
उशनसः (शुक्रस्य) चरितम् — The Account of Uśanā (Śukra): Yoga, Grievance, and Pacification
Upa-parva: Mokṣa-dharma (Liberation-Oriented Instruction) — Uśanā-Śiva Episode
Yudhiṣṭhira asks Bhīṣma to explain (i) why the devarṣi Uśanā (also called Kāvya/Śukra) is portrayed as favoring the Asuras and opposing the Devas, (ii) how he attained the status associated with Śukra, (iii) how he achieved prosperity, and (iv) why he is said not to traverse the mid-region of the sky. Bhīṣma narrates that Uśanā, a Bhṛgu-lineage sage described as firm in vows and compassionate by disposition, employs yogic means to restrain Kubera (Dhanada) and take his wealth. Distressed, Kubera approaches Śiva (Rudra) to report the act. Śiva, angered, takes up a weapon and seeks Uśanā; Uśanā anticipates the intent and, through yogic accomplishment, appears at the weapon’s point and then enters Śiva’s body, moving within. Yudhiṣṭhira asks why Uśanā moved within the deity’s abdomen; Bhīṣma adds background on Śiva’s prolonged austerity and the augmentation of his power and wealth through tapas. Śiva enters meditative absorption; Uśanā, unable to find an exit and scorched by divine energy, repeatedly requests favor. Śiva instructs him to exit through a constrained passage; upon exiting, Uśanā attains the designation linked to Śukra and is said not to pass through the mid-heavens due to that causal circumstance. Seeing Uśanā emerge radiant, Śiva remains poised to strike, but Umā restrains him, declaring Uśanā as having attained a son-like status by emergence from the deity and asserting a protective principle. Śiva relents, grants permission to depart as wished, and Uśanā, after salutation to Śiva and Umā, attains his desired course. Bhīṣma concludes that this is the requested account of the great Bhārgava’s conduct.
Chapter Arc: युधिष्ठिर के मन में युद्धोत्तर शोक और संसार-भार की तीव्र अनुभूति उठती है—देवताओं तक को मनुष्य-योनि में जन्म लेकर जो दुःख मिलता है, वह कैसे सह्य है? वे पूछते हैं: ‘कदा वयं करिष्यामः संन्यासं दुःखसंज्ञकम्’—कब हम इस दुःख-नामक बंधन से संन्यास लेंगे? → राज्य, देह-धारण, इन्द्रिय-प्राण-मन-बुद्धि की चंचलता और पुनर्भव का भय—इन सबके बीच युधिष्ठिर का प्रश्न तीखा होता जाता है: मुनि क्यों पुनर्जन्म को नहीं जाते, और हम कब राज्य त्यागकर उस मार्ग पर चलेंगे? इसी क्रम में उपमा आती है—जैसे