
राजधर्मः—राष्ट्ररक्षणं, दण्डनीतिः, हयग्रीवोपाख्यानम् (Royal Duty: Protection, Penal Policy, and the Hayagrīva Exemplum)
Upa-parva: Rājadharmānuśāsana Upa-Parva (राजधर्मानुशासन उपपर्व)
Vaiśaṃpāyana reports Vyāsa’s renewed counsel to Yudhiṣṭhira (Ajātaśatru). The instruction begins by urging the king to grant his forest-dwelling brothers the fruition of their aspirations and to govern the earth with steadiness, so that hardship culminates in welfare. The discourse links royal life to a sequence of obligations: experiencing dharma, artha, and kāma in due measure, repaying debts to guests, ancestors, and deities, and then pursuing higher ends. It recommends major sacrifices (including aśvamedha) as public-ritual instruments of legitimacy and renown. The chapter then turns to administrative ethics: taking revenue and exercising restraint must be balanced; a ruler who waits for the proper place and time, guided by śāstra-informed intelligence, does not incur fault. Conversely, a king who collects fiscal shares but fails to protect the realm inherits a portion of the resulting wrongdoing. The text outlines traits of disciplined rule—fearlessness grounded in dharmaśāstra, impartiality, and rejection of kāma and krodha—while warning that negligence, arrogance, and lack of protection generate culpability when subjects decline or are harmed by predation. Finally, Bhīṣma signals an illustrative narrative of the former royal sage Hayagrīva/Vājigrīva: a model of enemy-restraint and human protection whose valor is poetically recast as a sacrificial rite (weapons and chariot mapped to yajña implements). Through this metaphor, effective protection and self-sacrificing service are presented as a pathway to enduring fame and elevated posthumous attainment.
Chapter Arc: युद्ध-विजय के बाद भी युधिष्ठिर का मन राज्य और भोगों से नहीं भरता; शोक उसे जकड़े रहता है और वह व्यास से शांति का उपाय पूछता है। → युधिष्ठिर वीर-विहीनों, पुत्रहीन स्त्रियों और विलाप करती प्रजा की पीड़ा सुनकर और तीव्र व्याकुल हो उठता है—उसे लगता है कि राजधर्म भी इस शोक को नहीं काट पा रहा। → उपदेश का तीखा शिखर: कालचक्र की अजेयता और लोक-व्यवहार की कठोर सच्चाई—‘मनुष्य मनुष्यों को मारते हैं, फिर उन्हें भी दूसरे मारते हैं; वास्तव में न कोई मारता है न मारा जाता’—और सुख-दुःख का परस्पर-परिणाम (दुःखांत में सुख, सुखांत में दुःख) युधिष्ठिर के शोक पर सीधा प्रहार करता है। → व्यास (सेनजित् के उपदेश-उदाहरण सहित) शोक-निवारण का मार्ग बताते हैं: हानि (धन, दारा, पुत्र, पिता) पर ‘अहो दुःखम्’ में डूबने के बजाय दुःख की ‘अपचिति’—क्षय—का अभ्यास; और राजधर्म का शुद्ध पालन—बुद्धिपूर्वक नीति से राज्य-रक्षा, यज्ञशीलता, चातुर्वर्ण्य की स्थापना—जिससे कीर्ति और परलोक-कल्याण प्राप्त होता है। → शोक-शमन का सिद्धांत तो स्पष्ट होता है, पर युधिष्ठिर के भीतर यह प्रश्न शेष रहता है कि इतने रक्तपात के बाद वह स्वयं इस वैराग्य-युक्त राजधर्म को कैसे धारण करे।
