
Śānti-parva 206: Guṇa-hetu Moha, Kāma-krodha Chain, Indriya-utpatti, and Nirodha
Upa-parva: Mokṣa-dharma (Liberation Teachings) — Guṇa–Indriya–Saṃsāra Analysis Unit
A teacher (guru) explains a causal map of bondage: rajas and tamas are linked with delusion; from cognitive confusion arise desire (kāma), then anger (krodha), greed (lobha), fear (bhaya), pride (darpa), and ego-sense (ahaṃkāra), culminating in action (kriyā). Action generates relational attachment (sneha), then sorrow (śoka), and repeated cycles of pleasure–pain that condition rebirth. The discourse includes an intentionally unsentimental account of gestation and bodily formation to counteract craving. It then shifts to a Sāṃkhya-like account of prakṛti/field (kṣetra) and knower (kṣetrajña), describing how sensory faculties and vital functions arise in relation to specific cravings (e.g., sound-craving with hearing). Suffering is said to expand through appropriation (upādāna) and conceit/identification (abhimāna), while cessation is attainable through relinquishment (tyāga) and nirodha; one who knows cessation is described as freed from renewed embodiment. The chapter closes by urging examination of the senses’ arising and dissolution with “śāstra-vision,” so that knowledge of causes prevents return to bodily re-entry.
Chapter Arc: मनु, पंचभूतों और मन-बुद्धि-इन्द्रियों के संयोग से जीव की अनुभूति-यात्रा का सूत्र पकड़ाते हैं—एक ही परम तत्त्व कैसे अनेक देहों में अनेक रूपों से चमकता है? → उपमाओं की शृंखला से जिज्ञासा तीव्र होती है: जैसे स्वर्ण में सूत्र, मोतियों-प्रवालों में वही तत्त्व, वैसे ही आत्मा घोड़े-मनुष्य-हाथी-मृग-कीट-पतंग तक में कर्मानुसार आसक्त होकर भिन्न-भिन्न देह-धर्म धारण करती है; भूमि में एक रस होते हुए भी बीज के अनुसार औषधि-स्वभाव बदलता है, वैसे ही बुद्धि कर्मानुगा होकर अंतरात्मा का दर्शन ढक देती है। → ज्ञान से बुद्धि को निर्मल कर, मन को साधकर, और इन्द्रिय-ग्राम को मन के अधीन कर साधक ‘अक्षर’ पद को प्राप्त करता है—वही अनागत, सनातन, अव्यय, ध्रुव, स्वयम्भू परमगति; इसी निश्चय में अमृतत्व का द्वार खुलता है। → वेद (ऋक्-यजुः-साम) भी अध्ययन-काल में शरीराश्रित, यत्नसाध्य और विनाशिन बताए जाते हैं; और यह भी कि दुर्भाग्य, साधनहीनता तथा कर्मफलासक्ति के कारण मर्त्य उस मार्ग को नहीं देख पाते जिससे परम पद की प्राप्ति होती है—अतः निष्काम, शुद्ध-बुद्धि ज्ञान ही उपाय है।
Verse 1
ऑपन--माज बछ। अकाल षर्डाधिकद्विशततमो< ध्याय: परमात्मतत्त्वका निरूपण--मनु-बृहस्पति-संवादकी समाप्ति मनुर्वाच यदा तै: पञ्चभि: पज्च युक्तानि मनसा सह । अथ तद् रक्ष्यते ब्रह्म मणौ सूत्रमिवापितम्,मनुजी कहते हैं--बृहस्पते! जिस समय मनुष्य शब्द आदि पाँच विषयोंसहित पाँचों ज्ञानेन्द्रियों और मनको काबूमें कर लेता है, उस समय वह मणियोंमें ओतप्रोत तागेके समान सर्वत्र व्याप्त परब्रह्मका साक्षात्कार कर लेता है
