Adhyaya 300
Shanti ParvaAdhyaya 30063 Verses

Adhyaya 300

Saṃhāra-krama (The Sequence of Cosmic Dissolution) — Yājñavalkya’s Discourse

Upa-parva: Mokṣa-dharma (Liberation Discourse) — Cosmology of Dissolution (Saṃhāra)

Yājñavalkya continues a systematic account of categories (tattva) and time-measures by outlining dissolution (saṃhāra) in an ordered chain. The chapter depicts cyclical creation-and-withdrawal under an eternal, imperishable principle. A solar agency, described as dividing into twelve forms, rapidly desiccates the four modes of embodied life (jarāyuja, aṇḍaja, svedaja, udbhijja), reducing the world to a leveled surface. Waters then inundate the remaining earth, but are themselves consumed by a ‘time-fire’ (kālāgni), after which a great conflagration intensifies. Wind, characterized in eightfold form, consumes fire; space absorbs wind; mind absorbs space; ahaṃkāra (ego-principle), identified with prajāpati, absorbs mind; and a higher comprehensive principle (mahat/śambhu/īśāna imagery) subsumes ahaṃkāra, described via omniform and all-pervasive attributes. The chapter closes by stating that dissolution has been explained ‘as it is’ and transitions to the triadic analytic teaching of adhyātma, adhibhūta, and adhidaiva.

Chapter Arc: युधिष्ठिर, धर्म-शोक से थके हुए, भीष्म से पूछते हैं—तात! सांख्य और योग में वास्तविक अन्तर क्या है, और मुक्ति का मार्ग कौन-सा है? → भीष्म बताते हैं कि विद्वान अपने-अपने पक्ष की श्रेष्ठता सिद्ध करते हैं—कोई सांख्य की प्रशंसा करता है, कोई योग की; पर दोनों का लक्ष्य एक ही है: अनीश्वर (अहंकार-ग्रस्त) जीव कैसे छूटे। वे योग की साधना-रेखा खींचते हैं—धारणा, समाधि, इन्द्रिय-निग्रह, और तप-नियम; साथ ही चेतावनी देते हैं कि दुर्बल योगी जाल में फँसी मछलियों की तरह विषयों में फँसकर विनाश को जाते हैं। → भीष्म योग-सिद्धि की ऊँचाई का चित्र खींचते हैं—योगी काम-क्रोध, शीत-उष्ण, भय-शोक, तृष्णा, निद्रा आदि द्वन्द्वों को जीतकर सूक्ष्म धारणा से आत्म-समाधि में स्थित होता है; तब वह नाग, पर्वत, यक्ष, दिशाएँ, गन्धर्व-समूह, स्त्री-पुरुष—समस्त लोक-व्यवहार को अतिक्रमित कर शीघ्र विमुक्ति की ओर बढ़ता है, और ‘नारायणात्मा’ होकर मनुष्यों पर विजय पाता है। → अध्याय का निष्कर्ष यह है कि योग-विधि का सार इन्द्रिय-जय, मन-स्थैर्य और आत्म-समाधि है; बाह्य आडम्बर नहीं, बल्कि दीर्घकालीन संयम (जैसे एकाहार, रूक्ष यव-आहार का उदाहरण) और भीतर की शुद्धि ही बल और मुक्ति का कारण बनती है। → भीष्म की वाणी योग की सिद्धि तक पहुँचा देती है, पर युधिष्ठिर के मन में अगला प्रश्न उभरता है—इस सिद्धि का स्थायी आधार क्या है: ज्ञान (सांख्य) या अभ्यास (योग), और गृहस्थ-धर्म में रहते हुए यह कैसे साध्य है?

Shlokas

Verse 1

युधिष्ठिरने पूछा--तात! धर्मज्ञ कुरुश्रेष्ठ! सांख्य और योगमें कया अन्तर है? यह बतानेकी कृपा करें; क्योंकि आपको सब बातोंका ज्ञान है

युधिष्ठिर ने पूछा—तात! धर्मज्ञ, कुरुश्रेष्ठ! सांख्य और योग में क्या अंतर है? कृपा करके बताइए; क्योंकि आप सब बातों के ज्ञाता हैं।

Verse 2

भीष्म उवाच सांख्या: सांख्य॑ प्रशंसन्ति योगा योगं द्विजातय: । वदन्ति कारण श्रेष्ठ स्वपक्षोद्धावनाय वै

भीष्म बोले—युधिष्ठिर! सांख्य के विद्वान् सांख्य की और योग के ज्ञाता द्विज योग की प्रशंसा करते हैं। दोनों ही अपने-अपने पक्ष को ऊँचा दिखाने के लिए श्रेष्ठ-श्रेष्ठ युक्तियाँ प्रस्तुत करते हैं।

Verse 3

अनीथ्चवर:ः कथं मुच्येदित्येवं शत्रुकर्शन । वदन्ति कारणै: श्रैष्ठ्यं योगा: सम्पड्मनीषिण:

भीष्म बोले—शत्रुकर्शन! योग के मनीषी विद्वान् अपने मत की श्रेष्ठता बताते हुए यह युक्ति देते हैं—जो ईश्वर को नहीं मानता, वह मुक्त कैसे हो सकता है? इस प्रकार वे कहते हैं कि मोक्ष के लिए ईश्वर की सत्ता स्वीकार करना आवश्यक है।

