Adhyaya 40
CreationBrahmaCosmogony41 Shlokas

Adhyaya 40: The Yogin’s Impediments (Upasargas), Subtle Concentrations, and the Eight Siddhis

योगाध्याय (Yogādhyāya)

Creation of the World

इस अध्याय में योग-साधना के मार्ग में आने वाले उपसर्गों/विघ्नों—रोग, आलस्य, संशय, प्रमाद, इन्द्रिय-विक्षेप तथा देव-दानव आदि के प्रलोभन—का वर्णन है। सूक्ष्म धारणाएँ, प्राणायाम-ध्यान-समाधि की क्रमिक साधना और चित्त-शुद्धि व वैराग्य पर बल दिया गया है। आगे अणिमा आदि आठ सिद्धियों के लक्षण बताए गए हैं और यह भी कि सिद्धि-गर्व साधक को लक्ष्य से भटका सकता है, इसलिए विवेक और भक्ति सहित सावधानी आवश्यक है।

Divine Beings

Dattātreya

Celestial Realms

Svarga (heavenly realm, as an object of desire/attainment)

Key Content Points

Upasargas as yogic impediments: Dattātreya enumerates desire-objects and merit-objects (kāmya-kriyā, dāna-phala, vidyā, māyā, dhana, svarga, devatva) that distract the yogin from Brahman-oriented concentration.Five disturbances that vitiate yoga: prātibha (inflated ‘brilliance’/omniscience of words), śrāvaṇa (clairaudient range), daiva (godlike/unmattavat condition), bhrama (behavioral derangement), and āvarta (whirlpool-like cognitive turbulence).Seven subtle dhāraṇās and dispassion: a graded interiorization that relinquishes the sense-qualities and then mind and buddhi, warning that attachment to any bhūta-quality causes relapse.Aṣṭa-siddhis as secondary attainments: aṇimā, laghimā, mahimā, prāpti, prākāmya, īśitva, vaśitva, and yatrakāmāvasāyitā; these are framed as indicators, not the final goal.Liberation as non-differentiation with Brahman: nirvāṇa is described apophatically (no birth, growth, decay) and via merger metaphors (gold refined, fire into fire, water into water).

Focus Keywords

Markandeya Purana Adhyaya 40Yogadhyaya Markandeya PuranaDattatreya teachings on yogaUpasarga obstacles in yogaAṣṭa siddhi anima laghima mahima praptiSeven dharana subtle concentrationsNirvana and Brahman union in Purana

Shlokas in Adhyaya 40

Verse 1

इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे जडोपाख्याने योगाध्यायो नामैकोनचत्वारिंशोऽध्यायः । दत्तात्रेय उवाच । उपसर्गाः प्रवर्तन्ते दृष्टे ह्यात्मनि योगिनः । ये तांस्ते संप्रवक्ष्यामि समासेन निबोध मे ॥

इस प्रकार श्रीमार्कण्डेयपुराण के जडोपाख्यान में ‘योग’ नामक अध्याय आरम्भ होता है। दत्तात्रेय बोले—जब योगी आत्मा का साक्षात्कार कर लेता है, तब विघ्न (उपसर्ग) उत्पन्न होते हैं। उन्हें मैं तुम्हें संक्षेप में बताऊँगा; मेरी बात सुनो।

Verse 2

काम्याः क्रियास्तथा कामान् मानुषानभिवाञ्छति । स्त्रियो दानफलं विद्यां मायां कुप्यं धनं दिवम् ॥

वह कामना-पूर्ति करने वाले कर्मकाण्ड और मानवीय भोग—स्त्रियाँ, दान से प्राप्त पुण्य, विद्या, सिद्धि, निधियाँ, धन तथा स्वर्ग—इन सबकी इच्छा करता है।

Verse 3

देवत्‍वममरेशत्वं रसायनचयाः क्रियाः । मरुत्प्रपतनं यज्ञं जलग्न्यावेशनन्तथा ॥

वह देवत्व, अमरों में अधिपत्य, रसायन-सम्बन्धी संचय और क्रियाएँ, वायु में गमन/पतन, यज्ञ-शक्ति तथा बिना हानि के जल और अग्नि में प्रवेश—इनकी लालसा करता है।

Verse 4

श्राद्धानां सर्वदानानां फलानि नियमांस्तथा । तथोपवासात् पूर्ताच्च देवताभ्यर्चनादपि ॥