मनु बोले—हे बृहस्पते! जब मनुष्य मन सहित पाँचों ज्ञानेन्द्रियों को उनके पाँच विषयों (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध) समेत वश में कर लेता है, तब वह सर्वत्र व्याप्त परब्रह्म का साक्षात्कार करता है—जैसे मणियों में ओत-प्रोत धागा।
Verse 2
तदेव च यथा सूत्र सुवर्णे वर्तते पुनः । मुक्तास्वथ प्रवालेषु मृन्मये राजते तथा
भीष्म बोले—जैसे वही धागा फिर सोने में भी विद्यमान रहता है; और मोतियों तथा मूँगों में जड़ा हुआ भी चमकता है; वैसे ही मिट्टी के दानों में भी शोभा पाता है।
Verse 3
तद्धद् गोडश्वमनुष्येषु तद्धद्धस्तिमृगादिषु । तद्धत् कीटपतड्लेषु प्रसक्तात्मा स्वकर्मभि:
भीष्म बोले—वही (अन्तरात्मा) गौ, अश्व और मनुष्यों में है; वही हाथी, मृग आदि में है; वही कीट-पतंगों में भी है। परन्तु प्रत्येक जीव अपने-अपने कर्मों से बँधा हुआ, उन्हीं में आसक्त रहता है।
Verse 4
जैसे वही तागा सोनेकी लड़ियोंमें, मोतियोंमें, मूँगोंमें और मिट्टीकी मालाके दानोंमें ओतप्रोत होकर सुशोभित होता है, उसी प्रकार एक ही परमात्मा गौ, अश्व, मनुष्य, हाथी, मृग और कीट-पतंग आदि समस्त शरीरोंमें व्याप्त है! विषयासक्त जीवात्मा अपने-अपने कर्मके अनुसार भिन्न-भिन्न शरीर धारण करता है ।। येन येन शरीरेण यद्यत्कर्म करोत्ययम् । तेन तेन शरीरेण तत् तत् फलमुपाश्ुते,यह मनुष्य जिस-जिस शरीरसे जो-जो कर्म करता है, उस-उस शरीरसे उसी-उसी कर्मका फल भोगता है
भीष्म बोले—जैसे एक ही धागा सोने, मोती, मूँगा और मिट्टी की माला के दानों में ओत-प्रोत होकर उन्हें एकत्र करता और शोभा देता है, वैसे ही एक परमात्मा गौ, अश्व, मनुष्य, हाथी, मृग तथा कीट-पतंग आदि समस्त देहों में व्याप्त है। पर विषयासक्त जीव अपने-अपने कर्मों के अनुसार भिन्न-भिन्न शरीर धारण करता है। जिस-जिस शरीर से यह जो-जो कर्म करता है, उसी-उसी शरीर से वह उस कर्म का फल भोगता है।
Verse 5
यथा होकरसा भूमिरोषध्यर्थानुसारिणी । तथा कर्मनुगा बुद्धिरन्तरात्मानुदर्शिनी,जैसे भूमिमें एक ही रस होता है तो भी उसमें जैसा बीज बोया जाता है, उसीके अनुसार वह उसमें रस उत्पन्न करती है, उसी तरह अन्तरात्मासे ही प्रकाशित बुद्धि पूर्वजन्मके कर्मोके अनुसार ही एक शरीरसे दूसरे शरीरको प्राप्त होती है
भीष्म ने कहा—जैसे पृथ्वी का रस एक ही होता है, पर जैसा बीज बोया जाता है वैसा ही रस और फल वह उत्पन्न करती है; वैसे ही अन्तरात्मा से प्रकाशित बुद्धि पूर्वकर्मों के अनुसार चलती हुई जीव को एक देह से दूसरी देह में ले जाती है।
Verse 6
ज्ञानपूर्वा भवेल्लिप्सा लिप्सापूर्वाभिसंधिता । अभिसंधिपूर्वकं कर्म कर्ममूलं ततः फलम्,मनुष्यको पहले तो विषयका ज्ञान होता है; फिर उसके मनमें उसे पानेकी इच्छा उत्पन्न होती है। उसके बाद “इस कार्यको सिद्ध करूँ” यह निश्चय और प्रयत्न आरम्भ होता है। फिर कर्म सम्पन्न होता और उसका फल मिलता है
भीष्म ने कहा—पहले विषय का ज्ञान होता है; ज्ञान से उसे पाने की इच्छा (लिप्सा) उत्पन्न होती है। इच्छा से ‘मैं इसे सिद्ध करूँ’ ऐसा संकल्प और प्रयत्न उठता है। फिर कर्म होता है, और कर्म से फल प्राप्त होता है।
Verse 7
