
Atithi-satkāra and the Consolation of Wise Counsel (अतिथिसत्कारः प्रज्ञानवचनस्य च पराश्वासनम्)
Upa-parva: Mokṣa-dharma (instructional discourse on liberation-oriented ethics; chapter context: hospitality and reassurance to an atithi)
A brāhmaṇa speaks in response to counsel he has received, describing the instruction as the removal of a heavy burden (atibhāra) and as deeply consoling (parāśvāsakara). He illustrates its effect through a sequence of analogies: rest for a traveler fatigued by the road, a seat for one tired of standing, water for the thirsty, food for the hungry, the timely arrival of desired sustenance and a guest, the coming of a son to an aged person at the right moment, and the sight of a beloved person long contemplated. The brāhmaṇa states that the advice grants him vision and discernment, as if receiving sight in open space, and he resolves to act accordingly. He then invites the visitor to stay the night; the guest accepts, and the night passes pleasantly in dharma-oriented conversation. At dawn, after being honored to the brāhmaṇa’s capacity, the guest departs. The brāhmaṇa—now firm in dharmic resolve—proceeds in due time as instructed toward “bhujagendra-saṃśraya” (a destination described as the refuge/abode associated with the lord of serpents), committed to meritorious action.
Chapter Arc: इन्द्र पर दोहरी ब्रह्महत्या का भय छा जाता है; देवराज पद त्यागकर वह मानसरोवर की शीतल कमलिनी के पास छिपने चला जाता है—और उसके हटते ही त्रिलोकी का शासन-तंत्र डगमगा उठता है। → त्रिलोकनाथ शचीपति के भय-प्रणष्ट होते ही देवों पर रज-तम का आवेश, मंत्रों की अप्रवृत्ति, ऋषियों के यज्ञ-रक्षण में बाधा और राक्षसों का प्रादुर्भाव—धर्म-व्यवस्था के टूटने का संकेत देता है। इसी पृष्ठभूमि में नारायण की महिमा और उनके विविध रूपों का स्मरण/वर्णन आगे बढ़ता है, मानो जगत के केंद्र-स्तंभ को पुनः स्थापित करने की तैयारी हो। → रुद्र-नारायण के महायुद्ध-स्मरण में निर्णायक क्षण आता है: महात्मा नारायण के हुंकार से शंकर का त्रिशूल प्रतिहत होकर शंकर के ही कर में लौट जाता है—अजेयता का उद्घोष और ‘नारायण-जय’ का शिखर। → कृष्ण (नारायण) पार्थ को बताते हैं कि देवगणों ने त्रिदिव छोड़ तप किया और अंततः ‘नारायणजयो मृथे’—युद्ध में नारायण की विजय—यह निष्कर्ष स्थापित हुआ। साथ ही वे कहते हैं कि मैं अनेक रूप धारण कर पृथ्वी, ब्रह्मलोक और सनातन गोलोक तक विचरता हूँ—सर्वव्यापकता का आश्वासन। → अर्जुन का प्रश्न—‘उस संहार-समर्थ युद्ध में रुद्र और नारायण में से किसे जय मिली?’—कथा को अगले प्रसंग की ओर धकेलता है, जहाँ निर्णायक प्रमाण/विस्तार अपेक्षित रहता है।
Verse 1
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत गोक्षधर्मपर्वमें नारययणकी महिमाविषयक तीन सौ बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ३४२ ॥। (दक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल १४४ श्लोक हैं) 3: अ--छकऋा - सूर्य और चन्द्रमा ही अग्नि एवं सोम है। वे जगत्को हर्ष प्रदान करनेके कारण 'हृषी” कहलाते हैं। वे ही भगवानके केश अर्थात् किरणें हैं
शौनक बोले— “हे सौति! आपने अत्यन्त महान् आख्यान का वर्णन किया है। उसे सुनकर सभी मुनि परम विस्मय को प्राप्त हो गए हैं।”
Verse 42
अब इन्द्रके पास दोहरी ब्रह्महत्या उपस्थित हुई। उसके भयसे इन्द्रने देवराजपदका परित्याग कर दिया और मानसरोवरके जलनमें उत्पन्न हुई एक शीतल कमलिनीके पास जा पहुँचे। वहाँ अणिमा आदि ऐश्वर्यके योगसे इन्द्र अणुमात्र रूप धारण करके कमलनालकी ग्रन्थिमें प्रविष्ट हो गये
तब इन्द्र के सामने दोहरी ब्रह्महत्या उपस्थित हुई। उसके भय से इन्द्र ने देवराज्य का परित्याग कर दिया और मानसरोवर के जल में उत्पन्न शीतल कमलिनी में जा पहुँचे। वहाँ अणिमा आदि ऐश्वर्य-योग के बल से इन्द्र अणुमात्र रूप धारण करके कमलनाल की ग्रन्थि में प्रविष्ट हो गए।
Verse 43
अथ ब्रह्मवध्याभयप्रणष्टे त्रलोक्यनाथे शचीपतौ जगदनीश्वरं॑ बभूव देवान् रजस्तमश्नाविवेश मन्त्रा न प्रावर्तन्त महर्षीणां रक्षांसि प्रादुरभवन् ब्रह्म चोत्सादनं जगामानिन्द्राश्नाबला लोका: सुप्रधृष्या बभूवु:
ब्रह्महत्या के भय से त्रिलोकीनाथ शचीपति इन्द्र के लुप्त हो जाने पर जगत् निराधार-सा हो गया। देवताओं में रज और तम का आवेश छा गया। महर्षियों के मन्त्र निष्फल होने लगे; राक्षस प्रकट होकर बढ़ने लगे। वेदों का स्वाध्याय और धर्म-व्यवस्था क्षीण हो गई। इन्द्र के संरक्षण के बिना तीनों लोक दुर्बल हो गए और सहज ही आक्रान्त व विजित किए जाने योग्य बन पड़े।
Verse 44
अथ देवा ऋषयश्नायुषः: पुत्र नहुषं नाम देवराज्येडभिषिषिचुर्नहुष: पठ्चभि: शतैज्योतिषां ललाटे ज्वलद्धि: सर्वतेजोहरैस्त्रिविष्टपं पालयांबभूव
तदनन्तर देवताओं और ऋषियों ने आयु के पुत्र नहुष को देवराज्य के पद पर अभिषिक्त किया। नहुष के ललाट पर पाँच सौ प्रज्वलित ज्योतियाँ दहकती थीं, जो समस्त प्राणियों का तेज हर लेने वाली कही जाती थीं। उसी अपार तेज से सम्पन्न होकर वे त्रिविष्टप (स्वर्ग) का शासन करने लगे।
Verse 45
अथ लोका: प्रकृतिमापेदिरे स्वस्थाश्व हष्टाश्न बभूव॒ु:,ऐसा होनेपर सब लोग स्वाभाविक स्थितिमें आ गये। सभी स्वस्थ एवं प्रसन्न हो गये
तब सब लोग अपनी स्वाभाविक स्थिति में लौट आए; वे स्वस्थ और प्रसन्न हो गए।
Verse 46
अथोवाच नहुषः सर्व मां शक्रोपभुक्तमुपस्थितमृते शचीमिति स एवमुकक््त्वा शचीसमीपमगमदुवाचैनां सुभगे5हमिन्द्रो देवानां भजस्व मामिति तं शची प्रत्युवाच प्रकृत्या त्वं धर्मवत्सल: सोमवंशोद्धवश्व नाहसि परपत्नीधर्षणं कर्तुमिति,कुछ कालके पश्चात् नहुषने देवताओंसे कहा--*इन्द्रके उपभोगमें आनेवाली अन्य सारी वस्तुएँ तो मेरी सेवामें उपस्थित हैं। केवल शची मुझे नहीं मिली हैं।! ऐसा कहकर वे शचीके पास गये और उनसे बोले--'सौभाग्यशालिनि! मैं देवताओंका राजा इन्द्र हूँ। मेरी सेवा स्वीकार करो।” शचीने उत्तर दिया--'महाराज! आप स्वभावसे ही धर्मवत्सल और चन्द्रवंशके रत्न हैं। आपको परायी स्त्रीपर बलात्कार नहीं करना चाहिये”
कुछ काल बाद नहुष ने देवताओं से कहा—“इन्द्र के उपभोग की जो-जो वस्तुएँ थीं, वे सब मेरी सेवा में उपस्थित हैं; केवल शची नहीं मिली।” यह कहकर वह शची के पास गया और बोला—“सुभगे! मैं ही देवताओं का राजा इन्द्र हूँ; मेरा संग स्वीकार करो।” शची ने उत्तर दिया—“महाराज! आप स्वभाव से धर्मवत्सल हैं और चन्द्रवंश के भूषण हैं; आपको परायी स्त्री का अपमान/दुराचार नहीं करना चाहिए।”
Verse 47
तामथोवाच नहुष ऐन्द्रं पदमध्यास्थते मया-5हमिन्द्रस्थ राज्यरत्नहरो नात्राधर्म: वश्चित् त्वमिन्द्रोप-भुक्तेति सा तमुवाचास्ति मम किंचिद् व्रतमपर्यवसितं तस्यावभृथे त्वामुपगमिष्यामि कैश्चिदेवाहोभिरिति स शच्येवमभिहितो जगाम,तब नहुषने शचीसे कहा--'देवि! इस समय मैं इन्द्रपदपर प्रतिष्ठित हूँ। इन्द्रके राज्य और रत्न दोनोंका अधिकारी हो गया हूँ; अतः तुम्हारे साथ समागम करनेमें कोई अधर्म नहीं है; क्योंकि तुम इन्द्रके उपभोगमें आयी हुई वस्तु हो।। यह सुनकर शचीने कहा--“महाराज! मैंने एक व्रत ले रखा है। वह अभी समाप्त नहीं हुआ है। उसकी समाप्ति हो जानेपर कुछ ही दिनोंमें मैं आपकी सेवामें उपस्थित होऊँगी।! शचीके ऐसा कहनेपर नहुष चले गये
तब नहुष ने शची से कहा—“मैं इन्द्रपद पर प्रतिष्ठित हूँ; इन्द्र के राज्य और रत्नों का अधिकारी बन चुका हूँ, इसलिए तुम्हारे साथ समागम में कोई अधर्म नहीं; तुम तो इन्द्र द्वारा उपभोग की हुई हो।” यह सुनकर शची बोली—“महाराज! मेरा एक व्रत अभी अपूर्ण है। उसके अवभृथ-स्नान के बाद, कुछ ही दिनों में, मैं आपके पास आ जाऊँगी।” शची के ऐसा कहने पर नहुष चला गया।
Verse 48
अथ शची दु:ःखशोकार्ता भर्तृदर्शनलालसा नहुष-भयगृहीता बृहस्पतिमुपागच्छत् स च तामत्युद्धिग्नां दृष्टवैव ध्यानं प्रविश्य भर्तकार्यतत्परां ज्ञात्वा बृहस्पति- रुवाचानेनैव व्रतेन तपसा चान्विता देवीं वरदामुप-श्रुतिमाह्दय तदा सा ते इन्द्र दर्शयिष्यतीति सा&थ महानियमस्थिता देवीं वरदामुपश्रुतिं मन्त्रैराह्ययति सोपश्रुतिः शचीसमीपमगादुवाच चैनामियमस्मीति त्वया55हूतोपस्थिता किं ते प्रियं करवाणीति तां मूर्थ्ना प्रणम्योवाच शची भगवत्यहसि मे भर्तरिं दर्शयितुं त्वं सत्या ऋता चेति सैनां मानसं सरो5नयत तत्रेन्द्रे बिसग्रन्थिगतमदर्शयत्
Then Śacī, overwhelmed by grief and sorrow, longing to see her husband and seized by fear of Nahūṣa, went to Bṛhaspati. Seeing her extremely agitated, Bṛhaspati entered meditation and understood that she was intent on accomplishing her lord’s purpose. He said to her: “O goddess, strengthened by this very vow and by austerity, invoke the boon-giving देवी Upaśruti; then she will show you Indra.” Having received the teacher’s command, Śacī, steadfast in strict observance, invoked the boon-giving Upaśruti with mantras. Upaśruti came near Śacī and said: “I am here before you; called by you, I have come at once. What dear task shall I do for you?” Śacī bowed with her head and replied: “O Blessed One, please grant me the sight of my husband; you are Truth and Cosmic Order (satya and ṛta).” Upaśruti then led her to the lake Mānasarovara and there revealed Indra, hidden among the knots of lotus-stalk fibers.