वह श्राद्धकर्म के फल, समस्त दानों के फल, व्रतों के फल; तथा उपवास का पुण्य, पूर्त-कार्य (लोकहित/दान-निर्माण) का पुण्य, और देव-पूजा का फल भी चाहता है।

Verse 5

तेभ्यस्तेभ्यश्च कर्मभ्य उपसृष्टोऽभिवाञ्छति । चित्तमित्थं वर्तमानं यत्नाद्योगी निवर्तयेत् ॥

उन-उन कर्मों (और उनके प्रलोभनों) से आक्रान्त होकर वह उन्हें चाहने लगता है। इस प्रकार चंचल होते मन को योगी को प्रयत्नपूर्वक रोकना चाहिए।

Verse 6

ब्रह्मसङ्गिमनः कुर्वन्नुपसर्गात् प्रमुच्यते । उपसर्गैर्जितैरेभिरुपसर्गास्ततः पुनः ॥

मन को ब्रह्म में आसक्त/स्थिर करने से वह (ऐसे) विघ्नों से मुक्त होता है। परन्तु जब वे विघ्न जीत लिए जाते हैं, तब उसके बाद फिर अन्य विघ्न उत्पन्न हो जाते हैं।

Verse 7

योगिनः संप्रवर्तन्ते सत्त्वराजसतामसाः । प्रातिभिः श्रावणो दैवो भ्रमावत्तौ तथापरौ ॥

योगियों के लिए सत्त्व, रजस् और तमस् से उत्पन्न अन्तराय उठते हैं—प्रातिभ, श्रावण, दैव, तथा भ्रान्ति और आवर्त—ये (अन्य) दो भी।

Verse 8

पञ्चैते योगिनां योगविघ्राय कटुकोदयाः । वेदार्थाः काव्यशास्त्रार्था विद्याशिल्पान्यशेषतः ॥

ये पाँच तीव्र रूप से उत्पन्न होकर योगियों के योग में बाधा डालते हैं—वेद के अर्थ, काव्य और शास्त्रों के अर्थ, तथा समस्त विद्याओं और कलाओं का बिना शेष (अकस्मात्) अधिगम।

Verse 9

प्रतिभान्ति यदस्येति प्रातिभः स तु योगिनः । शब्दार्थानखिलान् वेत्ति शब्दं गृह्णाति चैव यत् ॥

क्योंकि उसके लिए सब कुछ ‘प्रकट होकर चमक उठता’ है, इसलिए योगी के लिए इसे ‘प्रातिभ’ कहा जाता है; वह सभी शब्दों और अर्थों को जानता है और वाणी के अभिप्राय को भी ग्रहण करता है।

Verse 10

योजनानां सहस्रेभ्यः श्रावणः सोऽभिधीयते । ममन्ताद्वीक्षते चाष्टौ स यदा देवतोपमः ॥

जब वह हजारों योजन दूर से भी सुन ले, तब उसे ‘श्रावण’ कहा जाता है; और जब वह आठों दिशाओं को मानो अंगूठे की नोक से देखे—तब वह देवतुल्य हो जाता है।

Verse 11

उपसर्गान्तमप्याहुर्दैवमुन्मत्तवद् बुधाः । भ्राम्यते यन्निरालम्बं मनो दोषेण योगिनः ॥

जो अन्तराय उन्माद के समान प्रकट होता है, उसे बुद्धिमान ‘दैव’ कहते हैं; जब दोष के कारण योगी का मन बिना आलम्बन, बिना आधार के भटकता है।

Verse 12

समस्ताचारविभ्रंशाद् भ्रमः स परिकीर्तितः । आवर्त इव तोयस्य ज्ञानावर्तो यदाकुलः ॥

समस्त सदाचार से विचलन को ‘मोह’ कहा जाता है। जब ज्ञान का भँवर उद्वेलित होता है, तब वह जल के भँवर के समान हो जाता है।

Verse 13

नाशयेच्चित्तमावर्त उपसर्गः स उच्यते । एतैर्नाशितयोगास्तु सकला देवयोनयः ॥

जो भँवर मन को नष्ट कर देता है, वही ‘उपसर्ग’ (बाधा) कहलाता है। इन्हीं से दिव्य-योनि वाले समस्त प्राणी योग से भ्रष्ट हो गए हैं।

Verse 14

उपसर्गैर्महाघोरैरावर्तन्ते पुनः पुनः । प्रावृत्य कम्बलं शुक्लं योगी तस्मान्मनोमयम् ॥