फल कर्मात्मकं विद्यात् कर्म ज्ञेयात्मकं तथा । ज्ञेयं ज्ञानात्मकं विद्याज्ज्ञानं सदसदात्मकम्,इस प्रकार फलको कर्मस्वरूप समझे। कर्मको जाननेमें आनेवाले पदार्थोंका रूप समझे और ज्ञेयको ज्ञानरूप समझे तथा ज्ञानका स्वरूप कार्य और कारण जाने
भीष्म ने कहा—फल को कर्मस्वरूप जानो; कर्म को ज्ञेय (जानने योग्य विषय) के स्वरूप वाला समझो; और ज्ञेय को ज्ञानस्वरूप जानो। ज्ञान का स्वरूप सत्-असत्—कार्य-कारण, प्रकट-अप्रकट—दोनों से संबद्ध है।
Verse 8
ज्ञानानां च फलानां च ज्ञेयानां कर्मणां तथा । क्षयान्ते यत् फल विद्याउज्ञानं ज्ञेयप्रतिष्ठितम्,ज्ञान, फल, ज्ञेय और कर्म--इन सबका अन्त होनेपर जो प्राप्तव्य फलरूपसे शेष रहता है, उसको ही तुम ज्ञेयमात्रमें व्याप्त होकर स्थित हुआ ज्ञानस्वरूप परमात्मा समझो
भीष्म ने कहा—ज्ञान, फल, ज्ञेय और कर्म—इन सबका क्षय हो जाने पर जो प्राप्तव्य फलरूप से शेष रह जाता है, उसे तुम ज्ञेयमात्र में व्याप्त होकर स्थित ज्ञानस्वरूप परमात्मा समझो।
Verse 9
महद्धि परमं भूतं यत् प्रपश्यन्ति योगिन: । अबुधास्तं न पश्यन्ति हा[ात्मस्थं गुणबुद्धय:,उस परम महान् तत्त्वको योगिजन ही देख पाते हैं। विषयोंमें आसक्त अज्ञानी मनुष्य अपने भीतर ही विराजमान उस परब्रह्म परमात्माको नहीं देख सकते हैं
भीष्म ने कहा—उस परम महान् तत्त्व को योगीजन ही प्रत्यक्ष देखते हैं। पर गुणों के खेल में फँसी और विषयासक्त बुद्धि वाले अज्ञानी लोग, अपने भीतर स्थित उसी परब्रह्म परमात्मा को नहीं देख पाते।
Verse 10
पृथिवीरूपतो रूपमपामिह महत्तरम् । अद्धों महत्तरं तेजस्तेजस: पवनो महान्
भीष्म बोले—यहाँ पृथ्वी के रूप से जल का रूप अधिक महान है। जल से भी अधिक महान तेज है, और तेज से भी महान प्रबल पवन है।
Verse 11
पवनाच्च महद् व्योम तस्मात् परतरं मन: । मनसो महती बुद्धिर्बुद्धे: कालो महान् स्मृत:
भीष्म बोले—पवन से विशाल आकाश उत्पन्न होता है; उससे परे मन है। मन से महान बुद्धि है, और बुद्धि से भी महान काल है—जिसे महाशक्ति कहा गया है।
Verse 12
कालात् स भगवान् विष्णुर्यस्य सर्वमिदं जगत् । नादिरन मध्यं नैवान्तस्तस्य देवस्य विद्यते
भीष्म बोले—उस काल से स्वयं भगवान् विष्णु प्रकट होते हैं, जिनके अधीन यह समस्त जगत् है। उस देव का न आदि ज्ञात है, न मध्य, न अन्त—वे सर्वथा परे हैं।
Verse 13
इस जगतमें पृथ्वीके रूपसे जलका ही रूप महान् है। जलसे तेज अति महान है, तेजसे पवन महान् है, पवनसे आकाश महान् है, आकाशसे मन परतर है अर्थात् सूक्ष्म, श्रेष्ठ और महान् है। मनसे बुद्धि महान् है, बुद्धिसे काल अर्थात् प्रकृति महान् है और कालसे भगवान् विष्णु अनन्त, सूक्ष्म, श्रेष्ठ और महान् हैं। यह सारा जगत् उन्हींकी सृष्टि है। उन भगवान् विष्णुका न कोई आदि है, न मध्य है और न अन्त ही है ।। अनादित्वादमध्यत्वादनन्तत्वाच्च सोडव्यय: । अत्येति सर्वदुःखानि दुःखं हुन्तवदुच्यते,वे आदि, मध्य और अन्तसे रहित होनेके कारण ही अविनाशी हैं; अतएव सम्पूर्ण दुःखोंसे परे हैं, क्योंकि विनाशशील वस्तु ही दुःखरूप हुआ करती है