Verse 49
तामथ पत्नीं कृशां ग्लानां चेन्द्रो दृष्टया चिन्तया-म्बभूव अहो मम दुःखमिदमुपगतं नष्टे हि मामिय-मन्विष्य यत्यत्न्यभ्यगमद् दुःखार्तेति तामिन्द्र उवाच कथं वर्तयसीति सा तमुवाच नहुषो मामाह्दयति पत्नीं कर्तु कालश्लास्य मया कृत इति तामिन्द्र उवाच गच्छ नहुषस्त्वया वाच्योथ<पूर्वेण मामृषियुक्तेन यानेन त्वमधिरूढ उद्वहस्वेति इन्द्रस्य महान्ति वाहनानि सन्ति मनःप्रियाण्यधिरूढानि मया त्वमन्येनोपयातुरमहसीति सैवमुक्ता हृष्टा जगामेन्द्रोडपि बिसग्रन्थिमेवाविवेश भूय:
Seeing his wife—thin and worn with grief—Indra reflected, “Alas, what sorrow has come upon me! While I remain hidden here, she, distressed, has searched for me and with great effort has come all this way.” Then Indra said to her, “How are you managing to live?” She replied, “Nahusha has taken the place of Indra and is summoning me to make me his wife. I have obtained only a short respite, and I have given my word that after the appointed time I will comply.” Indra said, “Go, and tell Nahusha this: ‘O king, mount an unprecedented conveyance yoked with sages and come to carry me away into your service.’ Indra has many great vehicles that delight the mind, but I have already ridden them all; therefore you should approach me by some other, extraordinary vehicle.” Thus instructed, Śacī departed joyfully, and Indra once again entered the knot of the lotus-stalk to remain concealed.
Verse 50
अथेन्द्राणीमभ्यागतां दृष्टयवा तामुवाच नहुषः पूर्ण. स काल इति त॑ शच्यब्रवीच्छक्रेण यथोक्तं स महर्षियुक्तं वाहनमधिरूढ: शचीसमीपमुपागच्छत्
When Indra’s queen Śacī arrived, Nahuṣa saw her and declared, “The time you asked for is now complete.” Śacī then repeated to him everything exactly as Indra had instructed. Thereupon Nahuṣa mounted the conveyance yoked with great sages and proceeded toward Śacī. The episode underscores how power, when mixed with impatience and entitlement, can turn into coercion, while Śacī’s careful adherence to Indra’s counsel reflects prudence and strategic fidelity to dharma under threat.
Verse 51
अथ मैत्रावरुणि: कुम्भयोनिरगस्त्य ऋषिवरो महर्षीन् धिकृक्रियमाणांस्तान् नहुषेणापश्यत् पद्धयां च तेनास्पृश्यत ततः स नहुषमब्रवीदकार्यप्रवृत्त पाप पतस्व महीं सर्पो भव यावद्धुमिर्गिरयश्व तिष्ठेयुस्तावदिति स महर्षिवाक्यसमकालमेव तस्माद् यानादवापतत्
Then Maitrāvaruṇi—Agastya, the great sage born from the jar—saw that Nahusha was rebuking and driving the assembled seers to move faster, and even struck Agastya’s body with his feet. Agastya then said to Nahusha: “Sinner, engaged in what ought not to be done—fall at once to the earth. Become a serpent, for as long as the earth and the mountains endure.” At the very moment the great sage spoke these words, Nahusha fell down from that conveyance.
Verse 52
अथानिन्द्र पुनस्त्र्लोक्यमभवत् ततो देवा ऋषयश्न भगवन्तं विष्णुं शरणमिन्द्रार्थेइभिजग्मुरूचुश्ैन॑ भगवन्निन्द्रं ब्रह्म॒हत्याभिभूतं त्रातुमहसीति ततः स वरदस्तानब्रवीदश्नमेधं यज्ञं वैष्णवं शक्रोडभियजतां ततः स्वस्थानं प्राप्स्यतीति ततो देवा ऋषयश्रेन्द्रे नापश्यन् यदा तदा शचीमूचुर्गच्छ सुभगे इन्द्रमानयस्वेति सा पुनस्तत्सर: समभ्यगच्छदिन्द्रश्न॒ तस्मात् सरस: प्रत्युत्थाय बृहस्पतिमभिजगाम बृहस्पतिश्नाश्वमेधं महाक्रतुं शक्रायाहरत् तत्र कृष्णसारड्ढं मेध्यमश्वमुत्सूज्य वाहनं तमेव कृत्वा इन्द्र मरुत्पतिं बृहस्पति: स्वं स्थानं प्रापपामास,नहुषका पतन हो जानेपर त्रिलोकीका राज्य पुन: बिना इन्द्रके हो गया, तब देवता और ऋषि इन्द्रके लिये भगवान् विष्णुकी शरणमें गये और उनसे बोले--“भगवन! ब्रह्महत्यासे पीड़ित हुए इन्द्रकी रक्षा कीजिये” तब वरदायक भगवान् विष्णुने उन देवताओंसे कहा --देवगण! इन्द्र विष्णुके उद्देश्यसे अश्वमेध यज्ञ करें। तब वे फिर अपना स्थान प्राप्त करेंगे।' यह सुनकर देवता और महर्षि इन्द्रको ढूँढ़ने लगे। जब वे कहीं उनका पता न पा सके, तब वे शचीसे बोले--'सुभगे! तुम्हीं जाओ और इन्द्रको यहाँ ले आओ।' तब शची पुनः मानसरोवरपर गयीं। शचीके कहनेसे इन्द्र उस सरोवरसे निकलकर बृहस्पतिजीके पास आये। बृहस्पतिजीने इन्द्रके लिये अश्वमेध नामक महायज्ञका अनुष्ठान किया। उस यजञ्ञमें उन्होंने कृष्णसारंग नामक यज्ञिय अश्वको छोड़ा था। उसीको वाहन बनाकर बृहस्पतिने पुनः देवराज इन्द्रको अपने पदपर प्रतिष्ठित किया
After Nahusha’s fall, the sovereignty of the three worlds again became without Indra. Then the gods and the seers sought refuge in Lord Vishnu for Indra’s sake and said, “O Blessed One, protect Indra who is overwhelmed by the sin of brahma-hatya.” The boon-giving Vishnu replied, “Let Shakra perform a Vaishnava Ashvamedha sacrifice; then he will regain his own station.” Hearing this, the gods and great seers searched for Indra; when they could not find him, they said to Shachi, “O fortunate one, go and bring Indra here.” Shachi went again to that lake. At her urging Indra rose up from the lake and went to Brihaspati. Brihaspati then arranged for Shakra the great Ashvamedha rite; releasing a consecrated sacrificial horse named Kṛṣṇasāraṅga, he made it Indra’s mount and restored Marutpati Indra to his rightful throne. Ethically, the passage frames the restoration of authority as requiring expiation and divine guidance: power is legitimate only when cleansed of grave wrongdoing and re-established through dharmic rites.
Verse 53
ततः स देवराड देवैर््रषिभि: स्तूयमानस्त्रिविष्ट-पस्थो निष्कल्मषो बभूव ह ब्रह्मवध्यां चतुर्ष स्थानेषु वनिताग्निवनस्पतिगोषु व्यभजदेवमिन्द्रो ब्रह्मतेज:- प्रभावोपबूृंहित: शत्रुवर्ध॑ कृत्वा स्वं स्थान प्रापित:
Thereafter the divine king Indra, praised by the gods and the seers, became free from taint and dwelt in Triviṣṭapa (heaven). He apportioned the burden of brahma-hatyā (the sin of slaying a brāhmaṇa) into four receptacles—women, fire, trees, and cows. Strengthened by the radiance of brahmanical power, Indra then overcame his enemies and regained his rightful station. The passage frames a moral logic of purification and restitution: wrongdoing is not denied but ritually redistributed and resolved so that cosmic order and rightful kingship may be restored.
Verse 54
(नहुषस्य शापमोक्षनिमित्तं देवैषिभिश्न याच्यमानोडगस्त्य: प्राह । यावत् स्वकुलज: श्रीमान् धर्मराजो युधिष्ठिर: । कथयित्वा स्वकान् प्रश्नान् भीम॑ तं च विमोक्ष्यते ।।
Agastya, entreated by the gods and sages to secure Nahusha’s release from his curse, declared: “When the illustrious Dharmarāja Yudhiṣṭhira—born in Nahusha’s own lineage—has posed his questions and received their answers, and then frees Bhīmasena from that bondage, at that very time he will also deliver Nahusha from the curse.” The passage frames liberation as contingent upon truthful inquiry, right understanding, and righteous action: release is not granted by mere pleading, but through dharmic discernment and the restoration of proper order.
Verse 55
भगुणा महर्षिणा शप्तोडग्नि: सर्वभक्षत्वमुपानीत:,महर्षि भूगुके शापसे अग्निदेव सर्वभक्षी हो गये
Because of the curse pronounced by the great sage Bhṛgu, Agni—the Fire-god—was condemned to become ‘all-devouring,’ compelled to consume whatever is offered or encountered. The episode underscores how even divine powers are bound by the moral force of a ṛṣi’s word, and how actions invite consequences that reshape one’s role in the cosmic order.
