Adhyaya 19
Ashvamedhika ParvaAdhyaya 1969 Verses

Adhyaya 19

Mokṣa-dharma Yoga-Upadeśa: Equanimity, Sense-Restraint, and Vision of the Ātman (आत्मदर्शन-योगोपदेशः)

Upa-parva: Mokṣa-dharma (Yoga-Upadeśa episode within Āśvamedhika Parva)

A Brahmin speaker outlines a liberation-oriented profile: the practitioner becomes non-initiating (nirārambha), friendly to all, forbearing, self-controlled, pure in conduct, free from pride and fear, and equal toward life/death, pleasure/pain, gain/loss, and the dear/hostile. Detachment (vairāgya) and the relinquishing of mental constructions lead gradually to nirvāṇa-like quiescence, likened to a fire extinguished without fuel. The discourse then turns technical: yoga is taught as sense-withdrawal and mind-fixation in the self, practiced in solitude and silence, with stepwise interior attention to the ‘city’ (pura) of embodiment—moving from external orientation to dwelling within the body’s ‘abode.’ Metaphors clarify self-extraction: like drawing a reed from muñja grass, the yogin discerns the self distinct from the body. The realized practitioner is described as unshaken by distress, unafraid amid worldly dissolution, and oriented to Brahman beyond sensory grasp, apprehended by the ‘lamp’ of mind. A student then asks physiological questions (digestion, breath, growth, wastes, locus of self), prompting the teacher’s response: the mind is placed within the body through controlled ‘gates’ (dvāras), seeking the self without negligence. Vāsudeva reports the teaching to Arjuna, stresses its esoteric status, and concludes with a practical claim: for one constantly disciplined, yoga becomes effective within six months.

Chapter Arc: एक ब्राह्मण-गुरु शिष्य को ‘एकायन’ (एक-निष्ठ) साधना का रहस्य खोलते हैं—कैसे तुष्णीम्, अल्पचिन्तन, और आत्म-स्थापन से मोक्ष का द्वार खुलता है। → उपदेश सूक्ष्म होता जाता है: ‘सर्वमित्र, सर्वसह, शम-रत, जितेन्द्रिय’ बनने की कठिन शर्तें; सब प्राणियों में आत्मवत् व्यवहार; और निर्जन वन में इन्द्रिय-ग्राम को संनियम्य कर भीतर-ही-भीतर काय-चिन्तन। साधक के सामने सबसे बड़ा शत्रु बाह्य विषय नहीं, भीतर का चंचल मन है—जो ‘कोष’ में वस्तुएँ रख देने पर भी उन्हीं का ध्यान करता रहता है। → गुरु ‘सर्वरहस्य’ का सार बाँध देते हैं: इन्द्रियों का निर्घोष-निग्रह, एकाग्रता, और मन को ‘पुर के भीतर’ स्थिर करना—बाह्य में नहीं। यही वह निर्णायक बिन्दु है जहाँ साधना का मार्ग कर्म-आचरण से आगे बढ़कर अन्तःकरण-शासन में परिणत होता है। → गुरु शिष्य को रहस्य कहकर विदा करते हैं—‘यथासुखं गच्छ’; और साथ ही संकेत देते हैं कि स्वधर्म-रत (यहाँ तक कि क्षत्रिय भी) यदि नित्य ब्रह्मलोक-परायण हों तो वही परमगति के अधिकारी हैं। → शिष्य (या जिज्ञासु) आगे जीवात्मा के शरीर-भार-वहन और नये शरीर-धारण (कैसे, किस प्रकार/‘किस रंग’ के) जैसे गूढ़ प्रश्न उठाता है—और कथावाचक कहता है कि उसने ‘यथाश्रुत’ उत्तर दिया, जिससे आगे के अध्यायों में सूक्ष्म देह-तत्त्व का विस्तार होने का संकेत मिलता है।

Shlokas

Verse 1

प्याज बछ। जज: एकोनविशो< ध्याय: गुरु-शिष्यके संवादमें मोक्षप्राप्तिके उपायका वर्णन ब्राह्मण उवाच यः स्यादेकायने लीनस्तूष्णीं किंचिदचिन्तयन्‌ । पूर्व पूर्व परित्यज्य स तीर्णो बन्धनाद्‌ भवेत्‌,सिद्ध ब्राह्मणने कहा--काश्यप! जो मनुष्य (स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरोंमेंसे क्रमश:) पूर्व-पूर्वका अभिमान त्यागकर कुछ भी चिन्तन नहीं करता और मौनभावसे रहकर सबके एकमात्र अधिष्ठान--परत्रह्म परमात्मामें लीन रहता है, वही संसार-वन्धनसे मुक्त होता है

