Mahabharata Adhyaya 109
Drona ParvaAdhyaya 10946 Versesसात्यकि के आक्रमण से कौरव-पक्ष का व्यूह टूटता है और सेना भयभीत होकर पीछे हटती है; पलड़ा पांडव-पक्ष की ओर झुकता है।

Adhyaya 109

Droṇa-parva Adhyāya 109 — Karṇa–Bhīma Yuddha and Durmukha’s Fall (कर्णभीमयुद्धम्; दुर्मुखवधः)

Upa-parva: Karna–Bhīmasena Saṅgrāma (Tactical Engagement Episode within Droṇa-parva)

Saṃjaya reports that Karṇa, having been defeated and made chariotless by Bhīma, mounts another chariot and immediately strikes the Pāṇḍava warrior. A sustained exchange of arrows follows, described through similes of powerful animals clashing. Bhīma answers Karṇa’s volleys with denser counter-fire, then launches a heavy mace toward the sūtaputra; the mace strike disables Karṇa’s chariot team, and Bhīma further cuts down the standard and strikes the charioteer, leaving Karṇa on a compromised vehicle. The narration marks this as an extraordinary display of Rādheya’s resilience even while chariotless. Observing Karṇa’s predicament, Duryodhana commands Durmukha to bring him a chariot; Durmukha advances and attempts to check Bhīma with arrows. Bhīma sends a chariot toward Durmukha and, in the same moment, dispatches him with nine well-feathered shafts. Karṇa mounts the offered chariot, shines again in battle, then pauses in visible grief upon seeing Durmukha’s body, circumambulates him, and resumes combat. Bhīma and Karṇa exchange fourteen nārācas each; Karṇa’s counter strikes pierce Bhīma’s left arm, causing heavy bleeding. Bhīma retaliates with swift arrows against Karṇa and his charioteer; Karṇa, unsettled by Bhīma’s force, withdraws rapidly from the immediate engagement, while Bhīma remains poised, bow drawn, described as blazing like fire.

Chapter Arc: संजय धृतराष्ट्र से कहते हैं कि द्रोण-पर्व के रण में केकयराज बृहत्क्षत्र के आगमन से कौरव-सेना में हलचल मचती है, और क्षेमधूर्ति उनके वक्ष पर तीव्र बाण-वर्षा कर युद्ध का द्वार खोल देता है। → क्षेमधूर्ति क्रोध में आकर तीखे भल्ल से बृहत्क्षत्र का धनुष काट देता है; उधर त्रिगर्त-पुत्र निरमित्र कौरव-वाहिनी को व्यथित करता हुआ रथ से गिरता है। युद्ध ‘तुमुल’ और ‘प्रेक्षणीय’ बन जाता है—सिद्ध-चारण तक विस्मित होकर देखते हैं। इसी बीच सात्यकि (युयुधान) अपनी युद्ध-उन्मत्त गति से कौरव-पंक्तियों को तोड़ने लगता है। → सात्यकि के शराघात से मगध-सैनिकों सहित कौरव-व्यूह भंग हो जाता है; भागते हुए शेष सैनिकों को देखकर स्पष्ट होता है कि रण-भूमि में उस क्षण निर्णायक दबाव सात्यकि के पक्ष में चला गया है। → महायशस्वी सात्यकि कौरव-सेना का विनाश कर अपने श्रेष्ठ धनुष को विधुन्वाता हुआ रण में चमकता है; भयभीत और तितर-बितर कौरव-सेना पुनः युद्ध के लिए सामने नहीं आती। → कौरव-पक्ष के बिखरने के बाद अगला प्रश्न यह रह जाता है कि कौन-सा वरिष्ठ योद्धा आगे बढ़कर सात्यकि के वेग को रोकेगा और व्यूह को फिर से बाँधेगा।

Shlokas

Verse 1

/ भीकम (2 अमान सप्ताधिकशततमो< ध्याय: कौरव-सेनाके क्षेमधूर्ति

संजय बोले—महाराज! केकयदेश के दृढ़ पराक्रमी वीर बृहत्क्षत्र को आते देख क्षेमधूर्तिने बाणों से उसकी छाती में बेध कर दिया।