Verse 56
अदितिर्व देवानामन्नमपचदेतद्ू भुक्त्वासुरान्ू हनिष्यन्तीति तत्र बुधो ब्रतचर्यासमाप्तावागच्छददितिं चावोचद् भिक्षां देहीति तत्र देवै: पूर्वमेतत् प्राश्यं नान्येनेत्यदितिर्भिक्षां नादादथ भिक्षाप्रत्याख्यान-रुषितेन बुधेन ब्रह्मभूतेनादिति: शप्ता अदितेरुदरे भविष्यति व्यथा विवस्वतो द्वितीयजन्मन्यण्डसंज्ञितस्य अण्डं मातुरदित्या मारितं स मार्तण्डो विवस्वानभवच्छाद्धदेव:
Aditi cooked food for the gods with the intention that, after eating it, they would be able to slay the Asuras. At that very time Budha, having completed his observance, came to Aditi and asked, “Give me alms.” Aditi reflected, “This food should be eaten first by the gods, and by no one else,” and so she did not give Budha any alms. Enraged at being refused, Budha—now possessed of brahmanic potency—cursed Aditi: “In your womb there will arise pain at the time of Vivasvat’s second birth, when he is in the form of an egg.” That egg in mother Aditi’s belly was destroyed by the pain; and because he emerged from a dead egg, Vivasvat became known as Mārtaṇḍa, also called Śrāddhadeva. Ethically, the passage warns that even a seemingly reasonable prioritization (serving the gods first) can become adharma when it violates the duty of hospitality and alms to a brahmin/guest, and that the power of ascetic merit, when joined with anger, can yield grave consequences.
Verse 57
दक्षस्य या वै दुहितर: षष्टिरासंस्ताभ्य: कश्यपाय त्रयोदश प्रादाद् दश धर्माय दश मनवे सप्तविंशतिमिन्दवे तासु तुल्यासु नक्षत्राख्यां गतासु सोमो रोहिण्यामभ्यधिकं प्रीतिमानभूत्ू ततस्ता: शिष्टा: पत्न्य ईरष्यावित्य: पितु:ः: समीपं गत्वेममर्थ शशंसुर्भगवन्नस्मासु तुल्यप्रभावासु सोमो रोहिणीं प्रत्यधिक॑ं भजतीति सोडब्रवीद् यक्ष्मैनमाविश्येतेति दक्षशापात् सोम॑ राजानं यक्ष्मा विवेश स यक्ष्मणा<विष्टो दक्षमगाद् दक्षश्नैनमब्रवीज्न सम॑ वर्तयसीति तत्रर्षय: सोममन्रुवन् क्षीयसे यक्ष्मणा पश्चिमायां दिशि समुद्रे हिरण्यसरस्तीर्थ तत्र गत्वा आत्मानमभिषेचयस्वेत्यथागच्छत् सोमस्तत्र हिरण्यसरस्तीर्थ गत्वा चात्मन: सेचनमकरोत् स्नात्वा चात्मानं पाप्मनो मोक्षयामास तत्र चावभासितस्तीर्थे यदा सोमस्तदा प्रभूति च तीर्थ तत् प्रभासमिति नाम्ना ख्यातं बभूव,प्रजापति दक्षके साठ कन्याएँ थीं। उनमेंसे तेरहका विवाह उन्होंने कश्यपजीके साथ कर दिया। दस कन्याएँ धर्मको, दस मनुको और सत्ताईस कन्याएँ चन्द्रमाको दे डालीं। उन सत्ताईस कन्याओंकी नक्षत्र नामसे प्रसिद्धि हुई। यद्यपि वे सब-की-सब एक समान रूपवती थीं तो भी चन्द्रमा सबसे अधिक रोहिणीपर ही प्रेम करने लगे। यह देख शेष पत्नियोंके मनमें ईर्ष्या हुई और उन्होंने पिताके समीप जाकर यह बात बतायी--'भगवन्! हम सब बहिनोंका प्रभाव एक-सा है तो भी चन्द्रदेव रोहिणीपर ही अधिक स्नेह रखते हैं।' यह सुनकर दक्षने कहा--“इनके भीतर यक्ष्माका प्रवेश होगा।” इस प्रकार ब्राह्मण दक्षके शापसे राजा सोमके शरीरमें यक्ष्माने प्रवेश किया। यक्ष्मासे ग्रस्त होकर राजा सोम प्रजापति दक्षके पास गये। रोषका कारण पूछनेपर दक्षने उनसे कहा--'तुम अपनी सभी पत्रनियोंके प्रति समान बर्ताव नहीं करते हो, उसीका यह दण्ड है।” वहाँ दूसरे ऋषियोंने सोमसे कहा--“तुम यक्ष्मासे क्षीण होते चले जा रहे हो। अतः पश्चिम दिशामें समुद्रके तटपर जो हिरण्यसर नामक तीर्थ है, वहाँ जाकर अपने-आपको स्नान कराओ।” तब सोमने हिरण्यसर तीर्थमें जाकर वहाँ स्नान किया। स्नान करके उन्होंने अपने-आपको पापसे छुड़ाया। उस तीर्थमें वे दिव्य प्रभासे प्रभासित हो उठे थे, इसलिये उसी समयसे वह स्थान प्रभासतीर्थके नामसे विख्यात हो गया
Dakṣa had sixty daughters. Of them he gave thirteen in marriage to Kaśyapa, ten to Dharma, ten to Manu, and twenty-seven to the Moon (Soma). Those twenty-seven became famed by the name ‘Nakṣatras’. Though all were equally endowed, Soma’s affection grew excessive toward Rohiṇī. The remaining wives, stirred by jealousy, went to their father and reported: ‘Revered one, though we are equal in worth, Soma favors Rohiṇī beyond measure.’ Hearing this, Dakṣa declared, ‘May consumption (yakṣmā) enter him.’ By Dakṣa’s curse, yakṣmā seized King Soma. Afflicted, Soma approached Dakṣa; and Dakṣa told him the cause: ‘You do not treat your wives with equality.’ Then the sages advised Soma: ‘You are wasting away from yakṣmā. Go to the western sea, to the sacred ford called Hiraṇyasaras, and bathe there, consecrating yourself.’ Soma went to that Hiraṇyasaras-tīrtha, performed the purificatory bathing, and by bathing freed himself from sin and affliction. Because Soma shone there with a divine radiance, from that time onward the tīrtha became renowned by the name Prabhāsa. Ethically, the episode frames partiality and neglect of fairness in relationships as a breach of dharma that invites suffering, while repentance and disciplined purification restore balance.
Verse 58
तच्छापादद्यापि क्षीयते सोमो<मावास्यान्तरस्थ: पौर्णमासीमात्रेडधिछितो मेघलेखाप्रतिच्छन्न॑ वपुर्दर्शयति मेघसदृशं वर्णमगमत् _तदस्य शशलक्ष्म विमलमभवत्
उसी शाप के कारण सोम (चन्द्रमा) आज भी कृष्णपक्ष में अमावस्या तक क्षीण होता जाता है और शुक्लपक्ष में पूर्णिमा तक बढ़ता रहता है। उसका गोल मण्डल मानो मेघ-सी श्याम रेखा से आच्छादित-सा दीखता है। उसके शरीर में खरगोश का चिह्न स्पष्ट और निर्मल रूप से दिखाई देता है, जिसका वर्ण मेघ के समान श्याम है।
Verse 59
स्थूलशिरा महर्षिमिरो: प्रागुत्तरे दिग्विभागे तपस्तेपे ततस्तस्य तपस्तप्यमानस्य सर्वगन्धवह: शुचिर्वायुर्वायमान: शरीरमस्पृशत्ू स तपसा तापित-शरीर: कृशो वायुनोपवीज्यमानो हृदये परितोषमगमत् तत्र किल तस्यानिलव्यजनकृतपरितोषस्य सद्यो वनस्पतयः पुष्पशोभां निदर्शितवन्त इति स एतान् शशाप न सर्वकालं पुष्पवन्तो भविष्यथेति,पूर्वकालकी बात है, मेरुपर्वतके पूर्वोत्तर भागमें स्थूलशिरा नामक महर्षि बड़ी भारी तपस्या कर रहे थे। उनके तपस्या करते समय सब प्रकार सुगन्ध लिये पवित्र वायु बहने लगी। उस वायुने प्रवाहित होकर मुनिके शरीरका स्पर्श किया। तपस्यासे संतप्त शरीरवाले उन कृशकाय मुनिने उस वायुसे वीजित हो अपने हृदयमें बड़े संतोषका अनुभव किया। वायुके द्वारा व्यजन डुलानेसे संतुष्ट हुए मुनिके समक्ष वृक्षोंने तत्काल फूलकी शोभा दिखलायी। इससे रुष्ट होकर मुनिने उन्हें शाप दिया कि तुम हर समय फूलोंसे भरे-पूरे नहीं रहोगे
पूर्वकाल में मेरु पर्वत के पूर्वोत्तर भाग में स्थूलशिरा नामक महर्षि घोर तपस्या कर रहे थे। उनके तप में प्रवृत्त होने पर सब प्रकार की सुगन्ध लिये हुए पवित्र वायु बहने लगी और बहती हुई उस वायु ने मुनि के शरीर का स्पर्श किया। तप से संतप्त, कृशकाय मुनि उस वायु के पंखे-से झलने पर हृदय में परम संतोष को प्राप्त हुए। मुनि के उस अनिल-व्यजनजन्य संतोष को देखकर वहाँ के वृक्षों ने तत्काल पुष्पों की शोभा प्रकट कर दी। तब क्रुद्ध होकर मुनि ने उन्हें शाप दिया—“तुम सदा फूलों से युक्त नहीं रहोगे।”
