Adhyaya 46
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Adhyaya 46: Cosmic Dissolution, the Emergence of Brahma, and the Measures of Time (Yugas, Manvantaras, and Brahma’s Day)

ब्रह्माण्डोत्पत्तिवर्णनम् / कालमान-युग-मन्वन्तर-निर्णयः (Brahmāṇḍotpatti-varṇanam / Kālamāna–Yuga–Manvantara-nirṇayaḥ)

The Continents

इस अध्याय में प्रलय के समय समस्त जगत का लय, फिर एकमात्र जलराशि में स्थित विश्व, और नारायण की योगनिद्रा का वर्णन है। उसी से ब्रह्मा का प्राकट्य होकर सृष्टि-क्रम आरम्भ होता है। साथ ही कृत-त्रेता-द्वापर-कलि युगों, मन्वन्तरों तथा ब्रह्मा के दिन-रात्रि (कल्प) के कालमान का शास्त्रीय निर्णय दिया गया है।

Divine Beings

परमेश्वर (Parameśvara)ब्रह्मा / हिरण्यगर्भ (Brahmā / Hiraṇyagarbha)विष्णु (Viṣṇu)रुद्र (Rudra)इन्द्र (Indra)

Celestial Realms

भूर्लोक (Bhūrloka)भुवर्लोक (Bhuvarloka)स्वर्लोक (Svarloka)महर्लोक (Maharloka)जनलोक (Janaloka)

Key Content Points

Pralaya and re-manifestation: the prākṛta dissolution (pratisañcara) and the latent balance of guṇas prior to creation.Cosmogony via yogic kṣobha: the Supreme enters and agitates prakṛti–puruṣa, producing the brahmāṇḍa and Brahmā (Hiraṇyagarbha).Trimūrti as guṇic functions: Brahmā-rajas (sṛṣṭi), Viṣṇu-sattva (pālana), Rudra-tamas (saṃhāra), with mutual dependence and non-separation.Chronometry: human and divine time units; caturyuga proportions (kṛta, tretā, dvāpara, kali with sandhyā/sandhyāṃśa).Manvantara architecture: 14 Manus per Brahmā’s day with recurring creation cycles of devas, saptarṣis, Indra, and royal lineages.Eschatology of Brahmā’s day: naimittika pralaya affecting Bhūr–Bhuvar–Svar, Maharloka’s persistence, and Brahmā’s “sleep” during the cosmic night; kalpa identification (Pādma past, Vārāha present).

Focus Keywords

Markandeya Purana Adhyaya 46Brahmanda utpatti Markandeya PuranaPrakrita pralaya pratisañcaraYuga chronology sandhya sandhyamshaManvantara duration 14 ManusNaimittika pralaya Brahma day nightVaraha Kalpa Padma KalpaTrimurti gunas rajas sattva tamas

Shlokas in Adhyaya 46

Verse 1

इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे ब्रह्मोत्पतिर् नाम पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः । श्रीमन्महर्षिवेदव्यासप्रणीतं श्रीमार्कण्डेयपुराणम् । (द्वितीयो भागः) षट्चत्वारिंशोऽध्यायः । क्रौष्टुकिरुवाच भगवन्स्त्वण्डसम्भूतिर्यथावत् कथिता मम । ब्रह्माण्डे ब्रह्मणो जन्म तथा चोक्तं महात्मनः ॥

इस प्रकार श्रीमार्कण्डेयपुराण में ‘ब्रह्मा की उत्पत्ति’ नामक पैंतालीसवाँ अध्याय (द्वितीय भाग) समाप्त हुआ। छियालीसवाँ अध्याय। क्रौष्टुकी बोले— हे भगवन्, ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति मुझे भली-भाँति समझाई गई; और हे महात्मन्, ब्रह्माण्ड के भीतर ब्रह्मा का जन्म भी।

Verse 2

एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं त्वत्तो भृगुकुलोद्भव । यदा न सृष्टिर्भूतानामस्ति किं नु न चास्ति वा । काले वै प्रलयस्यान्ते सर्वस्मिन्नुपसंहृते ॥

हे भृगुवंश में उत्पन्न महर्षि! मैं आपसे यह सुनना चाहता हूँ—जब प्राणियों की सृष्टि नहीं होती, तब क्या कुछ अस्तित्व में रहता है या नहीं? और प्रलय के अंत में, जब सब कुछ संहृत होकर लीन हो जाता है, तब उसकी क्या अवस्था होती है?