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ९ श्लोक मिलाकर कुल ४३ श्लोक हैं।) ऑपन-माज बक। अस्त पञ्चविशो< ध्याय: सेनजित्के उपदेशयुक्त उद्घारोंका उल्लेख करके व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाना वैशम्पायन उवाच द्वैषयायनवच: श्रुत्वा कुपिते च धनंजये । व्यासमामन्त्रय कौन्तेय: प्रत्युवाच युधिछ्िर:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! व्यासजीकी बात सुनकर और अर्जुनके कुपित हो जानेपर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने व्यासजीको आमन्त्रित करके उत्तर देना आरम्भ किया इस प्रकार श्रीमह्याभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें सेनजित्का उपाख्यानविषयक पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ २५ ॥। नल्लजा5 >> 7 जा षड्विशो<5ध्याय: युधिष्ठिरके द्वारा धनके त्यागकी ही महत्ताका प्रतिपादन वैशम्पायन उवाच अस्मिन्नेव प्रकरणे धनंजयमुदारधी: । अभिनीततरं वाक्यमित्युवाच युधिष्ठिर:
वैशम्पायन बोले—हे जनमेजय! द्वैपायन (व्यास) के वचन सुनकर और धनंजय (अर्जुन) के कुपित हो जाने पर, कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर ने व्यास को आमन्त्रित करके उत्तर देना आरम्भ किया।
Verse 2
युधिषछ्िर उवाच न पार्थिवमिदं राज्यं न भोगाश्च पृथग्विधा: । प्रीणयन्ति मनो मे5द्य शोको मां रुन्धयत्ययम्,युधिष्ठटिर बोले--मुने! यह भूतलका राज्य और ये भिन्न-भिन्न प्रकारके भोग आज मेरे मनको प्रसन्न नहीं कर रहे हैं। यह शोक मुझे चारों ओरसे घेरे हुए है
युधिष्ठिर बोले—हे मुने! न यह भूतल का राज्य, न नाना प्रकार के भोग—आज मेरे मन को प्रसन्न करते हैं। यह शोक मुझे चारों ओर से घेरे हुए है।
Verse 3
श्रुत्वा वीरविहीनानामपुत्राणां च योषिताम् । परिदेवयमानानां शान्तिं नोपलभे मुने
युधिष्ठिर बोले—हे मुने! जिन स्त्रियों के वीर (पति) नहीं रहे और जो पुत्रहीन हो गई हैं, उनके विलाप को सुनकर मेरे भीतर शान्ति नहीं रहती।
Verse 4
महर्षे! पति और पुत्रोंसे हीन हुई युवतियोंका करुण विलाप सुनकर मुझे शान्ति नहीं मिल रही है ।। इत्युक्त: प्रत्युवाचेदं व्यासो योगविदां वर: । युधिष्ठिरं महाप्राज्ञो धर्मज्ञो वेदपारग:,युधिष्ठिके ऐसा कहनेपर योगवेत्ताओंमें श्रेष्ठ और वेदोंके पारंगत दिद्वान् धर्मज्ञ महाज्ञानी व्यासने उनसे फिर इस प्रकार कहा
युधिष्ठिर बोले— “महर्षे! पति और पुत्रों से वंचित युवतियों का करुण विलाप सुनकर मेरे मन को शान्ति नहीं मिलती।” युधिष्ठिर के ऐसा कहने पर योगविदों में श्रेष्ठ, महाप्राज्ञ, धर्मज्ञ और वेदपारंगत व्यास ने उनसे फिर इस प्रकार कहा।
Verse 5
व्यास उवाच न कर्मणा लभ्यते चिन्तया वा नाप्यस्ति दाता पुरुषस्य कश्रित् | पर्याययोगाद् विहितं विधात्रा कालेन सर्व लभते मनुष्य:,व्यासजी बोले--राजन्! न तो कोई कर्म करनेसे नष्ट हुई वस्तु मिल सकती है, न चिन्तासे ही। कोई ऐसा दाता भी नहीं है, जो मनुष्यको उसकी विनष्ट वस्तु दे दे। बारी- बारीसे विधाताके विधानानुसार मनुष्य समयपर सब कुछ पा लेता है
