Adhyaya 71
Shanti ParvaAdhyaya 7116 Verses

Adhyaya 71

राज्ञो वृत्त-गुण-संग्रहः (Conduct and the Thirty-Six Virtues of a King) / The King’s Code of Conduct

Upa-parva: Rājadharmānuśāsana Upa-Parva (Instruction on Royal Conduct)

Yudhiṣṭhira asks by what mode of conduct (vṛtta) an informed king can attain beneficial aims with ease, both in this world and after death. Bhīṣma answers by presenting a compact catalogue described as a set of thirty-six virtues, articulated through paired prescriptions and prohibitions. The chapter emphasizes: non-harsh dharmic practice; balanced pursuit of artha and kāma without arrogance; pleasant but non-impoverishing speech; courage without boasting; generosity without indiscriminate giving; alliance-making without dependence on ignoble agents; avoidance of conflict with kin; operational efficiency without oppression; truth and discretion in counsel; careful administration of punishment only after examination; secrecy of strategic deliberation; non-naïve trust (especially toward harmful actors); disciplined domestic conduct; moderation in sensuality and consumption; honoring elders and teachers without deceit; worship without ostentation; competence with awareness of timing; pacification and beneficence without ulterior exploitation; controlled force applied with understanding; decisive neutralization of threats; anger regulated rather than impulsive; and firmness toward aggressors without misplaced softness. The unit closes with Bhīṣma’s warning that deviation produces severe insecurity, and Vaiśaṃpāyana notes Yudhiṣṭhira’s acceptance and enactment of the instruction.

Chapter Arc: भीष्म युधिष्ठिर के सामने राजधर्म का कठोर यथार्थ खोलते हैं—राजा को अपराधियों के भेद जानने होंगे, क्योंकि दण्ड का अज्ञान ही राज्य को भीतर से खा जाता है। → वह अपराधियों के प्रकार (मत्त, उन्मत्त, दस्यु आदि) और शासन-व्यवहार की सूक्ष्मता की ओर बढ़ते हैं; फिर राजा के लिए गुणों की दीर्घ सूची रखते हैं—धर्म, अर्थ, काम—तीनों का संतुलन, पर साथ ही संयम, विनय, दया, उदारता, सत्य, और व्यवहार-कौशल। → भीष्म का निर्णायक उपदेश: ‘षट्त्रिंशत् गुणों’ से युक्त राजा ही प्रजा का रक्षक बनता है—धर्म का आचरण करे पर कटु न बने; अर्थ साधे पर लोभी न हो; काम भोगे पर उन्मत्त न हो; दान दे पर अपात्र को नहीं; शूर हो पर डींग नहीं; साहसी हो पर निष्ठुर नहीं; ईर्ष्या-रहित होकर गृह-रक्षा करे और स्त्रियों/भोगों में अति न करे। → उपदेश को आचरण-निर्देश में बाँधकर भीष्म निष्कर्ष देते हैं: राज्य में स्थित रहकर यदि राजा इन गुणों का पालन करे तो इसी लोक में कल्याण पाता है और परलोक में स्वर्ग-प्रतिष्ठा।

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १३१६ श्लोक मिलाकर कुल ११६६ “लोक हैं।) > मत्त, उन्मत्त आदि दस प्रकारके अपराधियोंके नाम इस प्रकार हैं--१-मत्त, २-उन्मत्त, ३-दस्यु, ४-तस्कर, ५-प्रतारक, ६-शठ, ७-लम्पट, ८-जुआरी, ९-कृत्रिम लेखक (जालिया) और १०-घूसखोर। ३. काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य--इन छ: आन्तरिक शत्रुओंके समुदायको षड्वर्ग कहते हैं। इनको पूर्णरूपसे जीत लेनेवाला नरेश ही सर्वत्र विजयी होता है। २. श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, रसना और प्राण--इन पाँच इन्द्रियोंके समूहको ही पञ्चवर्ग कहते हैं। इन सबको क्रमशः शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध--इन विषयोंमें आसक्त न होने देना ही इनपर विजय पाना है। ३. आखेट, जूआ, दिनमें सोना, दूसरोंकी निन्‍्दा करना, स्त्रियोंमें आसक्त होना, मद्य पीना, नाचना, गाना, बाजा बजाना और व्यर्थ घूमना--से कामजनित दस दोष हैं, जिनपर राजाको विजय पाना चाहिये। इनको सर्वथा त्याग देना ही इनपर विजय पाना है। ४. चुगली, साहस, द्रोह, ईर्ष्या, दोषदर्शन, अर्थदूषण, वाणीकी कठोरता और दण्डकी कठोरता--ये क्रोधसे उत्पन्न होनेवाले आठ दोष राजाके लिए त्याज्य हैं। ५, धर्म, अर्थ और कामको अथवा उत्साहशक्ति, प्रभुशक्ति और मन्त्रशक्तिको त्रिवर्ग कहते हैं। ६. मन्‍्त्री, राष्ट्र, दुरग, कोष और दण्ड--ये पाँच ही अपने और शत्रुवर्गके मिलाकर दस वर्ग कहलाते हैं। इनकी पूरी जानकारी रखनेपर राजाको अपने और शत्रुपक्षके बलाबलका पूर्ण ज्ञान होता है। सप्ततितमो< ध्याय: राजाको इहलोक और परलोकमें सुखकी प्राप्ति करानेवाले छत्तीस गुणोंका वर्णन युधिछिर उवाच केन वृत्तेन वृत्तज्ञ वर्तमानो महीपति: । सुखेनार्थान्‌ सुखोदर्कानिह च प्रेत्य चाप्तुयात्‌,युधिष्ठिरने पूछा--आचारके ज्ञाता पितामह! किस प्रकारका आचरण करनेसे राजा इहलोक और परलोकमें भी भविष्यमें सुख देनेवाले पदार्थोको सुगमतापूर्वक प्राप्त कर सकता है?