Verse 2

संजय कहते हैं--महाराज! तदनन्तर सुदृढ़ पराक्रमी केकयराज बृहत्क्षत्रकों आते देख क्षेमधूर्तिने अनेक बाणोंद्वारा उनकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी ।।

संजय बोले—महाराज! इसके बाद दृढ़ पराक्रमी केकयराज बृहत्क्षत्र को आते देख क्षेमधूर्तिने अनेक बाणों से उसकी छाती में गहरी चोट पहुँचायी। तब, राजन्, द्रोणाचार्य के सैन्यव्यूह को भंग करने की इच्छा से बृहत्क्षत्र ने भी झुकी हुई गाँठवाले नब्बे बाणों द्वारा तुरंत ही क्षेमधूर्तिको घायल कर दिया।

Verse 3

क्षेमधूर्तिस्तु संक्रुद्ध: कैकेयस्य महात्मन: । धनुश्चिच्छेद भल्‍लेन पीतेन निशितेन ह,इससे क्षेमधूर्ति अत्यन्त कुपित हो उठा और उसने पानीदार तीखे भल्लसे महामनस्वी केकयराजका धनुष काट डाला

संजय बोले—क्रोध से उन्मत्त क्षेमधूर्ति ने महामनस्वी कैकेयराज पर प्रहार किया और चमकते, तीखे भल्ल से उसका धनुष दो टुकड़े कर दिया।

Verse 4

अथीैनं छिन्नधन्वानं शरेणानतपर्वणा । विव्याध समरे तूर्ण प्रवरं सर्वधन्विनाम्‌,धनुष कट जानेपर समस्त धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ बृहत्क्षत्रकों समरांगणमें झुकी हुई गाँठवाले बाणसे उसने तुरंत ही बींध डाला

संजय बोले—फिर धनुष कट जाने से धनुर्विहीन हुए उस वीर को उसने झुकी हुई गाँठों वाले बाण से रणभूमि में शीघ्र ही बेध दिया—जो समस्त धनुर्धरों में श्रेष्ठ गिना जाता था।

Verse 5

अथान्यद्‌ धनुरादाय बृहत्क्षत्रो हसन्निव । व्यश्वसूतरथं चक्रे क्षेमधूर्ति महारथम्‌,तदनन्तर बृहत्क्षत्रने दूसरा धनुष हाथमें लेकर हँसते-हँसते महारथी क्षेमधूर्तिको घोड़ों, सारथि और रथसे हीन कर दिया

संजय बोले—तदनन्तर बृहत्क्षत्र ने दूसरा धनुष उठा लिया और मानो हँसते हुए, महारथी क्षेमधूर्ति को घोड़ों, सारथि और रथ से वंचित कर दिया।

Verse 6

ततो5परेण भल्लेन पीतेन निशितेन च । जहार नृपते: कायाच्छिरो ज्वलितकुण्डलम्‌,इसके बाद दूसरे पानीदार तीखे भल्लसे राजा क्षेमधूर्तिके प्रज्वलित कुण्डलोंवाले मस्तकको धड़से अलग कर दिया

संजय बोले—तत्पश्चात उसने दूसरे चमकते, तीखे भल्ल से राजा का ज्वलित कुण्डलों से सुशोभित मस्तक धड़ से अलग कर दिया।

Verse 7

तच्छिन्नं सहसा तस्य शिर: कुज्चितमूर्थजम्‌ । सकिरीटं महीं प्राप्प बभौ ज्योतिरिवाम्बरात्‌

संजय बोले—तत्क्षण कटा हुआ, घुँघराले बालों वाला वह मस्तक मुकुट सहित पृथ्वी पर गिरा और आकाश से टूटे हुए उल्का-तारे के समान दीप्तिमान प्रतीत हुआ।

Verse 8

त॑ निहत्य रणे हृष्टो बृहत्क्षत्रो महारथः । सहसाभ्यपतत सैन्यं तावकं पार्थकारणात्‌,रणक्षेत्रमें क्षेमधूर्तिका वध करके प्रसन्न हुए महारथी बृहत्क्षत्र यूधिष्ठिरके हितके लिये सहसा आपकी सेनापर टूट पड़े