वायु अंजन/मैनसिल के रज में प्रवेश कर उसी रंग का दीखने लगता है, वैसे ही चेतना गुणों-संस्कारों में रंग जाती है। → भीष्म ‘प्राचीन इतिहास’ का द्वार खोलते हैं—निर्जित, असहाय, हृत-राज्य होकर भी शत्रुओं के बीच अविचल बुद्धि धारण करने वाले एक आदर्श का प्रसंग (वृत्र-गीताओं का संकेत) और फिर निर्णायक जिज्ञासा: ‘ऐश्वर्य (अणिमा आदि) और महद् ब्रह्म किस वर्ण/आधार में प्रतिष्ठित हैं? वे लौटते कैसे हैं? और किस कर्म या किस ज्ञान से वह परम फल प्राप्त होता है?’ → मुनि/वक्ता (भीष्म द्वारा उद्धृत) युधिष्ठिर को एकाग्र होकर सुनने को कहते हैं और संकेत देते हैं कि उत्तर कर्म-ज्ञान के बाह्य भेद से परे, अंतःकरण की शुद्धि, वैराग्य और तत्त्व-विवेक की दिशा में है—जहाँ देह-धारण को ‘दुःख’ जानकर भी कर्तव्य-क्षेत्र में बुद्धि स्थिर रखी जाती है और अंततः संन्यास/मोक्ष का उपाय स्पष्ट होता है। → मुनि उत्तर आरम्भ करते हैं—‘मयोच्यमानं… शृणु’—पर ऐश्वर्य-ब्रह्म के आधार, निवृत्ति और साधन का पूर्ण विवेचन अगले प्रवाह में खुलने को छोड़ दिया जाता है।
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुछ २३ श्लोक हैं) ऑपन-माज बछ। अकाल एकोनाशीरवत्याधिकद्विशततमो< ध्याय: ब्रहद्मकी प्राप्तिका उपाय तथा उस विषयमें वृत्र-शुक्र- संवादक आरम्भ युधिछिर उवाच धन्या धन्या इति जना: सर्वेडस्मान् प्रवदन्त्युत । न दुःखिततर: ककश्ित् पुमानस्माभिरस्ति ह
युधिष्ठिर बोले— सब लोग हमें ‘धन्य-धन्य’ कहते रहते हैं; पर सच तो यह है कि हमसे बढ़कर दुःखी कोई मनुष्य नहीं है।
Verse 2
लोकसम्भावितैर्दु:खं यत् प्राप्तं कुरुसत्तम । प्राप्प जाति मनुष्येषु देवेरपि पितामह
कुरुश्रेष्ठ पितामह! देवताओं के समान मान पाकर, मनुष्य-लोक में जन्म लेकर और लोक-समादर से विभूषित होकर भी हमें यहाँ महान् दुःख प्राप्त हुआ है।
Verse 3
कदा वयं करिष्याम: संन्यासं दुःखसंज्ञकम् | दुःखमेतच्छरीराणां धारणं कुरुसत्तम
युधिष्ठिर बोले— कुरुश्रेष्ठ! जिसे ‘दुःख’ कहा जाता है, उस संन्यास का आश्रय हम कब लेंगे? क्योंकि इन शरीरों का धारण करना ही मुझे दुःख प्रतीत होता है।
Verse 4
विमुक्ता: सप्तदशभिहेंतुभूतैश्व॒ पठचभि: । इन्द्रियार्थर्गुणैश्वैव अष्टाभिश्व पितामह
युधिष्ठिर बोले— पितामह! जो मुनि सत्रह तत्त्वों से, संसार के पाँच हेतुओं से, इन्द्रियों के विषयों और तीन गुणों से, तथा आठ के उस समुदाय से भी मुक्त हो जाते हैं—वे पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होते।
Verse 5
न गच्छन्ति पुनर्भावं मुनयः संशितव्रता: । कदा वयं गमिष्यामो राज्यं हित्वा परंतप
युधिष्ठिर बोले— तीक्ष्ण व्रतधारी मुनि पुनर्भव को नहीं जाते। परंतप पितामह! हम कब राज्य छोड़कर उस अवस्था को प्राप्त करेंगे?