Verse 4

वदन्ति कारण चेदं सांख्या: सम्यग्‌ द्विजातय: । विज्ञायेह गतीः सर्वा विरक्तो विषयेषु यः

भीष्म ने कहा—सम्यक् समझ रखने वाले सांख्य-मतावलम्बी द्विज यह युक्तियुक्त कारण बताते हैं कि इस लोक में जो समस्त गतियों को जानकर विषयों से विरक्त हो जाता है, वही देहत्याग के अनन्तर मोक्ष पाता है। यह बात सबके लिए स्पष्ट है; दूसरे किसी उपाय से मोक्ष सम्भव नहीं। इसलिए वे सांख्य को ही मोक्षदर्शन कहते हैं।

Verse 5

ऊर्ध्व॑ स देहात्‌ सूव्यक्त विमुच्येदिति नान्यथा । एठदाहुर्महाप्राज्ञा: सांख्ये वै मोक्षदर्शनम्‌

भीष्म ने कहा—यह बात स्पष्ट है कि देहत्याग के बाद ही जीव ऊर्ध्वगति होकर मुक्त होता है; इसके सिवा और कोई मार्ग नहीं। महाप्राज्ञ जन कहते हैं कि सांख्य ही वास्तव में ‘मोक्षदर्शन’ है।

Verse 6

स्वपक्षे कारण ग्राह्मूं समये वचन हितम्‌ । शिष्टानां हि मत ग्राहां त्वद्विधै: शिष्टसम्मतै:

भीष्म ने कहा—अपने पक्ष में जो युक्तियुक्त कारण हो, उसे ग्रहण करना चाहिए; और उचित समय पर हितकारक वचन कहना चाहिए। शिष्ट पुरुषों का मत अवश्य ग्रहण करने योग्य है—विशेषतः तुम-जैसे, जो स्वयं भी शिष्टों द्वारा सम्मानित हो।

Verse 7

अपने-अपने पक्षमें युक्तियुक्त कारण ग्राह्म होता है तथा सिद्धान्तके अनुकूल हितकारक वचन मानने योग्य समझा जाता है। शिष्ट पुरुषोंद्वारा सम्मानित तुम-जैसे लोगोंको श्रेष्ठ पुरुषोंका ही मत ग्रहण करना चाहिये ।।

भीष्म ने कहा—प्रत्यक्ष अनुभव के विषय में योगीजन प्रायः प्रत्यक्ष-प्रमाण को ही प्रधान मानते हैं, और सांख्य के अनुयायी शास्त्र-प्रमाण तथा सिद्धान्त-निश्चय पर विश्वास रखते हैं। तात युधिष्ठिर! मुझे ये दोनों ही मत तत्त्वतः सत्य प्रतीत होते हैं। इसलिए जो बात युक्तियुक्त, हितकारक और सिद्धान्त के अनुकूल हो, उसे ग्रहण करना चाहिए—विशेषतः शिष्टों द्वारा सम्मानित लोगों को शिष्टों का ही मत स्वीकार करना चाहिए।

Verse 8

उभे चैते मते ज्ञाते नूपते शिष्टसम्मते । अनुषछिते यथाशास्त्र नयेतां परमां गतिम्‌

भीष्म ने कहा—नरेश्वर! ये दोनों मत प्रसिद्ध हैं और शिष्ट पुरुषों द्वारा आदरित हैं। इन दोनों को जानकर यदि शास्त्रानुसार आचरण किया जाए, तो ये परमगति—अन्तिम मोक्ष—तक पहुँचा सकते हैं।

Verse 9

तुल्यं शौचं तपोयुक्तं दया भूतेषु चानघ । व्रतानां धारणं तुल्यं दर्शनं॑ न समं तयो:

बाहर-भीतर की पवित्रता, तप, प्राणियों पर दया और व्रतों का धारण—ये नियम दोनों मतों में समान रूप से माने गए हैं; पर उनके दर्शन, अर्थात् पद्धतियाँ, समान नहीं हैं।

Verse 10

युधिछिर उवाच यदि तुल्य॑ व्रतं शौच॑ दया चात्र फलं तथा । न तुल्य॑ दर्शनं कस्मात्‌ तन्मे ब्रूहि पितामह

युधिष्ठिर ने पूछा—पितामह! यदि इन दोनों मतों में उत्तम व्रत, बाहर-भीतर की पवित्रता और दया समान है, और दोनों का फल भी एक-सा है, तो इनके दर्शन में समानता क्यों नहीं? यह मुझे बताइए।

Verse 11

भीष्म उवाच रागं मोहं तथा स्नेहं काम॑ क्रोधं च केवलम्‌ | योगाच्छित्त्वा ततो दोषान्‌ पज्चैतानू्‌ प्राप्रुवन्ति तत्‌

भीष्म ने कहा—युधिष्ठिर! योगी पुरुष योगबल से राग, मोह, स्नेह, काम और क्रोध—इन पाँच दोषों को मूल से काटकर, उन्हें दूर कर परम पद को प्राप्त कर लेते हैं।

Verse 12

यथा चानिमिषा: स्थूला जाल छित्त्वा पुनर्जलम्‌ । प्राप्रुवन्ति तथा योगास्तत्‌ पं वीतकल्मषा:

जैसे बड़े-बड़े, अनिमेष मत्स्य जाल को काटकर फिर जल में समा जाते हैं, वैसे ही योगी पाप-कल्मष को नष्ट करके उस परम पद को प्राप्त करते हैं।