युधिष्ठिर ने पूछा—आचार के ज्ञाता पितामह! किस प्रकार के आचरण से राजा, उचित मर्यादा में स्थित रहकर, इस लोक में और परलोक में भी भविष्य में सुख देने वाले अर्थों को सहजता से प्राप्त कर सकता है?

Verse 2

भीष्म उवाच अयं गुणानां षट्त्रिंशत्षट्त्रिंशद्गुणसंयुत: । यान्‌ गुणांस्तु गुणोपेत: कुर्वन्‌ गुणमवाप्रुयात्‌,भीष्मजीने कहा--राजन्‌! दया और उदारता आदि गुणोंसे युक्त राजा जिन गुणोंको आचरणमें लाकर उत्कर्ष लाभ कर सकता है, वे छत्तीस प्रकारके गुण हैं। राजाको चाहिये कि वह इन छत्तीस गुणोंसे सम्पन्न होनेकी चेष्टा करे

भीष्मजी बोले—राजन्! ये छत्तीस गुण हैं। जो राजा स्वयं गुणसम्पन्न होकर इन गुणों का आचरण करता है, वह इनके द्वारा उत्कर्ष और सच्चा यश-फल प्राप्त करता है। इसलिए राजा को इन छत्तीस गुणों से युक्त होने का प्रयत्न करना चाहिए।

Verse 3

चरेद्‌ धर्मानकटुको मुज्चेत्‌ स्नेह न चास्तिक: । अनुशंसश्चरेदर्थ चरेत्‌ काममनुद्धत:,(अब मैं क्रमश: उन गुणोंका वर्णन करता हूँ) १-धर्मका आचरण करे, किंतु कटुता न आने दे। २-आस्तिक रहते हुए दूसरोंके साथ प्रेमका बर्ताव न छोड़े। ३-क्रूरताका आश्रय लिये बिना ही अर्थ-संग्रह करे। ४-मर्यादाका अतिक्रमण न करते हुए ही विषयोंको भोगे

धर्म का आचरण करे, पर आचरण में कटुता न आने दे। आस्तिक रहकर भी दूसरों के प्रति स्नेह-व्यवहार न छोड़े। क्रूरता का आश्रय लिए बिना अर्थ का उपार्जन करे, और मर्यादा का उल्लंघन किए बिना काम-भोग करे—यही संयम और सद्भाव का मार्ग है।

Verse 4

प्रियं ब्रयादकृपण: शूर: स्यादविकत्थन: । दाता नापात्रवर्षी स्यात्‌ प्रगल्भ: स्यादनिष्ठर:

प्रिय वचन बोले और कृपणता से रहित रहे। शूर हो, पर डींग न हाँके। दानी हो, पर अपात्र पर दान की वर्षा न करे। कार्य में प्रगल्भ और समर्थ हो, पर निष्ठुर और क्रूर न बने।

Verse 5

५-दीनता न लाते हुए ही प्रिय भाषण करे। ६-शूरवीर बने, किंतु बढ़-बढ़कर बातें न बनावे। ७-दान दे, परंतु अपात्रको नहीं। ८-साहसी हो, किंतु निष्ठर न हो ।। संदधीत न चानार्यविंगृह्नीयान्न बन्धुभि: । नाभक्तं चारयेच्चारं कुर्यात्‌ कार्यमपीडया,९-दुष्टोंके साथ मेल न करे। १०-बन्धुओंके साथ लड़ाई-झगड़ा न ठाने। ११-जो राजभक्त न हो, ऐसे गुप्तचरसे काम न ले। १२-किसीको कष्ट पहुँचाये बिना ही अपना कार्य करे

