Mahabharata Adhyaya 32
Virata ParvaAdhyaya 3235 Versesअत्यन्त घोर और अनिर्णीत; दोनों पक्ष उन्मत्त होकर भिड़े, निर्णायक पल विराट-सुशर्मा के आमने-सामने आने पर टिकता है।

Adhyaya 32

Virāṭa Rescued from Suśarmā; Night Battle and Royal Gratitude (विराटमोक्षणं सुशर्मवधाभिमुखं च)

Upa-parva: Gogrāhaṇa–Pratyānayana Upaparva (Cattle-Raid and Recovery Episode)

As the battlefield is obscured by darkness and dust, the moon rises and visibility returns, reinitiating intense engagement. Suśarmā of the Trigartas, supported by his younger brother and chariot forces, drives toward King Virāṭa; the Matsya king is rendered chariotless and seized alive, prompting panic among Matsya troops. Yudhiṣṭhira instructs Bhīma to secure Virāṭa’s release as repayment for Matsya’s protection during exile. Bhīma proposes using a tree as an improvised weapon, but Yudhiṣṭhira cautions that such extraordinary conduct could reveal Bhīma’s identity; he directs Bhīma to adopt a conventional human weapon so the incognito vow is not compromised. The Pandavas counterattack in coordinated fashion; casualty numbers are given to indicate the scale of reversal. Virāṭa regains initiative, striking with a mace and moving “like a young man though aged,” while Bhīma seizes the Trigarta leader with decisive force, collapsing Trigarta morale. After victory, the Pandavas recover cattle and wealth and bivouac contentedly. Virāṭa publicly honors the Kaunteyas with gifts and offers, even proposing to anoint Yudhiṣṭhira as ruler, while Yudhiṣṭhira redirects the king toward civic celebration and the formal proclamation of victory through messengers.

Chapter Arc: त्रिगर्त और मत्स्य सेनाएँ गो-धन पर दृष्टि गड़ाए, क्रोध से उन्मत्त होकर एक-दूसरे को ललकारती हुई रणभूमि में उतरती हैं। → हाथियों पर आरूढ़ योद्धा, तोमर-अंकुश से प्रेरित गजराज, रथ-रथी की भिड़ंत—चारों ओर शर-वृष्टि और अंग-भंग का दृश्य फैलता जाता है; शूरवीर पीछे हटने को तैयार नहीं। → दो प्रबल रथी (रथारूढ़ वीर) महासेना में घुसकर केशाकेशि तक उतर आते हैं; उसी उन्माद में त्रिगर्तराज सुशर्मा स्वयं मत्स्यराज विराट को द्वैरथ युद्ध के लिए ललकारता हुआ सामने आ जाता है। → रणभूमि कटे शिरों और कुण्डलमण्डित मस्तकों से आच्छादित हो जाती है; युद्ध मर्यादा-सीमा तोड़कर घोर कश्मल (मूर्च्छा/विक्षोभ) तक पहुँचता है—पर कोई पक्ष निर्णायक विजय नहीं पा पाता। → सुशर्मा और विराट के आमने-सामने आने के बाद युद्ध किस ओर झुकेगा—और गो-रक्षा का परिणाम क्या होगा—यह अगले प्रसंग पर टिका रह जाता है।

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १३ श्लोक मिलाकर कुल ४८ श्लोक हैं।) अऑरड..2 #९23: () हि 7 7 द्वात्रिशोड्थध्याय: मत्स्य तथा त्रिगर्तदेशीय सेनाओंका परस्पर युद्ध वैशम्पायन उवाच निर्याय नगराच्छूरा व्यूढानीका: प्रहारिण: । त्रिगर्तानस्पृशन्‌ मत्स्या: सूर्ये परिणते सति

वैशम्पायन बोले—राजन्! नगर से निकलकर प्रहार करने में कुशल मत्स्यदेशीय शूरवीर अपनी सेना का व्यूह बनाकर चले और सूर्य के ढलते-ढलते त्रिगर्तों से जा भिड़े।