ब्राह्मण ने कहा—हे काश्यप! जो पुरुष एकमात्र आश्रय परमात्मा में लीन रहकर मौन रहता है, कुछ भी चिन्तन नहीं करता, और क्रमशः पूर्व-पूर्व अवस्थाओं के अभिमान को त्याग देता है, वही बन्धन को पार कर मुक्त हो जाता है।

Verse 2

सर्वमित्र: सर्वसह: शमे रक्तो जितेन्द्रिय: । व्यपेतभयमन्युश्च॒ आत्मवान्‌ मुच्यते नर:,जो सबका मित्र, सब कुछ सहनेवाला, मनोनिग्रहमें तत्पर, जितेन्द्रिय, भय और क्रोधसे रहित तथा आत्मवान्‌ है, वह मनुष्य बन्धनसे मुक्त हो जाता है

ब्राह्मण ने कहा—जो सबका मित्र, सब कुछ सहनेवाला, शम में अनुरक्त, जितेन्द्रिय, भय और क्रोध से रहित तथा आत्मवान् है, वही मनुष्य बन्धन से मुक्त हो जाता है।

Verse 3

आत्मवत्‌ सर्वभूतेषु यश्नरेन्नियत: शुचि: । अमानी निरभीमान: सर्वतो मुक्त एव सः,जो नियमपरायण और पवित्र रहकर सब प्राणियोंके प्रति अपने-जैसा बर्ताव करता है, जिसके भीतर सम्मान पानेकी इच्छा नहीं है तथा जो अभिमानसे दूर रहता है, वह सर्वथा मुक्त ही है

ब्राह्मण ने कहा—जो नियमपरायण और पवित्र रहकर सब प्राणियों के प्रति अपने-जैसा व्यवहार करता है, जो मान नहीं चाहता और अभिमान से रहित रहता है, वह सर्वथा मुक्त ही है।

Verse 4

जीवितं मरणं चोभे सुखदु:खे तथैव च । लाभालाभे प्रियद्वेष्पे य: सम: स च मुच्यते,जो जीवन-मरण, सुख-दुःख, लाभ-हानि तथा प्रिय-अप्रिय आदि द्वन्धोंको समभावसे देखता है, वह मुक्त हो जाता है

ब्राह्मण ने कहा—जो जीवन-मरण, सुख-दुःख, लाभ-हानि तथा प्रिय-अप्रिय आदि द्वन्द्वों को समभाव से देखता है, वही मुक्त हो जाता है।

Verse 5

न कस्यचित्‌ स्पृहयते नावजानाति किंचन । निर्दचन्दो वीतरागात्मा सर्वथा मुक्त एव सः,जो किसीके द्रव्यका लोभ नहीं रखता, किसीकी अवहेलना नहीं करता, जिसके मनपर द्न्द्दोंका प्रभाव नहीं पड़ता और जिसके चित्तकी आसक्ति दूर हो गयी है, वह सर्वथा मुक्त ही है

जो किसी के द्रव्य का लोभ नहीं करता, किसी का तिरस्कार नहीं करता, जिसके मन पर द्वन्द्वों का प्रभाव नहीं पड़ता और जिसका अन्तःकरण आसक्ति-रहित हो गया है—वह सर्वथा मुक्त ही है।

Verse 6

अनमित्रश्न निर्बन्धुरनपत्यश्न यः क्वचित्‌ । त्यक्तधर्मार्थकामश्न निराकाड्क्षी च मुच्यते,जो किसीको अपना मित्र, बन्धु या संतान नहीं मानता, जिसने सकाम धर्म, अर्थ और कामका त्याग कर दिया है तथा जो सब प्रकारकी आकांक्षाओंसे रहित है, वह मुक्त हो जाता है

जो किसी भी स्थिति में किसी को ‘मेरा मित्र’, ‘मेरा बन्धु’ या ‘मेरा पुत्र’ नहीं मानता; जिसने सकाम धर्म, अर्थ और काम का त्याग कर दिया है; और जो समस्त आकांक्षाओं से रहित है—वह मुक्त हो जाता है।

Verse 7

नैव धर्मी न चाधर्मी पूर्वोपचितहायक: । धातुक्षयप्रशान्तात्मा निर्दन्दः स विमुच्यते,जिसकी न धर्ममें आसक्ति है न अधर्ममें, जो पूर्वसंचित कर्मोको त्याग चुका है, वासनाओंका क्षय हो जानेसे जिसका चित्त शान्त हो गया है तथा जो सब प्रकारके द्वन्धोंसे रहित है, वह मुक्त हो जाता है