संधि करे, पर अनार्यों से नहीं। बंधुओं से वैर-विग्रह न ठाने। जो राजभक्त न हो, ऐसे गुप्तचर को न रखे। और किसी को पीड़ा दिए बिना अपना कार्य सिद्ध करे।

Verse 6

अर्थ ब्रूयान्न चासत्सु गुणान्‌ ब्रूयान्न चात्मन: । आदद्यान्न च साधुभ्यो नासत्पुरुषमाश्रयेत्‌

अर्थयुक्त और सत्य वचन बोले; जहाँ गुण न हों वहाँ गुणों की प्रशंसा न करे, न ही आत्म-स्तुति में लगे। साधु-पुरुषों से कुछ न छीने। और असत् पुरुष का आश्रय कभी न ले।

Verse 7

१३-दुष्टोंस अपना अभीष्ट कार्य न कहे। १४-अपने गुणोंका स्वयं ही वर्णन न करे। १५- श्रेष्ठ पुरुषोंस उनका धन न छीने। १६-नीच पुरुषोंका आश्रय न ले ।। नापरीक्ष्य नयेद्‌ दण्डं न च मन्त्र प्रकाशयेत्‌ । विसूजेन्न च लुब्धेभ्यो विश्वसेन्नापकारिषु,१७-अपराधकी अच्छी तरह जाँच पड़ताल किये बिना ही किसीको दण्ड न दे। १८- गुप्त मन्त्रणाको प्रकट न करे। १९-लोभियोंको धन न दे। २०-जिन्होंने कभी अपकार किया हो, उनपर विश्वास न करे

भीष्म ने कहा—अच्छी तरह जाँच-पड़ताल किए बिना दण्ड न दे; गुप्त मन्त्रणा प्रकट न करे। लोभियों को धन न दे और जिन्होंने पहले अपकार किया हो, उन पर विश्वास न करे।

Verse 8

अर्नीर्षर्गुप्तदार: स्याच्चोक्ष: स्थादघृणी नृप: । स्त्रिय: सेवेत नात्यर्थ मृष्ट भुज्जीत नाहितम्‌,२१-ईर्ष्यारहित होकर अपनी स्त्रीकी रक्षा करे। २२-राजा शुद्ध रहे; किंतु किसीसे घृणा न करे। २३-स्त्रियोंका अधिक सेवन न करे। २४-शुद्ध और स्वादिष्ट भोजन करे, परंतु अहितकर भोजन न करे

भীष्म ने कहा—ईर्ष्या से रहित होकर अपनी पत्नी की रक्षा करे। राजा आचरण में शुद्ध रहे, पर किसी से घृणा न करे। स्त्रियों के संग का अत्यधिक सेवन न करे। शुद्ध, स्वादिष्ट और हितकर भोजन करे; अहितकर न खाए।

Verse 9

अस्तब्ध: पूजयेन्मान्यान्‌ गुरून्‌ सेवेदमायया । अर्चेद्‌ देवानदम्भेन श्रियमिच्छेदकुत्सिताम्‌,२५-उद्दण्डता छोड़कर विनीतभावसे माननीय पुरुषोंका आदर-सत्कार करे। २६- निष्कपटभावसे गुरु-जनोंकी सेवा करे। २७-दम्भहीन होकर देवताओंकी पूजा करे। २८- अनिन्दित उपायसे धन-सम्पत्ति पानेकी इच्छा करे

भীष्म ने कहा—अहंकार छोड़कर विनय से माननीय जनों का सत्कार करे। निष्कपट भाव से गुरुजनों की सेवा करे। दम्भरहित होकर देवताओं की पूजा करे। और धन-सम्पत्ति की इच्छा भी केवल अनिन्दित, शुद्ध उपायों से करे।

Verse 10

सेवेत प्रणयं हित्वा दक्ष: स्यान्न त्वकालवित्‌ । सान्त्वयेन्न च मोक्षाय अनुगह्नन्न चाक्षिपेत्‌,२९-हठ5 छोड़कर प्रीतिका पालन करे। ३०-कार्य-कुशल हो, किंतु अवसरके ज्ञानसे शून्य न हो। ३१-केवल पिण्ड छुड़ानेके लिये किसीको सान्त्वना या भरोसा न दे। ३२- किसीपर कृपा करते समय आक्षेप न करे