Verse 60
नारायणो लोकहितार्थ वडवामुखो नाम पुरा महर्षिबभूव तस्य मेरी तपस्तप्यत: समुद्र आहूतो नागतत्तेनामर्षितेनात्मगात्रोष्मणा समुद्र: स्तिमितजलः कृतः स्वेदप्रस्यन्दनसदृशश्वास्य लवणभावो जनित:
एक समय लोकहित के लिये भगवान् नारायण वडवामुख नामक महर्षि हुए। वे मेरु पर्वत पर तपस्या कर रहे थे; उन्हीं दिनों उन्होंने समुद्र का आवाहन किया, परन्तु समुद्र नहीं आया। इससे अमर्ष में भरकर उन्होंने अपने शरीर की उष्णता से समुद्र के जल को क्षुब्ध कर दिया, उसे भारी-सा स्तिमित बना दिया और पसीने के प्रवाह के समान उसमें खारापन उत्पन्न कर दिया।
Verse 61
उक्तश्नाप्पपेयो भविष्यस्येतच्च ते तोयं वडवामुखसंज्ञितेन पेपीयमानं मधुरं भविष्यति तदेतदद्यापि वडवामुखसंज्ञितेनानुवर्तिना तोयं समुद्रात् पीयते
तब उससे कहा—“समुद्र! तू पीने योग्य नहीं रहेगा; परन्तु तेरा यह जल वडवामुख नामक अग्नि के द्वारा बार-बार पीये जाने पर मधुर हो जायेगा।” यह बात आज भी देखी जाती है—वडवामुख-संज्ञक अग्नि समुद्र से जल खींचकर पीती रहती है।
Verse 62
हिमवतो. गिरे्दुहितरमुमां कन््यां रुद्रश्नकमे भूगुपि च महर्षिहिमवन्तमागत्याब्रवीत् कन्यामिमां मे देहीति तमब्रवीद्धिमवानभिलक्षितो वरो रुद्र इति तमब्रवीद् भुगुर्यस्मात् त्वयाहं कन्यावरण-कृतभाव: प्रत्याख्यातस्तस्मान्न रत्नानां भवान् भाजनं भविष्यतीति,हिमवानकी पुत्री उमाको जब वह कुमारी अवस्थामें थी तभी रुद्रने पानेकी इच्छा की। दूसरी ओरसे महर्षि भूगु भी वहाँ आकर हिमवानसे बोले--“अपनी यह कन्या मुझे दे दो।' तब हिमवानने उनसे कहा--“इस कन्याके लिये देख-सुनकर लक्षित किये हुए वर रुद्रदेव हैं।! तब भूगुने कहा--“मैं कन््याका वरण करनेकी भावना लेकर यहाँ आया था, किंतु तुमने मेरी उपेक्षा कर दी है; इसलिये मैं शाप देता हूँ कि तुम रत्नोंके भण्डार नहीं होओगे'
हिमवान की पुत्री उमा जब कुमारी अवस्था में थी, तब रुद्र ने उसे पाने की इच्छा की। उसी समय महर्षि भृगु भी वहाँ आकर हिमवान से बोले—“अपनी यह कन्या मुझे दे दो।” हिमवान ने कहा—“इस कन्या के लिये देख-सुनकर निश्चित किया हुआ वर रुद्र ही है।” तब भृगु बोले—“मैं कन्या-वरण की भावना लेकर आया था, पर तुमने मुझे ठुकरा दिया; इसलिये मैं शाप देता हूँ कि तुम रत्नों के भण्डार नहीं बनोगे।”
Verse 63
अद्यप्रभृत्येतववस्थितमृषिवचनं तदेवंविध॑ माहात्म्यं ब्राह्मणानाम्,आज भी महर्षिका वह वचन हिमवानपर ज्यों-का-त्यों लागू हो रहा है। ऐसा ब्राह्मणोंका माहात्म्य है
आज से महर्षि का वह वचन जैसा कहा गया था वैसा ही प्रतिष्ठित होकर चलता आ रहा है। ऐसा है ब्राह्मणों का माहात्म्य—सत्य और तप के बल से उनका वचन काल के पार भी प्रभावी रहता है।
Verse 64
क्षत्रमपि च ब्राह्मणप्रसादादेव शाश्वतीमव्ययां च पृथिवीं पत्नीमभिगम्य बुभूजे,क्षत्रिय जाति भी ब्राह्मणोंकी कृपासे ही सदा रहनेवाली इस अविनाशिनी पृथ्वीको पत्नीकी भाँति पाकर इसका उपभोग करती है
क्षत्रिय जाति भी ब्राह्मणों की कृपा से ही इस शाश्वत, अविनाशी पृथ्वी को पत्नी की भाँति पाकर उसका उपभोग करती है।
Verse 65
यदेतद् ब्रह्माग्नीषोमीयं तेन जगदू धार्यते,यह जो अग्नि और सोमसम्बन्धी ब्रह्म है, उसीके द्वारा सम्पूर्ण जगत् धारण किया जाता है
यह जो अग्नि और सोम से सम्बद्ध ब्रह्म है, उसी के द्वारा सम्पूर्ण जगत् धारण किया जाता है।
Verse 66
उच्यते-- सूर्याचन्द्रमसौ चक्षु: केशाश्वैवांशव: स्मृता: । बोधयंस्तापयंश्वैव जगदुत्तिष्ठते पृथक्
कहते हैं—सूर्य और चन्द्रमा मेरे नेत्र हैं और उनकी किरणें केश मानी गई हैं। जगत् को जगाते और ताप देते हुए वे दोनों अपने-अपने पथ पर पृथक्-पृथक् उदित होते हैं।
Verse 67
(नाम्नां निरुक्तं वक्ष्यामि शृणुष्वैकाग्रमानस: ।) बोधनात् तापनाच्चैव जगतो हर्षणं भवेत् । अग्नीषोमकृतैरेभि: कर्मभि: पाण्डुनन्दन | हृषीकेशो5हमीशानो वरदो लोकभावन:
अब मैं अपने नामों की व्युत्पत्ति बताऊँगा; तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो। जगत् को जगाने और ताप देने से सूर्य-चन्द्रमा हर्षदायक होते हैं। पाण्डुनन्दन! अग्नि और सोम द्वारा सम्पन्न इन कर्मों के कारण मैं—लोकभावन, वरदायक ईश्वर—‘हृषीकेश’ कहलाता हूँ।
Verse 68
इलोपहूतयोगेन हरे भागं क्रतुष्वहम् । वर्णश्न मे हरि: श्रेष्ठस्तस्माद्धरिरहं स्मृत:
यज्ञों में ‘इलोपहूता…’ आदि मन्त्र से आवाहन किए जाने पर मैं अपना नियत भाग ग्रहण करता हूँ; और मेरे शरीर का वर्ण भी हरित-श्याम है—इसलिए मैं ‘हरि’ नाम से स्मरण किया जाता हूँ।
Verse 69
धाम सारो हि भूतानाम् ऋतं चैव विचारितम् । ऋतधथामा ततो विप्रै: सद्यक्चाहं प्रकीर्तित:
प्राणियों के ‘धाम’ का सार ही ऋत—सत्य और धर्म-नियम—है, ऐसा विचार करके निश्चित किया गया है। इसलिए, हे ब्राह्मणो, मैं ‘ऋतधामा’—जिसका धाम ऋत में है—के रूप में यथार्थतः कीर्तित हूँ।
Verse 70
प्राणियोंके सारका नाम है धाम और ऋतका अर्थ है सत्य, ऐसा विद्वानोंने विचार किया है! इसीलिये ब्राह्मणोंने तत्काल मेरा नाम 'ऋतधामा” रख दिया था ।।
विद्वानों ने विचार किया कि प्राणियों के सार का नाम ‘धाम’ है और ‘ऋत’ का अर्थ सत्य है; इसलिए ब्राह्मणों ने तत्काल मेरा नाम ‘ऋतधामा’ रख दिया। और पूर्वकाल में जो पृथ्वी नष्ट होकर गुप्त रसातल में चली गई थी, उसे मैंने वराहरूप धारण करके पुनः प्राप्त किया; इसी कारण देवताओं ने वाणी द्वारा मेरी स्तुति ‘गोविन्द’ कहकर की—जो पृथ्वी को खोजकर प्राप्त करे, वही गोविन्द है।
Verse 71
शिपिविष्टेति चाख्यायां हीनरोमा च यो भवेत् । तेनाविष्ट तु यर्त्किंचिच्छिपिविष्टेति च स्मृत:
मेरे ‘शिपिविष्ट’ नाम की व्याख्या यह है—रोमहीन प्राणी को ‘शिपि’ कहते हैं और ‘विष्ट’ का अर्थ है ‘व्यापक’। मैं निराकार रूप से समस्त जगत् में व्याप्त हूँ; इसलिए मुझे ‘शिपिविष्ट’ कहा जाता है।
Verse 72
यास्को मामृषिरव्यग्रो नैकयज्ञेषु गीतवान् | शिपिविष्ट इति हास्माद् गुह्नामधरो हाहम्
ऋषि यास्क ने अव्यग्रचित्त होकर अनेक यज्ञों में ‘शिपिविष्ट’ कहकर मेरी महिमा का गान किया है; इसलिए मैं इस गुह्य नाम को धारण करता हूँ—क्योंकि गुह्य नामों में मैं अग्रगण्य हूँ।
Verse 73
स्तुत्वा मां शिपिविष्ठेति यास्क ऋषिरुदार धी: । मत्प्रसादादधो नष्ट निरुक्तमभिजग्मिवान्
उदारचेता यास्क मुनि ने “शिपिविष्ट” नाम से मेरी स्तुति की। मेरी ही कृपा से उसने पाताल में लुप्त हुए निरुक्त-शास्त्र को पुनः प्राप्त कर उस पवित्र विद्या को फिर जगत् में प्रतिष्ठित किया।
Verse 74
न हि जातो न जायेय॑ न जनिष्ये कदाचन । क्षेत्रज्ञ: सर्वभूतानां तस्मादहमज: स्मृत:
मैं न पहले कभी जन्मा हूँ, न अब जन्म लेता हूँ और न आगे कभी जन्म लूँगा। मैं समस्त प्राणियों के शरीर में स्थित क्षेत्रज्ञ—अन्तर्ज्ञ आत्मा—हूँ; इसीलिए मैं ‘अज’ (अजन्मा) कहलाता हूँ।
Verse 75
नोक्तपूर्व मया क्षुद्रमश्लीलं वा कदाचन । ऋता ब्रह्म॒सुता सा मे सत्या देवी सरस्वती
मैंने कभी भी तुच्छ या अश्लील वचन नहीं कहा। सत्यस्वरूपा, ब्रह्मा की पुत्री देवी सरस्वती ही मेरी वाणी है।
Verse 76
