर्मदेव उनकी दृढ़ता से द्रवित होकर महान महिष (भैंसे) का रूप धारण करते हैं और सात दिन तक उन्हें वर्षा से ढाँककर बचाते हैं। वर्षा थमने पर वत्सनाभ उस महिष को देखकर उसके धर्मवत् आचरण पर विचार करते हैं, फिर तप में लग जाते हैं; पर मन अशांत हो उठता है। वे समझते हैं कि रक्षक का सम्मान न करना कृतघ्नता है और प्रायश्चित्त में आत्मनाश का विचार करते हैं। तभी धर्म प्रकट होकर उन्हें रोकते हैं और अहिंसक उपाय बताते हैं—शंखतीर्थ में स्नान। स्नान से वत्सनाभ की बुद्धि शुद्ध होती है और वे ब्रह्मभाव को प्राप्त होते हैं। अंत में तीर्थ की महिमा तथा इस अध्याय के श्रवण-पाठ से मोक्षाभिमुख फल की फलश्रुति कही गई है।

63 verses

Adhyaya 26

Adhyaya 26

Tīrthatraya-Āvāhana and Jñāna-Upadeśa (यमुनागङ्गागयातीर्थत्रयप्रादुर्भावः)

इस अध्याय में सूत जी तीर्थयात्रा का क्रम बताते हैं—शङ्खतीर्थ के कर्मकाण्ड के बाद यमुना, गंगा और गया—इन तीन प्रसिद्ध तीर्थों का सेवन करना चाहिए। ये तीर्थ विघ्नों को दूर करने वाले, दुःख-शमन करने वाले हैं; विशेष रूप से अज्ञान का नाश करके ज्ञान प्रदान करने वाले कहे गए हैं। ऋषि पूछते हैं कि गन्धमादन में ये तीनों तीर्थ कैसे प्रकट हुए और स्नान से राजा जानश्रुति को ज्ञान कैसे मिला। सूत ऋषि रैक्व (सायुग्वाङ) का तपस्वी-चरित सुनाते हैं। वह जन्म से विकलांग होते हुए भी महान तपस्वी था; यात्रा न कर सकने पर उसने मंत्र और ध्यान से तीर्थों का आवाहन करने का संकल्प किया। तब पाताल से यमुना, जाह्नवी गंगा और गया मानव-रूप धारण कर प्रकट हुईं और जहाँ प्रकट हुईं वहीं निवास करने का वर दिया; वही स्थान यमुनातीर्थ, गंगातीर्थ और गयातीर्थ कहलाए। वहाँ स्नान करने से अज्ञान दूर होता है और ज्ञान का उदय होता है—यह फल बताया गया है। फिर अतिथि-सत्कार और दान में प्रसिद्ध राजा जानश्रुति का प्रसंग आता है। हंस-रूप में संवाद करते दिव्य ऋषि बताते हैं कि रैक्व का ब्रह्मज्ञान राजा के पुण्य से भी श्रेष्ठ है। इससे विचलित राजा रैक्व को खोजकर धन-वैभव अर्पित करता और उपदेश माँगता है, पर रैक्व मूल्य-भाव से द्रव्य को अस्वीकार करता है। अध्याय का सार यह है कि संसार तथा पुण्य-पाप दोनों के प्रति वैराग्य ही अद्वैत ज्ञान की भूमिका है; वही अज्ञान का निर्णायक नाश कर ब्रह्मभाव की ओर ले जाता है।

102 verses

Adhyaya 27

Adhyaya 27

Kotitīrtha-māhātmya and Pilgrimage Ethics (कोटितीर्थमाहात्म्य तथा तीर्थयात्रानैतिकता)

इस अध्याय में सूतजी ऋषियों से तीर्थयात्रा का क्रम और मार्ग-धर्म बताते हैं। वे कहते हैं कि यमुना, गंगा और गया में विधिपूर्वक स्नान करके यात्री को अत्यन्त पुण्यदायक कोटितीर्थ जाना चाहिए। यह तीर्थ सर्वप्रसिद्ध, समृद्धिदायक, पवित्रता देने वाला, पाप-नाशक, दुष्ट स्वप्नों और बड़े विघ्नों को दूर करने वाला कहा गया है। इसके नाम की कथा भी दी गई है—रावण-वध के बाद श्रीराम ब्रह्महत्या-दोष से मुक्ति हेतु गन्धमादन पर्वत पर ‘रामनाथ’ लिंग की स्थापना करते हैं। अभिषेक के लिए जल न मिलने पर वे धनुष की ‘कोटि’ से पृथ्वी को भेदते हुए जाह्नवी (गंगा) का स्मरण करते हैं, तब गंगा प्रकट होती है; इसलिए यह स्थान कोटितीर्थ कहलाया। यहाँ का स्नान बहु-जन्मों के संचित पापों को भी गलाने वाला बताया गया है; अन्य तीर्थों का स्नान कभी-कभी गहरे पाप का नाश नहीं कर पाता। ऋषि पूछते हैं—यदि कोटितीर्थ ही पर्याप्त है तो अन्य तीर्थों में स्नान क्यों? सूत उत्तर देते हैं कि मार्ग में मिलने वाले तीर्थों/देवालयों की उपेक्षा करके आगे बढ़ना ‘तीर्थातिक्रम-दोष’ है; इसलिए बीच-बीच में स्नान आवश्यक है और कोटितीर्थ अन्त में शेष मल को हरने वाला है। उदाहरण में श्रीराम ब्रह्महत्या से मुक्त होकर अयोध्या लौटते हैं। श्रीकृष्ण भी नारद के उपदेश से लोक-शिक्षा हेतु, कंस-वध से जुड़ा लोक-प्रसिद्ध दोष शांत करने के लिए कोटितीर्थ में स्नान कर मथुरा लौटते हैं। फलश्रुति में इस अध्याय के श्रवण-पाठ से ब्रह्महत्या आदि पापों से मुक्ति कही गई है।

101 verses

Adhyaya 28

Adhyaya 28

साध्यामृततीर्थमाहात्म्यं तथा पुरूरवोर्वशी-वियोगशापमोक्षणम् (The Glory of Sādhyāmṛta Tīrtha and the Curse-Release of Purūravas and Urvaśī)

इस अध्याय में सूत पहले कोटितीर्थ का वर्णन करके गन्धमादन पर्वत पर स्थित महातीर्थ ‘साध्यामृत’ की महिमा कहते हैं। वहाँ का स्नान तप, ब्रह्मचर्य, यज्ञ और दान से भी बढ़कर बताया गया है; उसके जल-स्पर्श से देहगत पाप तत्काल नष्ट होते हैं। प्रायश्चित्त-भाव से स्नान करने वाले विष्णुलोक में सम्मान पाते हैं और भारी कर्मबन्ध वाले भी भयानक नरकों से बच जाते हैं—ऐसा फल-निर्णय कहा गया है। फिर दृष्टान्त आता है—राजा पुरूरवा और अप्सरा उर्वशी कुछ शर्तों पर साथ रहते हैं: नग्न-दर्शन न हो, उच्छिष्ट भोजन न हो, और दो मेमनों की रक्षा हो। गन्धर्व छल से मेमने चुरा लेते हैं; पुरूरवा उन्हें बचाने दौड़ते हैं, बिजली की चमक में वे नग्न दिख जाते हैं और उर्वशी विरह करके चली जाती है। बाद में इन्द्रसभा में उर्वशी के नृत्य के समय दोनों हँस पड़ते हैं; तब तुम्बुरु उन्हें तत्काल-वियोग का शाप देता है। पुरूरवा इन्द्र से प्रार्थना करते हैं; इन्द्र साध्यामृत-तीर्थ की यात्रा बताते हैं—देव, सिद्ध और योगी-मुनियों से सेवित, भुक्ति-मुक्ति देने वाला और शाप-नाशक। वहाँ स्नान से शाप छूटता है, उर्वशी से पुनर्मिलन होता है और वे अमरावती लौटते हैं। अंत में कहा है—कामना से स्नान करने पर इच्छित फल और स्वर्ग, निष्काम स्नान से मोक्ष; तथा इस अध्याय का पाठ या श्रवण वैकुण्ठ-गति प्रदान करता है।

