
Sukta 1.100
Indra (with Maruts)
यह सूक्त इन्द्र की स्तुति करता है—अजेय, सूर्य-सदृश अग्रसर और वृत्र-वध करने वाले के रूप में—और बार-बार उन्हें “मरुतों सहित” पुकारता है, ताकि वे प्रत्येक संघर्ष और प्रत्येक कार्य में समुदाय के सक्रिय रक्षक बनें। इसमें इन्द्र से विजय, धन, जल और समृद्ध सन्तान की प्राप्ति सुनिश्चित करने की प्रार्थना है; और अंत में एक व्यापक आशीर्वाद के साथ यह अर्जित कल्याण को मित्र–वरुण, अदिति, सिन्धु, पृथ्वी और द्यौ (स्वर्ग) के माध्यम से सर्वत्र फैलाने की कामना करता है।
Mantra 2
यस्यानाप्तः सूर्यस्येव यामो भरेभरे वृत्रहा शुष्मो अस्ति । वृषन्तमः सखिभिः स्वेभिरेवैर्मरुत्वान्नो भवत्विन्द्र ऊती ॥
जिसका गमन सूर्य के समान अ-अवरोधित है, और जिसका वृत्र-हंता शुष्म (पराक्रम) प्रत्येक संघर्ष-क्षण में विद्यमान रहता है—वह अत्यन्त वृषभ-तुल्य, अपने ही सखाओं और अपने वेगवान् मरुत्-बल सहित, वह इन्द्र हमारी ऊति (रक्षा-सहायता) बने।
Mantra 3
दिवो न यस्य रेतसो दुघानाः पन्थासो यन्ति शवसापरीताः । तरद्द्वेषाः सासहिः पौंस्येभिर्मरुत्वान्नो भवत्विन्द्र ऊती ॥
जिसके पथ दिव्य रेतस् के प्रवाहों के समान, बीज को दुहते हुए, बल से परितः आवृत होकर प्रवाहित होते हैं—जो द्वेषों को तरता है, और पौरुष-शक्तियों से विजयी होता है—वह मरुत्वान् इन्द्र हमारी ऊति बने।
Mantra 5
स सूनुभिर्न रुद्रेभिॠभ्वा नृषाह्ये सासह्वाँ अमित्रान् । सनीळेभिः श्रवस्यानि तूर्वन्मरुत्वान्नो भवत्विन्द्र ऊती ॥
वह, पुत्रों सहित—रुद्रों के समान—नृसाह्य (नर-विजयी) संग्राम में अमित्रों को पराजित करने वाला; एक ही नीड़ (आश्रय) के सखाओं सहित, श्रवस्य (यशस्वी) कर्मों की ओर तीव्रता से प्रेरित करने वाला—वह मरुत्वान् इन्द्र हमारी ऊति बने।
Mantra 6
स मन्युमीः समदनस्य कर्तास्माकेभिर्नृभिः सूर्यं सनत् । अस्मिन्नहन्त्सत्पतिः पुरुहूतो मरुत्वान्नो भवत्विन्द्र ऊती ॥
वह युद्ध-उन्माद को जगाने वाला, संग्राम का कर्ता, हमारे नर-वीरों के साथ सूर्य को जीत लाया। इसी में उसने वध किया; सत्य का स्वामी, बहु-आहूत—मरुतों सहित वही इन्द्र हमारी सहायता (ऊति) बने।
Mantra 7
तमूतयो रणयञ्छूरसातौ तं क्षेमस्य क्षितयः कृण्वत त्राम् । स विश्वस्य करुणस्येश एको मरुत्वान्नो भवत्विन्द्र ऊती ॥
सहायताएँ (ऊतयः) उसे वीर-लाभ के संग्राम में विजयी करती हैं; प्रजाएँ उसे क्षेम (शांति) के लिए आश्रय-रक्षा बनाती हैं। वह करुणा-समस्त का एकमात्र ईश्वर है—मरुतों सहित वही इन्द्र हमारी सहायता (ऊति) बने।
Mantra 8
तमप्सन्त शवस उत्सवेषु नरो नरमवसे तं धनाय । सो अन्धे चित्तमसि ज्योतिर्विदन्मरुत्वान्नो भवत्विन्द्र ऊती ॥