रण में उन्हें मारकर हर्षित हुए महारथी बृहत्क्षत्र, पार्थपुत्र युधिष्ठिर के हित के लिए, सहसा आपकी सेना पर टूट पड़े।

Verse 9

धृष्टकेतुं तथा5<यान्तं द्रोणहेतो: पराक्रमी । वीरधन्वा महेष्वासो वारयामास भारत,भारत! इसी प्रकार द्रोणाचार्यके हितके लिये महाधनुर्धर पराक्रमी वीरधन्वाने वहाँ आते हुए धृष्टकेतुको रोका

भारत! इसी प्रकार द्रोणाचार्य के हित के लिए, वहाँ आते हुए धृष्टकेतु को महाधनुर्धर पराक्रमी वीरधन्वा ने रोक लिया।

Verse 10

तौ परस्परमासाद्य शरदंष्टी तरस्विनौ । शरैरनेकसाहसैरन्योन्यमभिजघध्नतु:,वे दोनों वेगशाली वीर बाणरूपी दाढ़ोंसे युक्त हो परस्पर भिड़कर अनेक सहस्र बाणोंद्वारा एक-दूसरेको चोट पहुँचाने लगे

वे दोनों वेगशाली वीर, बाणरूपी दाँतों से युक्त वराहों की भाँति परस्पर भिड़कर, अनेक सहस्र बाणों से एक-दूसरे को आहत करने लगे।

Verse 11

तावुभौ नरशार्दूलौ युयुधाते परस्परम्‌ । महावने तीव्रमदौ वारणाविव यूथपौ,महान्‌ वनमें तीव्र मदवाले दो यूथपति गजराजोंके समान वे दोनों पुरुषसिंह परस्पर युद्ध करने लगे

वे दोनों नरशार्दूल परस्पर आमने-सामने युद्ध करने लगे—जैसे महान वन में तीव्र मदवाले दो यूथपति गजराज भिड़ते हों।

Verse 12

गिरिगह्वरमासाद्य शार्दूलाविव रोषितौ | युयुधाते महावीर्यों परस्परजिघांसया

वे दोनों महान पराक्रमी, एक-दूसरे को मार डालने की इच्छा से क्रोध में भरकर, पर्वत-गुहा में पहुँचे हुए दो क्रुद्ध शार्दूलों की भाँति परस्पर जूझ रहे थे।

Verse 13

तद्‌ युद्धमासीत तुमुल प्रेक्षणीयं विशाम्पते । सिद्धचारणसंघानां विस्मयाद्धुतदर्शनम्‌,प्रजानाथ! उनका वह घमासान युद्ध देखने ही योग्य था। वह सिद्धों और चारणसमूहोंको भी आश्चर्यजनक एवं अद्भुत दिखायी देता था

संजय बोले—प्रजानाथ! वह युद्ध अत्यन्त तुमुल और घमासान था, देखने योग्य। सिद्धों और चारणों के समुदायों को भी वह अद्भुत दृश्य देखकर विस्मय हुआ; आश्चर्य से उनकी दृष्टि मानो काँप उठी।

Verse 14

वीरधन्वा ततः क्रुद्धो धृष्टकेतो: शरासनम्‌ | द्विधा चिच्छेद भल्लेन प्रहसन्निव भारत,भरतनन्दन! तत्पश्चात्‌ वीरधन्वाने कुपित होकर हँसते हुए-से ही एक भल्लद्वारा धृष्टकेतुके धनुषके दो टुकड़े कर दिये

संजय बोले—भरतनन्दन! तब क्रुद्ध हुए वीरधन्वा ने मानो हँसते हुए-से एक भल्ल-बाण से धृष्टकेतु के धनुष को दो टुकड़ों में काट दिया।

Verse 15

तदुत्सज्य धनुश्छिन्नं चेदिराजो महारथ: । शक्ति जग्राह विपुलां हेमदण्डामयस्मयीम्‌,महारथी चेदिराज धृष्टकेतुने उस कटे हुए धनुषको फेंककर एक लोहेकी बनी हुई स्वर्णदण्डविभूषित विशाल शक्ति हाथमें ले ली