96 verses

Adhyaya 29

Adhyaya 29

Sarvatīrtha-Māhātmya (मानसतीर्थ / सर्वतीर्थ माहात्म्य) — The Glory of the ‘All-Tīrthas’ Bath

अध्याय का आरम्भ सूत के कथन से होता है कि नियमशील यात्री पहले किसी मुक्तिदायक तीर्थ में स्नान करके फिर ‘सर्वतीर्थ’ नामक परम पुण्यस्थल पर जाए। यहाँ का स्नान महापापों का भी नाश करने वाला कहा गया है; स्नान करने वाले के सामने पाप मानो काँप उठते हैं। वेदपाठ, बड़े यज्ञ, देवपूजा, पवित्र तिथियों के उपवास और मंत्र-जप से जो फल मिलता है, वह यहाँ केवल डुबकी से प्राप्त हो जाता है। ऋषि पूछते हैं कि इस स्थान का नाम ‘सर्वतीर्थ’ कैसे पड़ा। सूत भृगुवंशी तपस्वी सुचरिता की कथा सुनाते हैं—वे अंधे, वृद्ध और सर्वदेशीय तीर्थयात्रा करने में असमर्थ थे। उन्होंने दक्षिण समुद्र के निकट गंधमादन पर्वत पर शिव की कठोर आराधना की—त्रिकाल पूजा, अतिथि-सत्कार, ऋतु-तप, भस्म-धारण, रुद्राक्ष-धारण और दीर्घ संयम का पालन किया। प्रसन्न होकर शिव प्रकट हुए, उन्हें दृष्टि दी और वर माँगने को कहा। सुचरिता ने वर माँगा कि बिना यात्रा किए उन्हें सभी तीर्थों के स्नान का फल मिल जाए। शिव ने कहा कि रामसेतु से पवित्र उस स्थान में वे सभी तीर्थों का आवाहन करेंगे; इसलिए यह ‘सर्वतीर्थ’ तथा ‘मानसतीर्थ’ कहलाएगा और भोग तथा मोक्ष—दोनों देने वाला होगा। सुचरिता ने स्नान करते ही यौवन पाया; उन्हें वहीं निवास कर शिव-स्मरण सहित नियमित स्नान करने और दूर की यात्राएँ छोड़ने का उपदेश मिला। अंत में वे शिव को प्राप्त हुए; इस आख्यान के पढ़ने-सुनने से पापों का क्षय होता है—ऐसी फलश्रुति कही गई है।

51 verses

Adhyaya 30

Adhyaya 30

धनुष्कोटि-तीर्थमाहात्म्य (Dhanuskoṭi Tīrtha-Māhātmya)

इस अध्याय में सूत जी नैमिषारण्य के ऋषियों को धनुष्कोटि-तीर्थ का माहात्म्य सुनाते हैं। कहा गया है कि विधिपूर्वक वहाँ स्नान करना, तथा उसका स्मरण, कथा-श्रवण/कथन और स्तुति भी, बड़े से बड़े पापों का शोधन कर देती है। आगे अट्ठाईस नरकों का वर्णन आता है और बताया जाता है कि जो धनुष्कोटि में स्नान करते हैं या श्रद्धा से उसका गुणगान करते हैं, वे उन दण्डलोकों में नहीं जाते। चोरी, विश्वासघात, हिंसा, वेद-विरुद्ध आचरण, काम-दोष, अधिकार का दुरुपयोग और यज्ञ-विधि का भंग—इन पापों के लिए जिन-जिस नरकों का विधान है, उनका उदाहरण देकर बार-बार यही कहा गया है कि धनुष्कोटि-स्नान से पतन रुक जाता है। फिर फल-श्रुति में धनुष्कोटि में अवगाहन को महादान और महायज्ञों, अश्वमेध आदि के समान पुण्यदायक बताया गया है; आत्मज्ञान और चतुर्विध मुक्ति-भाव की प्राप्ति का भी कथन है। अंत में नाम-व्युत्पत्ति दी गई है—रावण-वध के बाद विभीषण के राज्याभिषेक पर विभीषण सेतु के विषय में श्रीराम से प्रार्थना करता है; श्रीराम के धनुष-संबंधी चिन्ह/कर्म से वह स्थान पवित्र होकर ‘धनुष्कोटि’ कहलाता है। अध्याय सेतु-क्षेत्र के अन्य दिव्य स्थलों के साथ इसकी प्रतिष्ठा बताकर इसे सर्वपापहर और भुक्ति-मुक्ति देने वाला तीर्थ घोषित करता है।

103 verses

Adhyaya 31

Adhyaya 31

Aśvatthāmā’s Night Assault (Suptamāraṇa) and Prescribed Expiation (Prāyaścitta)

यह अध्याय प्रश्नोत्तर रूप में धर्म-विचार प्रस्तुत करता है। ऋषि पूछते हैं कि अश्वत्थामा ने सोए हुए लोगों का वध (सुप्तमारण) कैसे किया और उस पाप से कैसे मुक्त हुआ; साथ ही धनुष-नोक के माप जितने तीर्थ-स्नान द्वारा शुद्धि का संकेत भी आता है। दुर्योधन के पतन के बाद अश्वत्थामा, कृप और कृतवर्मा जल के निकट वन में जाते हैं। वहाँ एक हिंस्र पक्षी को सोए कौओं का संहार करते देखकर अश्वत्थामा इसे रात्रि-आक्रमण की शिक्षा मानता है। कृप के नैतिक विरोध के बावजूद वह महादेव की आराधना करता है, शुद्ध खड्ग प्राप्त करता है और सोए हुए शिविर में प्रवेश कर धृष्टद्युम्न आदि का वध करता है; द्वार पर कृप और कृतवर्मा पहरा देते हैं। इसके बाद तपस्वी उसे घोर दोष का भागी कहकर धिक्कारते हैं। वह प्रायश्चित्त हेतु व्यास के पास जाता है, जहाँ उसे सुप्तमारण-दोष की शुद्धि के लिए एक मास तक निरंतर स्नान-व्रत का विधान मिलता है। अंत में फलश्रुति है कि श्रद्धा से इसका पाठ या श्रवण करने से पाप नष्ट होते हैं और शिवलोक में सम्मान प्राप्त होता है।

102 verses

Adhyaya 32

Adhyaya 32

धनुष्कोटि-माहात्म्य (Dhanuṣkoṭi Māhātmya: The Glory of Dhanuṣkoṭi)

सूतजी नैमिषारण्य के ऋषियों से धनुष्कोटि तीर्थ का वैभव कहते हैं। सोमवंशी राजा नन्द राज्य अपने पुत्र धर्मगुप्त को सौंपकर तपोवन चले जाते हैं। धर्मगुप्त धर्मपूर्वक शासन करता है, अनेक यज्ञ करता है, ब्राह्मणों का पालन-पोषण करता है और प्रजा में व्यवस्था व शांति बनी रहती है। एक बार भयानक वन में शिकार करते हुए रात्रि हो जाती है। राजा संध्यावंदन कर गायत्री का जप करता है। उसी वृक्ष पर सिंह से भयभीत एक भालू चढ़ आता है और रात भर परस्पर रक्षा का धर्म-संधि प्रस्ताव रखता है। भालू के सो जाने पर सिंह राजा को विश्वासघात के लिए उकसाता है, पर भालू जागकर कहता है कि ‘विश्वासघात’ सबसे भारी पाप है। बाद में सिंह के बहकावे में आकर राजा सोए भालू को गिरा देता है; वह पुण्यबल से बच जाता है और स्वयं को भृगुवंशी ऋषि ध्यनकाष्ठ (भालू-रूप) बताकर निर्दोष सोए प्राणी को हानि पहुँचाने पर राजा को उन्माद का शाप देता है। फिर सिंह भी यक्ष निकलता है—कुबेर का सचिव भद्रनाम, जो गौतम के शाप से सिंह बना था; ध्यनकाष्ठ से संवाद कर वह शापमुक्त होकर यक्ष-रूप पा लेता है। उन्मत्त धर्मगुप्त को मंत्री नन्द के पास ले जाते हैं; नन्द ऋषि जैमिनि से उपाय पूछते हैं। जैमिनि सेतु के निकट दक्षिण समुद्र तट पर स्थित धनुष्कोटि में स्नान और रमानाथ (शिव) की पूजा बतलाते हैं, जो बड़े-बड़े दोषों को भी धो देती है। नन्द वहाँ ले जाकर नियमपूर्वक स्नान-पूजन कराते हैं और धर्मगुप्त का उन्माद तुरंत शांत हो जाता है; वह दान-भूमिदान कर पुनः धर्म से राज्य करता है। अंत में फलश्रुति है कि इस कथा का श्रवण भी पवित्र करता है और स्नान से पहले “धनुष्कोटि” तीन बार कहने से उत्तम फल मिलता है।