Verse 6
भीष्म उवाच नास्त्यनन्तं महाराज सर्व संख्यानगोचर: । पुनर्भावोडपि विख्यातो नास्ति किंचिदिहाचलम्
भीष्म ने कहा—महाराज! यहाँ कुछ भी वास्तव में अनन्त नहीं है। जगत् की समस्त वस्तुएँ संख्या और परिमाण की सीमा में आती हैं; कोई भी असीम नहीं। पुनर्जन्म भी नश्वरता से ही संबद्ध माना गया है। सार यह कि इस संसार में कुछ भी अचल—कुछ भी स्थायी—नहीं है।
Verse 7
न चापि मन्यसे राजन्नेष दोष: प्रसड्भत: । उद्योगादेव धर्मज्ञा: कालेनैव गमिष्यथ
भीष्म ने कहा—राजन्! तुम यह न मानो कि ऐश्वर्य अपने स्वभाव से ही दोष है, केवल इसलिए कि वह आसक्ति का अवसर बन सकता है। यह मत ठीक नहीं। तुम धर्म के ज्ञाता हो; अपने पुरुषार्थ से और समय आने पर तुम परम कल्याण—मोक्ष—की ओर अग्रसर हो सकोगे।
Verse 8
नेशेडयं सततं देही नृपते पुण्यपापयो: । तत एव समुत्थेन तमसा रुध्यतेडपि च
भीष्म ने कहा—नरेश्वर! यह देहधारी आत्मा सदा पुण्य-पाप (और उनके फलों) की स्वामी होकर स्वतंत्र नहीं रहती। उन्हीं कर्मों से उत्पन्न संस्काररूप अन्धकार से वह ढँक जाती है और उसी आवरण में सुख-दुःख भोगती है।
Verse 9
यथाजञ्जनमयो वायु: पुनर्मान:शिलं रज: । अनुप्रविश्य तद्वर्णो दृश्यते रज्जयन् दिश:
भिष्म ने कहा—जैसे अञ्जन-सा अन्धकार लिये वायु, मैनसिल के लाल-पीले रज में प्रवेश करके उसी रंग से युक्त दिखाई देती है और चलते-चलते दिशाओं को रँगती प्रतीत होती है; वैसे ही स्वभावतः वर्णरहित आत्मा, तमोगुणी अज्ञान से आवृत और कर्मफलों से रंजित होकर उन-उन “वर्णों” को धारण करती हुई, विविध देहधर्मों को स्वीकार कर प्राणियों के शरीरों में भटकती रहती है।
Verse 10
तथा कर्मफलैदेंही र|ज्जितस्तमसा55वृत: । विवर्णों वर्णमश्रित्य देहेषु परिवर्तते
भीष्म ने कहा—इसी प्रकार देहधारी आत्मा कर्मफलों से रंजित और तमस (अज्ञान) से आवृत होकर, स्वयं वर्णरहित होते हुए भी किसी एक अवस्था का आश्रय लेकर “वर्ण” धारण करती है और देहों में बार-बार परिवर्तित होती रहती है।
Verse 11
ज्ञानेन हि यदा जन्तुरज्ञानप्रभवं तम: । व्यपोहति तदा ब्रह्म प्रकाशति सनातनम्,जब जीव तत्त्वज्ञानद्वारा अज्ञानजनित अन्धकारको दूर कर देता है, तब उसके हृदयमें सनातन ब्रह्म प्रकाशित हो जाता है
जब जीव तत्त्वज्ञान के द्वारा अज्ञानजनित अन्धकार को दूर कर देता है, तब उसके हृदय में सनातन ब्रह्म प्रकाशित हो जाता है।
Verse 12
अयत्नसाध्यं मुनयो वदन्ति ये चापि मुक्तास्त उपासितव्या: । त्वया च लोकेन च सामरेण तस्मान्नमस्यामि महर्षिसड्घान्
ऋषि-मुनि कहते हैं कि ब्रह्म की प्राप्ति किसी बाह्य क्रियात्मक यत्न से साध्य नहीं है। इसलिए तुम—और देवताओं सहित समस्त लोक—उन जीवन्मुक्त पुरुषों की उपासना करो; इसी कारण मैं महर्षियों के समुदाय को नमस्कार करता हूँ।
Verse 13
अस्मिन्नर्थे पुरा गीतं शृणुष्वैकमना नृप । यथा दैत्येन वृत्रेण भ्रष्टैश्व्॒येण चेष्टितम्
नरेश! इस विषय में एक प्राचीन आख्यान गाया गया है—उसे एकाग्रचित्त होकर सुनो। उसमें बताया गया है कि ऐश्वर्य से भ्रष्ट होकर दैत्य वृत्र ने किस प्रकार आचरण किया।
Verse 14
निर्जितेनासहायेन हृतराज्येन भारत । अशोचता शत्रुमध्ये बुद्धिमास्थाय केवलाम्
भरतवंशज! पराजित, निराश्रय और राज्य से वंचित होकर भी वह शोक नहीं करता था; शत्रुओं के बीच रहकर भी उसने केवल शुद्ध, अनासक्त बुद्धि का आश्रय लिया।
Verse 15
भ्रष्टैश्वर्य पुरा वृत्रमुशना वाक्यमब्रवीत् | काचित् पराजितस्याद्य न व्यथा ते5स्ति दानव
पूर्वकाल में, ऐश्वर्य से भ्रष्ट हुए वृत्र से उशना (शुक्राचार्य) ने कहा—“दानव! पराजित होकर भी आज तुम्हें किसी प्रकार की व्यथा नहीं दिखती; इसका क्या कारण है?”