भीष्म बोले—इस जगत में पृथ्वी के रूप से जल का रूप ही अधिक महान है। जल से तेज अत्यन्त महान है, तेज से पवन महान है, पवन से आकाश महान है। आकाश से परे मन है—अर्थात् सूक्ष्म, श्रेष्ठ और महान। मन से बुद्धि महान है, बुद्धि से काल अर्थात् प्रकृति महान है, और काल से परे भगवान् विष्णु अनन्त, सूक्ष्म, श्रेष्ठ और महान हैं। यह सारा जगत उन्हीं की सृष्टि है। उन भगवान् विष्णु का न कोई आदि है, न मध्य, न अन्त। आदि, मध्य और अन्त से रहित होने के कारण वे अविनाशी हैं; अतएव वे सम्पूर्ण दुःखों से परे हैं, क्योंकि दुःख विनाशशील वस्तु में ही कहा जाता है।
Verse 14
तद् ब्रह्म परम॑ प्रोक्त तद्धाम परमं पदम् । तद् गत्वा कालविषयाद् विमुक्ता मोक्षमाश्रिता:
भीष्म बोले—उसी को परम ब्रह्म कहा गया है; वही परम धाम, परम पद है। उसे प्राप्त करके प्राणी काल के विषय-क्षेत्र से मुक्त होकर मोक्ष का आश्रय लेते हैं।
Verse 15
अविनाशी विष्णु ही परबत्रह्म कहे जाते हैं। वे ही परमधाम और परमपद हैं। उन्हें प्राप्त कर लेनेपर जीव कालके राज्यसे मुक्त हो मोक्षधाममें स्थित हो जाते हैं ।। गुणेष्वेते प्रकाशन्ते निर्गुणत्वात् तत: परम् | निवृत्तिलक्षणो धर्मस्तथा535नन्त्याय कल्पते,ये वध्य जीव गुणोंमें अर्थात् गुणोंके कार्यरूप शरीर आदिके सम्बन्धसे व्यक्त हो रहे हैं; परंतु परमात्मा निर्मुण होनेके कारण उनसे अत्यन्त परे हैं। जो निवृत्तिरूप धर्म (निष्काम कर्म) है, वह अक्षय पद (मोक्ष) की प्राप्ति करानेमें समर्थ है
भीष्म ने कहा—अविनाशी विष्णु ही परब्रह्म कहे जाते हैं। वही परमधाम और परमपद हैं। उन्हें प्राप्त करके जीव काल के राज्य से मुक्त होकर मोक्षधाम में स्थित हो जाता है। जीव गुणों में—गुणों के कार्यरूप शरीर, मन आदि के सम्बन्ध से—व्यक्त दिखाई देते हैं; परन्तु परमात्मा निर्गुण होने से उनसे अत्यन्त परे हैं। निवृत्तिलक्षण धर्म—निष्काम कर्म और ममता-त्याग—अक्षय पद, अर्थात् मोक्ष, तक पहुँचाने में समर्थ है।
Verse 16
ऋचो यजूंषि सामानि शरीराणि व्यपश्रिता: । जिद्लााग्रेषु प्रवर्तन्ते यत्नसाध्या विनाशिन:,ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद--ये अध्ययनकालमें शरीरके आश्रित रहते हैं और जिह्वाके अग्रभागपर प्रकट होते हैं; इसीलिये वे यत्नसाध्य और विनाशशील हैं अर्थात् इनका लुप्त होना स्वाभाविक है
ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद—ये अध्ययन के समय शरीर के आश्रित रहते हैं और जिह्वा के अग्रभाग पर प्रकट होते हैं; इसलिए वे यत्न से साध्य और विनाशशील हैं, अर्थात् उनका लुप्त होना स्वाभाविक है।
Verse 17
न चैवमिष्यते ब्रह्म शरीराश्रयसम्भवम् । न यत्नसाध्यं तद् ब्रह्म नादिमध्यं न चान्तवत्
भीष्म ने कहा—ब्रह्म को ऐसा नहीं मानना चाहिए कि वह शरीर के आश्रय से उत्पन्न होता है या शरीर पर निर्भर है। वह ब्रह्म किसी प्रयत्न से गढ़ी हुई उपलब्धि की तरह यत्नसाध्य नहीं; उसका न आदि है, न मध्य, और न ही उसका अन्त है।
Verse 18
किंतु परब्रह्म परमात्मा इस प्रकार शरीरका आश्रय लेकर प्रकट होनेपर भी वेदाध्ययनकी भाँति यत्नसाध्य नहीं है; क्योंकि उनका आदि, मध्य और अन्त नहीं है ।। ऋचामादिस्तथा साम्नां यजुषामादिरुच्यते । अन्तश्वादिमतां दृष्टो न त्वादिर््रह्यण: स्मृत:
भीष्म ने कहा—परब्रह्म परमात्मा, शरीर का आश्रय लेकर प्रकट होने पर भी, वेदाध्ययन की भाँति यत्नसाध्य नहीं है; क्योंकि उसका न आदि है, न मध्य, न अन्त। ऋक्, साम और यजुः—इनके आदि कहे जाते हैं; और जिनका आदि होता है, उनका अन्त भी देखा जाता है; पर ब्रह्म का कोई आदि स्मरण में नहीं आता।
Verse 19
वही ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदका आदि कहलाता है। जिनका कोई आदि होता है, उन पदार्थोंका अन्त होता देखा गया है। ब्रह्मका कोई भी आदि नहीं बताया गया है ।। अनादित्वादनन्तत्वातृतदनन्तमथाव्ययम् | अव्ययत्वाच्च निर्दु:खं द्वन्द्धाभावस्तत: परम्,वह अनादि और अनन्त होनेके कारण अक्षय और अविनाशी है। अविनाशी होनेसे ही दुःखरहित है। उसमें हर्ष और शोक आदि द्वल्धोंका अभाव है; अतएव वह सबसे परे है
भीष्म ने कहा—ब्रह्म अनादि और अनन्त होने से असीम तथा अव्यय है। और अव्यय होने के कारण ही वह दुःखरहित है। उसमें हर्ष-शोक आदि द्वन्द्वों का अभाव है; इसलिए वह सब अवस्थाओं से परे है।
Verse 20
अदृष्टतो<नुपायाच्च प्रतिसंधेश्व॒ कर्मण: । न तेन मर्त्या: पश्यन्ति येन गच्छन्ति तत् पदम्,परंतु दुर्भाग्य, साधनहीनता और कर्मफलविषयक आसक्तिके कारण जिससे परमात्माकी प्राप्ति होती है, मनुष्य उस मार्गका दर्शन नहीं कर पाते हैं
भीष्म ने कहा—वह मार्ग प्रत्यक्ष नहीं दिखता, उसके साधन भी समझ में नहीं आते, और कर्म अनेक उलझनों में बँध जाते हैं; इसलिए मर्त्य उस पथ को नहीं देख पाते जिससे परम पद की प्राप्ति होती है। दुर्भाग्य, साधनहीनता और कर्मफल में आसक्ति के कारण लोग उस मार्ग को पहचान नहीं पाते जो परमात्मा तक ले जाता है।
Verse 21
विषयेषु च संसर्गाच्छा श्वतस्य च दर्शनात् । मनसा चान्यदाकांक्षन् परं न प्रतिपद्यते
भीष्म ने कहा—विषयों के साथ निरन्तर संसर्ग और नश्वर वस्तुओं का ही दर्शन करते रहने से मनुष्य—मन में कुछ और चाहकर भी—परम को प्राप्त नहीं कर पाता। स्पर्श और दृश्य के आकर्षण से मन बाहर की ओर खिंच जाता है और जिस परम लक्ष्य की ओर वह धुँधली आकांक्षा रखता है, उसमें स्थिर नहीं हो पाता।
Verse 22
मनुष्योंकी विषयोंमें आसक्ति है; क्योंकि विषय-सुख सदा रहनेवाले हैं; ऐसी उनकी भावना है तथा वे अपने मनसे सांसारिक पदार्थोंको पानेकी इच्छा रखते हैं; इसीलिये उन्हें परब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति नहीं होती है ।। गुणान् यदिह पश्यन्ति तदिच्छन्त्यपरे जना: । परं नैवाभिकांक्षन्ति निर्गुणत्वाद् गुणार्थिन:,संसारी मनुष्य इस संसारमें जिन-जिन विषयोंको देखते हैं, उन्हींको पाना चाहते हैं। सर्वश्रेष्ठ परब्रह्म परमात्मा हैं, उन्हें पानेके लिये उनके मनमें इच्छा नहीं होती है; क्योंकि वे गुणार्थी (विषयाभिलाषी) होते हैं और परमात्मा निर्गुण (गुणातीत) हैं
भीष्म ने कहा—इस संसार में कुछ लोग जिन-जिन विषयों और गुणों को देखते हैं, उन्हीं को पाने की इच्छा करते हैं। वे परम ब्रह्म की सच्ची आकांक्षा नहीं करते; क्योंकि वे गुणों और भोगों के इच्छुक हैं, और परमात्मा निर्गुण—गुणातीत—हैं। इसलिए विषयासक्ति परमात्म-प्राप्ति में बाधा बनती है।
Verse 23