Verse 13

तथैव वागुरां छिक्त्वा बलवन्तो यथा मृगा: । प्राप्तुयुर्विमलं मार्ग विमुक्ता: सर्वबन्धनै:

राजन्! जैसे बलवान् मृग जाल तोड़कर सब बन्धनों से मुक्त हो निर्विघ्न मार्ग पर चल पड़ते हैं, वैसे ही योगबल से सम्पन्न योगी लोभजनित बन्धनों को तोड़कर परम निर्मल, कल्याणमय मार्ग को प्राप्त कर लेते हैं।

Verse 14

लोभजानि तथा राजन्‌ बन्धनानि बलान्विता: । छित्त्वा योगा: परं मार्ग गच्छन्ति विमलं शिवम्‌

भीष्म बोले—राजन्! जैसे बलवान् मृग जाल को तोड़कर सब बन्धनों से मुक्त होकर निर्विघ्न अपने मार्ग पर चले जाते हैं, वैसे ही योगबल से सम्पन्न योगी पुरुष लोभ से उत्पन्न समस्त बन्धनों को काटकर परम मार्ग—निर्मल और शिव—को प्राप्त होते हैं।

Verse 15

अबलाश्च मृगा राजन्‌ वागुरासु तथा परे | विनश्यन्ति न संदेहस्तद्वद्‌ योगबलादृते

भीष्म बोले—नरेश्वर! जैसे निर्बल मृग और अन्य पशु जाल में पड़कर निःसन्देह नष्ट हो जाते हैं, वैसे ही योगबल से रहित मनुष्य की भी वही दशा होती है।

Verse 16

बलहीनाश्न कौन्तेय यथा जाल॑ गता झषा: । वधं गच्छन्ति राजेन्द्र योगास्तद्वत्‌ सुदुर्बला:

भीष्म बोले—कुन्तीनन्दन राजेन्द्र! जैसे निर्बल मछलियाँ जाल में फँसकर वध को प्राप्त होती हैं, वैसे ही योगबल से सर्वथा रहित साधनाएँ (योग) अत्यन्त दुर्बल सिद्ध होती हैं और मनुष्य को विनाश की ओर ले जाती हैं।

Verse 17

यथा च शकुना: सूक्ष्मं प्राप्प जालमरिंदम । तत्र सक्ता विपद्यन्ते मुच्यन्ते च बलान्विता:

भीष्म बोले—अरिंदम! जैसे पक्षी सूक्ष्म जाल को पाकर उसमें फँस जाते हैं तो विनाश को प्राप्त होते हैं, और जो बलवान् होते हैं वे उसे तोड़कर मुक्त हो जाते हैं।

Verse 18

कर्मजैर्बन्धनैर्बद्धास्तद्वद्‌ योगा: परंतप । अबला वै विनश्यन्ति मुच्यन्ते च बलान्विता:

भीष्म बोले—परंतप! जो अपने कर्मों से उत्पन्न बन्धनों में बँधे हैं, वे उसी प्रकार साधना (योग) के द्वारा भी बँधे-से हो जाते हैं; दुर्बल निश्चय ही नष्ट होते हैं, और बलवान् मुक्त हो जाते हैं।

Verse 19

शत्रुदमन! जैसे निर्बल पक्षी सूक्ष्म जालमें फँसकर बन्धनको प्राप्त हो अपने प्राण खो देते हैं और बलवान्‌ पक्षी जाल तोड़कर उसके बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं

भीष्म बोले—शत्रुदमन! जैसे निर्बल पक्षी सूक्ष्म जाल में फँसकर बन्धन को प्राप्त होकर प्राण खो देता है और बलवान पक्षी जाल तोड़कर बन्धन से मुक्त हो जाता है, वैसे ही कर्मजनित पाशों से बँधे हुए दुर्बल योगी सर्वथा नष्ट हो जाते हैं। परन्तप! योगबल से सम्पन्न योगी सब प्रकार के बन्धनों से छूट जाते हैं। राजन्! जैसे अल्प और दुर्बल अग्नि पर भारी-मोटे ईंधन रख देने से वह जलने के बजाय बुझ जाती है, वैसे ही प्रभो! दुर्बल साधक महान् योग के भार से दबकर फल पाने के स्थान पर नष्ट हो जाता है।

Verse 20

स एव च यदा राजन्‌ वल्निर्जातबल: पुनः । समीरणगत।: क्षिप्रं दहेत्‌ कृत्स्नां महीमपि,राजन्‌! वही आग जब हवाका सहारा पाकर प्रबल हो जाती है, तब सम्पूर्ण पृथ्वीको भी तत्काल भस्म कर सकती है

भीष्म बोले—राजन्! वही अग्नि जब पुनः बल प्राप्त कर लेती है और वायु के सहारे चलकर प्रबल हो उठती है, तब वह शीघ्र ही सम्पूर्ण पृथ्वी को भी भस्म कर सकती है।

Verse 21

तद्धज्जातबलो योगी दीप्ततेजा महाबल: । अन्तकाल इवादित्य: कृत्स्नं संशोषयेज्जगत्‌

भीष्म बोले—इसी प्रकार योगी का योगबल जब उत्पन्न होकर बढ़ जाता है, तब वह उद्दीप्त तेज और महान् बल से सम्पन्न हो जाता है। तब वह प्रलयकालीन सूर्य की भाँति समस्त जगत् को सुखा देने वाला होकर, राग आदि समस्त दोषों को सुखाकर नष्ट कर देता है।