Verse 16
वृत्र बवाच सत्येन तपसा चैव विदित्वासंशयं हाहम् । न शोचामि न हृष्यामि भूतानामागतिं गतिम्
वृत्रासुर ने कहा— हे ब्राह्मण! सत्य और तप के प्रभाव से मैंने जीवों के आने-जाने का गूढ़ नियम निःसंदेह जान लिया है; इसलिए उनकी गति और नियति के विषय में मैं न शोक करता हूँ, न हर्ष।
Verse 17
कालसंचोदिता जीवा मज्जन्ति नरकेडवशा: । परितुष्टानि सर्वाणि दिव्यान्याहुर्मनीषिण:
काल से प्रेरित जीव अपने पापकर्मों के फलस्वरूप विवश होकर नरक में डूबते हैं; और पुण्य के फल से वे सब स्वर्गलोक में जाकर दिव्य सुख भोगते हैं— ऐसा मनीषियों का कथन है।
Verse 18
क्षपयित्वा तु तं कालं गणितं कालचोदिता: । सावशेषेण कालेन सम्भवन्ति पुन: पुन:
निश्चित और गणित समय को भोगकर चुकाने के बाद, काल की प्रेरणा से— और शेष कर्म सहित— वे जीव बार-बार फिर जन्म लेते हैं।
Verse 19
तिर्यग्योनिसहस्राणि गत्वा नरकमेव च । निर्गच्छन्त्यवशा जीवा: कामबन्धनबन्धना:,कामनाओंके बन्धनमें बँधकर विवश हुए कितने ही जीव सहस्रों बार तिर्यक्योनि तथा नरकमें पड़कर पुनः वहाँसे निकलते हैं
कामनाओं के बन्धन में बँधे विवश जीव सहस्रों बार तिर्यक्-योनियों में और नरक में जाकर, फिर वहाँ से निकलते रहते हैं।
Verse 20
एवं संसरमाणानि जीवान्यहमदृष्टवान् । यथा कर्म तथा लाभ इति शास्त्रनिदर्शनम्
इस प्रकार संसार में भटकते हुए जीवों को मैंने स्वयं देखा है। शास्त्र का निदर्शन यही है— जैसा कर्म, वैसा ही फल।
Verse 21
इस प्रकार मैंने सभी जीवोंको जन्म-मरणके चक््करमें पड़ा हुआ देखा है। शास्त्रका भी ऐसा सिद्धान्त है कि जैसा कर्म होता है, वैसा ही फल मिलता है ।।
भीष्म बोले—इस प्रकार मैंने सब प्राणियों को जन्म-मरण के चक्र में फँसा हुआ देखा है। शास्त्रों का भी यही सिद्धान्त है कि जैसा कर्म होता है वैसा ही फल मिलता है। प्राणी पहले ही सुख-दुःख तथा प्रिय-अप्रिय विषयों में विचरण करके, अपने कर्मों के अनुसार नरक, तिर्यग्योनि, मनुष्ययोनि अथवा देवयोनि को प्राप्त होते हैं।
Verse 22
कृतान्तविधिसंयुक्त: सर्वो लोक: प्रपद्यते । गतं गच्छन्ति चाध्वानं सर्वभूतानि सर्वदा,समस्त जीव जगत्-विधाताके विधानसे ही परिचालित हो सुख-दुःख पाता है और समस्त प्राणी सदा चले हुए मार्गपर ही चलते हैं
भीष्म बोले—समस्त लोक कृतान्त (काल-नियति) के विधान से ही संचालित होकर उसी के अधीन होता है। सब प्राणी सदा उसी पहले से निर्धारित मार्ग पर चलते हैं और जगत्-विधान के अनुसार सुख-दुःख का अनुभव करते हैं।
Verse 23
कालसंख्यानसंख्यातं सृष्टिस्थितिपरायणम् । त॑ भाषमाणं भगवानुशना प्रत्यभाषत । धीमान् दुष्टप्रलापांस्त्वं तात कस्मात् प्रभाषसे
भीष्म बोले—जो काल और संख्या के माप से प्रसिद्ध हैं तथा सृष्टि और पालन के परम आश्रय हैं, उस परमात्मा का प्रतिपादन करते हुए वृत्रासुर की बात सुनकर भगवान् उशना (शुक्राचार्य) ने उससे कहा—“तात! तुम तो बुद्धिमान हो; फिर ये दूषित, विपरीत और निरर्थक वचन क्यों बोल रहे हो?”