संजय बोले—कटे हुए धनुष को त्यागकर चेदिराज महारथी धृष्टकेतु ने लोहे की बनी, स्वर्णदण्ड से विभूषित विशाल शक्ति हाथ में ले ली।

Verse 16

तां तु शक्ति महावीर्या दोर्भ्यामायम्य भारत । चिक्षेप सहसा यत्तो वीरधन्वरथं प्रति,भारत! उस अत्यन्त प्रबल शक्तिको दोनों हाथोंसे उठाकर यत्नशील धृष्टकेतुने सहसा वीरधन्वाके रथपर उसे दे मारा

संजय बोले—भारत! उस अत्यन्त प्रबल शक्ति को दोनों हाथों से खींचकर, यत्नशील धृष्टकेतु ने सहसा उसे वीरधन्वा के रथ की ओर दे मारा।

Verse 17

तया तु वीरघातिन्या शक्‍त्या त्वभिहतो भूशम्‌ । निर्भिन्नहदयस्तूर्ण निषपपात रथान्महीम्‌,उस वीरघातिनी शक्तिकी गहरी चोट खाकर वीरधन्वाका वक्ष:स्थल विदीर्ण हो गया और वह तुरंत ही रथसे पृथ्वीपर गिर पड़ा

संजय बोले—उस वीरघातिनी शक्ति की गहरी चोट से वह अत्यन्त आहत हुआ; उसका हृदय विदीर्ण हो गया और वह तुरंत रथ से पृथ्वी पर गिर पड़ा।

Verse 18

तस्मिन्‌ विनिहते वीरे त्रैगर्तानां महारथे । बल॑ ते5भज्यत विभो पाण्डवेयै: समन्ततः,प्रभो! त्रिगर्तदेशके उस महारथी वीरके मारे जानेपर पाण्डव-सैनिकोंने चारों ओरसे आपकी सेनाको विघटित कर दिया

त्रिगर्तों के उस महारथी वीर के मारे जाने पर, हे प्रभो, पाण्डव-सैनिकों ने चारों ओर से आक्रमण करके आपकी सेना की व्यूह-रचना को तोड़-फोड़ कर बिखेर दिया।

Verse 19

सहदेवे तत: षष्टिं सायकान्‌ दुर्मुखोक्षिपत्‌ । ननाद च महानादं तर्जयन्‌ पाण्डवं रणे,तदनन्तर दुर्मुखने रणक्षेत्रमें सहदेवपर साठ बाण चलाये और उन पाण्डुकुमारको डाँट बताते हुए बड़े जोरसे गर्जना की

तदनन्तर दुर्मुख ने रणभूमि में सहदेव पर साठ बाण चलाए और पाण्डव को ललकारते हुए महागर्जना की।

Verse 20

माद्रेयस्तु ततः क्रुद्धो दुर्मुखं च शितैः शरै: । भ्राता भ्रातरमायान्तं विव्याध प्रहसन्निव

यह देखकर माद्रीकुमार सहदेव क्रुद्ध हो उठे। अपने ही भ्राता-तुल्य दुर्मुख को पास आते देख उन्होंने मानो हँसते हुए तीखे बाणों से उसे बेध डाला।

Verse 21

त॑ रणे रभसं दृष्टवा सहदेवं महाबलम्‌ | दुर्मुखो नवभिर्बाणैस्ताडयामास भारत,भारत! रणक्षेत्रमें महाबली सहदेवका वेग बढ़ता देख दुर्मुखने नौ बाणोंद्वारा उन्हें घायल कर दिया

भारत! रणक्षेत्र में महाबली सहदेव का प्रचण्ड वेग देखकर दुर्मुख ने नौ बाणों से उन्हें आहत कर दिया।

Verse 22

दुर्मुबस्य तु भल्लेन छित्त्वा केतुं महाबल: । जघान चतुरो वाहांश्षतुर्भिनिशितै: शरै:,तब महाबली सहदेवने एक भल्लसे दुर्मुखकी ध्वजा काटकर चार तीखे बाणोंद्वारा उसके चारों घोड़ोंको मार डाला