64 verses

Adhyaya 33

Adhyaya 33

धनुष्कोटि-माहात्म्यं (Dhanuṣkoṭi Māhātmya) — Expiation through the Dhanuṣkoṭi Tīrtha

इस अध्याय में ऋषियों के पूछने पर सूत सेतु-प्रदेश के धनुष्कोटि तीर्थ का गूढ़ और अद्भुत वैभव बताते हैं। रैभ्य नामक विद्वान् याज्ञिक के पुत्र अर्‍वावसु और परावसु राजा बृहद्द्युम्न के दीर्घ सत्त्र-यज्ञ में निष्कलंक विधि से सहायता करते हैं। तभी परावसु रात में लौटते समय वन में मृग-भ्रम से अपने पिता का वध कर बैठता है, जिससे ब्रह्महत्या-सदृश महादोष का संकट खड़ा हो जाता है। प्रायश्चित्त के लिए दोनों भाई उत्तरदायित्व बाँटते हैं—ज्येष्ठ परावसु यज्ञकार्य निभाता रहे, इसलिए कनिष्ठ अर्‍वावसु उसके स्थान पर दीर्घ व्रत स्वीकार करता है। फिर भी समाज और राजकीय प्रतिक्रिया से अर्‍वावसु को, निर्दोष होने पर भी, बहिष्कृत किया जाता है; वह कठोर तप करता है और देवदर्शन पाता है। देवगण बताते हैं कि सेतु-प्रदेश के धनुष्कोटि में स्नान महापातकों (पंचमहापातक सहित) का नाश करने वाला, लोक-कल्याण और मोक्षदायी उपाय है। परावसु नियत संकल्प से वहाँ स्नान करता है और आकाशवाणी से दोष-नाश की घोषणा सुनता है; अंततः मेल-मिलाप होता है। फलश्रुति में कहा गया है कि इस अध्याय का पाठ-श्रवण और धनुष्कोटि-स्नान घोर कष्टों व दोषों का शमन करता है।

83 verses

Adhyaya 34

Adhyaya 34

धनुष्कोटिप्रशंसनम् (Praise of Rāma-dhanus-koṭi) — Sṛgāla–Vānara Saṃvāda and the Expiatory Bath

इस अध्याय में सूत ‘इतिहास’ के रूप में दक्षिण समुद्र स्थित श्रीराम-धनुष्कोटि तीर्थ की महिमा कहते हैं। श्मशान-भूमि में जाति-स्मर दो प्राणी—सृगाल और वानर—मिलते हैं, जो पूर्वजन्म में मनुष्य मित्र थे। वानर सृगाल की दीन दशा और हीन आहार का कारण पूछता है। सृगाल बताता है कि वह पूर्वजन्म में वेदशर्मा नामक विद्वान ब्राह्मण था, जिसने एक ब्राह्मण को वचन देकर भी दान नहीं दिया; प्रतिश्रुत दान न देने से पुण्य नष्ट होता है और वचनभंग अत्यन्त भारी दोष है—यह कठोर चेतावनी दी जाती है। फिर सृगाल वानर से उसका कारण पूछता है। वानर स्वीकार करता है कि वह पूर्वजन्म में वेदनाथ नामक ब्राह्मण था, जिसने ब्राह्मण के घर से शाक-भाजी चुराई थी। ग्रन्थ ब्रह्मस्व-हरण (ब्राह्मण की संपत्ति की चोरी) को अत्यन्त घोर पाप बताकर नरक-भोग के बाद पशु-योनि की प्राप्ति का विधान दिखाता है। उद्धार की इच्छा से दोनों भस्म-लिप्त, त्रिपुण्ड्र-धारी, रुद्राक्ष-युक्त मुनि सिन्धुद्वीप के पास जाते हैं। मुनि उनके पूर्वजन्म की पुष्टि कर दक्षिण समुद्र में श्रीराम-धनुष्कोटि पर स्नान को प्रायश्चित्त बताता है। तीर्थ-प्रभाव सिद्ध करने हेतु वह यज्ञदेव के पुत्र सुमति की कथा सुनाता है—जो कुसंग से चोरी, मद्यपान आदि में गिरकर ब्रह्महत्या तक कर बैठता है और ब्रह्महत्या-रूपिणी शक्ति उसका पीछा करती है। अंत में दुर्वासा ऋषि कहते हैं कि श्रीराम-धनुष्कोटि में स्नान करने से ऐसे महापापों से भी शीघ्र मुक्ति मिलती है। इस प्रकार अध्याय वचनपालन, अचौर्य, ऋषि-वचन की सत्ता और तीर्थ-स्नान-प्रायश्चित्त को एक सूत्र में बाँधता है।

81 verses

Adhyaya 35

Adhyaya 35

धनुष्कोटिस्नानमाहात्म्यं — The Māhātmya of Bathing at Dhanuṣkoṭi

इस अध्याय में तीर्थ-सेवा द्वारा प्रायश्चित्त का बहुवाणी धर्मसंवाद है। यज्ञदेव दुर्वासा से पूछते हैं कि दुर्विनीत नामक ब्राह्मण ने मोह और कामवश मातृ-सीमा का उल्लंघन करके भारी पाप किया; फिर वह कैसे शुद्ध हुआ? दुर्वासा उसके जीवन का वर्णन करते हैं—पाण्ड्य देश का वह ब्राह्मण अकाल के कारण गोकर्ण गया, पतन हुआ, फिर पश्चात्ताप से ऋषियों की शरण में पहुँचा; कुछ ऋषि उसे ठुकराते हैं, पर व्यास करुणा से मार्ग बताते हैं। व्यास देश-काल-विशेष व्रत बताते हैं—माता सहित रामसेतु/धनुष्कोटि जाए, माघ मास में सूर्य के मकर में रहने पर संयम रखे, अहिंसा और वैर-त्याग करे, एक मास तक निरन्तर स्नान और उपवास करे। इससे पुत्र और माता दोनों की शुद्धि होती है। फिर व्यास गृहस्थ-धर्म में पुनः प्रवेश हेतु आचार-उपदेश देते हैं—अहिंसा, संध्या व नित्यकर्म, इन्द्रिय-निग्रह, अतिथि-गुरु-वृद्ध का सम्मान, शास्त्र-अध्ययन, शिव-विष्णु भक्ति, मंत्र-जप, दान और शौच। आगे एक अन्य प्रसंग में सिन्धुद्वीप बताता है कि यज्ञदेव अपने पुत्र को ब्रह्महत्या आदि पापों से मुक्ति के लिए धनुष्कोटि लाते हैं; वहाँ अशरीरी वाणी मुक्ति की पुष्टि करती है। अंत में फलश्रुति कहती है कि इस अध्याय का श्रवण-पाठ भी धनुष्कोटि-स्नान का फल देता है और शीघ्र ही योगियों के समुदायों को भी दुर्लभ, मोक्ष-सदृश पद प्रदान करता है।