व्यासजी बोले— “राजन्! जो वस्तु नष्ट हो गई है, वह न तो कर्म से ही लौटती है, न केवल चिन्ता से। कोई ऐसा दाता भी नहीं जो मनुष्य को उसकी विनष्ट वस्तु दे दे। विधाता के विधान के अनुसार क्रम से, समय आने पर मनुष्य सब कुछ प्राप्त करता है।”
Verse 6
न बुद्धिशास्त्राध्ययनेन शक्यं प्राप्तुं विशेष॑ मनुजैरकाले । मूर्खोडपि चाप्रोति कदाचिदर्थान् कालो हि कार्य प्रति निर्विशेष:,बुद्धि अथवा शास्त्राध्ययनसे भी मनुष्य असमयमें किसी विशेष वस्तुको नहीं पा सकता और समय आनेपर कभी-कभी मूर्ख भी अभीष्ट पदार्थोंको प्राप्त कर लेता है; अतः काल ही कार्यकी सिद्धिमें सामान्य कारण है
व्यासजी बोले— “बुद्धि या शास्त्राध्ययन से भी मनुष्य असमय किसी विशेष फल को नहीं पा सकता। पर समय आने पर कभी-कभी मूर्ख भी अभीष्ट वस्तु पा लेता है। इसलिए कार्य-सिद्धि में सामान्य कारण ‘काल’ ही है।”
Verse 7
नाभूतिकालेषु फलं ददन्ति शिल्पानि मन्त्राक्ष तथौषधानि । तान्येव कालेन समाहितानि सिद्धमन्ति वर्धन्ति च भूतिकाले,अवनतिके समय शिल्पकलाएँ, मन्त्र तथा औषध भी कोई फल नहीं देते हैं। वे ही जब उन्नतिके समय उपयोगमें लाये जाते हैं, तब कालकी प्रेरणासे सफल होते और वृद्धिमें सहायक बनते हैं
व्यासजी बोले— “अवनति और दुर्भाग्य के समय शिल्प, मन्त्राक्षर तथा औषधियाँ भी फल नहीं देतीं। वही साधन जब उन्नति के समय काल के अनुकूल समाहित होकर प्रयुक्त होते हैं, तब सफल होते और वृद्धि का कारण बनते हैं।”
Verse 8
कालेन शीघ्रा: प्रवहन्ति वाता: कालेन वृष्टिर्जलदानुपैति । कालेन पद्मोत्पलवज्जलं च कालेन पुष्यन्ति वनेषु वृक्षा:,समयसे ही तेज हवा चलती है, समयसे ही मेघ जल बरसाते हैं, समयसे ही पानीमें कमल तथा उत्पल उत्पन्न हो जाते हैं और समयसे ही वनमें वृक्ष पुष्ट होते हैं
व्यासजी बोले— “समय से ही तीव्र वायु बहती है, समय से ही जलधर मेघ आकर वर्षा करते हैं। समय से ही जल में कमल-उत्पल उत्पन्न होते हैं और समय से ही वन के वृक्ष पुष्ट होकर फलते-फूलते हैं।”
Verse 9
कालेन कृष्णाश्न सिताश्न रात्र्य: कालेन चन्द्र: परिपूर्णबिम्ब: । नाकालत: पुष्पफल द्रुमाणां नाकालवेगा: सरितो वहन्ति,समयसे ही अँधेरी और उजेली रातें होती हैं, समयसे ही चन्द्रमाका मण्डल परिपूर्ण होता है, असमयमें वृक्षोंमे फल और फूल भी नहीं लगते हैं और न असमयमें नदियाँ ही वेगसे बहती हैं
व्यास ने कहा—समय आने पर ही अँधेरी और उजली रातें होती हैं; समय आने पर ही चन्द्रमा पूर्ण मण्डल होता है। असमय में वृक्षों में फूल-फल नहीं लगते और न नदियाँ अपने उचित वेग से बहती हैं। इसलिए फल समय और अवसर से ही उत्पन्न होते हैं—मनुष्य को धैर्य और विवेक से, प्राकृतिक क्रम के विरुद्ध उतावली किए बिना कर्म करना चाहिए।
Verse 10
नाकालमत्ता: खगपन्नगाश्न मृगद्विपा: शैलमृगाश्न लोके । नाकालत: स्त्रीषु भवन्ति गर्भा नायान्त्यकाले शिशिरोष्णवर्षा:,लोकमें पक्षी, सर्प, जंगली मृग, हाथी और पहाड़ी मृग भी समय आये बिना मतवाले नहीं होते हैं। असमयमें स्त्रियोंके गर्भ नहीं रहते और बिना समयके सर्दी, गर्मी तथा वर्षा भी नहीं होती है