जिसकी न धर्म में आसक्ति है न अधर्म में; जो पूर्वोपचित कर्मों का भार त्याग चुका है; वासनाओं के क्षय से जिसका चित्त शान्त हो गया है; और जो सब प्रकार के द्वन्द्वों से रहित है—वह मुक्त हो जाता है।

Verse 8

अकर्मवान्‌ विकाडृक्षश्न पश्येज्जगदशाश्वतम्‌ । अश्वत्थसदृशं नित्यं जन्ममृत्युजरायुतम्‌,जो किसी भी कर्मका कर्ता नहीं बनता, जिसके मनमें कोई कामना नहीं है, जो इस जगत्‌को अभश्वत्थके समान अनित्य--कलतक न टिक सकनेवाला समझता है तथा जो सदा इसे जन्म, मृत्यु और जरासे युक्त जानता है, जिसकी बुद्धि वैराग्यमें लगी रहती है और जो निरन्तर अपने दोषोंपर दृष्टि रखता है, वह शीघ्र ही अपने बन्धनका नाश कर देता है

जो कर्तापन का अभिमान नहीं करता, जिसके मन में कोई कामना नहीं, जो इस जगत् को अश्वत्थ-वृक्ष के समान क्षणभंगुर देखता है और सदा इसे जन्म, मृत्यु तथा जरा से युक्त जानता है—वह (वैराग्य की दृष्टि से) सत्य को देखता है।

Verse 9

वैराग्यबुद्धि: सततमात्मदोषव्यपेक्षक: । आत्मबन्धविनिर्मोक्षं स करोत्यचिरादिव,जो किसी भी कर्मका कर्ता नहीं बनता, जिसके मनमें कोई कामना नहीं है, जो इस जगत्‌को अभश्वत्थके समान अनित्य--कलतक न टिक सकनेवाला समझता है तथा जो सदा इसे जन्म, मृत्यु और जरासे युक्त जानता है, जिसकी बुद्धि वैराग्यमें लगी रहती है और जो निरन्तर अपने दोषोंपर दृष्टि रखता है, वह शीघ्र ही अपने बन्धनका नाश कर देता है

जिसकी बुद्धि सदा वैराग्य में स्थित रहती है और जो निरन्तर अपने दोषों पर दृष्टि रखता है—वह शीघ्र ही आत्मा के बन्धनों से विमोचन कर देता है।

Verse 10

अगन्धमरसस्पर्शमशब्दमपरिग्रहम्‌ । अरूपमनभिश्ञेयं दृष्टवा$5त्मानं विमुच्यते,जो आत्माको गन्ध, रस, स्पर्श, शब्द, परिग्रह, रूपसे रहित तथा अज्ञेय मानता है, वह मुक्त हो जाता है

जो आत्मा को गन्ध, रस, स्पर्श और शब्द से परे—परिग्रह से रहित, अरूप और सामान्य ज्ञान का विषय न मानकर यथार्थतः देखता है, वह मुक्त हो जाता है।

Verse 11

पजञ्चभूतगुणैहीनममूर्तिमदहेतुकम्‌ । अगुणं गुणभोक्तारं यः पश्यति स मुच्यते,जिसकी दृष्टिमें आत्मा पाउ्चभौतिक गुणोंसे हीन, निराकार, कारणरहित तथा निर्मुण होते हुए भी (मायाके सम्बन्धसे) गुणोंका भोक्ता है, वह मुक्त हो जाता है

जो आत्मा को पंचभूतजन्य गुणों से रहित, निराकार, कारणरहित और निर्गुण—तथापि माया-संबन्ध से गुणों का भोक्ता प्रतीत होने वाला—यथार्थतः देखता है, वह मुक्त हो जाता है।

Verse 12

विहाय सर्वसंकल्पान्‌ बुद्ध्या शारीरमानसान्‌ | शनैर्निर्वाणमाप्रोति निरिन्धन इवानल:,जो बुद्धिसे विचार करके शारीरिक और मानसिक सब संकल्पोंका त्याग कर देता है, वह बिना ईंधनकी आगके समान धीरे-धीरे शान्तिको प्राप्त हो जाता है

जो विवेक-बुद्धि से शरीर और मन से उठने वाले समस्त संकल्पों का त्याग कर देता है, वह बिना ईंधन की अग्नि के समान धीरे-धीरे निर्वाण-शान्ति को प्राप्त होता है।

Verse 13

सर्वसंस्कारनिर्मुक्तो निर्द्धन्द्रो निष्परिग्रह: । तपसा इन्द्रियग्रामं यश्नरेन्मुक्त एव सः,जो सब प्रकारके संस्कारोंसे रहित, द्वद्ध और परिग्रहसे रहित हो गया है तथा जो तपस्याके द्वारा इन्द्रिय-समूहको अपने वशमें करके (अनासक्त) भावसे विचरता है, वह मुक्त ही है