अत्यन्त भयानक बाधाओं से वे बार-बार घुमाए जाते हैं। इसलिए योगी को मन से बने ‘श्वेत कम्बल’—अर्थात् अंतःशुद्धि और मानसिक संरक्षण—से अपने को आवृत कर लेना चाहिए।

Verse 15

चिन्तयेत् परमं ब्रह्म कृत्वा तत्प्रवणं मनः । योगयुक्तः सदा योगी लघ्वाहारो जितेन्द्रियः ॥

मन को उसी परम ब्रह्म की ओर प्रवृत्त करके उसका चिंतन करे। योग में सदा अनुशासित योगी अल्पाहार करे और इन्द्रियों को जीत ले।

Verse 16

सूक्ष्मास्तु धारणाः सप्त भूराद्या मूर्ध्नि धारयेत् । धरित्रीं धारयेद्योगी तत् सौक्ष्म्यं प्रतिपद्यते ॥

पृथ्वी से आरम्भ होने वाली सात सूक्ष्म धारणाएँ कही गई हैं। उन्हें मस्तक के शिखर पर धारण करना चाहिए। पृथ्वी-तत्त्व को धारण करके योगी उस सूक्ष्मता को प्राप्त करता है।

Verse 17

आत्मानं मन्यते चोर्वोṃ तद्गन्धञ्च जहाति सः । यथैवाप्सु रसं सूक्ष्मं तद्वद्रूपञ्च तेजसि ॥

तब वह अपने को पृथ्वी से भी सूक्ष्म मानकर उसके गन्ध-गुण का परित्याग करता है। जैसे जल में रस सूक्ष्म है, वैसे ही अग्नि में रूप सूक्ष्म होता है।

Verse 18

स्पर्शं वायो तथा तद्वद्विभ्रतस्तस्य धारणाम् । व्योम्रः सूक्ष्मां प्रवृत्तिञ्च शब्दं तद्वज्जहाति सः ॥

उसी एकाग्रता को धारण करके वह वायु के स्पर्श-गुण का त्याग करता है। फिर आकाश में सूक्ष्म चेष्टा (चेतना-गति) से वह वैसे ही शब्द-गुण को भी छोड़ देता है।

Verse 19

मनसा सर्वभूतानां मनस्याविशते यदा । मानसीं धारणां बिभ्रन्मनः सूक्ष्मञ्च जायते ॥

जब वह मन के द्वारा समस्त प्राणियों के मन में प्रवेश करता है, तब मानसिक धारणा को बनाए रखते हुए मन सूक्ष्म हो जाता है।

Verse 20

तद्वद् बुद्धिमशेषाणां सत्त्वानामेत्य योगवित् । परित्यजति सम्प्राप्य बुद्धिसौक्ष्म्यमनुत्तमम् ॥

उसी प्रकार योग का ज्ञाता समस्त प्राणियों की बुद्धि तक पहुँचता है; और बुद्धि की परम सूक्ष्मता को प्राप्त करके वह उसे भी त्याग देता है।

Verse 21

परित्यजति सूक्ष्माणि सप्त त्वेतानि योगवित् । सम्यग्विज्ञाय यो 'लर्क ! तस्यावृत्तिर्न विद्यते ॥

योग का ज्ञाता इन सात सूक्ष्मताओं का परित्याग करता है। हे अलर्क! जिसने इन्हें ठीक-ठीक समझ लिया, उसका पुनरावर्तन नहीं होता।

Verse 22

एतासां धारणानान्तु सप्तानां सौक्ष्म्यमात्मवान् । दृष्ट्वा दृष्ट्वा ततः सिद्धिं त्यक्त्वा त्यक्त्वा परां व्रजेत् ॥

इन सात धारणाओं के सूक्ष्म स्वरूप को बार-बार जानकर, आत्मसंयमी योगी उनसे उत्पन्न सिद्धियाँ प्राप्त करके भी उन्हें बार-बार त्याग दे और परम पद की ओर अग्रसर हो।

Verse 23

यस्मिन् यस्मिंश्च कुरुते भूते रागं महीपते । तस्मिंस्तस्मिन् समासक्तिं संप्राप्य स विनश्यति ॥

हे राजन्, जिस किसी प्राणी या तत्त्व के प्रति मन राग करता है, उसी विषय में आसक्ति से वह बँध जाता है; और उसी आसक्ति से उसका आध्यात्मिक पतन होता है।

Verse 24

तस्माद्विदित्वा सूक्ष्माणि संसक्तानि परस्परम् । परित्यजति यो देही स परं प्राप्नुयात् पदम् ॥