व्यास ने कहा—इस लोक में पक्षी, सर्प, वन्य मृग, हाथी और पर्वतीय मृग भी अपने समय के बिना उन्मत्त नहीं होते। असमय में स्त्रियों के गर्भ नहीं ठहरते और बिना समय के शीत, ग्रीष्म तथा वर्षा भी नहीं आती। इसलिए समय का विधान सब प्राणियों पर चलता है—उतावली और अव्यवस्था छोड़कर धैर्य व विवेक से कर्म करना चाहिए।
Verse 11
नाकालतो म्रियते जायते वा नाकालतो व्याहरते च बाल: । नाकालतो यौवनमभ्युपैति नाकालतो रोहति बीजमुप्तम्,बालक समय आये बिना न जन्म लेता है, न मरता है और न असमयमें बोलता ही है। बिना समयके जवानी नहीं आती और बिना समयके बोया हुआ बीज भी नहीं उगता है
व्यास ने कहा—न कोई असमय मरता है, न असमय जन्म लेता है; बालक भी समय से पहले बोलना नहीं सीखता। जवानी भी समय आने पर ही आती है और बोया हुआ बीज भी अपने समय पर ही अंकुरित होता है। इसलिए जगत के परिवर्तन समय के अधीन हैं—लाभ-हानि में धैर्य और स्थिरता रखनी चाहिए।
Verse 12
नाकालतो भानुरुपैति योगं नाकालतो3स्तंगिरिमभ्युपैति | नाकालतो वर्धते हीयते च चन्द्र: समुद्रो5पि महोर्मिमाली,असमयमें सूर्य उदयाचलसे संयुक्त नहीं होते हैं, समय आये बिना वे अस्ताचलपर भी नहीं जाते हैं, असमयमें न तो चन्द्रमा घटते-बढ़ते हैं और न समुद्रमें ही ऊँची-ऊँची तरंगें उठती हैं
व्यास ने कहा—सूर्य असमय उदयाचल से संयुक्त नहीं होता और समय से पहले अस्ताचल की ओर भी नहीं जाता। इसी प्रकार चन्द्रमा असमय न बढ़ता है न घटता है, और महान तरंगों से मुकुटित समुद्र भी असमय उफान नहीं मारता। इसलिए जगत की महाशक्तियाँ भी समय के अधीन चलती हैं—मनुष्य को धैर्य और मर्यादा से, नियत क्षण के विरुद्ध परिणामों को न ठेलते हुए, कर्म करना चाहिए।
Verse 13
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । गीत॑ राज्ञा सेनजिता दुः:खार्तेन युधिष्ठिर,युधिष्ठिर! इस विषयमें लोग एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं। एक समय शोकसे आतुर हुए राजा सेनजितने जो उद्बार प्रकट किया था, वही तुम्हें सुना रहा हूँ
युधिष्ठिर! इस विषय में लोग एक प्राचीन इतिहास का उदाहरण भी देते हैं। शोक से पीड़ित राजा सेनजित ने जो वचन कहा था, वही मैं तुम्हें सुनाता हूँ।
Verse 14
सवनिवैष पर्यायो मर्त्यान् स्पृशति दुःसह: । कालेन परिपक्तवा हि प्रियन्ते सर्वपार्थिवा:,(राजा सेनजितने मन-ही-मन कहा कि) “यह दुःसह कालचक्र सभी मनुष्योंपर अपना प्रभाव डालता है। एक दिन सभी भूपाल कालसे परिपक्व होकर मृत्युके अधीन हो जाते हैं
यह दुःसह कालचक्र सब मर्त्यों को स्पर्श करता है। काल से परिपक्व होकर अंततः सभी पृथ्वीपति—चाहे जितने प्रिय और पराक्रमी हों—मृत्यु के वश हो जाते हैं।
Verse 15
घ्नन्ति चान्यान् नरा राजंस्तानप्यन्ये तथा नरा: । संज्ैषा लौकिकी राजन् न हिनस्ति न हन्यते,“राजन! मनुष्य दूसरोंको मारते हैं, फिर उन्हें भी दूसरे लोग मार देते हैं। नरेश्वर! यह मरना-मारना लौकिक संज्ञामात्र है। वास्तवमें न कोई मारता है और न मारा ही जाता है
