ततः सैन्यं महाराज मत्स्यराजसुशर्मणो: । नाभ्यजानात् तदान्योन्यं सैन्येन रजसा55वृतम्,महाराज! तदनन्तर सैनिकोंके पैरोंसे इतनी धूल उड़ी कि मत्स्यनरेश तथा सुशर्मा दोनोंकी सेनाएँ उससे आच्छादित हो गयीं और एक-दूसरेके विषयमें यह भी न जान सकीं कि कौन कहाँ क्या कर रहा है?
महाराज! तत्पश्चात सैनिकों के पैरों से उड़ी धूल से मत्स्यराज विराट और सुशर्मा—दोनों की सेनाएँ ढँक गईं; तब वे एक-दूसरे को यह भी न जान सकीं कि कौन कहाँ क्या कर रहा है।
वैशम्पायन उवाच