73 verses

Adhyaya 36

Adhyaya 36

धनुष्कोटि-माहात्म्यम् (Dhanushkoti Māhātmya: Bathing Merit and Mahālaya Śrāddha)

इस अध्याय में सूत और मुनियों के संवाद के माध्यम से धर्म का उपदेश दिया गया है। ‘दुराचार’ नामक ब्राह्मण के उदाहरण से ‘संग-धर्म’ बताया गया है कि महापातकियों के दीर्घ संसर्ग से ब्राह्मण का पुण्य और प्रतिष्ठा क्रमशः क्षीण होती जाती है; साथ रहना, साथ खाना और साथ सोना आदि से पाप की समानता तक हो जाती है। फिर धनुष्कोटि तीर्थ की शक्ति का वर्णन है, जो श्रीरामचन्द्र के धनुष से सम्बद्ध और महापातक-नाशिनी कही गई है। वहाँ स्नान करने से तत्काल पापों से मुक्ति होती है और वेताल के वशीकरण जैसी बाधा भी दूर हो जाती है—यह कथा द्वारा स्पष्ट किया गया है। इसके बाद भाद्रपद कृष्णपक्ष में महालय श्राद्ध का काल-विधान, तिथि-विशेष के फल तथा उपेक्षा करने पर दोष बताए गए हैं। यथाशक्ति वेद-ज्ञ, सदाचारी ब्राह्मणों को भोजन कराना मुख्य बताया गया है। अंत में धनुष्कोटि-माहात्म्य के श्रवण और ज्ञान से पाप-नाश तथा मुक्ति-सहायता का सामान्य फलश्रुति रूप में प्रतिपादन है।

112 verses

Adhyaya 37

Adhyaya 37

Kṣīrakuṇḍa–Kṣīrasaras Māhātmya (Origin and Merit of the Milk-Tīrtha)

अध्याय 37 में ऋषिगण सूतजी से पूछते हैं कि चक्रतीर्थ के पास उल्लिखित क्षीरकुण्ड की उत्पत्ति और महिमा क्या है। सूत बताते हैं कि यह तीर्थ दक्षिण समुद्र के तट पर फुल्लग्राम में स्थित है, राम के सेतु-कार्य से पावन हुआ है, और इसके दर्शन, स्पर्श, ध्यान तथा स्तुति-पाठ से पाप नष्ट होकर मोक्ष की प्राप्ति होती है। फिर मुद्गल ऋषि की कथा आती है। वे नारायण को प्रसन्न करने हेतु वेदविहित यज्ञ करते हैं; विष्णु प्रत्यक्ष प्रकट होकर हवि ग्रहण करते हैं और वर देते हैं। मुद्गल पहले निष्कपट, अचल भक्ति माँगते हैं और फिर साधन न होने पर भी दिन में दो बार पयो-होम करने की क्षमता चाहते हैं। विष्णु विश्वकर्मा से सुंदर सरोवर बनवाते हैं और सुरभि को आदेश देते हैं कि वह प्रतिदिन उसे दूध से भर दे। तब यह तीर्थ ‘क्षीरसरस’ के नाम से प्रसिद्ध होता है; यहाँ स्नान करने से महापाप नष्ट होते हैं और मुद्गल को जीवनांत में मुक्ति का आश्वासन मिलता है। अंत में कद्रू से जुड़ा कारण-प्रसंग और फलश्रुति है कि इस अध्याय का पाठ या श्रवण क्षीरकुण्ड-स्नान का फल देता है।

63 verses

Adhyaya 38

Adhyaya 38

Kadrū–Vinatā Saṃvāda, Garuḍa-Amṛtāharaṇa, and Kṣīra-kuṇḍa Praśaṃsā (कद्रू-विनता संवादः, गरुडामृताहरणम्, क्षीरकुण्डप्रशंसा)

ऋषि सूतजी से पूछते हैं कि कद्रू क्षीर-कुण्ड में डूबने से कैसे मुक्त हुई और विनता किस छलपूर्ण शर्त के कारण दासी बनी। सूत कृतयुग का वृत्तान्त सुनाते हैं—कश्यप की दो पत्नियाँ कद्रू और विनता; विनता से अरुण और गरुड़ उत्पन्न हुए, और कद्रू से वासुकि आदि अनेक नाग। उच्चैःश्रवा घोड़े को देखकर दोनों ने पूँछ के रंग पर बाज़ी लगाई; कद्रू ने नाग-पुत्रों को पूँछ काली करने का आदेश देकर छल रचा, और विरोध करने पर उन्हें शाप दिया—जो आगे राजाओं के सर्प-सत्र में उनके विनाश का कारण बनता है। विनता हारकर दासी बन गई; गरुड़ ने कारण जानकर माता की मुक्ति का उपाय खोजा। नागों ने देवों का अमृत माँगा। विनता ने गरुड़ को धर्मयुक्त मर्यादा बताई—अमृत स्वयं न पीना और ब्राह्मण को हानि न पहुँचाना। गरुड़ ने कश्यप से परामर्श लिया; शापित वैरी हाथी और कछुए को भक्षण कर बल पाया, और वलखिल्य ऋषियों को कष्ट न हो इसलिए शाखा को अन्यत्र रख दिया। फिर देवताओं से युद्ध कर अमृत ले आया; विष्णु ने वर देकर गरुड़ को अपना वाहन बनाया। इन्द्र ने अमृत वापस लेने की युक्ति की; अंततः विनता दासत्व से मुक्त हुई। आगे क्षीर-कुण्ड के व्रत (तीन दिन उपवास और स्नान) की महिमा कही गई है, और फलश्रुति में पाठ-श्रवण को महादानों के तुल्य पुण्यदायक बताया गया है।

105 verses

Adhyaya 39

Adhyaya 39

कपितीर्थ-माहात्म्य तथा रंभा-शापमोचन (Kapitīrtha Māhātmya and Rambhā’s Release from the Curse)

इस अध्याय में दो प्रसंग हैं। पहले सूत कपितीर्थ की उत्पत्ति और उसकी अद्भुत फलदायिनी शक्ति बताते हैं। रावण आदि की सेनाओं पर विजय के बाद गन्धमादन पर्वत पर वानरों ने लोक-कल्याण हेतु यह तीर्थ बनाया, वहाँ स्नान कर वर पाए। फिर श्रीराम ने विशेष वर दिया कि कपितीर्थ-स्नान का फल गङ्गा-स्नान और प्रयाग-स्नान के समान, समस्त तीर्थों के पुण्य के बराबर, अग्निष्टोम आदि सोमयागों, गायत्री सहित महा-मन्त्र-जप, गोदान आदि महादानों, वेद-पारायण और देव-पूजा के फल के तुल्य होता है। देव-ऋषि वहाँ एकत्र होकर इसकी अनुपम महिमा गाते हैं और मोक्षार्थियों को वहाँ अवश्य जाने की आज्ञा देते हैं। दूसरे प्रसंग में रम्भा के शाप और मोचन की कथा है। कुशिकवंशी विश्वामित्र पहले राजा थे; वसिष्ठ के ब्रह्मतेज से पराजित होकर उन्होंने ब्राह्मणत्व प्राप्ति हेतु कठोर तप किया। देवताओं ने तप भंग करने को अप्सरा रम्भा को भेजा; युक्ति समझकर विश्वामित्र ने उसे दीर्घकाल तक शिला बनने का शाप दिया और कहा कि किसी ब्राह्मण के द्वारा ही मुक्ति होगी। आगे अगस्त्य के शिष्य श्वेत को एक राक्षसी सताती है; दिव्य क्रिया से वह शिला उछलकर कपितीर्थ में गिरती है। तीर्थ-स्पर्श से रम्भा पुनः अपने रूप में प्रकट होती है, देवताओं से सम्मान पाकर स्वर्ग लौटती है और कपितीर्थ की स्तुति करते हुए रामनाथ व शंकर की वन्दना करती है। अंत में फलश्रुति है कि इस अध्याय का श्रवण-पाठ कपितीर्थ-स्नान का फल देता है।

