उशनसः (शुक्रस्य) चरितम् — The Account of Uśanā (Śukra): Yoga, Grievance, and Pacification
लोकसम्भावितैर्दु:खं यत् प्राप्तं कुरुसत्तम । प्राप्प जाति मनुष्येषु देवेरपि पितामह
कुरुश्रेष्ठ पितामह! देवताओं के समान मान पाकर, मनुष्य-लोक में जन्म लेकर और लोक-समादर से विभूषित होकर भी हमें यहाँ महान् दुःख प्राप्त हुआ है।
युधिछिर उवाच