Verse 2

ते त्रिगर्ताश्न मत्स्याश्व संरब्धा युद्धदुर्मदा: । अन्योन्यमभिगर्जन्तो गोषु गृद्धा महाबला:

वैशम्पायन बोले—तब क्रोध से भरकर, युद्ध के उन्माद में डूबे वे त्रिगर्त और मत्स्यदेश के महाबली वीर गौओं के लोभ से एक-दूसरे को लक्ष्य करके गर्जना करने लगे।

Verse 3

भीमाश्च मत्तमातड्रास्तोमराड्कुशनोदिता: । ग्रामणीयै: समारूढा: कुशलैहस्तिसादिभि:

वैशम्पायन बोले— तोमरों और अंकुशों की मार से उकसाए गए, श्रेष्ठ ग्रामणी महावतों द्वारा कुशलतापूर्वक चलाए जा रहे, भयंकर और मदमत्त गजराज दोनों ओर से एक-दूसरे पर टूट पड़े। हाथियों पर सवार योद्धा जब परस्पर शस्त्रों से प्रहार करने लगे, तब उस गज-युद्ध का कोलाहल अत्यन्त घोर, रोंगटे खड़े कर देने वाला और महासंहारकारी हो उठा—मानो कौशल जब उन्माद से जुड़ जाए तो युद्ध अंधाधुंध विनाश बन जाता है।

Verse 4

तेषां समागमो घोरस्तुमुलो लोमहर्षण: । घ्नतां परस्परं राजन्‌ यमराष्ट्रविवर्धन:

वैशम्पायन बोले— राजन्! उनका वह समागम अत्यन्त घोर, कोलाहलपूर्ण और लोमहर्षक था। वे जब निकट से एक-दूसरे को मार गिराते थे, तब वह संग्राम यमराज्य को बढ़ाने वाला बन जाता था—क्योंकि उसमें मृत्यु के लिए निरन्तर नये-नये प्राण समर्पित होते जाते थे।

Verse 5

देवासुरसमो राजन्नासीत्‌ सूर्येडवलम्बति । पदातिरथनागेन्द्रहयारोहबलौघवान्‌

वैशम्पायन बोले— राजन्! जब सूर्य पश्चिम की ओर ढल रहा था, तब वह युद्ध देवासुर-संग्राम के समान हो उठा। पैदल, रथी, गजसवार और अश्वारोही—इन सबकी विशाल टोलियों से वह रणभूमि भर गई थी। यह दृश्य बताता था कि अहंकार और बल से प्रेरित मानव-संघर्ष भी विस्तार और उग्रता में मानो दैवी-आसुरी युद्ध का प्रतिबिम्ब बन जाता है।

Verse 6

अन्योन्यमभ्यापततां निध्नतां चेतरेतरम्‌ । उदतिष्ठद्‌ रजो भौम॑ न प्राज्ञायत किचन,एक-दूसरेपर धावा बोलकर आपसमें मार-काट मचानेवाले उन सैनिकोंके पदाघातसे इतनी धूल उड़ी कि कुछ भी सूझ-बूझ नहीं पड़ता था

एक-दूसरे पर धावा बोलकर परस्पर मार-काट मचाते हुए उन योद्धाओं के पदाघात से धरती की धूल घनी घटा-सी उठ खड़ी हुई। उस अंधकारमय धूल-छाजन में कुछ भी स्पष्ट नहीं सूझता था—पहचान और विवेक दोनों ही रण-कोलाहल में डूब गए थे।

Verse 7

पक्षिणश्वापतन्‌ भूमौ सैन्येन रजसा5<वृता: । इषुभिव्यतिसर्पदूभिरादित्योडन्तरधीयत

वैशम्पायन बोले— सेना की धूल से आच्छादित होकर उड़ते हुए पक्षी भी भूमि पर गिर पड़ते थे। और दोनों ओर से छूटे हुए बाण जब धाराओं की भाँति आकाश में एक-दूसरे को काटते हुए उड़ने लगे, तब सूर्यदेव भी दृष्टि से ओझल हो गए—इतनी घनी थी धूल और शरों की वर्षा।