बल के उद्गारों (उत्सवेषु) में नर उसे—उस नर-श्रेष्ठ को—रक्षा के लिए, धन-समृद्धि के लिए खोजते हैं। वह अन्धे तमस में भी ज्योति को पा लेता है—मरुतों सहित वही इन्द्र हमारी सहायता (ऊति) बने।
Mantra 9
स सव्येन यमति व्राधतश्चित्स दक्षिणे संगृभीता कृतानि । स कीरिणा चित्सनिता धनानि मरुत्वान्नो भवत्विन्द्र ऊती ॥
वह अपने बाएँ हाथ से अति-अहंकारी को भी रोक देता है; और दाएँ हाथ से सिद्ध किए हुए कर्मों को समेट लेता है। गायक (कीरि) के साथ भी वह धन-समृद्धियों को जीत लेता है—मरुतों सहित वही इन्द्र हमारी सहायता (ऊति) बने।
Mantra 10
स ग्रामेभिः सनिता स रथेभिर्विदे विश्वाभिः कृष्टिभिर्न्वद्य । स पौंस्येभिरभिभूरशस्तीर्मरुत्वान्नो भवत्विन्द्र ऊती ॥
वह ‘विजेता’ आज ग्रामों द्वारा, रथों द्वारा, और समस्त जन-समुदायों (कृष्टि) द्वारा प्रसिद्ध हो। वह पुरुषार्थ-शक्तियों से शत्रु-निषेधों को परास्त करे—मरुतों सहित वही इन्द्र हमारी सहायता (ऊति) बने।
Mantra 11
स जामिभिर्यत्समजाति मीळ्हेऽजामिभिर्वा पुरुहूत एवैः । अपां तोकस्य तनयस्य जेषे मरुत्वान्नो भवत्विन्द्र ऊती ॥
वह बहु-आहूत (पुरुहूत) अपने प्रेरणाओं से—हमारे स्वजन (जामि) द्वारा भी, और अस्वजन द्वारा भी—समृद्ध लाभ को जीतता है। वह हमारे लिए जलों को, बालक को, और संतान को जीतता है—मरुतों सहित वही इन्द्र हमारी सहायता (ऊति) बने।
Mantra 12
स वज्रभृद्दस्युहा भीम उग्रः सहस्रचेताः शतनीथ ऋभ्वा । चम्रीषो न शवसा पाञ्चजन्यो मरुत्वान्नो भवत्विन्द्र ऊती ॥
वह वज्रधारी, दस्यु-हंता, भीषण और उग्र है; सहस्र-चेताः, शत-नीथ, ऋभु-सा कुशल कर्ता। बल से वह चर्म-ढाल के समान दृढ़, पंचजन्य (पाँच जनों) के लिए आधार है। मरुतों सहित इन्द्र हमारी सहायता और रक्षा हों।
Mantra 13
तस्य वज्रः क्रन्दति स्मत्स्वर्षा दिवो न त्वेषो रवथः शिमीवान् । तं सचन्ते सनयस्तं धनानि मरुत्वान्नो भवत्विन्द्र ऊती ॥
उसका वज्र हमारे सामने स्वयं-प्रेरित होकर गर्जता है; दिव्य तेज के समान उसका नाद, शिमीवान्—प्रेरक वेग से परिपूर्ण है। विजयें उससे जुड़ती हैं, धन उससे जुड़ते हैं। मरुतों सहित इन्द्र हमारी सहायता और रक्षा हों।
Mantra 14
यस्याजस्रं शवसा मानमुक्थं परिभुजद्रोदसी विश्वतः सीम् । स पारिषत्क्रतुभिर्मन्दसानो मरुत्वान्नो भवत्विन्द्र ऊती ॥
जिसका अनवरत बल ‘मान’ और ‘उक्थ’ को भोगता-परिवेष्टित करता है, और जो सर्वतः दोनों लोकों (रोदसी) को भर देता है—वह, अपने क्रतुओं से मन्दमान होकर, हमें चारों ओर से सुरक्षित रखे। मरुतों सहित इन्द्र हमारी सहायता और रक्षा हों।
Mantra 15