68 verses

Adhyaya 40

Adhyaya 40

Gayatrī–Sarasvatī Sannidhāna at Gandhamādana and the Establishment of the Twin Kuṇḍas (गायत्रीसरस्वती-सन्निधानं तथा कुण्डद्वय-माहात्म्यम्)

अध्याय का आरम्भ सूतजी द्वारा ऋषियों से होता है। वे बताते हैं कि गायत्री और सरस्वती की परम्पराओं का श्रवण‑कीर्तन मुक्तिदायक और पापहारी है। जो आनन्दपूर्वक गायत्री‑सरस्वती तीर्थों में स्नान करता है, वह गर्भवास के दुःख से बचता है और निश्चित मोक्ष पाता है। ऋषि पूछते हैं कि गन्धमादन पर्वत पर गायत्री‑सरस्वती का सन्निधान क्यों है। सूतजी कारणकथा कहते हैं—प्रजापति ब्रह्मा अपनी पुत्री वाक् पर मोहित हुए; वाक् हरिणी रूप धारण कर भागी और ब्रह्मा उसके पीछे दौड़े। देवताओं ने इस निषिद्ध आचरण की निन्दा की। तब शिव ने व्याध (शिकारी) रूप लेकर ब्रह्मा को बाण से विद्ध किया; उस आघात से महान ज्योति प्रकट हुई जो मृगशीर्ष नक्षत्र बनी, और शिव का उसका अनुगमन खगोलीय संकेत रूप में वर्णित है। ब्रह्मा के पतन से व्याकुल गायत्री और सरस्वती ने पति‑पुनर्स्थापन हेतु गन्धमादन में कठोर तप किया—उपवास, इन्द्रिय‑संयम, शिव‑ध्यान और पञ्चाक्षर मंत्र‑जप। स्नान के लिए उन्होंने अपने नाम से दो कुण्ड/तीर्थ बनाए और त्रिसवन स्नान किया। प्रसन्न होकर शिव पार्वती तथा देवगणों सहित प्रकट हुए; स्तुति सुनकर उन्होंने वर दिया और ब्रह्मा के शिरों को जोड़कर उन्हें पुनः चतुर्मुख ब्रह्मा रूप में स्थापित किया। ब्रह्मा ने अपराध स्वीकार कर भविष्य में निषिद्ध कर्म से रक्षा माँगी; शिव ने प्रमाद न करने की शिक्षा दी। शिव ने दोनों कुण्डों का नित्य तारक माहात्म्य बताया—वहाँ स्नान से शुद्धि, महापातक‑नाश, शान्ति और इष्ट‑सिद्धि मिलती है; वेदाध्ययन या नित्यकर्म से वंचित जनों को भी समतुल्य फल प्राप्त होता है। अंत में फलश्रुति है कि श्रद्धा से इस अध्याय का श्रवण या पाठ करने पर दोनों तीर्थों में स्नान का फल मिलता है।

61 verses

Adhyaya 41

Adhyaya 41

गायत्री-सरस्वतीतीर्थमाहात्म्य तथा कश्यपप्रायश्चित्तकथा (Glory of the Gayatrī–Sarasvatī Tīrthas and the Atonement Narrative of Kaśyapa)

इस अध्याय में सूत जी गायत्री–सरस्वती नामक युगल तीर्थों पर केंद्रित एक पावन इतिहास सुनाने का संकल्प करते हैं। पहले राजा परीक्षित की प्रसिद्ध कथा आती है—शिकार के समय उन्होंने ध्यानस्थ ऋषि का अपमान करते हुए उनके कंधे पर मरा हुआ सर्प रख दिया; ऋषि-पुत्र शृंगी ने शाप दिया कि सातवें दिन तक्षक के दंश से राजा की मृत्यु होगी। राजा रक्षा-उपाय करता है, और ब्राह्मण-मंत्रिक कश्यप विष-निवारण हेतु चल पड़ता है; मार्ग में तक्षक उसे रोककर वट-वृक्ष को जलाकर अपनी घातक शक्ति दिखाता है, पर कश्यप मंत्र से वृक्ष और उस पर बैठे मनुष्य को पुनर्जीवित कर देता है। तक्षक धन देकर कश्यप को लौटा देता है, और अंततः फल में कीट-रूप धारण कर राजा को दंश कर मार देता है। इसके बाद कश्यप के धर्म-संकट का वर्णन है। समर्थ होते हुए भी लोभवश उसने विषपीड़ित की रक्षा नहीं की—इस कारण समाज उसे धिक्कारता है; वह ऋषि शाकल्य से परामर्श लेता है। शाकल्य कठोर नीति बताते हैं कि जान-बूझकर लोभ से जीवन-रक्षा से हटना महापाप तुल्य है और उसके सामाजिक-वैदिक दुष्परिणाम होते हैं। प्रायश्चित्त के लिए वे दक्षिण समुद्र के सेतु-प्रदेश में, घण्डमादन-संबद्ध स्थान पर स्थित गायत्री–सरस्वती तीर्थों में संकल्पपूर्वक स्नान और नियम का उपदेश देते हैं। कश्यप वहाँ स्नान कर तत्काल शुद्ध हो जाता है; तब देवी गायत्री और सरस्वती प्रकट होकर तीर्थ-स्वरूप बताती हैं, वर देती हैं, और कश्यप की स्तुति स्वीकार करती हैं—वे विद्या की मूर्ति और वेद-माता हैं। अंत में इन तीर्थों के स्नान-श्रवण से महान पवित्र फल की फलश्रुति कही गई है।

102 verses

Adhyaya 42

Adhyaya 42

ऋणमोचन–देवतीर्थ–सुग्रीव–नल–नीलादि तीर्थमाहात्म्य (Release from Debts and the Glories of Key Setu Tīrthas)

इस अध्याय में श्रीसूत ऋषियों से सेतु-प्रदेश के अनेक तीर्थों का वैभव बताते हैं। सबसे पहले ‘ऋणमोचन’ तीर्थ का वर्णन है, जहाँ स्नान से तीन ऋण—ऋषि-ऋण, देव-ऋण और पितृ-ऋण—का मोचन कहा गया है। ग्रंथ बताता है कि ब्रह्मचर्य-धर्म, यज्ञकर्म और संतान/पितृ-परंपरा के अभाव से ये ऋण उत्पन्न होते हैं; ऋणमोचन में स्नान से इन दायित्वों से मुक्ति मिलती है। आगे पाण्डव-संबद्ध एक महातीर्थ का उल्लेख है, जहाँ प्रातः-सायं स्मरण को भी महान तीर्थ-स्नान के तुल्य माना गया है; तर्पण, दान और ब्राह्मण-भोजन को विशेष पुण्यदायक कहा गया है। फिर देवतीर्थ/देवकुण्ड का माहात्म्य आता है, जिसे अत्यन्त दुर्लभ-प्राप्त बताया गया है; वहाँ स्नान को महावैदिक यज्ञों के समान फलदायक, पापनाशक और उच्च लोक-प्रद कहा गया है। दो से छह दिन तक निवास और बार-बार स्नान को भी अत्यन्त प्रभावशाली बताया गया। इसके बाद सुग्रीवतीर्थ का वर्णन है—स्नान, स्मरण, उपवास, अभिषेक और तर्पण से सूर्यलोक-प्राप्ति, घोर पापों का प्रायश्चित्त और महान कर्मफल की सिद्धि बताई गई है। नलतीर्थ और नीलतीर्थ शुद्धि तथा महायज्ञ-समान फल देने वाले हैं; नील को अग्नि-पुत्र और संस्थापक कहा गया है। वानरों द्वारा प्रतिष्ठित अनेक तीर्थों की परंपरा के बाद विभीषण-तीर्थों का वर्णन है, जो दुःख, रोग, दरिद्रता, दु:स्वप्न और नरक-पीड़ा का नाश कर वैकुण्ठ-सदृश अनावृत्ति पद देता है। अंत में सेतु/गन्धमादन क्षेत्र को रामचन्द्र की आज्ञा से देव, पितृ, ऋषि आदि का नित्य निवास बताया गया है और इस माहात्म्य के पाठ-श्रवण से दुःख-निवृत्ति तथा कैवल्य-प्राप्ति की फलश्रुति कही गई है।