गुणैर्यस्त्ववरैर्युक्त: कथं विद्यात् परान् गुणान् । अनुमानाद्धि गन्तव्यं गुणैरवयवै: परम्,भला, जो इन तुच्छ विषयोंमें फँसा हुआ है, वह परमदिव्य गुणोंको कैसे जान सकता है? जैसे धूमसे अग्निका अनुमान होता है, उसी प्रकार नित्यत्व आदि स्वरूपभूत दिव्य गुणोंद्वारा परब्रह्म परमात्माके स्वरूपका दिग्दर्शन हो सकता है
भीष्म ने कहा—जो तुच्छ गुणों में बँधा है, वह उच्च गुणों को कैसे जान सकेगा? परम का बोध तो अनुमान से होता है; जैसे धुएँ से अग्नि का अनुमान किया जाता है, वैसे ही उसके सूचक गुणों और अंश-लक्षणों से परब्रह्म का दिग्दर्शन होता है।
Verse 24
सूक्ष्मेण मनसा विद्यो वाचा वक्तुंन शकक््नुम: । मनो हि मनसा ग्राहां दर्शनेन च दर्शनम्,हम ध्यानद्वारा शुद्ध और सूक्ष्म हुए मनसे परमात्माके स्वरूपका अनुभव तो कर सकते हैं, किंतु वाणीद्वारा उसका वर्णन नहीं कर सकते; क्योंकि मनके द्वारा ही मानसिक विषयका ग्रहण हो सकता है और ज्ञानके द्वारा ही ज्ञेयको जाना जा सकता है
भीष्म ने कहा—सूक्ष्म और शुद्ध हुए मन से हम परम तत्त्व का साक्षात्कार तो कर सकते हैं, पर वाणी से उसका वर्णन नहीं कर सकते। क्योंकि मन के विषय मन से ही ग्रहण होते हैं, और दर्शन का ज्ञान दर्शन से ही होता है।
Verse 25
ज्ञानेन निर्मलीकृत्य बुद्धि बुद्धथा मनस्तथा । मनसा चेन्द्रियग्राममक्षरं प्रतिपद्यते
सच्चे ज्ञान से बुद्धि को निर्मल करके, उस निर्मल बुद्धि से मन को स्थिर किया जाता है। फिर मन के द्वारा इन्द्रियों के समस्त समुदाय को वश में करके साधक अक्षर—अविनाशी ब्रह्म—को प्राप्त होता है।
Verse 26
इसलिये ज्ञानके द्वारा बुद्धिको, बुद्धिके द्वारा मनको तथा मनके द्वारा इन्द्रिय- समुदायको निर्मल एवं शुद्ध करके अविनाशी परमात्माको प्राप्त किया जा सकता है ।। बुद्धिप्रवीणो मनसा समृद्धो निराशिषं निर्गुणमभ्युपैति । परं त्यजन्तीह विलोड्यमाना हुताशनं वायुरिवेन्धनस्थम्
इसलिए ज्ञान के द्वारा बुद्धि को, बुद्धि के द्वारा मन को, और मन के द्वारा इन्द्रिय-समुदाय को निर्मल-शुद्ध करके अविनाशी परमात्मा को प्राप्त किया जा सकता है। बुद्धि में प्रवीण और संयमित मन से सम्पन्न पुरुष, निराश होकर निर्गुण सत्य के निकट पहुँचता है। जैसे वायु ईंधन में छिपी अग्नि को मथकर प्रज्वलित कर देती है, वैसे ही यहाँ आसक्तियों का परित्याग करके अंतःसंयम परमात्मा को प्रकट कर देता है।
Verse 27
बुद्धिमें प्रवीण अर्थात् विशुद्ध और सूक्ष्म बुद्धिसे सम्पन्न एवं मानसिक बलसे युक्त हुआ पुरुष, समस्त इच्छासे अतीत निर्गुण ब्रह्मको प्राप्त होता है। जैसे वायु काठमें रहनेवाले अदृश्य अग्निको बिना प्रज्वलित किये ही छोड़ देता है, वैसे ही कामनाओंसे विकल हुए पुरुष भी अपने शरीरके भीतर स्थित परमात्माका त्याग कर देते हैं अर्थात् उसे जानने और पानेकी चेष्टा नहीं करते ।। गुणादाने विप्रयोगे च तेषां मन: सदा बुद्धिपरावराभ्याम् | अनेनैव विधिना सम्प्रवृत्तो गुणापाये ब्रह्म शरीरमेति,जब साधक साधनरूप गुणोंको धारण कर लेता है और उन सांसारिक पदार्थोंसे मनको हटा लेता है, तब उसका मन बुद्धिजन्य अच्छे-बुरे भावोंसे रहित होकर निरन्तर निर्मल रहता है। इस प्रकार साधनमें लगा हुआ साधक जब गुणोंसे अतीत हो जाता है, तब ब्रह्मके स्वरूपका साक्षात् कर लेता है