Verse 22

दुर्बलश्ष यथा राजन्‌ स्रोतसा हियते नर: । बलहीनस्तथा योगो विषयैह्ियतेडवश:,राजन! जैसे दुर्बल मनुष्य पानीके वेगसे बह जाता है, उसी तरह दुर्बल योगी विवश होकर विषयोंकी ओर खिंच जाता है

भीष्म बोले—राजन्! जैसे दुर्बल मनुष्य जलधारा के वेग से बह जाता है, उसी प्रकार बलहीन योग (अथवा योगी) विवश होकर विषयों की ओर खिंच जाता है।

Verse 23

तदेव च महास्रोतो विष्टम्भयति वारण: । तद्धद्‌ योगबलं लब्ध्वा व्यूहते विषयान्‌ बहून्‌

भीष्म बोले—परन्तु उसी महान् जलस्रोत को जैसे गजराज रोक देता है, उसी प्रकार योगबल प्राप्त करके योगी भी उन अनेक विषयों को अवरुद्ध कर देता है और उनके प्रवाह में नहीं बहता।

Verse 24

विशन्ति चावशा: पार्थ योगाद्‌ योगबलान्विता: । प्रजापतीनृषीन्‌ देवान्‌ महाभूतानि चेश्वरा:

हे पार्थ! योग से उत्पन्न बल से युक्त वे स्वाधीन महात्मा योग के द्वारा प्रजापतियों, ऋषियों, देवताओं और महाभूतों में भी इच्छानुसार प्रवेश कर लेते हैं। हे कुन्तीनन्दन! योग उन्हें उन उच्चतर भावों में व्याप्त होने और उन्हें धारण करने की सामर्थ्य देता है।

Verse 25

न यमो नान्तक: क्रुद्धो न मृत्युर्भीमविक्रम: । ईशते नृपते सर्वे योगस्यामिततेजस:,नरेश्वर! अमित तेजस्वी योगीपर क्रोधमें भरे हुए यमराज, अन्तक और भयंकर पराक्रम दिखानेवाली मृत्युका भी शासन नहीं चलता है

हे नरेश्वर! अमित तेजस्वी योगी पर क्रुद्ध यम, अन्तक और भीम पराक्रमी मृत्यु का भी शासन नहीं चलता। योग में स्थित वह पुरुष भय, भाग्य और दमनकारी शक्तियों की सामान्य पहुँच से ऊपर उठ जाता है।

Verse 26

आत्मनां च सहस्राणि बहूनि भरतर्षभ । योग: कुर्याद्‌ बल प्राप्य तैश्न सर्वेर्महीं चरेत्‌,भरतश्रेष्ठ) योगी योगबल पाकर अपने हजारों रूप बना सकता है और उन सबके द्वारा इस पृथ्वीपर विचर सकता है

हे भरतश्रेष्ठ! योगबल प्राप्त करके योगी अपने हजारों रूप बना सकता है और उन सबके द्वारा इस पृथ्वी पर विचर सकता है।

Verse 27

प्राप्तुयाद्‌ विषयांश्वैव पुनश्चोग्रं तपश्चरेत्‌ । संक्षिपेच्च पुनस्तात सूर्यस्तेजोगुणानिव

तात! वह उन शरीरों के द्वारा विषयों का सेवन भी करता है और उग्र तपस्या भी करता है। फिर, जैसे सूर्य अपनी तेजोमयी किरणों को समेट लेता है, वैसे ही वह उन सब रूपों को पुनः अपने में संक्षिप्त कर लेता है।

Verse 28

बलस्थस्य हि योगस्य बन्धनेशस्य पार्थिव । विमोक्षप्रभविष्णुत्वमुपपन्नमसंशयम्‌

हे पार्थिव! जब योग बल और स्थैर्य में दृढ़ हो जाता है, तब वह बन्धन का भी स्वामी बन जाता है; और निःसन्देह वही मोक्ष का भी समर्थ साधन है। अर्थात जो अनुशासित शक्ति मन को विषयों में बाँध सकती है, वही सम्यक् दिशा में लगकर मुक्तिदायिनी हो जाती है।

Verse 29

पृथ्वीनाथ! बलवान्‌ योगी बन्धनोंको तोड़नेमें समर्थ होता है, उसमें अपनेको मुक्त करनेकी पूर्ण शक्ति आ जाती है, इसमें तनिक भी संशय नहीं है ।।

भीष्म ने कहा—हे पृथ्वीनाथ! बलवान योगी अपने बन्धनों को तोड़ने में समर्थ होता है; उसके भीतर स्वयं को मुक्त करने की पूर्ण शक्ति जाग उठती है—इसमें तनिक भी संशय नहीं। हे प्रजापालक नरेश! दृष्टान्त के लिए योग से प्राप्त होने वाली कुछ सूक्ष्म शक्तियों का मैं फिर से तुमसे वर्णन करूँगा।

Verse 30

आत्मनश्न समाधाने धारणां प्रति वा विभो । निदर्शनानि सूक्ष्माणि शूणु मे भरतर्षभ,प्रभो! भरतश्रेष्ठू आत्मसमाधिके लिये जो धारणा की जाती है, उसके विषयमें भी कुछ सूक्ष्म दृष्टान्त बतलाता हूँ, सुनो