62 verses

Adhyaya 43

Adhyaya 43

रामनाथ-महालिङ्ग-माहात्म्यम् (Glory of the Rāmanātha Mahāliṅga)

इस अध्याय में श्रीसूत रामनाथ/रामेश्वर महालिंग की महिमा का सुव्यवस्थित वर्णन करते हैं। आरम्भ में फलश्रुति है कि इस कथा के श्रवण से मनुष्य पापों से मुक्त होता है, और राम द्वारा प्रतिष्ठित लिंग का एक बार दर्शन भी शिवसायुज्य रूप मोक्ष देने वाला बताया गया है। युग-गणना के माध्यम से कलियुग में भक्ति-संपर्क का फल शीघ्र और अनेकगुणा होने की बात विशेष रूप से कही गई है। यह क्षेत्र सर्वतीर्थ, देवता, ऋषि और पितरों की सन्निधि से परिपूर्ण माना गया है। स्मरण, स्तुति, पूजा और नामोच्चारण मात्र को दुःख, भय और परलोक-दण्ड से रक्षा करने वाला धर्मोपाय कहा गया है। दर्शन या कीर्तन से महापातकों के नाश का विस्तृत फल-निर्देश भी दिया गया है। फिर महालिंग-केन्द्रित अष्टविध भक्ति बताई गई—भक्तों की सेवा, प्रसन्नतापूर्वक पूजा, व्यक्तिगत उपासना, देह से किया गया परिश्रम, माहात्म्य का ध्यानपूर्वक श्रवण, भक्ति-जन्य देहभाव, निरन्तर स्मरण, और लिंग-परायण आजीविका—और इसे सभी वर्गों के लिए सुलभ बताया गया है। अंत में मंदिर-निर्माण तथा दूध, दही, घी, पंचगव्य, रस, सुगन्धित जल आदि से अभिषेक, वेदपाठ सहित, और उनसे प्राप्त लोक/फल का वर्णन कर, निरन्तर सेवा से लौकिक समृद्धि तथा परम मुक्ति का निष्कर्ष दिया गया है।

104 verses

Adhyaya 44

Adhyaya 44

रामेश्वरलिङ्गप्रतिष्ठा, कुबेरजलदर्शनविधि, तथा रामस्तोत्रफलश्रुति (Rāmeśvara Liṅga-Installation, Kubera’s Vision-Water Rite, and the Fruit of Rāma-Stotra)

इस अध्याय में सूत ऋषियों से रामकथा का बहु-भागीय धर्मोपदेशात्मक वर्णन करते हैं। राम समुद्र-तट पर पहुँचकर सेतु बाँधते हैं और लंका में प्रवेश करते हैं। वहाँ प्रमुख राक्षस सेनापतियों के साथ घोर युद्ध होते हैं; नागास्त्र से बँधे राम-लक्ष्मण को गरुड़ मुक्त करते हैं, और आगे मातलि तथा ऐन्द्र रथ की दिव्य सहायता से इन्द्रजीत और रावण का वध होता है। फिर कथा कर्मकाण्ड की ओर मुड़ती है—विभीषण कुबेर द्वारा भेजा गया अभिमंत्रित जल प्रस्तुत करते हैं। उस जल को नेत्रों में लगाने से अन्तरहित (छिपे) प्राणी दिखाई देने लगते हैं और युद्ध में दृष्टि-स्वच्छता व रणनीतिक स्पष्टता आती है। विजय के बाद दण्डकारण्य से अगस्त्य-प्रमुख मुनि आते हैं और विस्तृत राम-स्तोत्र का पाठ करते हैं; उसकी फलश्रुति रक्षा और पवित्रता का आश्वासन देती है। अंत में रावण-वध से शेष पाप के प्रश्न पर मुनि शिव-आराधना और गन्धमादन पर लिङ्ग-प्रतिष्ठा का विधान बताते हैं। हनुमान कैलास से लिङ्ग लाकर “रामेश्वर” की स्थापना कराते हैं; उसके दर्शन और सेवा का महान पुण्य कहा गया है।

102 verses

Adhyaya 45

Adhyaya 45

हनूमद्विषाद-रामोपदेशः (Hanumān’s Distress and Rāma’s Instruction at Setu)

इस अध्याय में सेतु पर लिङ्ग-प्रतिष्ठा के समय एक गहन धर्म-तत्त्व संवाद आता है। हनुमान तपस्या करके कैलास से शिवकृपा प्राप्त कर शुभ लिङ्ग शीघ्र लाते हैं, पर देखते हैं कि राम ऋषियों और देवताओं की साक्षी में सीता द्वारा निर्मित बालू के लिङ्ग (सैकत-लिङ्ग) की पूजा और प्रतिष्ठा कर रहे हैं। इसे अपने प्रति उपेक्षा मानकर हनुमान शोक, आत्मग्लानि और क्रोध व्यक्त करते हैं; अपनी सेवा को अवमूल्यित समझकर देह-त्याग तक का विचार करते हैं। राम उन्हें स्थिर करने वाला उपदेश देते हैं—आत्मा को कर्मजन्य जन्म-मरण से भिन्न बताकर त्रिशरीर से परे निर्गुण, अद्वैत आत्मतत्त्व का चिंतन करने को कहते हैं। सत्य, अहिंसा, इन्द्रिय-निग्रह, परदोष-दर्शन से बचना और देवपूजन की नित्यता जैसे आचार-नियम बताते हैं; देह-सुख की भ्रान्ति को अशुचिता और अनित्यता के विचार से काटकर वैराग्य उत्पन्न करते हैं। फिर राम समय-सीमा का कारण बताकर सीता के सैकत-लिङ्ग की प्रतिष्ठा समझाते हैं और हनुमान के कैलास-लिङ्ग की भी स्थापना का वचन देते हैं। हनूमदीश्वर और राघवेश्वर के दर्शन-संबंध तथा तीर्थ-फल का विधान बताया जाता है; अनेक लिङ्गों का वर्णन करते हुए शिव के “एकादश-रूप” की नित्य उपस्थिति कही जाती है। अंत में हनुमान सैकत-लिङ्ग उखाड़ने का प्रयास करते हैं, पर असफल होकर अत्यधिक श्रम से रक्तस्राव सहित गिर पड़ते हैं; तब राम, लक्ष्मण, सीता और वानर करुणा से उनके पास आते हैं।

89 verses

Adhyaya 46

Adhyaya 46

Hanūmat-stuti, Hanūmat-kuṇḍa-māhātmya, and Setu-liṅga Context (हनूमत्स्तुति-हनूमत्कुण्डमाहात्म्य-सेतुलिङ्गप्रसङ्गः)

