Saṃhāra-krama (The Sequence of Cosmic Dissolution) — Yājñavalkya’s Discourse
प्राप्तुयाद् विषयांश्वैव पुनश्चोग्रं तपश्चरेत् । संक्षिपेच्च पुनस्तात सूर्यस्तेजोगुणानिव
तात! वह उन शरीरों के द्वारा विषयों का सेवन भी करता है और उग्र तपस्या भी करता है। फिर, जैसे सूर्य अपनी तेजोमयी किरणों को समेट लेता है, वैसे ही वह उन सब रूपों को पुनः अपने में संक्षिप्त कर लेता है।
भीष्म उवाच