भीष्म ने कहा—हे विभो! हे भरतश्रेष्ठ! आत्मसमाधि में आत्मा को स्थिर करने तथा उसे प्राप्त कराने वाली धारणा के विषय में कुछ सूक्ष्म दृष्टान्त मुझसे सुनो।

Verse 31

अप्रमत्तो तथा धन्वी लक्ष्यं हन्ति समाहित: । युक्त: सम्यक्‌ तथा योगी मोक्ष॑ प्राप्नोत्यसंशयम्‌

भीष्म ने कहा—जैसे सदा सावधान धनुर्धर, चित्त को एकाग्र करके, लक्ष्य को अवश्य बेध देता है; वैसे ही जो योगी सम्यक् अनुशासन से योग में युक्त होकर मन को परमात्मा में स्थिर करता है, वह निस्संदेह मोक्ष को प्राप्त करता है।

Verse 32

स्नेहपूर्णे यथा पात्रे मन आधाय निश्चलम्‌ । पुरुषो युक्त आरोहेत्‌ सोपानं युक्तमानस:

भीष्म ने कहा—हे पृथ्वीनाथ! जैसे सिर पर रखे तेल से भरे पात्र पर मन को निश्चल करके, एकाग्रचित्त पुरुष सीढ़ियाँ चढ़ जाता है और तनिक भी तेल नहीं छलकता; वैसे ही योगयुक्त योगी जब आत्मा को परमात्मा में स्थिर करता है, तब वह भीतर से अत्यन्त निर्मल और अचल हो जाता है, और उसका अन्तःप्रकाश सूर्य के समान दीप्त हो उठता है।

Verse 33

युक्तस्तथायमात्मानं योग: पार्थिव निश्चलम्‌ । करोत्यमलमात्मानं भास्करोपमदर्शनम्‌

भीष्म ने कहा—हे पार्थिव! यह योग सम्यक् रूप से युक्त होने पर आत्मा को निश्चल कर देता है; वह अन्तःकरण को निर्मल करता है और दृष्टि को सूर्य के समान तेजस्वी, स्वच्छ तथा कल्मषरहित बना देता है।

Verse 34

यथा च नावं कौन्तेय कर्णधार: समाहित: । महार्णवगतां शीघ्र॑ नयेत्‌ पार्थिवसत्तम

भीष्म बोले—हे कुन्तीपुत्र, नृपश्रेष्ठ! जैसे सावधान और स्थिर कर्णधार महासागर में पड़ी नौका को शीघ्र उसके गन्तव्य तक पहुँचा देता है, वैसे ही योगानुसार तत्त्व को जानने वाला पुरुष समाधि द्वारा मन को परमात्मा में स्थिर करके, इस देह का त्याग करने पर, उस दुर्गम परम पद को प्राप्त होता है।

Verse 35

तद्वदात्मसमाधानं युक्‍त्वा योगेन तत्त्ववित्‌ । दुर्गमें स्थानमाप्नोति हित्वा देहमिमं नूप

भीष्म बोले—उसी प्रकार, हे नरेश! योग द्वारा आत्मा को सम्यक् समाधि में युक्त करके तत्त्वज्ञ पुरुष इस देह का त्याग करने पर दुर्गम स्थान को प्राप्त होता है। हे कुन्तीपुत्र, नृपश्रेष्ठ! वह उस परम, दुर्जय धाम में पहुँच जाता है।

Verse 36

सारथिश्न यथा युकत्वा सदश्चान्‌ सुसमाहितः । देशमिष्टं नयत्याशु धन्विनं पुरुषर्षभ

भीष्म बोले—हे पुरुषश्रेष्ठ! जैसे अत्यन्त सावधान सारथि उत्तम घोड़ों को रथ में जोतकर और पूर्णतः एकाग्र रहकर धनुर्धर योद्धा को शीघ्र अभीष्ट देश में पहुँचा देता है, वैसे ही धारणाओं में एकाग्रचित्त योगी लक्ष्य की ओर छोड़े हुए बाण की भाँति शीघ्र परम पद को प्राप्त हो जाता है।

Verse 37

तथैव नृपते योगी धारणासु समाहित: । प्राप्नोत्याशु परं स्थान लक्ष॑ मुक्त इवाशुग:

भीष्म बोले—हे राजन्! इसी प्रकार धारणाओं में समाहित योगी शीघ्र ही परम स्थान को प्राप्त होता है—जैसे लक्ष्य की ओर छोड़ा हुआ तीव्र बाण।

Verse 38

प्रवेश्यात्मनि चात्मानं योगी तिष्तति योडचल: । पापं हन्ति पुनीतानां पदमाप्रोति सोडजरम्‌

भीष्म बोले—जो योगी समाधि द्वारा आत्मा को परमात्मा में प्रविष्ट कराकर अचल हो जाता है, वह अपने पापों का नाश कर देता है और शुद्ध पुरुषों द्वारा प्राप्त होने वाले उस अजर-अमर पद को पा लेता है।

Verse 39

नाभ्यां कण्ठे च शीर्ष च हृदि वक्षसि पार्श्चयो: । दर्शने श्रवणे चापि घ्राणे चामितविक्रम

भीष्म बोले—अमित पराक्रमी नरेश! जो योगी योग के महान् व्रत में एकाग्रचित्त रहकर धारणाभ्यास से नाभि, कण्ठ, मस्तक, हृदय, वक्षःस्थल, पार्श्वभाग तथा नेत्र, कान और नासिका आदि इन्द्रियों में सूक्ष्म आत्मा को परमात्मा के साथ भली-भाँति संयुक्त करता है, वह यदि चाहे तो अपने पर्वताकार शुभ-अशुभ कर्मराशि को शीघ्र भस्म कर, उत्तम योग का आश्रय लेकर मुक्त हो जाता है।