तब महाबली सहदेव ने एक भल्ल से दुर्मुख की ध्वजा काट दी और चार तीखे बाणों से उसके चारों घोड़ों को मार गिराया।

Verse 23

अथापरेण भल्लेन पीतेन निशितेन ह । चिच्छेद सारथे: कायाच्छिरो ज्वलितकुण्डलम्‌

तब उसने पीले वर्ण के एक और तीक्ष्ण भल्ल से सारथि के शरीर से ज्वलित कुण्डलों से सुशोभित सिर काट गिराया।

Verse 24

फिर दूसरे पानीदार एवं तीखे भल्लसे उसके सारथिके चमकीले कुण्डलवाले मस्तकको धड़से काट गिराया ।।

फिर उसने पीले वर्ण के तीक्ष्ण भल्ल से सारथि का ज्वलित कुण्डल-युक्त मस्तक धड़ से काट गिराया। तत्पश्चात् सहदेव ने तीक्ष्ण क्षुरप्र से रण में कौरव का विशाल धनुष काट दिया और फिर उसे पाँच बाणों से बेध दिया।

Verse 25

हताश्चृं तु रथं त्यक्त्वा दुर्मुखो विमनास्तदा । आरुरोह रथं राजन्‌ निरमित्रस्थ भारत

तब हताश दुर्मुख अपना रथ छोड़कर, उस समय खिन्न मन से, हे राजन्, निरमित्र के रथ पर जा चढ़ा।

Verse 26

राजन्‌! भरतनन्दन! तब दुर्मुख दुःखी मनसे उस अश्वहीन रथको त्यागकर निरमित्रके रथपर जा चढ़ा ।।

हे राजन्, भरतनन्दन! तब दुःखी मन वाला दुर्मुख उस अश्वहीन रथ को त्यागकर निरमित्र के रथ पर जा चढ़ा। तब शत्रुवीरों का संहार करने वाले सहदेव क्रुद्ध हो उठे और उस महासमर में सेना के बीचोबीच भल्ल से निरमित्र को मार गिराया।

Verse 27

स पपात रथोपस्थान्निरमित्रो जनेश्वर: । त्रिगर्तराजस्य सुतो व्यथयंस्तव वाहिनीम्‌,त्रिगर्तराजका पुत्र राजा निरमित्र अपने वियोगसे आपकी सेनाको व्यथित करता हुआ रथकी बैठकसे नीचे गिर पड़ा

तब त्रिगर्तराज का पुत्र, जनाधिप निरमित्र, जो आपकी वाहिनी को व्यथित कर रहा था, रथ की बैठक से नीचे गिर पड़ा।

Verse 28

त॑ तु हत्वा महाबाहुः सहदेवो व्यरोचत । यथा दाशरथी राम: खरं हत्वा महाबलम्‌

उसको मारकर महाबाहु सहदेव वैसे ही शोभित हुए, जैसे दाशरथिनन्दन श्रीराम महाबली खर का वध करके सुशोभित हुए थे।

Verse 29

हाहाकारो महानासीत्‌ त्रिगर्तानां जनेश्वर । राजपुत्रं हतं दृष्टवा निरमित्र॑ं महारथम्‌,नरेश्वर! महारथी राजकुमार निरमित्रको मारा गया देख त्रिगर्तोंके दलमें महान्‌ हाहाकार मच गया

नरेश्वर! महारथी राजकुमार निरमित्र को मरा हुआ देखकर त्रिगर्तों में महान् हाहाकार मच गया।

Verse 30

नकुलस्ते सुतं राजन्‌ विकर्ण पृथुलोचनम्‌ । मुहूर्ताज्जितवॉल्लोके तदद्भुतमिवा भवत्‌,राजन! नकुलने विशाल नेत्रोंवाले आपके पुत्र विकर्णको दो ही घड़ीमें पराजित कर दिया; यह अद्भुत-सी बात हुई

राजन्! नकुल ने विशाल नेत्रोंवाले आपके पुत्र विकर्ण को क्षणभर में जीत लिया; यह लोक में अद्भुत-सा प्रतीत हुआ।