Verse 3

मार्कण्डेय उवाच । यदा तु प्रकृतौ याति लयं विश्वमिदं जगत् । तदोच्यते प्राकृतोऽयं विद्वद्भिः प्रतिसञ्चरः ॥

मार्कण्डेय बोले—जब यह समस्त जगत् प्रकृति में विलीन हो जाता है, तब उस प्रत्यावर्तन (संहृति) को विद्वान ‘प्राकृत प्रलय’ कहते हैं।

Verse 4

स्वात्मन्यवस्थितेव्यक्ते विकारे प्रतिसंहृते । प्रकृतिः पुरुषश्चैव साधर्म्येणावतिṣ्ठतः ॥

जब अव्यक्त अपने ही स्वरूप में स्थित रहता है और विकार निवृत्त हो जाते हैं, तब प्रकृति और पुरुष एक प्रकार के समत्व (अविभेद/संतुलन) में प्रतिष्ठित रहते हैं।

Verse 5

तदा तमश्च सत्त्वञ्च समत्वेन व्यवस्थितौ । अनुद्रिक्तावनूनौ च तत्प्रोतौ च परस्परम् ॥

तब तम और सत्त्व समभाव में स्थित रहते हैं—न अधिक, न न्यून—और वे परस्पर गुंथे हुए (अनुबद्ध) रहते हैं।

Verse 6

तिलेषु वा यथा तैलं घृतं पयसि वा स्थितम् । तथा तमसि सत्त्वे च रजोऽप्यनुसृतं स्थितम् ॥

जैसे तिलों में तेल और दूध में घी विद्यमान रहता है, वैसे ही रजस् तम और सत्त्व के भीतर व्याप्त होकर सुप्त (गुप्त) रूप से स्थित रहता है।

Verse 7

उत्पत्तिर्ब्रह्मणो यावदायुṣो द्विपरार्धिकम् । तावद्दिनं परेśस्य तत्समा संयमे निशा ॥

ब्रह्मा के प्रकट होने से लेकर उनके जीवन के अंत तक—परिमाण में दो परार्ध—यही परमेश्वर का दिन है। उतनी ही अवधि की उसकी रात्रि है, जिसमें यह जगत् संनियमन (प्रलय) में स्थित रहता है।

Verse 8

अहर्मुखे प्रबुद्धस्तु जगदादिरनादिमान् । सर्वहेतुरचिन्त्यात्मा परः कोऽप्यपरक्रियः ॥

(सृष्टि-)दिवस के आरम्भ में जगत् की योनि—स्वयं अनादि होकर भी—जाग्रत होता है: वह सर्वकारण, अचिन्त्य-स्वभाव, परम तत्त्व, और किसी पर आश्रित न होकर कार्य करने वाला है।

Verse 9

प्रकृतिं पुरुषञ्चैव प्राविश्याशु जगत्पतिः । क्षोभयामास योगेन परेण परमेश्वरः ॥

प्रकृति और पुरुष—दोनों में शीघ्र प्रवेश करके जगदीश्वर परमेेश्वर ने अपने परम योग से उन्हें क्षोभित किया, जिससे प्रकट होने की प्रक्रिया आरम्भ हुई।

Verse 10

यथा मदो नवस्त्रीणां यथा वा माधवानिलः । अनुप्रविष्टः क्षोभाय तथासौ योगमूर्तिमान् ॥