राजन्! मनुष्य दूसरों को मारते हैं, और वे ही मनुष्य फिर अन्य मनुष्यों द्वारा मारे जाते हैं। नरेश्वर! यह ‘मारना-मारना’ केवल लौकिक संज्ञा है; वास्तव में न कोई मारता है, न कोई मारा जाता है।
Verse 16
हन्तीति मन्यते वक्रिन्न हन्तीत्यपि चापर: । स्वभावतस्तु नियतौ भूतानां प्रभवाप्ययौं,“एक मानता है कि आत्मा मारता है।” दूसरा ऐसा मानता है कि “नहीं मारता है।' पाज्चभौतिक शरीरोंके जन्म और मरण स्वभावत: नियत हैं
एक कहता है—‘यह मारता है’; दूसरा कहता है—‘यह नहीं मारता।’ परन्तु स्वभाव से ही प्राणियों का उत्पत्ति और विनाश नियत है।
Verse 17
नष्टे धने वा दारे वा पुत्रे पितरि वा मृते । अहो दुःखमिति ध्यायन् दुःखस्यापचितिं चरेत्,“धनके नष्ट होनेपर अथवा स्त्री, पुत्र या पिताकी मृत्यु होनेपर मनुष्य “हाय! मुझपर बड़ा भारी दुःख आ पड़ा” इस प्रकार चिन्ता करते हुए उस दुःखकी निवृत्तिकी चेष्टा करता है
धन नष्ट हो जाने पर, या पत्नी, पुत्र अथवा पिता के मर जाने पर, मनुष्य ‘हाय! यह कितना दुःख है’—ऐसा सोचता हुआ उस दुःख की निवृत्ति का उपाय करता है।
Verse 18
स कि शोचसि मूढ: सन् शोच्यान् किमनुशोचसि । पश्य दु:खेषु दुःखानि भयेषु च भयान्यपि,“तुम मूढ़ बनकर शोक क्यों कर रहे हो? उन मरे हुए शोचनीय व्यक्तियोंका बारंबार स्मरण ही क्यों करते हो? देखो, शोक करनेसे दुःखमें दुःख तथा भयमें भयकी वृद्धि होगी
तू मूढ़ होकर क्यों शोक करता है? जो स्वयं शोचनीय हैं, उनका बार-बार क्यों शोक करता है? देख—शोक करने से दुःख में दुःख बढ़ता है और भय में भय भी।
Verse 19
आत्मापि चायं न मम सर्वापि पृथिवी मम । यथा मम तथान्येषामिति पश्यन् न मुहृति,“यह शरीर भी अपना नहीं है और सारी पृथ्वी भी अपनी नहीं है। यह जिस तरहसे मेरी है, उसी तरह दूसरोंकी भी है। ऐसी दृष्टि रखनेवाला पुरुष कभी मोहमें नहीं फँसता है
यह आत्मा (यह शरीर) भी मेरा नहीं है और सारी पृथ्वी भी मेरी नहीं है। जो यह देखता है कि जो कुछ ‘मेरा’ कहा जाता है, वह उसी प्रकार दूसरों का भी है—वह पुरुष क्षणभर भी मोह में नहीं पड़ता।
Verse 20
शोकस्थानसहस्राणि हर्षस्थानशतानि च । दिवसे दिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम्,'शोकके सहसों स्थान हैं, हर्षके भी सैकड़ों अवसर हैं। वे प्रतिदिन मूढ़ मनुष्यपर ही प्रभाव डालते हैं, विद्वानूपर नहीं
शोक के सहस्रों कारण हैं और हर्ष के भी सैकड़ों अवसर हैं। वे दिन-प्रतिदिन मूढ़ मनुष्य को ही घेर लेते हैं, पण्डित को नहीं।
Verse 21
एवमेतानि कालेन प्रियद्वेष्पाणि भागश: । जीवेषु परिवर्तन्ते दुःखानि च सुखानि च,इस प्रकार ये प्रिय और अप्रिय भाव ही दुःख और सुख बनकर अलग-अलग सभी जीवोंको प्राप्त होते रहते हैं
इस प्रकार काल के प्रवाह में प्रिय और अप्रिय भाव अपने-अपने भाग से जीवों में बदलते रहते हैं—और वही दुःख तथा सुख बनकर प्राप्त होते हैं।
Verse 22
दुःखमेवास्ति न सुखं तस्मात् तदुपलभ्यते । तृष्णार्तिप्रभवं दुःखं दुःखार्तिप्रभवं सुखम्,'संसारमें केवल दुःख ही है, सुख नहीं, अतः दुःख ही उपलब्ध होता है। तृष्णाजनित पीड़ासे दु:ख और दुःखकी पीड़ासे सुख होता है अर्थात् दुःखसे आर्त हुए मनुष्यको ही उसके न रहनेपर सुखकी प्रतीति होती है