बुद्धि में प्रवीण—अर्थात् विशुद्ध, सूक्ष्म और स्थिर बुद्धि से सम्पन्न तथा मानसिक बल से युक्त—पुरुष समस्त इच्छाओं से परे निर्गुण ब्रह्म को प्राप्त होता है। जैसे वायु काष्ठ में स्थित अदृश्य अग्नि को बिना प्रज्वलित किए ही छोड़ देती है, वैसे ही कामनाओं से व्याकुल पुरुष अपने ही शरीर में स्थित परमात्मा को त्याग देते हैं—अर्थात् उसे जानने और पाने का प्रयत्न नहीं करते। पर जब साधक साधनरूप गुणों को धारण कर, मन को विषयों से हटाता है, तब उसका मन बुद्धि के ‘उत्तम-निकृष्ट’, ‘शुभ-अशुभ’ भावों से रहित होकर निरन्तर निर्मल रहता है। इसी विधि से प्रवृत्त होकर, जब वह उन सहायक गुणों से भी परे हो जाता है, तब शरीर में स्थित ब्रह्म का साक्षात् अनुभव कर लेता है।
Verse 28
अव्यक्तात्मा पुरुषो व्यक्तकर्मा सोव्यक्तत्वं गच्छति हुन्तकाले । तैरेवायं चेन्द्रियैर्वर्थमानै- ग्लयद्िवा5वर्ततेडकामरूप:,पुरुषका आत्मा (वास्तविक स्वरूप) अव्यक्त है और उसके कर्म शरीररूपमें व्यक्त हैं। अतः वह अन्तकालमें अव्यक्तभावको प्राप्त हो जाता है। परंतु कामनाओंसे तद्गरूप हुआ वह जीव उन बढ़ी हुई विषयप्रबल इन्द्रियोंसे युक्त होकर पुनः संसारमें आ जाता है अर्थात् पुनः शरीरको धारण कर लेता है
पुरुष का आत्मस्वरूप अव्यक्त है और उसके कर्म शरीर के द्वारा व्यक्त होते हैं; इसलिए वह अन्तकाल में अव्यक्तभाव को प्राप्त होता है। परन्तु कामनाओं से रूपित यह जीव, विषयों से बलवान हुई उन्हीं इन्द्रियों को साथ लिए, फिर संसार में लौट आता है—अर्थात् पुनः देह धारण करता है।
Verse 29
सर्वैरय॑ चेन्द्रियै: सम्प्रयुक्तो देहं प्राप्त: पठडचभूताश्रय: स्यात् । नासामर्थ्याद् गच्छति कर्मणेह हीनस्तेन परमेणाव्ययेन,सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे संयुक्त होकर यह देहधारी जीव पंचभूतस्वरूप शरीरके आश्रित हो जाता है। ज्ञान और उपासना आदिकी शक्तिके बिना वह केवल कर्मोद्वारा परमात्माको नहीं पाता। अतः वह उस अविनाशी परमेश्वरसे वंचित रह जाता है
सम्पूर्ण इन्द्रियों से संयुक्त यह देहधारी जीव पंचमहाभूत-आश्रित शरीर में निवास करता है। परन्तु सच्चे ज्ञान और उपासना-जन्य सामर्थ्य के बिना वह यहाँ केवल कर्मकाण्ड से परमात्मा को नहीं पाता; इसलिए उस अव्यय परमेश्वर से वंचित रह जाता है।
Verse 30
पृथ्व्यां नर: पश्यति नान्तमस्या ह्ान्तश्नास्या भविता चेति विद्धि | पर॑ं नयन्तीह विलोड्यमानं यथा प्लवं वायुरिवार्णवस्थम्
भीष्म बोले—इस पृथ्वी पर मनुष्य इसका अन्त नहीं देख पाता; यह भी जानो कि इसकी अन्तःसीमा भी प्राप्त नहीं होती। यहाँ परिस्थितियों से मथा हुआ मनुष्य आगे ही बहा ले जाया जाता है—जैसे समुद्र में तैरती नाव को वायु बहा ले जाती है।
Verse 31
इस भूतलपर रहनेवाला मनुष्य यद्यपि इस पृथ्वीका अन्त नहीं देखता है तो भी कहीं- न-कहीं इसका अन्त अवश्य है, ऐसा समझो। जैसे समुद्रमें लहरोंद्वारा ऊपर-नीचे होते हुए जहाजको प्रवाहके अनुकूल बहती हुई हवा तटपर लगा देती है, उसी प्रकार संसारसमुद्रमें गोता लगाते हुए मनुष्यको अनुकूल वातावरण संसारसागरसे पार कर देता है ।। दिवाकरो गुणमुपलभ्य निर्गुणो यथा भवेदपगतरश्मिमण्डल: । तथा हासौ मुनिरिह निर्विशेषवान् स निर्गुणं प्रविशति ब्रह्म चाव्ययम्,सम्पूर्ण जगत्का प्रकाशक सूर्य प्रकाशरूपी गुणको पाकर भी अस्ताचलको जाते समय अपने किरणसमूहको समेटकर जैसे निर्गुण हो जाता है, उसी प्रकार भेदभावसे रहित हुआ मुनि यहाँ अविनाशी निर्गुण ब्रह्ममें प्रवेश कर जाता है