Verse 40

स्थानेष्वेतेषु यो योगी महाव्रतसमाहित: । आत्मना सूक्ष्ममात्मानं युद्धक्ते सम्यग्विशाम्पते

भीष्म बोले—हे प्रजापते! महाव्रत में समाहित वह योगी इन सब स्थानों में धारणाभ्यास द्वारा सूक्ष्म आत्मा को परमात्मा में भली-भाँति संयुक्त करता है। वह यदि चाहे तो पर्वत के समान विशाल शुभ-अशुभ कर्मराशि को शीघ्र भस्म कर, उत्तम योग का आश्रय लेकर मुक्त हो जाता है।

Verse 41

स शीघ्रमचलप्रख्यं कर्म दग्ध्वा शुभाशुभम्‌ । उत्तमं योगमास्थाय यदीच्छति विमुच्यते

वह शीघ्र ही पर्वत के समान अचल शुभ-अशुभ कर्मों को भस्म कर देता है; और उत्तम योग का आश्रय लेकर, यदि चाहे, तो मुक्त हो जाता है।

Verse 42

युधिछिर उवाच आहारान्‌ कीदृशान्‌ कृत्वा कानि जित्वा च भारत । योगी बलमवाप्रोति तद्‌ भवान्‌ वक्तुमहसि

युधिष्ठिर बोले—हे भारत! योगी किस प्रकार का आहार अपनाकर और किन-किन (अन्तरायों/विकारों) को जीतकर योगबल प्राप्त करता है? कृपा करके यह मुझे बताइए।

Verse 43

भीष्म उवाच कणानां भक्षणे युक्त: पिण्याकस्य च भारत | स्नेहानां वर्जने युक्तो योगी बलमवाप्लुयात्‌

भीष्म बोले—हे भारत! जो योगी धान की खुद्दी और तिल की खली जैसे सादे अन्न का सेवन करता है तथा घी-तेल आदि स्निग्ध पदार्थों का त्याग करता है, वही योगबल प्राप्त करता है।

Verse 44

भुज्जानो यावकं रूक्ष॑ दीर्घकालमरिंदम । एकाहारो विशुद्धात्मा योगी बलमवाप्नुयात्‌,शत्रुदमन नरेश! जो दीर्घकालतक एक समय जौका रूखा दलिया खाता है, वह योगी शुद्धचित होकर योगबलकी प्राप्ति कर सकता है

भीष्म ने कहा—हे शत्रुदमन नरेश! जो मनुष्य दीर्घकाल तक रूखे जौ के दलिये का दिन में एक ही बार आहार करता है और अंतःकरण से शुद्ध व संयमी रहता है, वह योगी योगाभ्यास से उत्पन्न बल को प्राप्त कर सकता है।

Verse 45

पक्षान्‌ मासानृतूंश्चैतान्‌ संवत्सरानहस्तथा । अप: पीत्वा पयोमिश्रा योगी बलमवाप्नुयात्‌

भीष्म ने कहा—पक्ष, मास, ऋतु और वर्ष—इन क्रमशः बढ़ते अंतरालों के अनुसार नियत समय पर दूध-मिश्रित जल का पान करके योगी धीरे-धीरे बल को प्राप्त करता है।

Verse 46

अखण्डमपि वा मांसं सततं मनुजेश्वर । उपोष्य सम्यक्‌ शुद्धात्मा योगी बलमवाप्रुयात्‌

भीष्म ने कहा—हे मनुजेश्वर! जो निरंतर मांस का त्याग करता है और विधिपूर्वक उपवास तथा व्रतों का आचरण करके अंतःकरण को शुद्ध कर लेता है, वह योगी भी योगबल को प्राप्त कर सकता है।

Verse 47

काम जित्वा तथा क्रोधं शीतोष्णे वर्षमेव च । भयं शोकं तथा श्वासं पौरुषान्‌ विषयांस्तथा

भीष्म ने कहा—काम और क्रोध को जीतकर, शीत-उष्ण तथा वर्षा को सहकर, भय और शोक को वश में करके, श्वास को नियमित करके, तथा पौरुष के आवेगों और विषयों के आकर्षण को भी संयमित करना चाहिए।

Verse 48

अरतिं दुर्जयां चैव घोरां तृष्णां च पार्थिव । स्पर्श निद्रां तथा तन्द्रीं दुर्जयां नृपसत्तम

भीष्म ने कहा—हे पार्थिव, हे नृपसत्तम! अरति (अस्थिरता), घोर तृष्णा, स्पर्श का लोभ, निद्रा और तन्द्रा—ये सब अत्यन्त दुर्जय हैं।

Verse 49

दीपयन्ति महात्मान: सूक्ष्ममात्मानमात्मना | वीतरागा महाप्राज्ञा ध्यानाध्यपनसम्पदा

भीष्म बोले—महात्मा जन अपने ही अन्तरात्मबल से भीतर स्थित सूक्ष्म आत्मा को प्रकाशित करते हैं। वे वीतराग, महाप्राज्ञ होते हैं और ध्यान तथा स्वाध्याय-सम्पदा से उस स्पष्ट बोध को प्राप्त करते हैं।