Verse 31

सात्यकिं व्याप्रदत्तस्तु शरै: संनतपर्वभि: । चक्रे<दृश्यं साश्वसूतं सध्वजं पृतनान्तरे,व्याप्रदत्तने झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा सेनाके मध्यभागमें घोड़ों, सारथि और ध्वजसहित सात्यकिको अदृश्य कर दिया

तब व्याप्रदत्त ने झुकी हुई गाँठवाले बाणों से सेना के बीच सात्यकि को घोड़ों, सारथि और ध्वज सहित ऐसा ढक दिया कि वह अदृश्य-सा हो गया।

Verse 32

तान्‌ निवार्य शरान्‌ शूर: शैनेय: कृतहस्तवत्‌ | साश्व॒सूतध्वजं बाणैरव्याच्रिदत्तमपातयत्‌

तब शूरवीर शैनेय सात्यकि ने सिद्धहस्त की भाँति उन बाणों को रोककर अपने बाणों से घोड़ों, सारथि और ध्वज सहित अव्याच्रिदत्त को मार गिराया।

Verse 33

कुमारे निहते तस्मिन्‌ मागधस्य सुते प्रभो । मागधा: सर्वतो यत्ता युयुधानमुपाद्रवन्‌,प्रभो! मगधनरेशके पुत्र राजकुमार व्याप्रदत्तके मारे जानेपर मगधदेशीय वीरोंने सब ओरसे प्रयत्नशील होकर युयुधानपर धावा किया

प्रभो! मगधराज के उस कुमार के मारे जाने पर मगधदेश के वीर चारों ओर से उद्यत होकर युयुधान पर टूट पड़े।

Verse 34

विसृजन्त:ः शरांश्वैव तोमरांश्न सहस्रश: । भिन्दिपालांस्तथा प्रासान्‌ मुदूगरान्‌ मुसलानपि

वे सहस्रों बाण और तोमर छोड़ते रहे; भिन्दिपाल, प्रास, मुद्गर और मुसल भी फेंकते रहे।

Verse 35

तांस्तु सर्वानू स बलवान्‌ सात्यकिर्युद्धदुर्मद:

तब युद्ध के उन्माद से मतवाला बलवान् सात्यकि उन सबका सामना करने लगा।

Verse 36

मागधान्‌ द्रवतो दृष्टवा हतशेषान्‌ समन्ततः

चारों ओर से भागते हुए, वध के बाद बचे-खुचे मगधों को देखकर,

Verse 37

नाशयित्वा रणे सैन्यं त्वदीयं माधवोत्तम:

रण में तुम्हारी सेना का नाश करके, माधवों में श्रेष्ठ (श्रीकृष्ण) ...

Verse 38

भज्यमानं बल॑ राजन्‌ सात्वतेन महात्मना

संजय बोले—राजन्, उस महात्मा सात्वत वीर के द्वारा सेना चूर-चूर की जा रही थी; रणभूमि में उसका अप्रतिहत पराक्रम व्यूहों को तोड़ता हुआ सब दर्शकों के धैर्य और धर्मबुद्धि की परीक्षा ले रहा था।

Verse 39

ततो द्रोणो भृशं क्रुद्ध: सहसोदवृत्य चक्षुषी । सात्यकिं सत्यकर्माणं स्वयमेवाभिदुद्रुवे,तब अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए द्रोणाचार्यने सहसा आँखें घुमाकर सत्यकर्मा सात्यकिपर स्वयं ही आक्रमण किया

संजय बोले—तब द्रोणाचार्य अत्यन्त क्रोध से भरकर, सहसा आँखें घुमाते हुए, सत्यकर्मा सात्यकि पर स्वयं ही टूट पड़े; उस क्षण रणक्रोध ने शास्त्रज्ञ गुरु के संयम को भी भेदकर त्वरित प्रतिशोध की ओर धकेल दिया और कर्तव्य व आवेग के बीच का धर्म-संकट और तीव्र हो उठा।

Verse 106

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें युधिष्चटिरका पलायनविषयक एक सौ छवाँ अध्याय पूरा हुआ

इस प्रकार श्रीमहाभारत के द्रोणपर्व के अन्तर्गत जयद्रथवधपर्व में युधिष्ठिर के पलायन-विषयक एक सौ छठा अध्याय समाप्त हुआ।