संसार में वास्तव में दुःख ही है, सुख नहीं; इसलिए अनुभव में दुःख ही आता है। तृष्णा से उत्पन्न पीड़ा से दुःख होता है, और दुःख की पीड़ा से (उसके हटने पर) सुख की प्रतीति होती है।
Verse 23
सुखस्यानन्तरं दुःखं दुःखस्यानन्तरं सुखम् | न नित्यं लभते दुःखं न नित्यं लभते सुखम्,“सुखके बाद दुःख और दुःखके बाद सुख आता है। कोई भी न तो सदा दुःख पाता है और न निरन्तर सुख ही प्राप्त करता है
सुख के बाद दुःख आता है और दुःख के बाद सुख। न कोई सदा दुःख पाता है, न कोई निरन्तर सुख ही प्राप्त करता है।
Verse 24
इस प्रकार श्रीमह्ाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें व्यासवाक्यविषयक चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ,सुखमेव हि दुःखान्तं कदाचिद् दुःखत: सुखम् | तस्मादेतद् द्ववं जह्माद् य इच्छेच्छाश्वतं सुखम्
कभी सुख ही दुःख का अन्त बन जाता है और कभी दुःख से ही सुख उत्पन्न होता है। इसलिए जो स्थायी कल्याण चाहता है, उसे इस सुख-दुःख के द्वन्द्व को त्यागकर दोनों में समभाव से स्थिर रहना चाहिए।
Verse 25
यन्निमित्तो भवेच्छोकस्तापो वा भूशदारुण:,इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि सेनजिदुपाख्याने पज्चविंशो&5 ध्याय:
व्यास ने कहा—जिस कारण से शोक उत्पन्न हो या अत्यन्त भयानक ताप (पीड़ा) उठे, उस कारण को समझकर यथोचित उपाय करना चाहिए। इस प्रकार श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के राजधर्मानुशासनपर्व में सेनजित-उपाख्यान का पच्चीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ।
Verse 26
आयासो वापि यन्मूलस्तदेकाड्मपि त्यजेत् । “जिसके कारण शोक और बढ़ा हुआ ताप होता हो अथवा जो आयासका भी मूल कारण हो, वह अपने शरीरका एक अंग भी हो तो भी उसको त्याग देना चाहिये ।। सुखं वा यदि वा दु:खं प्रियं वा यदि वाप्रियम् । प्राप्त प्राप्त्मुपासीत हृदयेनापराजित:,“सुख हो या दुःख, प्रिय हो अथवा अप्रिय, जब जो कुछ प्राप्त हो, उस समय उसे सहर्ष अपनावे। अपने हृदयसे उसके सामने पराजय न स्वीकार करे (हिम्मत न हारे)
व्यास ने कहा—जिसके कारण शोक और दाहक पीड़ा होती हो, अथवा जो परिश्रम-क्षय का भी मूल हो, वह यदि अपने शरीर का अंग-सा ही क्यों न हो, तो भी उसे त्याग देना चाहिए। सुख हो या दुःख, प्रिय हो या अप्रिय—जो जैसा प्राप्त हो, उसे उसी समय स्वीकार करे; हृदय से पराजित न हो, भीतर का साहस न छोड़े।
Verse 27
ईषदप्यड् दाराणां पुत्राणां वा चराप्रियम् । ततो ज्ञास्यसि क: कस्य केन वा कथमेव च
व्यास ने कहा—पत्नी (या पत्नियों) अथवा पुत्रों के प्रति थोड़ा-सा भी अप्रिय आचरण करके देखो; तब तुम जान जाओगे कि कौन किसका है—किसके द्वारा, और किस प्रकार।
Verse 28
'प्रिय मित्र! स्त्री अथवा पुत्रोंका थोड़ा-सा भी अप्रिय कर दो, फिर स्वयं समझ जाओगे कि कौन किस हेतुसे किस तरह किसके साथ कितना सम्बन्ध रखता है? ।। ये च मूढतमा लोके ये च बुद्धेः परं गता: । त एव सुखमेधन्ते मध्यम: क्लिश्यते जन:,'संसारमें जो अत्यन्त मूर्ख हैं, अथवा जो बुद्धिसे परे पहुँच गये हैं, वे ही सुखी होते हैं; बीचवाले लोग कष्ट ही उठाते हैं!