जैसे मद (राग) युवतियों में प्रवेश करता है, या जैसे वसन्त की वायु प्राणियों में प्रवेश करके उन्हें उद्वेलित करती है, वैसे ही योग-स्वरूप वह एक (परम) क्षोभ उत्पन्न करने हेतु प्रविष्ट हुआ।

Verse 11

प्रधानॆ क्षोभ्यमाणे तु स देवो ब्रह्मसंज्ञितः । समुत्पन्नोऽण्डकोषस्थो यथा ते कथितं मया ॥

जब प्रधान (प्रकृति) क्षोभित हो रहा था, तब ब्रह्मा नामक वह देवता उत्पन्न हुआ; वह ब्रह्माण्ड-कोश के भीतर स्थित रहा—जैसा मैंने तुमसे कहा है।

Verse 12

स एव क्षोभकः पूर्वं स क्षोभ्यः प्रकृतेः पतिः । स सङ्कोचविकाशाभ्यां प्रधानत्वेऽपि च स्थितः ॥

वही एक प्रथम प्रेरक है और वही प्रेरित होने योग्य भी—प्रकृति का स्वामी। प्रधानरूप में स्थित होकर भी वह संकोच और विस्तार में निरन्तर बना रहता है।

Verse 13

अत्पन्नः स जगद्योनिरगुणोऽपि रजोगुणम् । भुञ्जन् प्रवर्तते सर्गे ब्रह्मत्वं समुपाश्रितः ॥

प्रकट होकर वही जगत् की योनि/उत्पत्तिस्रोत बनता है; गुणातीत होते हुए भी रजोगुण का आश्रय लेकर सृष्टि में प्रवृत्त होता है और ब्रह्मा-भाव को धारण करता है।

Verse 14

ब्रह्मत्वे स प्रजाः सृष्ट्वा ततः सत्त्वातिरेकवान् । विष्णुत्वमेत्य धर्मेण कुरुते परिपालनम् ॥

ब्रह्मा-भाव में वह प्रजाओं की सृष्टि करता है; फिर सत्त्वप्रधान होकर विष्णु-भाव को प्राप्त करता है और धर्म के द्वारा पालन-रक्षा करता है।

Verse 15

ततस्तमोगुणोद्रिक्तो रुद्रत्वे चाखिलं जगत् । उपसंहृत्य वै शेते त्रैलोक्यं त्रिगुणोऽगुणः ॥

फिर तमोगुण की प्रबलता से रुद्र-भाव में वह समस्त विश्व का संहार/संकोच करता है; उसे समेटकर वह शयन करता है—त्रिलोकी उसी में लीन हो जाती है; वह कार्य में त्रिगुणयुक्त और स्वरूप में गुणातीत है।

Verse 16

यथा प्राग्व्यापकः क्षेत्री पालको लावकस्तथा । यथा स सञ्ज्ञामायाति ब्रह्मविष्ण्वीशकारिणीम् ॥

जिस प्रकार क्षेत्रज्ञ (आत्मतत्त्व) पूर्व से सर्वव्यापी है, वैसे ही वही पालक और संहर्ता भी है; इस प्रकार वह ब्रह्मा, विष्णु और ईश—इन कार्यों को करने वाले नामों को धारण करता है।

Verse 17

ब्रह्मत्वे सृजते लोकान् रुद्रत्वे संहरत्यपि । विष्णुत्वे चाप्युदासीनस्तिस्त्रोऽवस्थाः स्वयम्भुवः ॥

ब्रह्मा-भाव में वह लोकों की सृष्टि करता है; रुद्र-भाव में उनका संहार भी करता है; और विष्णु-भाव में वह उदासीन, सम और स्थिर रहता है। ये स्वयम्भू की आत्मा की तीन अवस्थाएँ हैं।

Verse 18

रजो ब्रह्मा तमो रुद्रो विष्णुः सत्त्वं जगत्पतिः । एत एव त्रयो देवा एत एव त्रयो गुणाः ॥