Verse 50

पृथ्वीनाथ! नृपश्रेष्ठ) काम

भीष्म बोले—हे पृथ्वीनाथ, नृपश्रेष्ठ! जो काम और क्रोध को, शीत और उष्ण को, वर्षा को, भय और शोक को, चंचल श्वास को, मनुष्यों को प्रिय लगने वाले विषयों को, दुर्जय असंतोष को, घोर तृष्णा को, स्पर्श-लोलुपता को, निद्रा को तथा दुर्जय आलस्य को जीत लेता है, वह वीतराग हो जाता है। ऐसा महात्मा योगी, उत्तम और सूक्ष्म बुद्धि से युक्त होकर, स्वाध्याय और ध्यान का सम्पादन करता है और विवेकबुद्धि के द्वारा सूक्ष्म आत्मा का साक्षात्कार कर लेता है। परन्तु, हे भरतश्रेष्ठ! विद्वान ब्राह्मणों ने योग के इस मार्ग को दुर्गम दुर्ग के समान माना है; कोई विरला ही इसे कुशलपूर्वक पार कर पाता है।

Verse 51

यथा कश्रिद्‌ वन॑ घोरं बहुसर्पसरीसूपम्‌ । श्वभ्रवत्‌ तोयहीनं च दुर्गमें बहुकण्टकम्‌

भीष्म बोले—जैसे कोई विरला ही मनुष्य ऐसे घोर वन को सकुशल पार कर पाता है जो अनेक सर्पों और रेंगने वाले जीवों से भरा हो, जलहीन खाई के समान हो, दुर्गम हो और काँटों से आच्छादित हो; जहाँ आहार दुर्लभ हो, भय बहुत हो, वृक्ष दावानल से जले हों और मार्ग चोर-डाकुओं से भरा हो—उसी प्रकार योगपथ का आश्रय लेकर कोई विरला ही द्विज उस पर कुशलपूर्वक चल पाता है, क्योंकि वह मार्ग अनेक दोषों और कठिनाइयों से युक्त कहा गया है।

Verse 52

अभक्तमटवीप्रायं दावदग्धमहीरुहम्‌ । पन्थानं तस्कराकीर्ण क्षेमेणाभिपतेद्‌ युवा

भीष्म बोले—जैसे कोई विरला नवयुवक ही ऐसे पथ पर सकुशल चल सकता है जो निर्जन अटवी के समान हो, जिसके वृक्ष दावानल से दग्ध हो चुके हों और जो चोरों से आकीर्ण हो; जहाँ भोजन अप्राप्य हो और यात्रा कठोर व भयावह हो—उसी प्रकार योगमार्ग का आश्रय लेकर कोई विरला द्विज ही कुशलपूर्वक आगे बढ़ पाता है।

Verse 53

योगमार्ग तथा55साद्य यः वक्रिद्‌ व्रजते द्विज: । क्षेमेणोपरमेन्मार्गाद्‌ बहुदोषो हि स स्मृतः

भीष्म बोले—योगमार्ग का आश्रय लेकर कोई विरला द्विज ही उस पर चल पाता है; और चलकर भी वह उससे सकुशल विरत हो सके—ऐसा भी होता है। क्योंकि यह मार्ग अनेक दोषों, अर्थात् अनेक कठिनाइयों और संकटों से युक्त स्मरण किया गया है।

Verse 54

सुस्थेयं क्षुधधारासु निशितासु महीपते । धारणासु तु योगस्य दुःस्थेयमकृतात्मभि:

भीष्म बोले—हे महीपते! छुरे की तीखी धार पर भी कोई सहज खड़ा रह सकता है; पर जिनका अन्तःकरण अशुद्ध और असंयत है, उनके लिए योग की धारणाओं में स्थिर रहना अत्यन्त कठिन है।

Verse 55

विपन्ना धारणास्तात नयन्ति न शुभां गतिम्‌ । नेतृहीना यथा नाव: पुरुषानर्णवे नूप

भीष्म बोले—हे तात, नरेश्वर! जो धारणाएँ विफल या अपूर्ण रह जाती हैं, वे शुभगति तक नहीं पहुँचातीं। जैसे नाविक के बिना नाव समुद्र में मनुष्यों को पार नहीं लगा सकती, वैसे ही सिद्ध न हुई धारणाएँ कल्याण-पथ नहीं दिला सकतीं।

Verse 56

यस्तु तिक्ठतति कौन्तेय धारणासु यथाविधि । मरणं जन्म दु:खं च सुखं च स विमुज्चति,कुन्तीनन्दन! जो विधिपूर्वक योगकी धारणाओंमें स्थिर रहता है, वह जन्म, मृत्यु, दुःख और सुखके बन्धनोंसे छुटकारा पा जाता है

भीष्म बोले—हे कुन्तीनन्दन! जो विधिपूर्वक योग की धारणाओं में स्थिर रहता है, वह जन्म-मृत्यु तथा दुःख-सुख—इन सब बन्धनों से मुक्त हो जाता है।

Verse 57

नानाशास्त्रेषु निष्पन्नं योगेष्विदमुदाह्तम्‌ । परं योगस्य यत्‌ कृत्यं निश्चितं तद्‌ द्विजातिषु

भीष्म बोले—योग-विषयक नाना शास्त्रों में जो सिद्धान्त स्थापित है, वही मैंने यहाँ कहा है। योग-साधना के जो परम कर्तव्य निश्चित किए गए हैं, वे द्विजातियों के लिए ही विहित माने गए हैं।