व्यास ने कहा—प्रिय मित्र, स्त्री या पुत्रों का थोड़ा-सा भी अप्रिय कर दो; तब तुम स्वयं समझ जाओगे कि कौन किस हेतु से, किस प्रकार, किसके साथ कितना सम्बन्ध रखता है। इस संसार में जो अत्यन्त मूर्ख हैं, अथवा जो बुद्धि की सीमा के पार पहुँच गये हैं, वही सुख में बढ़ते हैं; बीचवाला मनुष्य ही कष्ट उठाता है।
Verse 29
इत्यब्रवीन्महाप्राज्ञो युधिष्ठिर स सेनजित् । परावरज्ञो लोकस्य धर्मवित् सुखदुःखवित्,युधिष्ठिर! लोकके भूत और भविष्य तथा सुख एवं दुःखको जाननेवाले धर्मवेत्ता महाज्ञानी सेनजितने ऐसा ही कहा है
व्यास ने कहा: युधिष्ठिर से महाप्राज्ञ सेनजित ने इसी प्रकार कहा। वह लोक के परावर तत्त्वों का ज्ञाता, धर्म का निर्णायक और सुख-दुःख के विधान को जानने वाला था—इस प्रकार उसने युधिष्ठिर से भाषण किया।
Verse 30
येन दुःखेन यो दुःखी न स जातु सुखी भवेत् | दुःखानां हि क्षयो नास्ति जायते हापरात् परम्,जिस किसी भी दुःखसे जो दुखी है, वह कभी सुखी नहीं हो सकता; क्योंकि दुःखोंका अन्त नहीं है। एक दुःखसे दूसरा दुःख होता ही रहता है
व्यास ने कहा: जिस दुःख से जो मनुष्य दुखी हो जाता है, वह कभी वास्तव में सुखी नहीं हो सकता; क्योंकि दुःखों का क्षय नहीं होता—एक दुःख के बाद दूसरा दुःख निरन्तर उत्पन्न होता रहता है।
Verse 31
सुखं च दुःखं च भवाभवौ च लाभालाभौ मरणं जीवितं च । पर्यायत: सर्वमवाप्रुवन्ति तस्माद् धीरो नैव हृष्येन्न शोचेत्,सुख-दुःख, उत्पत्ति-विनाश, लाभ-हानि और जीवन-मरण--ये समय-समयपर क्रमसे सबको प्राप्त होते हैं; इसलिये धीर पुरुष इनके लिये हर्ष और शोक न करे
सुख और दुःख, उत्पत्ति और विनाश, लाभ और हानि, मृत्यु और जीवन—ये सब क्रमशः समय आने पर सबको प्राप्त होते हैं। इसलिए धीर पुरुष न तो हर्ष करे, न शोक; वह स्थिर बुद्धि से इनका सामना करे।
Verse 32
दीक्षां राज्ञ: संयुगे युद्धमाहु- योग राज्ये दण्डनीत्यां च सम्यक् । वित्तत्यागो दक्षिणानां च यज्ञे सम्यग दानं पावनानीति विद्यात्,राजाके लिये संग्राममें जूझना ही यज्ञकी दीक्षा लेना बताया गया है। राज्यकी रक्षा करते हुए दण्डनीतिमें भलीभाँति प्रतिष्ठित होना ही उसके लिये योगसाधन है तथा यज्ञमें दक्षिणारूपसे धनका त्याग एवं उत्तम रीतिसे दान ही राजाके लिये त्याग है। ये तीनों कर्म राजाको पवित्र करनेवाले हैं, ऐसा समझे
व्यास ने कहा: राजा के लिए संग्राम में जूझना ही यज्ञ की दीक्षा कही गई है। राज्य की रक्षा करते हुए दण्डनीति और धर्मयुक्त शासन में दृढ़ प्रतिष्ठा—यही उसका योग है। यज्ञ में दक्षिणा रूप से धन का त्याग और विधिपूर्वक दान—यही उसका सच्चा संन्यास है। जानो, ये तीनों कर्तव्य राजा को पवित्र करते हैं।
Verse 33
रक्षन् राज्यं बुद्धिपूर्व नयेन संत्यक्तात्मा यज्ञशीलो महात्मा । सर्वाल्लॉकान् धर्मदृष्ट्या चरंश्वा- प्यूथ्व॑ देहान्मोदते देवलोके
व्यास ने कहा: जो महात्मा राजा बुद्धिपूर्वक नीति से राज्य की रक्षा करता है, आत्मसंयमी और यज्ञशील रहता है, वह धर्मदृष्टि से सब लोकों में विचरता है। और पृथ्वी पर देह त्याग कर भी वह देवलोक में आनन्दित होता है।
Verse 34
जो राजा अहंकार छोड़कर बुद्धिमानीसे नीतिके अनुसार राज्यकी रक्षा करता है, स्वभावसे ही यज्ञके अनुष्ठानमें लगा रहता है और धर्मकी रक्षाको दृष्टिमें रखकर सम्पूर्ण लोकोंमें विचरता है, वह महामनस्वी नरेश देहत्यागके पश्चात् देवलोकमें आनन्द भोगता है ।। जित्वा संग्रामान् पालयित्वा च राष्ट्र सोम॑ पीत्वा वर्धयित्वा प्रजाश्न । युक्त्या दण्डं धारयित्वा प्रजानां युद्धे क्षीणो मोदते देवलोके,जो संग्राममें विजय, राष्ट्रका पालन, यज्ञमें सोमरसका पान, प्रजाओंकी उन्नति तथा प्रजावर्गके हितके लिये युक्तिपूर्वक दण्डधारण करते हुए युद्धमें मृत्युको प्राप्त होता है, वह देवलोकमें आनन्दका भागी होता है