भीष्म बोले—यद्यपि इस भूतल पर रहने वाला मनुष्य पृथ्वी का अन्त नहीं देखता, तथापि समझो कि कहीं-न-कहीं उसका अन्त अवश्य है। जैसे समुद्र में लहरों से ऊपर-नीचे होता हुआ जहाज़ भी प्रवाह के अनुकूल अनुकूल वायु से तट पर लग जाता है, वैसे ही संसार-सागर में डूबता-उतराता मनुष्य अनुकूल आध्यात्मिक वातावरण से पार हो जाता है। जैसे सूर्य प्रकाश-गुण को धारण करके भी अस्त होते समय किरण-मण्डल समेटकर मानो निर्गुण हो जाता है, वैसे ही भेदभाव-रहित मुनि यहाँ अविनाशी निर्गुण ब्रह्म में प्रवेश कर जाता है।
Verse 32
अनागतं सुकृतवतां परां गतिं स्वयम्भुवं प्रभवनिधानमव्ययम् । सनातन यदमृतमव्ययं ध्रुवं निचाय्य तत् परममृतत्वमश्षुते,जो कहींसे आया हुआ नहीं है, नित्य विद्यमान है, पुण्यवानोंकी परमगति है, स्वयम्भू (अजन्मा) है, सबकी उत्पत्ति और प्रलयका स्थान है, अविनाशी एवं सनातन है, अमृत, अविकारी एवं अचल है, उस परमात्माका ज्ञान प्राप्त करके मनुष्य परममोक्षको प्राप्त कर लेता है
भीष्म बोले—वह परम तत्त्व कहीं से आया हुआ नहीं, नित्य विद्यमान है; पुण्यवानों की परमगति है; स्वयम्भू (अजन्मा) है; सबकी उत्पत्ति और प्रलय का आश्रय है; अविनाशी और सनातन है—अमृत, अविकारी और ध्रुव। उस परमात्मा को जानकर मनुष्य परम मोक्ष, मृत्यु से परे अवस्था, प्राप्त कर लेता है।
Verse 205
इस प्रकार श्रीमह्याभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें मनु और बृहस्पतिका संवादविषयक दो सौ पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ
इस प्रकार श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्व में मनु और बृहस्पति के संवाद-विषयक दो सौ पाँचवाँ अध्याय समाप्त हुआ।
Verse 206
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि मनुबृहस्पतिसंवादे षडधिकद्विशततमो<ध्याय:
इति श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व में मोक्षधर्मपर्व के अन्तर्गत मनु–बृहस्पति संवाद का दो सौ छठा अध्याय।
The chapter analyzes how a person becomes behaviorally compelled by desire-driven cognition—progressing from kāma to krodha, lobha, pride, and ahaṃkāra—until action and attachment produce sorrow and repeated suffering.
Understand the causes (kāraṇas) of sense-impulses and identification, then apply tyāga and nirodha: suffering grows through appropriation and self-referential conceit, and diminishes through relinquishment and disciplined restraint grounded in discernment.
Yes: the chapter states that one who knows cessation (nirodhajña) is freed, and that when the causal bases are known the embodied being “does not again deserve/require a body,” indicating release from renewed embodiment.