इस अध्याय में तीन जुड़े हुए प्रसंग आते हैं। पहले भाग में मूर्च्छित हनुमान को देखकर श्रीराम करुणा से भरकर लंका-अभियान के उनके सेवाकर्म स्मरण करते हैं—समुद्र-लांघन, मैनाक और सुरसा से सामना, छाया पकड़ने वाली राक्षसी का वध, लंका में प्रवेश, सीता का पता लगाना, चूड़ामणि प्राप्त करना, अशोक-वाटिका का विध्वंस, राक्षसों व सेनापतियों से युद्ध, और फिर लौट आना। राम का शोक धर्मवचन बन जाता है कि भक्त के बिना राज्य, संबंधी और जीवन तक निरर्थक हैं; भक्ति को संकट-सहने वाली देहधारी निष्ठा के रूप में दिखाया गया है। दूसरे भाग में हनुमान चेतना पाकर श्रीराम को हरि-विष्णु तथा नरसिंह, वराह, वामन आदि अनेक अवतार-रूपों में स्तुति करते हैं। फिर वे सीता की प्रशंसा श्री/लक्ष्मी, प्रकृति, विद्या और करुणामयी मातृ-शक्ति के रूप में करते हैं। यह स्तोत्र पाप-नाशक कहा गया है और इसके पाठ से लौकिक फल तथा अंततः मुक्ति का फल बताया गया है। तीसरे भाग में तीर्थ-माहात्म्य आता है। राम बताते हैं कि लिंग के विषय में किया गया अतिक्रमण बड़े देवता भी नहीं मिटा सकते; जहाँ हनुमान गिरे, वहाँ “हनुमत्कुण्ड” की स्थापना कर उसकी कीर्ति बताते हैं। वहाँ स्नान को महान नदियों से भी श्रेष्ठ फलदायक कहा गया है और तट पर श्राद्ध व तिलोदक देने से पितरों को विशेष लाभ बताया गया है। अंत में सेतु के निकट प्रतिष्ठा-कार्य तथा पाठ-श्रवण से शुद्धि और शिवलोक में मान की फलश्रुति दी गई है।

80 verses

Adhyaya 47

Adhyaya 47

Rāvaṇa-vadha-hetukā Brahmahatyā-śāntiḥ — Rāmeśvara-liṅga-pratiṣṭhā ca (Chapter 47)

अध्याय के आरम्भ में ऋषि सूत से पूछते हैं कि रावण तो राक्षस माना जाता है, फिर उसके वध के बाद राघव (राम) को ब्रह्महत्या-दोष कैसे लगा? सूत पुलस्त्य-वंश का वर्णन करते हैं—ब्रह्मा से उत्पन्न पुलस्त्य के पुत्र विश्रवा हुए। विश्रवा का विवाह सुमाली की पुत्री कैकसी से हुआ, जिनसे रावण (दशग्रीव), कुम्भकर्ण, विभीषण और शूर्पणखा उत्पन्न हुए। अशुभ संध्या-काल में आई कैकसी को विश्रवा ने बताया कि पुत्र उग्र राक्षस होंगे, पर अन्तिम पुत्र विभीषण धर्मात्मा और शास्त्रज्ञ होगा। इसके बाद कहा जाता है कि विश्रवा और पुलस्त्य के कारण रावण तथा कुम्भकर्ण का ब्राह्मणीय वंश से सम्बन्ध है; इसलिए उनके वध से राम को ब्रह्महत्या-सदृश अशौच/मल लगता है। इस दोष-शान्ति हेतु राम वैदिक विधि से रामेश्वर (रामनाथ) लिङ्ग की प्रतिष्ठा करते हैं और ब्रह्महत्या-विमोचन करने वाला तीर्थ स्थापित होता है। क्षेत्र में दिशाओं में आदित्य, सोम, अग्नि, यम, वरुण, वायु, कुबेर आदि देवताओं तथा विनायक, कुमार, वीरभद्र और शिवगणों की उपस्थिति का वर्णन है। एक प्रबल ब्रह्महत्या को भूमिगत गुहा में बाँधकर ऊपर न उठ सके, इसलिए भैरव को रक्षक रूप में स्थापित किया जाता है। अन्त में राम ब्राह्मण आचार्यों की व्यवस्था करते हैं और ग्राम, धन, आभूषण, वस्त्र आदि दान देकर निरन्तर पूजा का प्रबन्ध करते हैं। फलश्रुति में कहा है कि इस अध्याय के पाठ-श्रवण से पाप नष्ट होते हैं और हरि के साथ सायुज्य प्राप्त होता है।

66 verses

Adhyaya 48

Adhyaya 48

अध्याय ४८: रामनाथसेवा-माहात्म्यं तथा ब्रह्महत्या-प्रायश्चित्तोपदेशः (Chapter 48: The Glory of Service to Rāmanātha and Instruction on Expiation for Major Transgressions)

सूत ऋषियों को एक तीर्थ-आधारित धर्मकथा सुनाते हैं। पाण्ड्यराज शंकर वेदज्ञ और कर्मनिष्ठ होकर शिकार के लिए घने वन में जाता है। वहाँ वह एक शांत मुनि को पशु समझकर मार देता है और फिर मुनि की पत्नी का भी वध कर बैठता है; इससे ब्रह्महत्या और स्त्रीहत्या का घोर पाप एकत्र हो जाता है। उनके पुत्र का शोक देखकर उपस्थित ऋषि उसे समझाते हैं—मृत्यु का नियम, कर्म का कारण-कार्य, और उपनिषदों में प्रतिपादित अद्वैत ब्रह्म का विचार बताते हुए, साथ ही व्यावहारिक कर्तव्य भी बताते हैं: अस्थि-संचय, श्राद्ध आदि संस्कार, और रामसेतु के निकट रामनाथ-क्षेत्र में अस्थियों का प्रतिष्ठापन, जिससे शुद्धि होती है। जाङ्गल (शाकल्य का पुत्र) विधिपूर्वक कर्म करता है और स्वप्न-दर्शन में माता-पिता को विष्णु-सदृश दिव्य रूप में देखकर उनकी शुभगति जानता है। इसके बाद ऋषि राजा की निंदा कर आत्मदाह को प्रायश्चित्त मानते हैं; राजा अग्नि में प्रवेश करने को उद्यत होता है। तभी एक अशरीरी वाणी उसे रोककर व्यवस्थित प्रायश्चित्त बताती है—एक वर्ष तक दिन में तीन बार राम द्वारा स्थापित रामनाथ-लिंग की नियमपूर्वक सेवा: प्रदक्षिणा, साष्टांग नमस्कार, घृत-दूध-मधु से नित्य अभिषेक, नैवेद्य व पायस, तथा तिल के तेल का दीप-पूजन। कहा गया है कि ऐसी सेवा महापातकों का भी नाश करती है और इस माहात्म्य का श्रवण-पाठ शुद्धि तथा रामनाथ-प्राप्ति देता है। राजा इस व्रत-नियम का पालन कर पापक्षय पाता है और राज्य को स्थिर कर समृद्धि से शासन करता है।

103 verses

Adhyaya 49

Adhyaya 49

स्तोत्राध्यायः — Rāmanātha (Rāmeśvara) Stotra and Phalaśruti

सूता एक “महापुण्य” स्तोत्राध्याय का परिचय देते हैं, जो रामनाथ (रामेश्वर) के प्रतिष्ठित लिंग पर शिव-स्तुति से संबंधित है। राम, लक्ष्मण, सीता, सुग्रीव तथा अन्य वानर, फिर देवता और ऋषि क्रमशः स्तुतियाँ करते हैं—शिव को शूलिन, गंगाधर, उमापति, त्रिपुरघ्न जैसे भक्तिपरक नामों से और साक्षी, सत्-चित्-आनंद, निर्लेप, अद्वय जैसे तत्त्वबोधक विशेषणों से वर्णित करते हैं। लक्ष्मण जन्म-जन्मांतर तक अटल भक्ति, वैदिक आचरण में निष्ठा और “असत्-मार्ग” से दूर रहने की प्रार्थना करते हैं। सीता पतिव्रत-रक्षा और शुद्ध अभिप्राय की कामना करती हैं। सुग्रीव, विभीषण और वानर-समुदाय संसार को भय, रोग, क्रोध, लोभ और मोह से भरे सागर/वन के समान बताकर उससे उद्धार माँगते हैं; देव-ऋषि कहते हैं कि भक्ति के बिना कर्मकांड, शास्त्र-ज्ञान और तप निष्फल हैं, जबकि एक बार का दर्शन, स्पर्श या नमस्कार भी जीवन-परिवर्तनकारी है। शिव स्तोत्र की प्रशंसा कर फलश्रुति बताते हैं—इसके पाठ या श्रवण से पूजन का फल और महान पुण्य मिलता है, जो अद्भुत तीर्थ-सेवा और रामसेतु-निवास के समान माना गया है। निरंतर जप-कीर्तन से जरा-मरण का भय मिटता है और अंततः रामनाथ के साथ सायुज्य-मुक्ति प्राप्त होती है।