अतः सूक्ष्म तत्त्वों को परस्पर गुंथे हुए जानकर, जो देहधारी उन्हें छोड़ देता है, वह परम स्थान को प्राप्त होता है।

Verse 25

एतान्येव तु सन्धान्य सप्त सूक्ष्माणि पार्थिव । भूतादीनां विरागोऽत्र सद्भावज्ञस्य मुक्तये ॥

हे राजन्, इन्हीं सात सूक्ष्म तत्त्वों पर मन को स्थिर करने से भूतों आदि के प्रति वैराग्य उत्पन्न होता है; सद्भाव को जानने वाले के लिए यही मोक्ष का कारण बनता है।

Verse 26

गन्धादिषु समासक्तिं सम्प्राप्य स विनश्यति । पुनरावर्तते भूप स ब्रह्मापरमानुषम् ॥

गन्ध आदि इन्द्रिय-विषयों में तीव्र आसक्ति में गिरकर मनुष्य का आध्यात्मिक विनाश होता है; और हे राजन्, वह ब्रह्मा से लेकर मनुष्य-योनि तक की परिधि में फिर-फिर लौटता है।

Verse 27

सप्तैताः धारणाः योगी समतीत्य यदिच्छति । तस्मिंस्तस्मिंल्लयं सूक्ष्मे भूते याति नरेश्वर ॥

हे नराधिप! योगी जब अपनी इच्छा से इन सात धारणाओं का अतिक्रमण कर लेता है, तब वह प्रत्येक संबंधित सूक्ष्म तत्त्व में लय को प्राप्त होता है।

Verse 28

देवानामसुराणां वा गन्धर्वोरगरक्षसाम् । देहेषु लयमायाति सङ्गं नाप्रोति च क्वचित् ॥

देव, असुर, गन्धर्व, नाग या राक्षस—इनके शरीरों में जहाँ कहीं भी वह प्रवेश कर लय को प्राप्त करे, फिर भी वह कहीं भी आसक्ति को नहीं अपनाता।

Verse 29

अणिमा लघिमा चैव महिमा प्राप्तिरेव च । प्राकाम्यं च तथैशित्वं वशित्वञ्च तथापरम् ॥

अणिमा, लघिमा, महिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व तथा आठवीं अन्य शक्ति—ये ही प्रसिद्ध अष्ट सिद्धियाँ हैं।

Verse 30

यत्रकामावसायित्वं गुणानेतांस्तथैश्वरान् । प्राप्नोत्यक्ष्टौ नरव्याघ्र परं निर्वाणसूचकान् ॥

हे नरव्याघ्र! स्वेच्छानुसार फल-निर्णय तक पहुँचाने वाली ये आठ ऐश्वर्य-शक्तियाँ और गुण प्राप्त होते हैं; परन्तु ये केवल परम निर्वाण की ओर संकेत करने वाले लक्षण मात्र हैं।

Verse 31

सूक्ष्मात् सूक्ष्मतमोऽणीयान् शीघ्रत्वं लघिमा गुणः । महिमाशेषपूज्यत्वात् प्राप्तिर्नाप्राप्यमस्य यत् ॥

अणिमा—अत्यन्त सूक्ष्म से भी सूक्ष्म हो जाना; लघिमा—शीघ्रता युक्त लघुता का गुण; महिमा—जिससे सर्वत्र पूज्य होने की महानता; और प्राप्ति—जिससे उसके लिए कुछ भी अप्राप्य नहीं रहता।

Verse 32

प्राकाम्यमस्य व्यापित्वादीशित्वञ्चेश्वरो यतः । वखित्वाद्वशिमा नाम योगिनः सप्तमो गुणः ॥

उसकी सर्वव्यापकता से प्राकाम्य (अवरोध-रहित प्राप्ति-शक्ति) होती है और उसके ऐश्वर्य से ईशित्व (सर्वाधिकार) होता है। तथा वशीकरण-समर्थ होने से ‘वशिता’ नामक गुण योगी का सातवाँ लक्षण कहा गया है।

Verse 33

यत्रेच्छास्थानमप्युक्तं यत्रकामावसायिता । ऐश्वर्यकारणैरेभिर्योगिनः प्रोक्तमष्टधा ॥

वह जहाँ-जहाँ इच्छा करता है, वह स्थान उसके लिए उपलब्ध कहा जाता है; और जहाँ वह (इच्छा को) प्रवृत्त करता है, वहाँ कामना सिद्धि पाती है। इन ऐश्वर्य-कारणों से योगी की सिद्धियाँ आठ प्रकार की घोषित की गई हैं।