भীष्म ने कहा—हठ छोड़कर उचित प्रीति-सम्बन्ध निभाए, पर आसक्ति का दास न बने। कार्य में दक्ष हो, और अवसर-ज्ञान से शून्य न रहे। केवल पिण्ड छुड़ाने के लिए किसी को सान्त्वना या आश्वासन न दे। और कृपा करते समय ताना या आक्षेप न करे।

Verse 11

प्रहरेन्न त्वविज्ञाय हत्वा शत्रूनू न शोचयेत्‌ । क्रोधं कुर्यान्न चाकस्मान्मृदुः स्यान्नापकारिषु,३३-बिना जाने किसीपर प्रहार न करे। ३४-शत्रुओंको मारकर शोक न करे। ३५- अकस्मात्‌ किसीपर क्रोध न करे तथा ३६-कोमल हो, परंतु अपकार करनेवालोंके लिये नहीं

भীष्म ने कहा—बिना जाने-समझे किसी पर प्रहार न करे। शत्रुओं को मारकर शोक न करे। अकस्मात् किसी पर क्रोध न करे। और कोमल हो, पर अपकार करने वालों के प्रति नहीं।

Verse 12

एवं चरस्व राज्यस्थो यदि श्रेय इहेच्छसि । अतोडन्यथा नरपतिर्भयमृत्छत्यनुत्तमम्‌,युधिष्ठिर! यदि इस लोकमें कल्याण चाहते हो तो राज्यपर स्थित रहकर ऐसा ही बर्ताव करो; क्योंकि इसके विपरीत आचरण करनेवाला राजा बड़ी भारी विपत्ति या भयमें पड़ जाता है

भीष्म बोले—युधिष्ठिर! यदि तुम इसी लोक में कल्याण चाहते हो, तो राज्य में स्थित रहकर इसी प्रकार आचरण करो; क्योंकि इसके विपरीत चलने वाला राजा अनुपम भय और भारी विपत्ति में पड़ जाता है।

Verse 13

इति सर्वान्‌ गुणानेतान्‌ यथोक्तान्‌ यो<नुवर्तते । अनुभूयेह भद्राणि प्रेत्य स्वर्गे महीयते

भीष्म बोले—इस प्रकार जो मनुष्य (या राजा) यथोक्त इन सब गुणों का अनुवर्तन करता है, वह इसी जीवन में शुभ फल भोगता है और मृत्यु के बाद स्वर्ग में सम्मानित होकर महिमा पाता है।

Verse 14

जो राजा यथार्थरूपसे बताये गये इन सभी गुणोंका अनुवर्तन करता है, वह इस जगत्‌में कल्याणका अनुभव करके मृत्युके पश्चात्‌ स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है ।। वैशम्पायन उवाच इदं वच: शान्तनवस्य शुश्रुवान्‌ युधिष्ठिर: पाण्डवमुख्यसंवृत: । तदा ववन्दे च पितामहं नृपो यथोक्तमेतच्च चकार बुद्धिमान्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! पितामह शान्तनुनन्दन भीष्मका यह उपदेश सुनकर पाण्डवोंसे और प्रधान राजाओंसे घिरे हुए बुद्धिमान्‌ राजा युधिष्ठिरने उन्हें प्रणाम किया और उन्होंने जैसा बताया था, वैसा ही किया

जो राजा यथार्थ रूप से बताये गये इन सभी गुणों का अनुवर्तन करता है, वह इस जगत् में कल्याण का अनुभव करके मृत्यु के पश्चात् स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित होता है। वैशम्पायन बोले—जनमेजय! शान्तनुनन्दन भीष्म के ये वचन सुनकर, पाण्डवों और प्रधान राजाओं से घिरे हुए बुद्धिमान् राजा युधिष्ठिर ने पितामह को प्रणाम किया और जैसा उपदेश मिला था वैसा ही आचरण किया।

Verse 69

इस प्रकार श्रीमह्याभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें उनह्तत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ

इस प्रकार श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्व में इकहत्तरवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

Verse 70

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि सप्ततितमो5ध्याय: ।। ७० || इस प्रकार श्रीमह्याभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधमानुशासनपर्वमें सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ

इस प्रकार श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्व में सत्तरवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

Frequently Asked Questions

How a ruler can secure welfare and stability through conduct-based governance—balancing dharma, artha, and kāma—while avoiding administrative harms such as harshness, indiscretion, and naïve trust.

Rulership is sustained by disciplined virtues operationalized as procedures: examine before punishing, keep counsel confidential, give with discernment, speak pleasantly without self-deception, and apply firmness proportionately against aggressors.

Yes in functional form: Bhīṣma states that following these virtues yields prosperity here and honor in heaven after death, while deviation leads to severe fear and insecurity; Vaiśaṃpāyana adds that Yudhiṣṭhira accepted and implemented the counsel.