Verse 24
वृत्र बवाच प्रत्यक्षमेतद् भवतस्तथान्येषां मनीषिणाम् । मया यज्जयलुब्धेन पुरा तप्तं महत् तप:
वृत्र ने कहा—ब्रह्मन्! यह बात आपके तथा अन्य मनीषी महापुरुषों के लिए प्रत्यक्ष है कि मैंने पहले विजय के लोभ से प्रेरित होकर अत्यन्त कठोर तप किया था।
Verse 25
गन्धानादाय भूतानां रसांश्न विविधानपि । अवर्ध त्रीन् समाक्रम्य लोकान् वै स्वेन तेजसा
मैं बल में बहुत बढ़ गया था; इसलिए अपने ही तेज से तीनों लोकों पर चढ़ाई करके मैंने अन्य प्राणियों को रौंद डाला और उनके उपभोग की गन्ध, रस आदि विविध वस्तुएँ छीन ली थीं।
Verse 26
ज्वालामालापरिक्षिप्तो वैहायसचरस्तथा । अजेय: सर्वभूतानामासं नित्यमपेतभी:
मैं ज्वालामालाओं से आवृत होकर, आकाश में निर्भय विचरता था; और समस्त प्राणियों के लिए सदा अजेय हो गया था।
Verse 27
ऐश्वर्य तपसा प्राप्तं भ्रष्ट तच्च स्वकर्मभि: । धृतिमास्थाय भगवन् न शोचामि ततस्त्वहम्
भगवन्! तपस्या के प्रभाव से जो ऐश्वर्य मैंने पाया था, वह मेरे ही कर्मों से नष्ट हो गया; तथापि धैर्य धारण करके मैं उसके लिए शोक नहीं करता।
Verse 28
युयुत्सुना महेन्द्रेण पुंसा सार्थ महात्मना । ततो मे भगवान् दृष्टो हरिनारायण: प्रभु:
युद्ध की इच्छा से महात्मा देवराज इन्द्र जब मेरे सम्मुख आए, तब उनके साथ सहायक रूप में आए हुए सर्वेश्वर भगवान् हरि-नारायण के भी मैंने दर्शन किए।
Verse 29
वैकुण्ठ: पुरुषो5नन्त: शुक्लो विष्णु: सनातन: । मुञज्जकेशो हरिश्मश्रु: सर्वभूतपितामह:,वे भगवान् वैकुण्ठ, पुरुष, अनन्त, शुक्ल, विष्णु, सनातन, मुंजकेश, हरिश्मश्रु तथा सम्पूर्ण भूतोंके पितामह हैं
वे भगवान् वैकुण्ठ, परम पुरुष, अनन्त, शुक्ल, विष्णु, सनातन, मुंजकेश, हरिश्मश्रु तथा समस्त भूतों के पितामह हैं।
Verse 30
नूनं तु तस्य तपस: सावशेषमिहास्ति वै । यदहं प्रष्टमिच्छामि भगवन् कर्मण: फलम्,भगवन्! अवश्य ही मेरी उस तपस्याका कोई अंश अब भी शेष रह गया है, अतः मैं उस कर्मफलके विषयमें प्रश्न करना चाहता हूँ
भगवन्! निश्चय ही उस तपस्या का कुछ अंश अब भी मेरे भीतर शेष है; इसलिए मैं कर्म के फल—कर्मों के परिणाम—के विषय में पूछना चाहता हूँ।
Verse 31
ऐश्वर्य वै महद् ब्रह्म वर्णे कस्मिन् प्रतिष्तितम् । निवर्तते चापि पुन: कथमैश्चर्यमुत्तमम्,अणिमा आदि ऐश्वर्य और महद् ब्रह्म किस वर्णमें प्रतिष्ठित हैं? तथा वह उत्तम ऐश्वर्य कैसे नष्ट हो जाता है?