रजोगुण ब्रह्मा है; तमोगुण रुद्र है; और सत्त्वगुण जगदीश्वर विष्णु है। यही तीन देव हैं; यही तीन गुण हैं।

Verse 19

अन्योन्यमिथुना ह्येते अन्योन्याश्रयिणस्तथा । क्षणं वियोगो नह्येषां न त्यजन्ति परस्परम् ॥

ये परस्पर युग्मित और एक-दूसरे पर आश्रित हैं। इनके बीच क्षणभर का भी वियोग नहीं; ये एक-दूसरे को नहीं छोड़ते।

Verse 20

एवं ब्रह्मा जगत्पूर्वो देवदेवश्चतुर्मुखः । रजोगुणं समाश्रित्य स्त्रष्ट्टत्वे स व्यवस्थितः ॥

इस प्रकार जगत् से भी पूर्व उत्पन्न देवों के देव, चतुर्मुख ब्रह्मा, रजोगुण का आश्रय लेकर स्रष्टा के पद में प्रतिष्ठित होता है।

Verse 21

हिरण्यगर्भो देवादिरनादिरुपचारतः । भूपद्मकर्णिकासंस्थो ब्रह्माग्रे समजायत ॥

हिरण्यगर्भ—देवों में प्रथम, औपचारिक अर्थ में अनादि—वही ब्रह्मा, पृथ्वी-रूपी कमल की कर्णिका पर स्थित होकर, आदि में उत्पन्न हुआ।

Verse 22

तस्य वर्षशतं त्वेकं परमायुर्महात्मनः । ब्रह्म्येणैव हि मानेन तस्य संख्यां निबोध मे ॥

उसकी परम आयु सौ वर्ष कही गई है, और वह ब्रह्मा के मान-प्रमाण से गिनी जाती है। उस मान की गणना मुझसे सुनो।

Verse 23

निमेषैर्दशभिः काष्ठा तथा पञ्चभिरुच्यते । कलास्त्रिंशच्च वै काष्ठा मुहूर्तं त्रिंशत्ताः कलाः ॥

दस निमेषों से एक काष्ठा कही जाती है (और उसका पाँच प्रकार का विभाग भी कहा गया है)। तीस कलाएँ एक काष्ठा बनाती हैं; और तीस कलाएँ एक मुहूर्त बनाती हैं।

Verse 24

अहोरात्रं मुहूर्तानां नृणां त्रिंशत्तु वै स्मृतम् । अहोरात्रैश्च त्रिंशद्भिः पक्षौ द्वौ मास उच्यते ॥

मनुष्यों के लिए दिन-रात तीस मुहूर्तों का स्मरण किया गया है। ऐसे तीस दिन-रातों से दो पक्ष बनते हैं, जिन्हें मास कहा जाता है।

Verse 25

तैः षड्भिरयनं वर्षं द्वेऽयने दक्षिणोत्तरे । तद्देवाना्महोरात्रं दिनं तत्रोत्तरायणम् ॥

छह (मास) से एक अयन होता है; वर्ष दो अयनों का है—दक्षिण और उत्तर। वही देवताओं का दिन-रात है: उत्तरायण उनका दिन है और दक्षिणायन उनकी रात।

Verse 26

दिव्यैर्वर्षसहस्रैस्तु कृतत्रेतादिसंज्ञितम् । चतुर्युगं द्वादशभिस्तद्विभागं शृणुष्व मे ॥

देव-वर्षों के सहस्रों में कृत, त्रेता आदि युग निर्दिष्ट किए गए हैं। चतुर्युग बारह सहस्र (देव-वर्ष) का माना जाता है; उसके विभाग मुझसे सुनो।

Verse 27

चत्वारि तु सहस्राणि वर्षाणां कृतमुच्यते । शतानि सन्ध्या चत्वारि सन्ध्यांशश्च तथाविधः ॥