व्यासजी बोले—जो राजा युद्धों में विजय पाकर राज्य की रक्षा करता है, विधिपूर्वक यज्ञ करता और सोमरस का पान करता है, प्रजाओं की उन्नति करता है तथा प्रजाजन के हित और व्यवस्था के लिए विवेकपूर्वक दण्ड धारण करता है—वह धर्मकर्म में क्षीण होकर यदि रणभूमि में गिर पड़े, तो देवलोक में आनन्द भोगता है। यह उपदेश नम्रता-युक्त राजधर्म, नीतिपूर्ण शासन, यज्ञ-कर्तव्य और धर्म-रक्षा की प्रशंसा करता है; और धर्मसेवा में प्राप्त वीरमृत्यु को पुण्यफलदायिनी बताता है।
Verse 35
सम्यग वेदान् प्राप्य शास्त्राण्यधीत्य सम्यग राज्यं पालयित्वा च राजा | चातुर्वर्ण्य स्थापयित्वा स्वधर्मे पूतात्मा वै मोदते देवलोके,सम्यक् प्रकारसे वेदोंका ज्ञान, शास्त्रोंका अध्ययन, राज्यका ठीक-ठीक पालन तथा चारों वर्णोका अपने-अपने धर्ममें स्थापन करके जो अपने मनको पवित्र कर चुका है, वह राजा देवलोकमें सुखी होता है
व्यासजी बोले—जो राजा सम्यक् रूप से वेदों का ज्ञान प्राप्त करके, शास्त्रों का अध्ययन करके, राज्य का ठीक-ठीक पालन करके और चारों वर्णों को उनके-उनके स्वधर्म में स्थापित करके अपने अन्तःकरण को पवित्र कर लेता है, वह देवलोक में सुखी होता है। यहाँ राजधर्म को विद्या, न्यायपूर्ण शासन और धर्म-व्यवस्था के द्वारा आत्मशुद्धि तथा परलोक-सुख का मार्ग बताया गया है।
Verse 36
यस्य वृत्तं नमस्यन्ति स्वर्गस्थस्यापि मानवा: । पौरजानपदामात्या: स राजा राजसत्तम:,स्वर्गलोकमें रहनेपर भी जिसके चरित्रको नगर और जनपदके मनुष्य एवं मन्त्री मस्तक झुकाते हैं, वही राजा समस्त नरपतियोंमें सबसे श्रेष्ठ है
व्यासजी बोले—स्वर्गलोक में रहने पर भी जिसके चरित्र को नगर और जनपद के लोग तथा मन्त्री मस्तक झुकाकर नमस्कार करते हैं, वही राजा राजाओं में श्रेष्ठ है। सच्चे राज्यत्व का लक्षण केवल बल नहीं, बल्कि ऐसा धर्ममय आचरण है जो मृत्यु के बाद भी श्रद्धा जगाए।
Verse 243
सुखान्तप्रभवं दुःखं दुःखान्तप्रभवं सुखम् । “कभी दुःखके अन्तमें सुख और कभी सुखके अन्तमें दुःख भी आता है; अतः जो नित्य सुखकी इच्छा रखता हो, वह इन दोनोंका परित्याग कर दे; क्योंकि दुःख सुखके अन्तमें अवश्यम्भावी है, वैसे ही सुख भी दुःखके अन्तमें अवश्यम्भावी है
सुख के अन्त से दुःख उत्पन्न होता है और दुःख के अन्त से सुख। इसलिए जो नित्य सुख की इच्छा रखता है, वह इन दोनों का परित्याग करे; क्योंकि जैसे सुख के अन्त में दुःख अवश्यंभावी है, वैसे ही दुःख के अन्त में सुख भी अवश्यंभावी है।
How a ruler can legitimately collect revenue and exercise coercive restraint while remaining ethically blameless: the chapter argues legitimacy depends on śāstra-guided, context-sensitive action and, crucially, on effective protection of subjects.
Assume active, disciplined governance: protect the realm, appoint competent learned agents, honor worthy groups, restrain kāma and krodha, and treat public security as the king’s direct responsibility rather than a peripheral concern.
Yes, implicitly: righteous protection and properly ordered rule yield public welfare, durable fame (kīrti), and favorable posthumous attainment; negligence in protection transfers moral liability to the king, diminishing both legitimacy and merit.