Verse 8

खटद्योतैरिव संयुक्तमन्तरिक्ष॑ं व्यराजत । रुक्मपृष्ठानि चापानि व्यतिषिक्तानि धन्विनाम्‌

वैशम्पायन बोले—बाणों की चमक से आकाश ऐसा दीप्त हो उठा मानो जुगनुओं से भर गया हो। विश्वविख्यात धनुर्धरों के सुवर्ण-पृष्ठ धनुष, रण में घायल होकर गिरते वीरों के हाथों से छूट-छूटकर दूसरे हाथों में जाते रहे। रथी रथियों से और पैदल पैदलों से भिड़े; युद्ध का घनघोर, परन्तु क्रमबद्ध कोलाहल छा गया।

Verse 9

पततां लोकवीराणां सव्यदक्षिणमस्यताम्‌ | रथा रथै: समाजम्मु: पादातैश्व पदातय:

वैशम्पायन बोले—लोकविख्यात वीर दाएँ-बाएँ से छोड़े गए बाणों के प्रहार से गिरने लगे। तब रथ रथ से और पैदल पैदल से सटकर भिड़ गए; संग्राम निकट-युद्ध में बदल गया।

Verse 10

सादिन: सादिभिश्लैव गजैश्लापि महागजा: । असिश्रि: पट्टिशै: प्रासै: शक्तिभिस्तोमरैरपि

वैशम्पायन बोले—घुड़सवार घुड़सवारों से और महागज महागजों से भिड़े। तलवार-ढालधारी योद्धा, पट्टिश, प्रास, शक्ति और तोमर धारण करने वालों से भी टकराए; इस प्रकार अनेक शस्त्रों का समबल संग्राम छिड़ गया।

Verse 11

संरब्धा: समरे राजन्‌ निजघ्नुरितरेतरम्‌ | निधघ्नन्त: समरे<न्योन्यं शूरा: परिघबाहव:

वैशम्पायन बोले—राजन्! रण में क्रोध से उन्मत्त होकर वे वीर एक-दूसरे को मार गिराते थे। परिघ के समान प्रचण्ड भुजाओं वाले शूर, संग्राम में निरन्तर परस्पर प्रहार करते रहे।

Verse 12

न शेकुरभिसंरब्धा: शूरान्‌ कर्तु पराड्मुखान्‌ । घुड़सवार घुड़सवारोंसे और गजारोही गजारोहियोंसे लड़ रहे थे। राजन! वे सब क्रोधमें भरकर उस युद्धमें एक-दूसरेपर तलवार

वैशम्पायन बोले—क्रोध से भरे होने पर भी वे शूरवीरों को पीठ दिखाने के लिए विवश न कर सके। रण की भीड़ में बार-बार के प्रहार भी जो डटे थे, उनकी धीरता को तोड़ न पाए; साहस का सामना साहस से हुआ और कोई पक्ष पीछे न हटा।

Verse 13

अदृश्यंस्तत्र गात्राणि शरैश्छिन्नानि भागश:

वैशम्पायन बोले—वहाँ उसने बाणों से कटे हुए अंगों को टुकड़े-टुकड़े पड़ा देखा; वह दृश्य अत्यन्त भीषण था और युद्धकर्म के भारी पाप-भार को प्रकट करता था।

Verse 14

शालस्कन्धनिकाशानि क्षत्रियाणां महामृधे । उस महासंग्राममें बहुत-से क्षत्रिय वीरोंके शरीर, जो शालवृक्षकी शाखाओंके समान विशाल एवं हृष्ट-पुष्ट थे, छिन्न-भिन्न होकर टुकड़े-टुकड़े दिखायी देने लगे ।।

वैशम्पायन बोले—उस महासंग्राम में शालवृक्ष की शाखाओं के समान विशाल-हृष्टपुष्ट क्षत्रियवीरों के शरीर छिन्न-भिन्न होकर भूमि पर पड़े दिखे; और नागभोग के समान मोटी-घुमावदार भुजाएँ धरती पर बिखरी थीं—अविवेकपूर्ण क्रोध के विनाश का प्रमाण बनकर।