सच्चासच्चैव कौन्तेय मया55वेशितमात्मनि । पौष्करे ब्रह्मसदने सत्यं मामृषयो विदु:
कुन्तीपुत्र! मैंने सत् और असत्—दोनों को अपने भीतर प्रविष्ट कर रखा है। इसलिए पुष्कर-सम, नाभि-कमल से उत्पन्न ब्रह्मलोक में रहने वाले ऋषि मुझे ‘सत्य’ नाम से जानते हैं।
Verse 77
सच्त्वान्नच्युतपूर्वो5हं सत्त्वं वै विद्धि मत्कृतम् । जन्मनीहा भवेत् सत्त्वं पौर्विकं मे धनंजय
धनंजय! मैं कभी सत्त्व से च्युत नहीं हुआ। सत्त्व को मुझसे ही उत्पन्न जानो। इस जन्म में भी मेरा वह प्राचीन, आद्य सत्त्व विद्यमान है; उसी सत्त्व के कारण मैं पापरहित होकर निष्काम कर्म में प्रवृत्त रहता हूँ—इसीलिए लोग मुझे ‘सात्त्वत’ कहते हैं।
Verse 78
निराशी: कर्मसंयुक्त: सत्त्वतश्नाप्पकल्मष: । सात्त्वतज्ञानदृष्टोडहं सत्त्वतामिति सात्त्वत:ः
मैं निराशी होकर कर्म में लगा रहता हूँ और सत्त्व के कारण पाप से रहित रहता हूँ। सात्त्वत-ज्ञान से मेरा स्वरूप जाना जाता है; इसलिए मैं “सात्त्वत” कहलाता हूँ। हे धनंजय! मैं कभी सत्त्व से च्युत नहीं हुआ। जानो, सत्त्व मुझसे ही उत्पन्न है; मेरा वह प्राचीन शुद्ध सत्त्व इस अवतार में भी विद्यमान है। सत्त्व के कारण मैं निष्काम कर्म करते हुए भी निष्पाप रहता हूँ। जो भगवत्प्राप्त हैं, वे पाञ्चरात्र आदि वैष्णव तन्त्ररूप सात्त्वत-ज्ञान से मेरे तत्त्व को समझते हैं; इसी से लोग मुझे “सात्त्वत” कहते हैं।
Verse 79
कृषामि मेदिनीं पार्थ भूत्वा कार्ष्णायसो महान् | कृष्णो वर्णश्व॒ मे यस्मात् तस्मात् कृष्णोडहमर्जुन
हे पार्थ! मैं काले लोहे के महान् फाल का रूप धारण करके इस पृथ्वी को जोतता हूँ। और मेरा वर्ण भी कृष्ण (काला) है; इसलिए, हे पृथापुत्र अर्जुन, मैं “कृष्ण” कहलाता हूँ।
Verse 80
मया संश्लेषिता भूमिरद्धिव्योम च वायुना । वायुश्न तेजसा सार्ध वैकुण्ठत्वं ततो मम
मैंने भूमि को जल के साथ, आकाश को वायु के साथ और वायु को तेज के साथ संयुक्त किया है। इसलिए—पाँचों भूतों को मिलाने में जिसकी शक्ति कभी कुण्ठित नहीं होती—मैं “वैकुण्ठ” कहलाता हूँ।
Verse 81
निर्वाणं परम॑ ब्रह्म धर्मोड्सौ पर उच्यते | तस्मान्न च्युतपूर्वोडहमच्युतस्तेन कर्मणा
निर्वाण—जो परम ब्रह्म है—वही परम धर्म कहा गया है। उससे मैं पहले कभी च्युत नहीं हुआ; और उसी आचरण में अडिग रहने के कारण लोग मुझे “अच्युत” कहते हैं।
Verse 82
पृथिवीनभसी चोभे विश्रुते विश्वतोमुखे । तयो: संधारणार्थ हि मामधोक्षजमञज्जसा
पृथ्वी और आकाश—दोनों सर्वतोमुखी और प्रसिद्ध हैं। उन्हें मैं अनायास धारण करता हूँ; इसलिए (अधः=पृथ्वी, अक्ष=आकाश, ज=धारण करने वाला) लोग मुझे यथार्थ ही “अधोक्षज” कहते हैं।
Verse 83
निरुक्त वेदविदुषो वेदशब्दार्थचिन्तका: । ते मां गायन्ति प्राग्वंशे अधोक्षज इति स्थिति:
निरुक्त-निपुण, वेदवेत्ता और वेद-शब्दों के अर्थ पर मनन करने वाले विद्वान प्राग्वंश में बैठकर ‘अधोक्षज’ नाम से मेरी महिमा का गान करते हैं; इसलिए वेद-स्तुति और अर्थ-चिन्तन के आधार पर मेरा नाम ‘अधोक्षज’ ही प्रतिष्ठित है।
Verse 84
(अधो न क्षीयते यस्माद् वदन्त्यन्ये ह्धोक्षजम् ।) जिसके अनुग्रहसे जीव अधोगतिमें पड़कर क्षीण नहीं होता, उन भगवान्को दूसरे लोग इसी व्युत्पत्तिके अनुसार 'अधोक्षज' कहते हैं ।।
जिसकी कृपा से जीव अधोगति में पड़कर भी क्षीण नहीं होता, उसी भगवान को कुछ लोग इस व्युत्पत्ति के अनुसार ‘अधोक्षज’ कहते हैं। महर्षि बताते हैं कि यह एक शब्द होते हुए भी तत्त्वतः भिन्न-भिन्न पदों का समुदाय है, जो सृष्टि, पालन और लय के एकमात्र अधिष्ठान को सूचित करता है; इसलिए प्रभु नारायण के सिवा संसार में कोई दूसरा ‘अधोक्षज’ नहीं कहलाने योग्य है।
Verse 85
घृतं ममार्चिषो लोके जन्तूनां प्राणधारणम् । घृतार्चिरहमव्यग्रैवेंदज्ै: परिकीर्तित:
इस लोक में घृत प्राणियों के प्राणों का पोषण है, क्योंकि वही मेरी ज्वालाओं को प्रज्वलित करता है। इसलिए अव्यग्र, शान्तचित्त वेदज्ञ मुनियों ने मुझे ‘घृतार्चि’—घृत से पोषित तेज वाला—कहकर कीर्तित किया है।
Verse 86
त्रयो हि धातव: ख्याता: कर्मजा इति ते स्मृता: । पित्तं श्लेष्मा च वायुश्चव एब संघात उच्यते
शरीर में तीन धातु प्रसिद्ध हैं—वायु (वात), पित्त और श्लेष्मा (कफ); और वे कर्मजन्य माने गए हैं। इनका संयुक्त समुदाय ‘त्रिधातु’ कहा जाता है।
Verse 87
एतैश्न धार्यते जन्तुरेतै: क्षीणैश्व क्षीयते । आयुर्वेदविदस्तस्मात् त्रिधातु मां प्रचक्षते
इन्हीं (तीन धातुओं) से जीव धारण होता है और इनके क्षीण हो जाने पर वह भी क्षीण हो जाता है। इसलिए आयुर्वेद के विद्वान मुझे ‘त्रिधातु’ कहते हैं।
Verse 88
वृषो हि भगवान् धर्म: ख्यातो लोकेषु भारत । नैधण्टुकपदाख्याने विद्धि मां वृषमुत्तमम्
हे भारत! भगवान् धर्म लोकों में ‘वृष’ (बैल) नाम से विख्यात है। नैघण्टुक (वैदिक शब्दार्थ-कोश) में ‘वृष’ का अर्थ धर्म बताया गया है; इसलिए, भरतनन्दन, मुझे ‘वृष’—धर्म का परम स्वरूप—समझो।
Verse 89
कपिर्वराह: श्रेष्ठश्न धर्मश्न॒ वृष उच्यते । तस्माद् वृषाकपिं प्राह कश्यपो मां प्रजापति:
‘कपि’ (वराह) और ‘वर’ (श्रेष्ठ)—जो धर्म को जानता हुआ अग्रणी हो—वह ‘वृष’ कहलाता है। इसलिए प्रजापति कश्यप ने मुझे ‘वृषाकपि’ कहा।
Verse 90
कपि शब्दका अर्थ वराह एवं श्रेष्ठ है और वृष कहते हैं धर्मको। मैं धर्म और श्रेष्ठ वराहरूपधारी हूँ; इसलिये प्रजापति कश्यप मुझे “वृषाकपि' कहते हैं ।।
‘कपि’ शब्द का अर्थ वराह तथा ‘श्रेष्ठ’ है और ‘वृष’ धर्म को कहते हैं। मैं धर्म हूँ और श्रेष्ठ वराहरूप धारण करता हूँ; इसलिए प्रजापति कश्यप मुझे ‘वृषाकपि’ कहते हैं। देवता और असुर भी मेरे आदि, मध्य और अन्त को कभी नहीं जान पाते; इसीलिए मैं ‘अनादि’, ‘अमध्य’ और ‘अनन्त’—सर्वव्यापी ईश्वर, लोकों का साक्षी—कहलाता हूँ।
Verse 91
शुचीनि श्रवणीयानि शूणोमीह धनंजय । न च पापानि गृह्नामि ततोऊहं वै शुचिश्रवा:
हे धनंजय! मैं यहाँ पवित्र और श्रवणीय वचनों को ही सुनता हूँ; पापपूर्ण बातों को कभी ग्रहण नहीं करता। इसलिए मेरा नाम ‘शुचिश्रवा’—जिसकी श्रवण-शक्ति पवित्र है—है।
Verse 92
एकशड्गः पुरा भूत्वा वराहो नन्दिवर्धन: । इमां चोद्धृतवान् भूमिमेकशूड्रस्ततो हाहम्
पूर्वकाल में मैंने एक-शृंग (एक-दंत) वराह का रूप धारण करके इस पृथ्वी को जल से बाहर उठाया और जगत् का आनन्द बढ़ाया; इसलिए मैं ‘एकशृंग’ कहलाता हूँ।
Verse 93
तथैवासं त्रिककुदो वाराहं रूपमास्थित: । त्रिककुत् तेन विख्यात: शरीरस्य तु मापनात्
इसी प्रकार मैंने वराह-रूप धारण किया; मेरे गौर शरीर में तीन ककुद् (उन्नत उभार) थे। उन तीन उभारों के कारण—जो मेरे शरीर के माप से प्रकट थे—मैं ‘त्रिककुद्’ नाम से विख्यात हुआ।
Verse 94
विरिज्च इति यत् प्रोक्ते कापिलज्ञानचिन्तकै: । स प्रजापतिरेवाहं चेतनात् सर्वलोककृत्
कपिल-प्रणीत सांख्य-ज्ञान का चिंतन करने वाले विद्वान् जिसे ‘विरिंच’ कहते हैं, वह सर्वलोक-स्रष्टा प्रजापति मैं ही हूँ; क्योंकि चेतना प्रदान करने वाला मैं ही हूँ।
Verse 95
विद्यासहायवन्तं मामादित्यस्थं सनातनम् | कपिल प्राहुराचार्या: सांख्या निश्चितनिश्चया:
तत्त्व-निर्णय में दृढ़ सांख्याचार्य मुझे—विद्या-शक्ति के साहचर्य से सम्पन्न, आदित्य-मण्डल में स्थित, सनातन देवता—‘कपिल’ कहते हैं।
Verse 96
हिरण्यगर्भो द्युतिमान् य एष च्छन्दसि स्तुत: । योगै: सम्पूज्यते नित्यं स एवाहं भुवि स्मृत:
वेद-मंत्रों में जिनकी स्तुति की गई है और इस जगत में योगीजन जिनकी नित्य पूजा तथा स्मरण करते हैं, वह तेजस्वी ‘हिरण्यगर्भ’ मैं ही हूँ।
Verse 97
एकविंशतिसाहस्रं ऋग्वेदं मां प्रचक्षते । सहस्रशाखं यत् साम ये वै वेदविदो जना:,वेदके विद्वान् मुझे ही इक्कीस हजार ऋचाओंसे युक्त “ऋग्वेद' और एक हजार शाखाओंवाला 'सामवेद' कहते हैं
वेद के ज्ञाता जन मुझे ही इक्कीस हजार ऋचाओं से युक्त ‘ऋग्वेद’ और एक हजार शाखाओं वाले ‘सामवेद’ के रूप में कहते हैं।
Verse 98
गायन्त्यारण्यके विप्रा मद्धक्तास्ते हि दुर्लभा: | षट्पञ्चाशतमष्टौ च सप्तत्रिंशतमित्युत
वन में विप्र ऋषि स्तुति-गान करते हैं; जो मेरे भक्त हैं, वे निश्चय ही दुर्लभ हैं। (वे) छप्पनवें, आठवें और सैंतीसवें (का भी) उल्लेख करते हैं—ऐसा कहा गया है।
Verse 99
पडञ्चकल्पमथर्वाणं कृत्याभि: परिबृंहितम्
अथर्वण का पंचकल्प—कृत्याओं (आभिचारिक कर्मों) से परिपुष्ट और दृढ़ किया हुआ—प्रयुक्त हुआ।
Verse 100
कल्पयन्ति हि मां विप्रा अथर्वाणविदस्तथा । अथर्ववेदी ब्राह्मण मुझे ही कृत्याओं आभिचारिक प्रयोगोंसे सम्पन्न पंचकल्पात्मक “अथर्ववेद' मानते हैं ।। शाखाभेदाश्न ये केचिद् याश्व शाखासु गीतय:
अथर्ववेद के ज्ञाता विप्र मुझे ही पंचकल्पात्मक अथर्व मानते हैं, जो कृत्याओं—आभिचारिक प्रयोगों—से सम्पन्न है। और जो-जो शाखाभेद हैं तथा जो-जो गीतियाँ शाखाओं में गाई जाती हैं—(वे सब भी उसी में मानी जाती हैं)।
Verse 101
यत् तद् हयशिर: पार्थ समुदेति वरप्रदम्
हे पार्थ, वह वरप्रद हयशिर (अश्वशीर्ष) प्रकट होता है।
Verse 102
वामादेशितमार्गेण मत्प्रसादान्महात्मना
वाम (बाएँ) द्वारा निर्देशित मार्ग से, और मेरी कृपा से, वह महात्मा (आगे बढ़ेगा)।
Verse 103
पाज्चालेन क्रम: प्राप्तस्तस्माद् भूतात् सनातनात् | महात्मा पांचालने वामदेवके बताये हुए ध्यान-मार्गसे मेरी आराधना करके मुझ सनातन पुरुषके ही कृपाप्रसादसे वेदका क्रमविभाग प्राप्त किया था ।।
इन्द्र ने कहा—“जाओ और नहुष से यह कह दो। जैसे पहले किया गया था, वैसे ही तुम ऋषियों से जुते हुए उस प्राचीन वाहन पर आरूढ़ हुए हो।” फिर उन्होंने कहा—“उस सनातन, आद्य पुरुष से वेद-पाठ के क्रम (क्रम-विधि) का अनुशासन प्राप्त हुआ। महात्मा पांचाल ने वामदेव के बताए हुए ध्यान-मार्ग से मेरी आराधना की और मुझ सनातन पुरुष की कृपा से वेद का क्रम-विभाग प्राप्त किया; बाभ्रव्य गोत्र में वही क्रम-पारंगत प्रथम आचार्य हुआ। और बाभ्रव्य गोत्र में जन्मे महर्षि गालव ने भगवान नारायण से वर तथा परम उत्तम योग पाकर वेद के क्रम-विभाग और शिक्षा का प्रणयन किया; इस प्रकार वे क्रम-विधि में सिद्ध सबसे पहले अग्रणी विद्वान बने।”
Verse 104
नारायणाद् वरं लब्ध्वा प्राप्प योगमनुत्तमम् । क्रमं प्रणीय शिक्षां च प्रणयित्वा स गालव:
भगवान नारायण से वर पाकर और अनुत्तम योग को प्राप्त करके महर्षि गालव ने वेद-पाठ के क्रम (क्रम-विभाग) को सुव्यवस्थित किया और शिक्षा-शास्त्र (उच्चारण-विज्ञान) की भी रचना की। इस प्रकार वे वेद के क्रम-विधान में पूर्णतः सिद्ध जनों में अग्रणी बने—यह दिखाते हुए कि आध्यात्मिक साधना और पवित्र ज्ञान का सावधान संरक्षण एक ही धर्म-कर्तव्य के दो रूप हैं।
Verse 105
कण्डरीको<थ राजा च ब्रह्म॒दत्त: प्रतापवान् । जातीमरणजं दु:खं स्मृत्वा स्मृत्वा पुन: पुन:
तब राजा कण्डरीक और प्रतापी ब्रह्मदत्त भी—जन्म और मृत्यु से उत्पन्न दुःख को बार-बार स्मरण करते हुए—मन को बारंबार उसी पीड़ादायक मर्त्य-चक्र की ओर फेरते रहे, ताकि संयम और उच्च बोध की प्रेरणा बनी रहे।
Verse 106
पुराहमात्मज: पार्थ प्रथित: कारणान्तरे
हे पार्थ, बहुत पहले मैं ‘पुत्र’ के रूप में प्रसिद्ध था—एक भिन्न कारण-परिस्थिति में।
Verse 107
नरनारायणो पूर्व तपस्तेपतुरव्ययम्,पहले नर और नारायणने जब धर्ममय रथपर आरूढ़ हो गन्धमादन पर्वतपर अक्षय तप किया था, उसी समय प्रजापति दक्षका यज्ञ आरम्भ हुआ
पूर्वकाल में नर और नारायण ने अक्षय तप किया। वे दोनों धर्ममय रथ पर आरूढ़ होकर गन्धमादन पर्वत पर अविनाशी तपस्या में प्रवृत्त थे; उसी समय प्रजापति दक्ष का यज्ञ आरम्भ हुआ। यह प्रसंग बताता है कि तप (आत्मसंयम) और यज्ञ (धर्म-कर्तव्य) दोनों लोक-धारण करने वाले समानान्तर कर्म हैं—व्यक्ति की साधना और समाज-धर्म एक ही ऋत-व्यवस्था के आधार हैं।
Verse 108
धर्मयानं समारूढौ पर्वते गन्धमादने । तत्कालसमये चैव दक्षयज्ञो बभूव ह,पहले नर और नारायणने जब धर्ममय रथपर आरूढ़ हो गन्धमादन पर्वतपर अक्षय तप किया था, उसी समय प्रजापति दक्षका यज्ञ आरम्भ हुआ
पहले नर और नारायण धर्ममय रथ पर आरूढ़ होकर गन्धमादन पर्वत पर अक्षय तप कर रहे थे; उसी समय प्रजापति दक्ष का यज्ञ आरम्भ हुआ।
Verse 109
न चैवाकल्पयद् भागं दक्षो रुद्रस्य भारत । ततो दधीचिवचनाद् दक्षयज्ञमपाहरत्,भारत! उस यज्ञमें दक्षने रुद्रके लिये भाग नहीं दिया था; इसलिये दधीचिके कहनेसे रुद्रदेवने दक्षके यज्ञका विध्वंस कर डाला
हे भारत! उस यज्ञ में दक्ष ने रुद्र के लिये भाग नहीं ठहराया; इसलिए दधीचि के वचन से प्रेरित होकर रुद्रदेव ने दक्ष के यज्ञ का विध्वंस कर डाला।
Verse 110
ससर्ज शूलं कोपेन प्रज्वलन्तं मुहुर्मुहुः । तच्छूलं भस्मसात्कृत्वा दक्षयज्ञं सविस्तरम्
क्रोध से उसने बार-बार प्रज्वलित त्रिशूल का प्रहार किया; और उसी त्रिशूल से दक्ष के यज्ञ को उसके समस्त विस्तार सहित भस्म कर दिया।
Verse 111
पार्थ! उस समय नारायणकी छातीमें वह त्रिशूल बड़े वेगसे जा लगा। उससे निकलते हुए तेजकी लपेटमें आकर नारायणके केश मूँजके समान रंगवाले हो गये। इससे मेरा नाम “मुछजकेश' हो गया
पार्थ! उस समय वह त्रिशूल बड़े वेग से नारायण की छाती में जा लगा। उससे निकलते हुए तेज की लपेट में आकर नारायण के केश मूँज के समान वर्ण वाले हो गये; इसी से मेरा नाम ‘मुञ्जकेश’ प्रसिद्ध हुआ।
Verse 112
ततस्तत् तेजसा<<विष्टा: केशा नारायणस्य ह । बभूवुर्मुज्जवर्णास्तु ततो5हं मुछजकेशवान्
तब उस तेज से आविष्ट होकर नारायण के केश मूँज-वर्ण के हो गये; इसलिए मैं ‘मुञ्जकेश’ कहलाया, हे पार्थ।
Verse 113
तच्च शूलं विनिर्धूतं हुंकारेण महात्मना । जगाम शंकरकरं नारायणसमाहतम्,तब महात्मा नारायणने हुंकारध्वनिके द्वारा उस त्रिशूलको पीछे हटा दिया। नारायणके हुंकारसे प्रतिहत होकर वह शंकरजीके हाथमें चला गया
महात्मा नारायण के हुंकार-नाद से वह त्रिशूल झटक दिया गया; नारायण के प्रतिघात से वह रुककर शंकर के हाथ में लौट आया।
Verse 114
अथ रुद्र उपाधावत् तावृषी तपसान्वितौ । तत एन॑ समुद्भूतं कण्ठे जग्राह पाणिना
तब रुद्र तपोबल से युक्त उन दोनों ऋषियों की ओर दौड़े; उसी क्षण जो प्राणी उठ खड़ा हुआ, उसे रुद्र ने हाथ से कंठ पकड़ लिया।
Verse 115
अथ रुद्रविघातार्थमिषीकां नर उद्धरन्
तब रुद्र के विघ्न को काटने के लिए उस पुरुष ने एक सरकंडा उखाड़ लिया।
Verse 116
क्षिप्तश्ष सहसा तेन खण्डनं प्राप्तवांस्तदा
उसके द्वारा सहसा आघात पाकर वह उसी समय खंड-खंड होकर नष्ट हो गया।
Verse 117
अर्जुन उवाच अस्मिन् युद्धे तु वा्ष्णेय त्रैलोक्यशमने तदा
अर्जुन बोले— हे वार्ष्णेय! इस युद्ध में, जब वह तीनों लोकों के शमन का कारण बना, तब…
Verse 118
श्रीभगवानुवाच तयो: संलग्नयोर्युद्धे रुद्रनारायणात्मनो:
श्रीभगवान् बोले—अर्जुन! जब रुद्र और नारायण—एक-दूसरे की दिव्य शक्ति से युक्त—परस्पर युद्ध में संलग्न हो गए, तब समस्त लोकों के सभी प्राणी सहसा उद्विग्न हो उठे। यज्ञों में विधिपूर्वक अर्पित विशुद्ध हवि को भी अग्निदेव ग्रहण नहीं कर पा रहे थे।
Verse 119
उद्विग्ना: सहसा कृत्स्ना: सर्वे लोकास्तदा भवन् । नागृह्नात् पावक: शुभ्र॑ मखेषु सुहुतं हवि:
उस समय समस्त लोक सहसा उद्विग्न हो उठे। यज्ञों में विधिपूर्वक अर्पित विशुद्ध हवि को भी पावक (अग्नि) ग्रहण नहीं कर पा रहे थे।
Verse 120
वेदा न प्रतिभान्ति सम ऋषीणां भावितात्मनाम् | देवान् रजस्तमश्वैव समाविविशतुस्तदा,पवित्रात्मा ऋषियोंको वेदोंका स्मरण नहीं हो पाता था। उस समय देवताओंमें रजोगुण और तमोगुणका आवेश हो गया था
पवित्रात्मा ऋषियों के मन में वेद स्पष्ट नहीं हो रहे थे। उसी समय देवताओं में रजोगुण और तमोगुण का आवेश छा गया।
Verse 121
वसुधा संचकम्पे च नभश्न विचचाल ह । निष्प्रभाणि च तेजांसि ब्रह्मा चैवासनच्युत:
पृथ्वी काँप उठी और आकाश भी डगमगा गया। समस्त तेजस्वी प्रकाश निष्प्रभ हो गए और ब्रह्मा भी अपने आसन से विचलित हो उठे।
Verse 122
अगाच्छोषं समुद्रश्न हिमवांश्व व्यशीर्यत । पृथ्वी काँपने लगी
समुद्र सूखने लगा और हिमालय विदीर्ण होने लगा। पाण्डुनन्दन! ऐसे अपशकुन प्रकट होने पर ब्रह्माजी देवताओं और महात्मा ऋषियों के साथ शीघ्र वहाँ आ पहुँचे, जहाँ वह युद्ध हो रहा था।
Verse 123
ब्रह्मा वृतो देवगणैरऋषिभि श्ष महात्मभि: । आजगामाशु त॑ देशं यत्र युद्धमवर्तत
देवगणों और महात्मा ऋषियों से घिरे हुए ब्रह्मा शीघ्र ही उस स्थान पर आ पहुँचे जहाँ युद्ध चल रहा था।
Verse 124
सो&गञ्जलिप्रग्रहो भूत्वा चतुर्वक्त्रो निरुक्तग: | उवाच वचन रुद्रं लोकानामस्तु वै शिवम्
उन्होंने हाथ जोड़कर प्रणाम किया, चतुर्मुख रूप धारण कर नियत विधि के अनुसार रुद्र से बोले—“लोकों का कल्याण हो; सबके लिए शिव (मंगल) हो।”
Verse 125
न्यस्यायुधानि विश्वेश जगतो हितकाम्यया । निरुक्तगम्य भगवान् चतुर्मुखने हाथ जोड़कर रुद्रदेवसे कहा--'प्रभो! समस्त लोकोंका कल्याण हो! विश्वेश्वरर आप जगत्के हितकी कामनासे अपने हथियार रख दीजिये ।।
अर्जुन ने कहा—“हे विश्वेश्वर! जगत के हित की कामना से अपने आयुध रख दीजिए। हे भगवान्, वेदवाणी से ज्ञेय, हे चतुर्मुख! वह अक्षर, अव्यक्त परमेश्वर—जो लोकों का ईश्वर और पालनकर्ता है…”
Verse 126
कूटस्थं कर्त निर्दधन्द्रमकर्तेति च यं विदु: । व्यक्तिभावगतस्यास्य एका मूर्तिरियं शुभा
अर्जुन ने कहा—“उसे कूटस्थ (अचल) कहते हैं; उसे बन्धनों को दग्ध करने वाला कर्ता भी जानते हैं और अकर्ता भी। उसी तत्त्व की, जब वह व्यक्त-भाव में आता है, यह एक कल्याणमयी मूर्ति है।”
Verse 127
“जो सम्पूर्ण जगत्का उत्पादक, अविनाशी और अव्यक्त ईश्वर हैं, जिन्हें ज्ञानी पुरुष कूटस्थ, निर्दधन्द्र, कर्ता और अकर्ता मानते हैं, व्यक्त-भावको प्राप्त हुए उन्हीं परमेश्वरकी यह एक कल्याणमयी मूर्ति है ।।
अर्जुन ने कहा—“जो सम्पूर्ण जगत का उत्पादक, अविनाशी, अव्यक्त और ईश्वर है—जिसे ज्ञानी कूटस्थ, निर्द्वन्द्व, कर्ता तथा अकर्ता मानते हैं—उसी परमेश्वर की, व्यक्त-भाव को प्राप्त हुई, यह एक कल्याणमयी मूर्ति है। धर्मकुल में उत्पन्न ये दोनों—नर और नारायण—देवश्रेष्ठ, महाव्रती और महान् तपस्या से युक्त हैं।”
Verse 128
अहं प्रसादजस्तस्य कुतश्चित् कारणान्तरे । त्वं चैव क्रोधजस्तात पूर्वसर्गे सनातन:
अर्जुन बोले— किसी विशेष निमित्त से उन्हीं नारायण के कृपा-प्रसाद से मेरा जन्म हुआ है। तात! आप भी पूर्वसर्ग में उसी भगवान् के क्रोध से उत्पन्न सनातन पुरुष हैं।
Verse 129
मया च सार्ध वरद विबुधैश्न महर्षिभि: । प्रसादयाशु लोकानां शान्तिर्भवतु मा चिरम्
अर्जुन बोले— वरद! देवताओं, महर्षियों और मेरे साथ शीघ्र ही इन भगवान् को प्रसन्न कीजिये, जिससे समस्त लोकों में बिना विलम्ब शान्ति स्थापित हो।
Verse 130
ब्रह्मणा त्वेवमुक्तस्तु रुद्र: क्रोधाग्निमुत्सूजन् । प्रसादयामास ततो देवं नारायण प्रभुम् शरणं च जगामाद्यं वरेण्यं वरदं प्रभुम्ू
ब्रह्माजी के ऐसा कहने पर रुद्रदेव ने अपनी क्रोधाग्नि का परित्याग किया। तत्पश्चात् उन्होंने आदिदेव, वरेण्य, वरदायक, सर्वसमर्थ भगवान् नारायण को प्रसन्न किया और उन्हीं की शरण ली।
Verse 131
ततो<5थ वरदो देवो जितक्रोधो जितेन्द्रिय: । प्रीतिमानभवत्् तत्र रुद्रेण सह संगत:,तब क्रोध और इन्द्रियोंको जीत लेनेवाले वरदायक देवता नारायण वहाँ बड़े प्रसन्न हुए और रुद्रदेवसे गले मिले
तब क्रोध और इन्द्रियों को जीत लेने वाले वरदायक देवता नारायण वहाँ अत्यन्त प्रसन्न हुए और रुद्रदेव से मिलकर उन्हें हृदय से आलिंगन किया।
Verse 132
ऋषिभिर्त्रद्मणा चैव विबुधैश्व सुपूजित: । उवाच देवमीशानमीश: स जगतो हरि:
तदनन्तर देवताओं, ऋषियों और ब्रह्माजी से अत्यन्त पूजित होकर जगदीश्वर श्रीहरि ने रुद्रदेव से कहा— “प्रभो! जो तुम्हें यथार्थ जानता है, वह मुझे भी जानता है; जो तुम्हारा अनुगामी है, वह मेरा भी अनुगामी है। हम दोनों में कोई भेद नहीं। अतः तुम्हारे मन में इसके विपरीत विचार न उठे।”
Verse 133
यस्त्वां वेत्ति स मां वेत्ति यस्त्वामनु स मामनु । नावयोरन्तरं किंचिन्मा ते5भूद् बुद्धिरन्यथा
जो तुम्हें यथार्थ रूप से जानता है, वह मुझे भी जानता है; जो तुम्हारा अनुगामी है, वह मेरा भी अनुगामी है। हम दोनों में किंचित् भी भेद नहीं है—तुम्हारे मन में इसके विपरीत विचार न उठे।
Verse 134
अद्यप्रभृति श्रीवत्स: शूलाडुको मे भवत्वयम् । मम पाण्यड्कितश्नापि श्रीकण्ठस्त्वं भविष्यसि
आज से तुम्हारे शूल का यह चिह्न मेरे वक्षःस्थल पर ‘श्रीवत्स’ के नाम से प्रसिद्ध होगा; और मेरे हाथ के चिह्न से अंकित होने के कारण तुम भी ‘श्रीकण्ठ’ कहलाओगे।
Verse 135
श्रीभगवानुवाच एवं लक्षणमुत्पाद्य परस्परकृतं तदा । सख्यं चैवातुलं कृत्वा रुद्रेण सहितावृषी
श्रीभगवान् बोले—इस प्रकार तब उन्होंने परस्पर द्वारा किये हुए उन चिह्नों को अपने-अपने शरीर में उत्पन्न किया; और रुद्रदेव के सहित उन दोनों ऋषियों ने अतुल मैत्री स्थापित की।
Verse 136
तपस्तेपतुरव्यग्रौ विसृज्य त्रिदिवौकस: । एष ते कथित: पार्थ नारायणजयो मृथे
वे स्वर्गलोक के निवासियों को विदा करके, अव्यग्रचित्त होकर तपस्या करने लगे। हे पार्थ! यह मैंने तुम्हें युद्ध में नारायण की विजय का वृत्तान्त कहा।
Verse 137
नामानि चैव गुह्मानि निरुक्तानि च भारत । ऋषिभि: कथितानीह यानि संकीर्तितानि ते
हे भारत! मेरे जो गुप्त नाम हैं और उनकी व्युत्पत्तियाँ, वे मैंने यहाँ बतायीं; तथा ऋषियों द्वारा जो नाम कहे और निश्चित किये गये हैं, उनका भी मैंने तुम्हें वर्णन किया।
Verse 138
एवं बहुविधे रूपैश्नरामीह वसुन्धराम् । ब्रद्मलोक॑ च कौन्तेय गोलोक॑ च सनातनम्
कुन्तीनन्दन! इस प्रकार अनेक प्रकार के रूप धारण करके मैं इस पृथ्वी पर विचरता हूँ; ब्रह्मलोक में भी निवास करता हूँ और सनातन गोलोक में भी विहार करता हूँ।
Verse 139
मया वत्वं रक्षितो युद्धे महान्तं प्राप्तताउजयम् । यस्तु ते सो5ग्रतो याति युद्धे सम्प्रत्युपस्थिते
अर्जुन ने कहा—मैंने युद्ध में तुम्हारी रक्षा की और तुम्हें महान् विजय दिलाई; परन्तु अब, जब युद्ध सामने उपस्थित है, जो तुम्हारे आगे-आगे चलता है, वही इस क्षण का सच्चा अग्रणी है।