99 verses

Adhyaya 50

Adhyaya 50

सेतुमाधववैभवम् (The Glory of Setumādhava and the Test of Royal Devotion)

सूता जी कहते हैं—मथुरा के सोमवंशी राजा पुण्यनिधि (गुणनिधि) तीर्थयात्रा हेतु रामसेतु पहुँचे। उन्होंने धनुष्कोटि में स्नान किया, रामनाथ का पूजन किया और विधिपूर्वक व्रत, कर्म तथा दान किए, जिनमें तुलापुरुष-प्रकार का दान भी था। वहीं एक आठ वर्ष की अनाथ कन्या ने कठोर शर्तों सहित संरक्षण और दत्तक-स्वीकार की याचना की; राजा और रानी विन्ध्यावली ने उसे पुत्री रूप में स्वीकार किया। इसके बाद लक्ष्मी ने क्रीड़ा-रूप विवाद के बहाने राजा की भक्ति की परीक्षा कराई और विष्णु ब्राह्मण-तपस्वी के वेष में आए। छद्मवेषी विष्णु जब कन्या का हाथ बलपूर्वक पकड़कर ले जाने लगे तो वह रो पड़ी; राजा ने अपनी प्रतिज्ञा निभाते हुए उस ‘ब्राह्मण’ को बाँधकर रामनाथ के प्रांगण में बंद कर दिया। रात में स्वप्न द्वारा रहस्य प्रकट हुआ—बंदी शंख-चक्र-गदा-पद्म-धारी विष्णु हैं और कन्या महालक्ष्मी। प्रातः राजा ने पहचानकर स्तोत्रों से पूजन किया और बंधन के अपराध की क्षमा माँगी। विष्णु ने कहा कि यह कर्म उन्हें प्रिय है, क्योंकि इससे संरक्षण-प्रतिज्ञा और भक्ति सिद्ध हुई; लक्ष्मी ने स्थिर राज्य, चरणों में अचल भक्ति और पुनर्जन्म-रहित मोक्ष का वर दिया। अंत में कहा गया कि भगवान सेतु में ‘सेतुमाधव’ रूप से निवास करेंगे, सेतु ब्रह्मा और शंकर/रामनाथ द्वारा सुरक्षित है, और इस अध्याय का श्रवण-पाठ वैकुण्ठ-गति देता है।

99 verses

Adhyaya 51

Adhyaya 51

सेतुयात्राक्रमः (Setu-yātrā-kramaḥ) — The Prescribed Order of the Setu Pilgrimage

इस अध्याय में सूत द्विजों को सेतु-यात्रा का धर्मयुक्त क्रम बताते हैं। स्नान, आचमन, नित्य-विधि और शुद्धाचार करके रमानाथ/राघव के प्रति भक्ति-संकल्प करना, तथा वेदज्ञ ब्राह्मणों को तृप्त कर भोजन कराना प्रमुख कर्तव्य कहा गया है। यात्री भस्म-त्रिपुण्ड्र या ऊर्ध्व-पुण्ड्र, रुद्राक्ष, तप, वाणी-संयम धारण करे; अष्टाक्षर और पंचाक्षर मंत्रों का नियत जप करे, विलास और व्यर्थ आसक्तियों से बचे। मार्ग में सेतु-माहात्म्य, रामायण या अन्य पुराणों का पाठ/श्रवण, दान, अतिथि-सत्कार और धर्मपालन निरंतर करने का विधान है। समुद्र-तट पर विशेष कर्म बताया गया है—पाषाणदान (एक या सात पत्थर) के बाद आवाहन, नमस्कार, अर्घ्य देकर स्नान की अनुमति माँगना; प्रत्येक चरण के लिए मंत्र निर्दिष्ट हैं। फिर मंत्रोच्चार सहित स्नान करके ऋषि, देवता, वानर-वीर तथा पितरों का नाम लेकर तर्पण किया जाता है। इसके बाद श्राद्ध-क्रम आता है—यथाशक्ति सरल या षड्रस-युक्त विस्तृत, और गो, भूमि, तिल, हिरण्य आदि दानों सहित। आगे तीर्थ-परिक्रमा—चक्रतीर्थ, कपितीर्थ, सीताकुण्ड, ऋणमोचन, लक्ष्मणतीर्थ, रामतीर्थ, हनुमत्कुण्ड, ब्रह्मकुण्ड, नागकुण्ड, अगस्त्यकुण्ड, अग्नितीर्थ—करके रामेश्वर और सेतुमाधव की पूजा, दान, तथा संयमित रूप से घर लौटकर सामूहिक भोजन कराने का निर्देश है। अंत में फलश्रुति कहती है कि सेतु-यात्रा-क्रम और सेतु-माहात्म्य का श्रवण/पाठ भी शुद्धि और दुःख-निवारण देता है, यहाँ तक कि जो स्वयं यात्रा न कर सकें उन्हें भी।

80 verses

Adhyaya 52

Adhyaya 52

धनुष्कोटिमाहात्म्य (Dhanuṣkoṭi Māhātmya) — Ritual Merit of Snāna, Dāna, and Setu-Observances

इस अध्याय में सूत मुनियों से धनुष्कोटि (रामसेतु) का माहात्म्य कहते हैं। इसे परम पुण्यक्षेत्र बताकर कहा गया है कि यहाँ जप, होम, तप और दान अक्षय फल देते हैं, और अन्य प्रसिद्ध तीर्थों में दीर्घ निवास या स्नान के तुल्य पुण्य यहाँ सहज प्राप्त होता है। माघ-मास में स्नान, सूर्य/चन्द्र ग्रहण के अवसर, तथा अर्धोदय–महोदय जैसे योगों में स्नान-दान आदि का फल विशेष रूप से बढ़ता है; पापक्षय, स्वर्ग, तथा वैष्णव/शैव सिद्धियाँ—सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सायुज्य—की फलश्रुति भी कही गई है। साथ ही दान की मर्यादा बताई गई है कि दान केवल सत्पात्र को ही देना चाहिए; पवित्र स्थान में कुपात्र को दिया गया दान आध्यात्मिक हानि का कारण माना गया है। वसिष्ठ–दिलीप संवाद में सत्पात्र के लक्षण—वेदाचार, नित्यकर्म की परंपरा, और दरिद्रता में भी शील-शुद्धि—निर्धारित किए गए हैं; और यदि योग्य पात्र न मिले तो संकल्प करके जल-समर्पण द्वारा प्रतीक दान का उपाय बताया गया है। अंत में सेतु को दिव्य संरक्षणयुक्त कहा गया है—विष्णु ‘सेतुमाधव’ रूप में, देवता-ऋषि और अन्य प्राणी वहाँ उपस्थित—और सेतु का स्मरण, पाठ तथा श्रवण मठ-मंदिर या पवित्र तटों पर करने से महान फल की पुष्टि की गई है।

115 verses

FAQs about Setubandha Mahatmya

It elevates Setu (the bridge-site) as a sanctified liminal geography where epic action becomes ritual memory, and where contact with designated tīrthas is framed as ethically transformative.

The section repeatedly associates Setu-related bathing and visitation with purification from transgressions (pāpa-kṣaya) and the accrual of merit through regulated acts such as snāna, recitation, and attentive listening.

The central legend is the Setubandha episode: Rāma’s alliance with the vānaras, the ocean’s propitiation, Nāla’s bridge-building, and the subsequent sanctification of multiple tīrthas along the Setu corridor.