Verse 15

रथिनां रथिभिश्षात्र सम्प्रहारो5भ्यवर्तत

वैशम्पायन बोले—राजन्, वहाँ रथियों का रथियों से घोर संग्राम छिड़ गया; घुड़सवार घुड़सवारों से और पैदल पैदलों से भिड़ गए। सब ओर रक्तधारा बह चली; उससे धरती की धूल भी मानो दबकर शान्त हो गई।

Verse 16

सादिशभि: सादिनां चापि पदातीनां पदातिभि: । उपाशाम्यद्‌ रजो भौम॑ रुधिरेण प्रसर्पता

वैशम्पायन बोले—रथी रथियों से, घुड़सवार घुड़सवारों से और पैदल पैदलों से भिड़ गए; फैलते हुए रक्त से धरती की धूल भी शान्त हो गई।

Verse 17

(युधिष्ठिरोडपि धर्मात्मा भ्रातृभि: सहितस्तदा । व्यूहं कृत्वा विराटस्य अन्वयुध्यत पाण्डव: ।।

वैशम्पायन बोले—तब धर्मात्मा पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर भी भाइयों सहित राजा विराट के लिये व्यूह रचकर त्रिगर्तों से युद्ध करने लगे। उन्होंने अपने को श्येन के समान बनाकर चोंच का स्थान लिया; नकुल और सहदेव दोनों पंख बने और वृकोदर भीमसेन पूँछ बने। वहाँ कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर ने शत्रुओं के एक सहस्र का संहार किया; अत्यन्त क्रुद्ध भीमसेन ने दो सहस्र रथियों को परलोक पहुँचा दिया; नकुल ने तीन सौ और सहदेव ने चार सौ को मार गिराया। बाणवृष्टि से गहरे घायल गरुत्मान्-तुल्य योद्धा इधर-उधर बैठने को विवश हुए; आकाश में उनकी गति और दूर तक देखने की शक्ति भी रुक गई।

Verse 18

ते घ्नन्त: समरे<न्योन्यं शूरा: परिघबाहव: । न शेकुरभिसंरब्धा: शूरान्‌ कर्तु पराड्मुखान्‌

रणभूमि में परिघ-सी भुजाओं वाले वे शूरवीर क्रोध से उन्मत्त होकर एक-दूसरे पर घातक प्रहार करते थे; तथापि वे सच्चे वीरों को युद्ध से विमुख नहीं कर सके।

Verse 19

शतानीकः: शतं हत्वा विशालाक्षश्नतुःशतम्‌ । प्रविष्टी महतीं सेनां त्रिगर्तानां महारथौ

इस प्रकार युद्ध करते-करते शतानीक ने सौ और विशालाक्ष (मदिराक्ष) ने चार सौ त्रिगर्त योद्धाओं को मारकर उनकी विशाल सेना में प्रवेश किया। वे दोनों महारथी थे।

Verse 20

तौ प्रविष्टी महासेनां बलवन्तौ मनस्विनौ । आच्छेतां बहुसंरब्धौ केशाकेशि रथारथि:

उस विशाल सेना में घुसकर वे बलवान् और मनस्वी वीर अत्यन्त क्रुद्ध हो उठे और सारी सेना को व्याकुल कर दिया। वे केश पकड़-पकड़कर तथा रथों पर बैठे रथियों को गिरा-गिराकर युद्ध करने लगे।

Verse 21

लक्षयित्वा त्रिगर्तानां तौ प्रविष्टी रथव्रजम्‌ | अग्रत: सूर्यदत्तश्न मदिराक्षश्न पृष्ठत:

फिर उन दोनों ने त्रिगर्तों की रथसेना को लक्ष्य बनाकर उसमें प्रवेश किया। सूर्यदत्त ने आगे से आक्रमण किया और मदिराक्ष ने पीछे से।

Verse 22

विराटस्तत्र संग्रामे हत्वा पजचशतान्‌ रथान्‌ | हयानां च शतान्यष्टौ हत्वा पजच महारथान्‌