Verse 140
त॑ विद्धि रुद्रं कौन्तेय देवदेवं कपर्दिनम् । काल: स एव कथित: क्रोधजेति मया तव
कुन्तीनन्दन! उसे रुद्र—देवाधिदेव, जटाजूटधारी—समझो। वही काल कहलाता है; और वही मैंने तुम्हें ‘क्रोधज’ (क्रोध से उत्पन्न) कहकर बताया है।
Verse 141
मुझसे सुरक्षित होकर तुमने महाभारत युद्धमें महान् विजय प्राप्त की है। कुन्तीनन्दन! युद्ध उपस्थित होनेपर जो पुरुष तुम्हारे आगे-आगे चलते थे, उन्हें तुम जटाजूटधारी देवाधिदेव रुद्र समझो। उन्हींको मैंने तुमसे क्रोधद्वारा उत्पन्न बताया है। वे ही काल कहे गये हैं ।।
जिन शत्रुओं को तुमने मारा है, वे वास्तव में पहले ही उसी के द्वारा निहत हो चुके थे। उस अप्रमेय-प्रभाव वाले देवाधिदेव, उमापति, विश्वेश्वर, अक्षय हर को संयतचित्त होकर नमस्कार करो।
Verse 142
तुमने जिन शत्रुओंको मारा है, वे पहले ही रुद्रदेवके हाथसे मार दिये गये थे। उनका प्रभाव अप्रमेय है। तुम उन देवाधिदेव, उमावल्लभ विश्वनाथ, पापहारी एवं अविनाशी महादेवजीको संयतचित्त होकर नमस्कार करो ।।
धनंजय! जिन्हें मैंने पहले बार-बार ‘क्रोधज’ कहकर तुम्हें बताया था, और जो कुछ तुमने पहले सुना था—वह सब उसी रुद्रदेव के प्रभाव का ही प्राकट्य है।
Verse 342
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि नारायणीये द्विचत्वारिंशदधिकत्रिशततमो<5 ध्याय:
इस प्रकार श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के मोक्षधर्मपर्वान्तर्गत नारायणीये में तीन सौ बयालीसवाँ अध्याय समाप्त होता है।
Verse 986
यस्मिन् शाखा यजुर्वेदे सो5हमाध्वर्यवे स्मृतः । आरण्यकॉमें ब्राह्मणलोग मेरा ही गान करते हैं। वे मेरे परम भक्त दुर्लभ हैं। जिस यजुर्वेदकी छप्पन+आठ+सैंतीस-एक सौ एक शाखाएँ मौजूद हैं
यजुर्वेद की जिस शाखा में मैं अध्वर्यु के रूप में स्मरण किया जाता हूँ, आरण्यकों और ब्राह्मण-परम्परा में भी वे मेरा ही गान करते हैं। मेरे परम भक्त दुर्लभ हैं। और अनेक शाखाओं वाले यजुर्वेद में भी मेरा ही स्तवन गाया गया है।
Verse 1003
स्वरवर्णसमुच्चारा: सर्वास्तान् विद्धि मत्कृतान् वेदोंमें जो भिन्न-भिन्न शाखाएँ हैं
स्वरों और वर्णों के उच्चारण की जितनी भी विधियाँ हैं, उन सबको मेरी ही रची हुई जानो। वेद की जितनी भिन्न-भिन्न शाखाएँ हैं, उन शाखाओं में जितने भी गीत हैं, और उन गीतों में स्वर-वर्णोच्चारण के जो नियम हैं—यह सब मुझसे ही उत्पन्न हुआ समझो।
Verse 1016
सो&हमेवोत्तरे भागे क्रमाक्षरविभागवित् । कुन्तीनन्दन! सबको वर देनेवाले जो हयग्रीव प्रकट होते हैं
कुन्तीनन्दन! उत्तरभाग में क्रम और अक्षर-विभाग का ज्ञाता मैं ही हूँ। जब-जब वर देने वाले हयग्रीव प्रकट होते हैं, तब उसी रूप में मैं ही अवतीर्ण होता हूँ। उत्तरभाग में वेद-मन्त्रों के क्रम-विभाग और अक्षर-विभाग को मैं ही जानता हूँ।
Verse 1053
सप्तजातिषु मुख्यत्वाद् योगानां सम्पदं गत: । कण्डरीक-कुलमें उत्पन्न हुए प्रतापी राजा ब्रह्मदत्तने सात जन्मोंके जन्म-मृत्युसम्बन्धी दुःखोंका बार-बार स्मरण करके तीव्रतम वैराग्यके कारण शीघ्र ही योगजनित एऐश्वर्य प्राप्त कर लिया था
सात जन्मों में प्रधानता प्राप्त करके उसने योगजनित सम्पदा को प्राप्त किया। कण्डरीक-कुल में उत्पन्न प्रतापी राजा ब्रह्मदत्त ने सात जन्मों के जन्म-मृत्युजन्य दुःखों का बार-बार स्मरण किया; उस स्मरण से उत्पन्न तीव्र वैराग्य के कारण उसने शीघ्र ही योगज ऐश्वर्य प्राप्त कर लिया।
Verse 1066
धर्मस्य कुरुशार्टूल ततो5हं धर्मज: स्मृत: । कुरुश्रेष्ठ! कुन्तीकुमार! पूर्वकालमें किसी कारणवश मैं धर्मके पुत्ररूपसे प्रसिद्ध हुआ था। इसीलिये मुझे “धर्मज” कहा गया है
हे कुरुशार्दूल! इसी कारण मैं ‘धर्मज’—धर्म का पुत्र—के रूप में स्मरण किया जाता हूँ। हे कुरुश्रेष्ठ, कुन्तीपुत्र! पूर्वकाल में किसी विशेष कारण से मैं धर्म के पुत्ररूप में प्रसिद्ध हुआ था; इसलिए मुझे ‘धर्मज’ कहा जाता है।
Verse 1106
आवयो: सहसागच्छद् बदर्याश्रममन्तिकात् । रुद्रने क्रोधपूर्वक अपने प्रज्वलित त्रिशूलका बारंबार प्रयोग किया। वह त्रिशूल दक्षके विस्तृत यज्ञको भस्म करके सहसा बदरिकाश्रममें हम दोनों (नर और नारायण) के निकट आ पहुँचा
वह सहसा निकट से बदरिकाश्रम की ओर दौड़ पड़ा। क्रोध में रुद्र ने अपने प्रज्वलित त्रिशूल का बार-बार प्रहार किया। वह त्रिशूल दक्ष के विस्तृत यज्ञ को भस्म करके वेग से बदरिकाश्रम में हम दोनों—नर और नारायण—के निकट आ पहुँचा।
Verse 1146
नारायण: स विश्वात्मा तेनास्य शितिकण्ठता । यह देख रुद्र तपस्यामें लगे हुए उन ऋषियोंपर टूट पड़े। तब विश्वात्मा नारायणने अपने हाथसे उन आक्रमणकारी रुद्रदेवका गला पकड़ लिया। इसीसे उनका कण्ठ नीला हो जानेके कारण वे “नीलकण्ठ' के नामसे प्रसिद्ध हुए
तपस्या में लगे हुए उन ऋषियों पर रुद्र टूट पड़े। तब विश्वात्मा नारायण ने अपने हाथ से उस आक्रमणकारी रुद्र का गला पकड़ लिया। उसी पकड़ से उनका कण्ठ नीला पड़ गया; इसलिए वे ‘नीलकण्ठ’ नाम से प्रसिद्ध हुए।
Verse 1156
मन्नत्रैश्न संयुयोजाशु सो5भवत् परशुर्महान् । इसी समय रुद्रका विनाश करनेके लिये नरने एक सींक निकाली और उसे मन्त्रोंसे अभिमन्त्रित करके शीघ्र ही छोड़ दिया। वह सींक एक बहुत बड़े परशुके रूपमें परिणत हो गयी
मन्त्रों से अभिमन्त्रित होते ही वह शीघ्र ही समर्थ होकर एक महान् परशु बन गया। उसी समय रुद्र के विनाश के लिए नर ने एक सींक निकाली, उसे मन्त्रों से अभिमन्त्रित करके तुरंत छोड़ दिया; और वह सींक एक विशाल परशु के रूप में परिणत हो गई।
Verse 1173
को जय प्राप्तवांस्तत्र शंसैतन्मे जनार्दन । अर्जुनने पूछा--वृष्णिनन्दन! त्रिलोकीका संहार करनेवाले उस युद्धके उपस्थित होनेपर वहाँ रुद्र और नारायणमेंसे किसको विजय प्राप्त हुई? जनार्दन! आप यह बात मुझे बताइये
अर्जुन ने पूछा—हे वृष्णिनन्दन! जब त्रिलोकी का संहार करने वाला वह युद्ध उपस्थित हुआ, तब वहाँ रुद्र और नारायण में से किसको विजय मिली? हे जनार्दन! यह बात मुझे बताइये।
Verse 11131
वेगेन महता पार्थ पतन्नारायणोरसि
हे पार्थ! वह महान वेग से गिरता हुआ नारायण के वक्षस्थल पर जा पड़ा।
Verse 11636
ततो<5हं खण्डपरशु: स्मृत: परशुखण्डनात् । नरका चलाया हुआ वह परशु सहसा रुद्रके द्वारा खण्डित कर दिया गया। मेरे परशुका खण्डन हो जानेसे मैं 'खण्डपरशु” कहलाया
तदनन्तर मेरे परशु के खण्डित हो जाने से मैं ‘खण्डपरशु’ के नाम से स्मरण किया जाने लगा।
The chapter addresses the need to transform internal distress and uncertainty into stable, dharma-aligned action; it frames wise counsel as a remedy that restores functional clarity and moral confidence.
Instruction that reassures is portrayed as a basic human necessity—like rest, water, and food—because it removes psychological burden and enables disciplined, timely performance of duty, including hospitality and respectful conduct.
No explicit phalaśruti is stated in these verses; the implied valuation is pragmatic and ethical: reassurance and hospitality yield discernment, social harmony, and firm resolve toward meritorious conduct.