न यस्य देवा देवता न मर्ता आपश्चन शवसो अन्तमापुः । स प्ररिक्वा त्वक्षसा क्ष्मो दिवश्च मरुत्वान्नो भवत्विन्द्र ऊती ॥
जिसके पराक्रम की अंतिम सीमा तक न देव पहुँच सके, न देवतागण, न मनुष्य, न तो जल भी—वह दूर-विचरने वाला, अपनी त्वक्षा (रचनाशक्ति) से पृथ्वी और द्यौ (स्वर्ग) को व्याप्त करता है। मरुतों सहित वही इन्द्र हमारी सहायता और रक्षा बने।
Mantra 16
रोहिच्छ्यावा सुमदंशुर्ललामीर्द्युक्षा राय ऋज्राश्वस्य । वृषण्वन्तं बिभ्रती धूर्षु रथं मन्द्रा चिकेत नाहुषीषु विक्षु ॥
लाल और श्याम, सुन्दर किरणों वाले, अलंकृत और दीप्तिमान—ऋज्राश्व के धन हेतु चमकते हुए; धुरों पर प्रेरक-बल से परिपूर्ण रथ को धारण करती हुई—नहुष-जन की प्रजाओं में वह मन्द्र (प्रेरित आनन्द) प्रकट होता है।
Mantra 17
एतत्त्यत्त इन्द्र वृष्ण उक्थं वार्षागिरा अभि गृणन्ति राधः । ऋज्राश्वः प्रष्टिभिरम्बरीषः सहदेवो भयमानः सुराधाः ॥
हे वृषभ इन्द्र! यह वही उक्थ (स्तुति-गीत) है—दान के लिए वार्षागिरा तुम्हारी ओर गाते हैं। ऋज्राश्व अपने दलों सहित, अम्बरीष, सहदेव, भयमान—ये सु-राधा (उदार दाता) इसे घोषित करते हैं।
Mantra 18
दस्यूञ्छिम्यूँश्च पुरुहूत एवैर्हत्वा पृथिव्यां शर्वा नि बर्हीत् । सनत्क्षेत्रं सखिभिः श्वित्न्येभिः सनत्सूर्यं सनदपः सुवज्रः ॥
बहु-आहूत (पुरुहूत) इन्द्र ने अपने वेगपूर्ण प्रहारों से दस्युओं और शिम्युों को मारकर पृथ्वी पर गिरा दिया। अपने दीप्तिमान सखाओं के साथ उसने क्षेत्र (रणभूमि) जीता; उसने सूर्य को जीता; उसने जलों को जीता—वह सु-वज्रधारी।
Mantra 19
विश्वाहेन्द्रो अधिवक्ता नो अस्त्वपरिह्वृताः सनुयाम वाजम् । तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः ॥
इन्द्र सदा हमारा अधिवक्ता बने, ताकि हम अविमूढ़ (अपरिह्वृत) रहकर बल-सम्पदा (वाज) को प्राप्त करें। और मित्र-वरुण हमारे लिए उसे बढ़ाएँ—अदिति, सिन्धु (नदी), पृथ्वी और द्यौ (स्वर्ग) भी।
Because Indra’s power is portrayed as arriving with the Maruts—storm-like companions who amplify his force—so the prayer asks for help that is swift, energetic, and victorious.
It asks for vāja (winning strength and success), wealth, released waters (life-sustaining abundance), and thriving children and descendants, along with protection from harm and deception.
The hymn closes by widening the blessing: Indra grants victory and advocacy, and these deities and cosmic supports are invoked to stabilize, increase, and sustain that good for the community.
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