उस संग्राम में रथियों में श्रेष्ठ राजा विराट ने रथ द्वारा विविध मार्गों से चलते हुए अनेक प्रकार का रणकौशल दिखाया। त्रिगर्तों के पाँच सौ रथी, आठ सौ घुड़सवार और पाँच महारथियों को मार गिराकर, वह स्वर्णभूषित रथ पर बैठे सुशर्मा पर टूट पड़ा।

Verse 23

चरन्‌ स विविधान्‌ मार्गान्‌ रथेन रथसत्तम: | त्रिगर्तानां सुशर्माणमार्च्छ॑द्‌ रुक्मरथं रणे

वैशम्पायन बोले— रथियों में श्रेष्ठ राजा विराट रथ पर चढ़कर अनेक मार्गों से विचरते हुए, युद्ध-कौशल के विविध उपाय दिखाते रहे। उस संग्राम में त्रिगर्तों के पाँच सौ रथियों, आठ सौ अश्वारोहियों और पाँच महारथियों को मार गिराकर, स्वर्ण-भूषित रथ पर बैठे त्रिगर्तराज सुशर्मा पर उन्होंने सीधा धावा किया।

Verse 24

तौ व्यवाहरतां तत्र महात्मानौ महाबलौ | अन्योन्यमभिगर्जन्तौ गोष्ेषु वृष भाविव,वे दोनों महान्‌ बलवान्‌ और महामनस्वी वीर गर्जते हुए एक-दूसरेसे इस प्रकार जा भिड़े, मानो गोशालामें दो साँड़ लड़ रहे हों

वैशम्पायन बोले— वहाँ वे दोनों महात्मा, महाबली वीर एक-दूसरे पर गर्जते हुए इस प्रकार भिड़े, मानो गोशाला में दो साँड़ लड़ रहे हों।

Verse 25

ततो राजा त्रिगर्तानां सुशर्मा युद्धदुर्मद: । मत्स्यं समायाद्‌ राजान द्वैरथेन नरर्षभ:

वैशम्पायन बोले— तब युद्ध के उन्माद से मतवाला त्रिगर्तराज सुशर्मा आगे बढ़ा और मत्स्यदेश के राजा विराट का द्वैरथ-युद्ध में सामना करने लगा।

Verse 26

ततो रथाभ्यां रथिनौ व्यतीयतुरमर्षणौ । शरान्‌ व्यसृजतां शीघ्र॑ं तोयधारा घना इव

वैशम्पायन बोले— तब अपमान न सहने वाले, क्रोध से भरे वे दोनों रथी अपने-अपने रथ बढ़ाकर निकट आ गए और शीघ्र ही एक-दूसरे पर बाणों की झड़ी लगाने लगे—मानो दो घनघोर मेघ जलधाराएँ बरसा रहे हों।

Verse 27

अन्योन्यं चापि संरब्धौ विचेरतुरमर्षणौ । कृतास्त्रौ निशितैर्बाणैरसिशक्तिगदा भूती

वैशम्पायन बोले— दोनों का परस्पर क्रोध और अमर्ष बढ़ गया था। अस्त्रविद्या में निपुण वे दोनों तलवार, शक्ति और गदा धारण किए हुए, तीखे बाणों से एक-दूसरे पर प्रहार करते हुए रणभूमि में इधर-उधर विचरने लगे।

Verse 28

ततो राजा सुशर्माणं विव्याध दशभि: शरै: | पजञ्चभि: पज्चभिश्षास्य विव्याध चतुरो हयान्‌,इसी समय राजा विराटने सुशर्माको दस बाणोंसे बींध डाला और पाँच-पाँच बाणोंसे उसके चारों घोड़ोंको भी घायल कर दिया

तब राजा विराट ने सुशर्मा को दस बाणों से बेध दिया और पाँच-पाँच बाणों से उसके चारों घोड़ों को भी घायल कर दिया।

Verse 29

तथैव मत्स्यराजानं सुशर्मा युद्धदुर्मद: । पज्चाशता शितैर्बाणैविव्याध परमास्त्रवित्‌,इसी प्रकार महान्‌ अस्त्रवेत्ता सुशर्माने भी रणोन्मत्त होकर पचास तीखे बाणोंसे मत्स्यराज विराटको बींध डाला