Verse 58

परं हि तद्‌ ब्रह्म महन्महात्मन्‌ ब्रह्माणमीशं वरदं च विष्णुम्‌ भवं च धर्म च षडाननं च यद्‌ ब्रह्मपुत्रांश्व महानुभावान्‌

भीष्म बोले—हे महात्मन्! वह परब्रह्म ही परम है। योगसिद्ध महात्मा यदि चाहे तो तत्क्षण मुक्त होकर उसी परब्रह्म-स्वरूप को प्राप्त कर लेता है; अथवा अपने योगबल से ईश्वर ब्रह्मा, वरदायक विष्णु, भव (शिव), धर्म और षडानन (कार्त्तिकेय) तथा ब्रह्मा के महानुभाव पुत्रों (सनकादि) के लोकों तक पहुँचकर उनके सान्निध्य में प्रवेश कर सकता है।

Verse 59

तमश्न कष्ट सुमहद्‌ रजश्न सत्त्वं विशुद्ध प्रकृति परां च । सिद्धि च देवीं वरुणस्य पत्नीं तेजश्न कृत्स्नं सुमहच्च धैर्यम्‌

भीष्म बोले—योगी कष्टदायक तमोगुण, महान् रजोगुण और विशुद्ध सत्त्वगुण में प्रवेश कर सकता है; वह परम प्रकृति में भी प्रवेश कर सकता है; वरुण की पत्नी सिद्धिदेवी में, तथा सम्पूर्ण तेज और महान् धैर्य में भी प्रवेश कर सकता है। इस प्रकार योगसिद्ध महात्मा पुरुष यदि चाहे तो उसी क्षण मुक्त होकर परब्रह्म के स्वरूप को प्राप्त कर लेता है; अथवा योगबल से इन तत्त्वों और दिव्य पदों तक पहुँचकर उनमें प्रवेश कर सकता है।

Verse 60

ताराधिपं खे विमल॑ सतारं विश्वांश्व देवानुरगान्‌ पितृश्च । शैलांश्व क॒त्स्नानुदधींश्व घोरान्‌ नदीश्व॒ सर्वा: सवनान्‌ घनांश्व

भीष्म बोले—वह ताराओं से युक्त आकाश में प्रकाशित होनेवाले निर्मल तारापति चन्द्रमा में, विश्वेदेवों में, नागों में और पितरों में; समस्त पर्वतों में, भयंकर समुद्रों में, सब नदियों में, वनों में और मेघों में भी पहुँचकर उनमें प्रवेश कर सकता है। योगसिद्ध महात्मा पुरुष यदि चाहे तो उसी क्षण मुक्त होकर परब्रह्म को प्राप्त कर लेता है; अथवा योगबल से इन लोकों और प्राणियों तक जाकर उनमें प्रवेश कर सकता है।

Verse 61

नागान्‌ नगान्‌ यक्षगणान्‌ दिशश्व गन्धर्वसंघान्‌ पुरुषान्‌ स्त्रियश्न । परस्पर प्राप्प महान्महात्मा विशेत योगी न चिराद्‌ विमुक्त:

भीष्म बोले—योगी नागों में, पर्वतों में, यक्षगणों में, दिशाओं में, गन्धर्वों के समुदायों में, तथा पुरुषों और स्त्रियों में भी—एक से दूसरे के पास पहुँचकर—प्रवेश कर सकता है। ऐसा महान् महात्मा योगी शीघ्र ही मुक्त भी हो जाता है। यह प्रसंग योगसिद्धि की व्यापक सामर्थ्य बताता है, पर संकेत करता है कि वास्तविक सिद्धि मोक्ष ही है, न कि सामर्थ्य का प्रदर्शन।

Verse 62

कथा च येयं नृपते प्रसक्ता देवे महावीर्यमतौ शुभेयम्‌ । योगी स सर्वानिभिभूय मर्त्यान्‌ नारायणात्मा कुरुते महात्मा

भीष्म बोले—हे नृप! प्रसंगवश मैंने तुम्हें महावीर्य और महाबुद्धि वाले परम देव से सम्बन्ध रखनेवाली यह कल्याणमयी कथा सुनायी है। योगसिद्ध महात्मा पुरुष सब मर्त्यों से ऊपर उठकर नारायणस्वरूप हो जाता है और संकल्पमात्र से सृष्टि करने की सामर्थ्य प्राप्त कर लेता है।

Verse 300

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि योगविधौ त्रिशततमो5ध्याय: ।। ३०० || इस प्रकार श्रीमह्या भारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें योगविधिविषयक तीन सौवाँ अध्याय पूरा हुआ

इस प्रकार श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्व में योगविधि-विषयक तीन सौवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

Frequently Asked Questions

It frames impermanence and cyclical dissolution as a contemplative premise: understanding the withdrawal of the world and the hierarchy of faculties is presented as support for disidentification from transient forms and for liberation-oriented discernment.

The chapter teaches an ordered dependence: gross forms resolve into subtler principles, culminating in a comprehensive, all-pervasive reality; this hierarchy functions as a map for analyzing experience from material phenomena to mind, ego, and beyond.

No explicit phalaśruti is stated in the provided verses; instead, the text signals a curricular transition—having explained saṃhāra, it proceeds to adhyātma, adhibhūta, and adhidaiva—implying pedagogical value through systematic comprehension rather than promised merit.