कृत (सत्य) युग चार हजार दिव्य वर्षों का कहा गया है। उसकी संध्या चार सौ वर्ष की है और संध्यांश भी उतने ही वर्षों का माना गया है।

Verse 28

त्रेता त्रीणि सहस्राणि दिव्याब्दानां शतत्रयम् । तत्सन्ध्या तत्समा चैव सन्ध्यांशश्च तथाविधः ॥

त्रेता युग तीन हजार दिव्य वर्षों का है और उसका संधि-काल तीन सौ वर्ष का है। उसकी संध्या भी उतनी ही है और संध्यांश भी उसी माप का है।

Verse 29

द्वापरं द्वे सहस्रे तु वर्षाणां द्वे शते तथा । तस्य सन्ध्या समाख्याता द्वे शताब्दे तदंशकः ॥

द्वापर युग दो हजार दिव्य वर्षों का है और उसी प्रकार उसका संधि-काल दो सौ वर्ष का है। उसकी संध्या दो सौ वर्ष कही गई है और संध्यांश भी उतने ही वर्षों का है।

Verse 30

कलिः सहस्रं दिव्यानामब्दानां द्विजसत्तम । सन्ध्या सन्ध्यांशकश्चैव शतकौ समुदाहृतौ ॥

हे द्विजश्रेष्ठ! कलि युग एक हजार दिव्य वर्षों का है। उसकी संध्या और संध्यांश—दोनों—प्रत्येक एक सौ वर्ष के कहे गए हैं।

Verse 31

एषा द्वादशसाहस्री युगाख्या कविभिः कृता । एतत् सहस्रगुणितमो ब्राह्म्यमुदाहृतम् ॥

इस युग-चक्र को मुनियों ने ‘बारह हजार’ कहा है। यही, एक हजार से गुणित होकर, ब्राह्म (ब्रह्मा-संबंधी) प्रमाण अर्थात् परिमाण कहा गया है।

Verse 32

ब्रह्मणो दिवसे ब्रह्मन् मनवः स्युश्चतुर्दश । भवन्ति भागशस्तेषां सहस्रं तद्विभज्यते ॥

हे ब्राह्मण! ब्रह्मा के एक दिन में चौदह मनु होते हैं। उनके-उनके काल भागों के रूप में विभक्त हैं; वह दिन सहस्र भागों में विभाजित है।

Verse 33

देवाः सप्तर्षयः सेन्द्रा मनुस्तत्सूनवो नृपाः । मनुना सह सृज्यन्ते संह्रियन्ते च पूर्ववत् ॥

देवता, सप्तर्षि, इन्द्र सहित देवगण, मनु तथा उसके पुत्र-रूप राजा—ये सब मनु के साथ ही उत्पन्न होते हैं और फिर पूर्ववत् ही लीन हो जाते हैं।

Verse 34

चतुर्युगानां संख्याता साधिका ह्येकसप्ततिः । मन्वन्तरं तस्य संख्यां मानुषाब्दैर्निबोध मे ॥

मन्वन्तर का परिमाण (अधिकांश सहित) इकहत्तर चतुर्युग माना गया है। उसकी संख्या मनुष्य-वर्षों में मुझसे जानो।

Verse 35

त्रिंशत्कोट्यस्तु संपूर्णाः संख्याताः संख्यया द्विज । सत्पषष्ठिस्तथान्यानि नियुतानि च संख्यया ॥

हे द्विज! वह पूर्णतः तीस करोड़ होता है, और संख्या के अनुसार आगे छियासठ नियुत और भी (अधिक) हैं।

Verse 36

विंशतिश्च सहस्राणि कालोऽयं साधिकं विना । एतन्मन्वन्तरं प्रोक्तं दिव्यैर्वर्षैर्निबोध मे ॥

यह काल, जो अतिरिक्त भाग से रहित है, बीस हजार (वर्ष) का है। मुझसे जानो—देव-वर्षों के मान से इसे मन्वन्तर कहा गया है।