इसी प्रकार रणोन्मत्त और परम अस्त्रों का ज्ञाता सुशर्मा ने भी मत्स्यराज विराट को पचास तीखे बाणों से बेध डाला।

Verse 30

ततः सैन्यं महाराज मत्स्यराजसुशर्मणो: । नाभ्यजानात्‌ तदान्योन्यं सैन्येन रजसा55वृतम्‌

महाराज! तत्पश्चात सैनिकों के पैरों से उड़ी धूल से मत्स्यराज विराट और सुशर्मा—दोनों की सेनाएँ ढँक गईं; तब वे एक-दूसरे को यह भी न जान सकीं कि कौन कहाँ क्या कर रहा है।

Verse 32

इति श्रीमहा भारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि दक्षिणगोग्रहे विराटसुशर्मयुद्धे द्वात्रिंशोड्थ्याय:

इस प्रकार श्रीमहाभारत के विराटपर्व के अंतर्गत गोहरणपर्व में, दक्षिण दिशा से गौओं के अपहरण के प्रसंग में विराट और सुशर्मा के युद्ध-वर्णन वाला बत्तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।

Verse 39

इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहदरणपर्वमें दक्षिण दिशाकी ओरसे गौअओंके अपहरण के प्रसंगर्ें मत्स्यराजविराटके युद्धोद्योगसे सम्बद्ध इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

इस प्रकार श्रीमहाभारत के विराटपर्व के अंतर्गत गोहरणपर्व में, दक्षिण दिशा से गौओं के अपहरण के प्रसंग तथा उसके प्रत्युत्तर में मत्स्यराज विराट के युद्धोद्योग से सम्बद्ध इकतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।

Verse 126

अदृश्यत शिरश्कछिन्नं रजोध्वस्तं सकुण्डलम्‌ । बातकी बातमें

Vaiśampāyana said: Severed heads, still wearing their earrings, were seen rolling and lying in the dust, fouled by the earth raised in battle. The scene underscores the grim cost of violence: even beauty, ornament, and identity are reduced to lifeless fragments amid the chaos of combat.

Verse 143

आस्तीर्णा वसुधा भाति शिरोभिश्व सकुण्डलै: । सर्पोंके शरीरकी भाँति सुशोभित चन्दनचर्चित भुजाओं तथा कुण्डलमण्डित मस्तकोंसे पटी हुई रणभूमि अपूर्व शोभा धारण कर रही थी

Vaiśampāyana said: The earth lay strewn and yet shone—covered with severed heads adorned with earrings. The battlefield, carpeted with sandalwood-smeared arms and heads decked with ornaments, took on an uncanny, unprecedented splendor, like the patterned body of a serpent. The verse underscores the Mahābhārata’s stark moral tension: the same marks of culture and refinement (perfume, jewelry) become, in war, ornaments of death—beauty turned into a grim testimony to violence and impermanence.

Verse 163

कश्मलं चाविशद्‌ घोर निर्मर्यादमवर्तत । युद्ध करनेवाले वीरोंको मूर्च्छा आने लगी। उनमें मर्यादाशून्य भयंकर युद्ध छिड़ गया

Then a dreadful moral confusion seized them, and the fighting turned lawless. The warriors engaged in battle began to faint, and a terrifying conflict broke out in which the accepted bounds of conduct were no longer observed.

Frequently Asked Questions

The dilemma is whether Bhīma should deploy an extraordinary, identity-revealing tactic (using a tree as a weapon) versus acting in a conventional manner to fulfill protective duty while preserving the incognito vow.

Right action is context-sensitive: dharma includes not only the duty to protect and repay obligations, but also disciplined self-limitation so that a necessary act does not violate higher commitments or broader strategic aims.

No explicit phalaśruti is stated here; the chapter instead functions as practical exemplification of dharma-in-action—restraint, reciprocity, and calibrated power—within the larger Virāṭa-parva framework.

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