Verse 34

मुक्तिसंसूचकं भूप ! परं निर्वाणमात्मनः । ततो न जायते नैव वर्धते न विनश्यति ॥

हे राजन्, आत्मा का परम निर्वाण ही मोक्ष का लक्षण है। उसके बाद वह न जन्म लेता है, न बढ़ता है और न नष्ट होता है।

Verse 35

नापि क्षयमवाप्रोति परिणामं न गच्छति । छेदं क्लेदं तथा दाहं शोषं भूरादितो न च ॥

उसमें न क्षय होता है, न कोई विकार उत्पन्न होता है। और वह न काटा जा सकता है, न भिगोया जा सकता है, न जलाया जा सकता है, न सुखाया जा सकता है—पृथ्वी आदि (तत्त्वों) से आरम्भ होने वाले कष्ट उसे स्पर्श नहीं करते।

Verse 36

भूतवर्गादवाप्नोति शब्दाद्यैः ह्रियते न च । न चास्य सन्ति शब्दाद्यास्तद्भोक्ता तैर् न युज्यते ॥

वह भूत-समूह (पंचतत्त्व) से प्राप्त/प्रभावित नहीं होता और न शब्द आदि विषयों द्वारा हर लिया जाता है। वास्तव में उसके लिए शब्द आदि हैं ही नहीं; और उस (अवस्था) का अनुभोक्ता उनसे संयुक्त नहीं होता।

Verse 37

यथाहि कनकं खण्डमपद्रव्यवदग्निना । दग्धदोषं द्वितीयेन खण्डेनैक्यं व्रजेन्नृप ॥

हे राजन्! जैसे स्वर्ण का खण्ड अग्नि से मल-दोष जल जाने पर मानो मिश्रधातु-रहित शुद्ध हो जाता है और दूसरे शुद्ध स्वर्णखण्ड से एकत्व पा लेता है।

Verse 38

न विशेषमवाप्रोति तद्वद्योगाग्निना यतिः । निर्दग्धदोषस्तेनैक्यं प्रयाति ब्रह्मणा सह ॥

उसी प्रकार तपस्वी योगरूपी अग्नि से (अहंकारादि) मल जलाकर कोई पृथक् भेद नहीं पाता; वह ब्रह्म के साथ एकत्व को प्राप्त होता है।

Verse 39

यथाग्निरग्नौ संक्षिप्तः समानत्वमनुव्रजेत् । तदाख्यस्तन्मयो भूतो न गृह्येत विशेषतः ॥

जैसे अग्नि में डाली हुई अग्नि उसी के समानता को प्राप्त होती है—वही कहलाती है और उसी स्वभाव की हो जाती है; किसी विशेष रूप से पृथक् नहीं जानी जाती।

Verse 40

परेण ब्रह्मणा तद्वत् प्राप्यैक्यं दग्धकिल्विषः । योगी याति पृथग्भावं न कदाचिन्महीपते ॥

उसी प्रकार परम ब्रह्म में एकत्व प्राप्त कर योगी—जिसके पाप जल चुके हैं—हे भूमिपते! फिर कभी भेदभाव में नहीं जाता।

Verse 41

यथा जलं जलेनैक्यं निक्षिप्तमुपगच्छति । तथात्मा साम्यमभ्येति योगिनः परमात्मनि ॥

जैसे जल में डाला गया जल एकत्व को प्राप्त होता है, वैसे ही योगी का आत्मा परमात्मा के साथ साम्य (तादात्म्य) को प्राप्त होता है।

Frequently Asked Questions

The chapter examines how awakened yogic perception can generate temptations and distortions (upasargas) that mimic spiritual success, and it argues that ethical-psychological restraint—redirecting the mind toward Brahman and cultivating dispassion—is necessary to prevent siddhis, merit, and heavenly aspirations from replacing liberation.

It does not develop Manvantara chronology or genealogical transitions; instead, it functions as a stand-alone doctrinal instruction on yoga and liberation, framed as Dattātreya’s counsel to a king regarding the hazards and proper orientation of yogic practice.

This Adhyāya is outside the Devi Māhātmya section (Adhyāyas 81–93) and contains no stuti, epithet, or battle narrative of the Goddess; its primary contribution is yogic-advaitic soteriology centered on Brahman rather than explicit Śākta theology.