Verse 37

अष्टौ वर्षसहस्राणि दिव्यया संख्यया युतम् । द्विपञ्चाशत्तथान्यानि सहस्राण्यधिकानि तु ॥

दैवी गणना के अनुसार आठ हजार वर्ष; और इसके अतिरिक्त और भी बावन हजार वर्ष अधिक माने जाते हैं।

Verse 38

चतुर्दशगुणो ह्येष कालो ब्रह्म्यमहः स्मृतम् । तस्यान्ते प्रलयः प्रोक्तो ब्रह्मन् नैमित्तिको बुधैः ॥

यह काल चौदह गुना किया जाए तो ब्रह्मा का एक दिन कहा जाता है; उसके अंत में, हे ब्राह्मण, ज्ञानीजन नैमित्तिक प्रलय बताते हैं।

Verse 39

भूर्लोकोऽथ भुवर्लोकः स्वर्लोकश्च विनाशिनः । तथा विनाशमायान्ति महर्लोकश्च तिष्ठति ॥

भूर्लोक, भुवर्लोक और स्वर्गलोक नश्वर हैं; वे भी नष्ट हो जाते हैं, पर महर्लोक बना रहता है।

Verse 40

तद्वासिनोऽपि तापेन जनलोकं प्रयान्ति वै । एकार्णवे च त्रैलोक्ये ब्रह्मा स्वपिति वै निशि ॥

वहाँ के निवासी भी ताप से दग्ध होकर जनलोक को चले जाते हैं; और जब तीनों लोक एक ही समुद्र बन जाते हैं, तब ब्रह्मा रात्रि में शयन करते हैं।

Verse 41

तत्प्रमाणैव सा रात्रिस्तदन्ते सृज्यते पुनः । एवंतु ब्रह्मणो वर्षमेकं वर्षशतन्तु तत् ॥

वह रात्रि भी उतनी ही अवधि की होती है; उसके अंत में फिर सृष्टि रची जाती है। यही ब्रह्मा का एक वर्ष है, और वह चक्र सौ वर्षों तक चलता है।

Verse 42

शतं हि तस्य वर्षाणां परमित्यभिधीयते । पञ्चाशद्भिस्तथा वर्षैः परार्धमिति कीर्त्यते ॥

उसके सौ वर्ष ‘पर’ कहलाते हैं; और उसी प्रकार पचास वर्ष ‘परार्ध’ (पूर्ण आयु का आधा भाग) कहे गए हैं।

Verse 43

एवमस्य परार्धन्तु व्यतीतं द्विजसत्तम । यस्यान्तेऽभून्महाकल्पः पाद्म इत्यभिविश्रुतः ॥

इस प्रकार, हे द्विजश्रेष्ठ, उसके एक परार्ध का समय बीत चुका; उसके अंत में ‘पाद्म’ नाम से प्रसिद्ध महान् कल्प हुआ।

Verse 44

द्वितीयस्य परार्धस्य वर्तमानस्य वै द्विज । वाराह इति कल्पोऽयं प्रथमः परिकल्पितः ॥

हे द्विज, जो दूसरा परार्ध अब चल रहा है, उसमें ‘वाराह’ नामक यह कल्प प्रथम माना जाता है।

Frequently Asked Questions

It investigates what persists when manifest creation is absent at pralaya’s end and how creation resumes—framed through the equilibrium of the guṇas and the Supreme’s yogic kṣobha of prakṛti–puruṣa that initiates cosmogenesis.

It supplies the cosmological scaffolding for Manvantara narration by defining the caturyuga system, stating that 14 Manus occur in a single day of Brahmā, and describing the recurring re-creation of devas, saptarṣis, Indra, and royal lineages within each Manvantara.

It links Manvantara cycles to Brahmā’s day–night rhythm and identifies kalpa succession: the famed Pādma kalpa at the close of the first parārdha, and the current kalpa as Vārāha, the first kalpa of the second parārdha.