Verse 107

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि संकुलयुद्धे सप्ताधिकशततमो<ध्याय:

इति श्रीमहाभारत के द्रोणपर्व में जयद्रथवधपर्व के अन्तर्गत संकुल युद्ध-वर्णन वाला एक सौ सातवाँ अध्याय।

Verse 346

अयोधयमन्‌ रणे शूरा: सात्वतं युद्धदुर्मदम्‌ । वे शूरवीर मागध-सैनिक बहुत-से बाणों

संजय बोले—रण में शूरवीरों ने युद्धोन्मत्त सात्वत वीर सात्यकि से युद्ध किया। मागध के सैनिक बहुत-से बाणों, सहस्रों तोमरों, भिन्दिपालों, प्रासों, मुदगरों और मूसलों से प्रहार करते हुए समरांगण में उस पर टूट पड़े; परन्तु वह रण में दुर्जय ही बना रहा।

Verse 356

नातिकृच्छाद्धसन्नेव विजिग्ये पुरुषर्षभ: । बलवान युद्धदुर्मद पुरुषप्रवर सात्यकिने हँसते हुए ही उन सबको अधिक कष्ट उठाये बिना ही परास्त कर दिया

संजय बोले—अधिक कष्ट उठाए बिना, मानो हँसते हुए ही, युद्ध के उन्माद से उद्दीप्त, बलवान् पुरुषश्रेष्ठ सात्यकि ने उन सबको परास्त कर दिया।

Verse 363

बल॑ ते5भज्यत विभो युयुधानशरार्दितम्‌ । प्रभो! मरनेसे बचे हुए मागध-सैनिकोंको चारों ओर भागते देख सात्यकिके बाणोंसे पीड़ित हुई आपकी सेनाका व्यूह भंग हो गया

संजय बोले—प्रभो! युयुधान (सात्यकि) के बाणों से आहत आपकी सेना का बल टूट गया। मृत्यु-भय से बचे हुए मागध सैनिकों को चारों ओर भागते देख, भयभीत और घायल दलों का व्यूह भंग हो गया।

Verse 376

विधुन्वानो धनु: श्रेष्ठ व्यभश्राजत महायशा: । इस प्रकार मधुवंशके श्रेष्ठ वीर महायशस्वी सात्यकि रणक्षेत्रमें आपकी सेनाका विनाश करके अपने उत्तम धनुषको हिलाते हुए बड़ी शोभा पा रहे थे

संजय बोले—श्रेष्ठ धनुष को हिलाते हुए वह महायशस्वी योद्धा अत्यन्त दीप्तिमान् हो उठा। इस प्रकार मधुवंश के श्रेष्ठ वीर, श्रीमान् सात्यकि ने रणभूमि में आपकी सेना का विनाश करके अपने उत्तम धनुष को झकझोरते हुए परम शोभा पाई।

Verse 386

नाभ्यवर्तत युद्धाय त्रासितं दीर्घबाहुना । राजन! महामना महाबाहु सात्यकिके द्वारा डरायी गयी और तितत-बितर की हुई आपकी सेना फिर युद्धके लिये सामने नहीं आयी

संजय बोले—राजन्! दीर्घबाहु, महामना, महाबाहु सात्यकि के द्वारा भयभीत और तितर-बितर हुई आपकी सेना फिर युद्ध के लिए सामने नहीं आई।

Frequently Asked Questions

The chapter frames a dharma tension between relentless pursuit of advantage (including disabling chariot infrastructure and pre-empting reinforcements) and the intermittent demands of honor and grief, seen when Karṇa pauses to acknowledge Durmukha even as the engagement continues.

Capability in action is shown as relational and conditional: success depends on support systems, composure, and adaptive decision-making; emotional disturbance can briefly suspend strategic clarity, yet duty-driven re-entry remains a defining feature of kṣātra conduct.

No explicit phalaśruti is provided in this adhyāya; its significance is contextual, contributing to the epic’s cumulative reflection on agency, loss, and the ethical ambiguity of tactical necessity within the broader war narrative.

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