भीष्म बोले— महद् ऐश्वर्य, जो वास्तव में परम ब्रह्म है, किस वर्ण में प्रतिष्ठित है? और वह उत्तम प्रभुत्व फिर कैसे लौट आता है, तथा किस प्रकार नष्ट हो जाता है? मुझे बताइए— अणिमा आदि सिद्धियाँ और महद् ब्रह्म किस वर्ण पर आश्रित हैं, और वह अनुपम ऐश्वर्य कैसे क्षीण हो जाता है?
Verse 32
कस्माद् भूतानि जीवन्ति प्रवर्तन्ते तथा पुनः । किं वा फल परं प्राप्प जीवस्तिष्ठति शाश्वत:
भीष्म बोले— प्राणी किस आधार से जीवित रहते हैं? और किस कारण से वे फिर कर्म में प्रवृत्त होते हैं? तथा कौन-सा परम फल प्राप्त करके जीव अविनाशी और सनातन रूप से अपने स्वरूप में स्थिर हो जाता है?
Verse 33
केन वा कर्मणा शक््यमथ ज्ञानेन केन वा । तदवाप्तुं फलं विप्र तन्मे व्याख्यातुमहसि,विप्रवर! किस कर्म अथवा ज्ञानसे उस फलको प्राप्त किया जा सकता है? यह मुझे बतानेकी कृपा करें
विप्रवर! किस कर्म से अथवा किस ज्ञान से उस फल की प्राप्ति संभव है? कृपा करके मुझे उसका व्याख्यान कीजिए।
Verse 34
इतीदमुक्त: स मुनिस्तदानीं प्रत्याह यत् तच्छुणु राजसिंह । मयोच्यमान पुरुषर्षभ त्व- मनन्यचित्त: सह सोदरीयै:
भीष्म बोले— ऐसा कहे जाने पर उस मुनि ने उसी समय उत्तर दिया। राजसिंह! जो उसने कहा, उसे सुनो। पुरुषश्रेष्ठ! मैं जो कह रहा हूँ, उसे तुम अपने भाइयों के साथ एकाग्रचित्त होकर सुनो।
Verse 279
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि वृत्रगीतासु एकोनाशीत्यधिकद्धिशततमो<5 ध्याय:
इस प्रकार श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के मोक्षधर्मपर्व में वृत्रगीता-प्रसंग के अंतर्गत दो सौ उन्नासीवाँ अध्याय समाप्त हुआ।
The dilemma concerns how power should be answered by power: a grievance (Kubera’s loss) prompts punitive escalation (Śiva’s pursuit), while the narrative tests whether enforcement should be absolute or moderated by compassion and relational status (Umā’s protective argument).
The chapter’s didactic implication is that extraordinary capacities—whether yogic or sovereign—require governance by restraint, mediation, and grace; conflict resolution is portrayed as ethically superior when it prevents disproportionate harm and restores equilibrium.
No explicit phalaśruti is stated in the provided passage; the closure is archival and confirmatory—Bhīṣma states that he has narrated the Bhārgava’s account as requested—functioning as a textual seal rather than a merit-promising epilogue.