जो समस्त संस्कारों से मुक्त, द्वन्द्वों से रहित और निष्परिग्रही हो गया है, तथा जो तपस्या द्वारा इन्द्रिय-समूह को वश में करके अनासक्त भाव से विचरता है—वह तो मुक्त ही है।

Verse 14

विमुक्त: सर्वसंस्कारैस्ततो ब्रह्म सनातनम्‌ । परमाप्रोति संशान्तमचलं नित्यमक्षरम्‌,जो सब प्रकारके संस्कारोंसे मुक्त होता है, वह मनुष्य शान्त, अचल, नित्य, अविनाशी एवं सनातन परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है

जो समस्त संस्कारों से विमुक्त हो जाता है, वह शान्त, अचल, नित्य, अक्षय और सनातन परब्रह्म को प्राप्त कर लेता है।

Verse 15

अतः पर प्रवक्ष्यामि योगशास्त्रमनुत्तमम्‌ । युञ्जन्तः सिद्धमात्मानं यथा पश्यन्ति योगिन:,अब मैं उस परम उत्तम योगशास्त्रका वर्णन करूँगा, जिसके अनुसार योग-साधन करनेवाले योगी पुरुष अपने आत्माका साक्षात्कार कर लेते हैं

अतः अब मैं उस परम उत्तम योगशास्त्र का वर्णन करूँगा, जिसके अनुसार योग-साधन में लगे योगीजन सिद्ध आत्मा का साक्षात्कार करते हैं।

Verse 16

तस्योपदेशं वक्ष्यामि यथावत्‌ तन्निबोध मे । यैद्वरिश्षारयन्नित्यं पश्यत्यात्मानमात्मनि,मैं उसका यथावत्‌ उपदेश करता हूँ। मनोनिग्रहके जिन उपायोंद्वारा चित्तको इस शरीरके भीतर ही वशीभूत एवं अन्तर्मुख करके योगी अपने नित्य आत्माका दर्शन करता है, उन्हें मुझसे श्रवण करो

मैं उसका यथावत् उपदेश करता हूँ—मेरी बात को भलीभाँति समझो। जिन उपायों से योगी नित्य अभ्यास करते हुए मन को भीतर ही धारण कर, इसी शरीर में वश में करके, आत्मा में आत्मा का दर्शन करता है, उन्हें मुझसे सुनो।

Verse 17

इन्द्रियाणि तु संहृत्य मन आत्मनि धारयेत्‌ | तीव्र तप्त्वा तप: पूर्व मोक्षयोगं समाचरेत्‌,इन्द्रियोंको विषयोंकी ओरसे हटाकर मनमें और मनको आत्मामें स्थापित करे। इस प्रकार पहले तीव्र तपस्या करके फिर मोक्षोपयोगी उपायका अवलम्बन करना चाहिये

इन्द्रियों को विषयों से समेटकर मन को स्थिर करे और उस मन को आत्मा में स्थापित करे। पहले तीव्र तपस्या करके, फिर मोक्ष-योग का आचरण करना चाहिए।

Verse 18

इस प्रकार श्रीमह्याभारत आश्वमेधिकपववके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें अद्ठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ,तपस्वी सतत युक्तो योगशास्त्रमथाचरेत्‌ । मनीषी मनसा विद्र: पश्यन्नात्मानमात्मनि मनीषी ब्राह्मणको चाहिये कि वह सदा तपसयामें प्रवृत्त एवं यत्नशील होकर योगशास्त्रोक्त उपायका अनुष्ठान करे। इससे वह मनके द्वारा अन्त:ःकरणमें आत्माका साक्षात्कार करता है

तपस्वी, सदा संयम में युक्त, योगशास्त्र के अनुसार आचरण करे। ऐसा मनीषी विद्वान् मन के द्वारा अन्तःकरण में आत्मा में आत्मा का साक्षात्कार करता है।

Verse 19

स चेच्छक्नोत्ययं साधुर्योक्तुमात्मानमात्मनि । तत एकान्तशील: स पश्यत्यात्मानमात्मनि,एकान्तमें रहनेवाला साधक पुरुष यदि अपने मनको आत्मामें लगाये रखनेमें सफल हो जाता है तो वह अवश्य ही अपनेमें आत्माका दर्शन करता है इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि एकोनविंशोडध्याय:

यदि कोई साधु पुरुष अपने मन-आदि को आत्मा में युक्त करने में समर्थ हो जाए, तो वह एकान्तशील होकर निश्चय ही आत्मा में आत्मा का दर्शन करता है।

Verse 20

संयतः सतत युक्त आत्मवान्‌ विजितेन्द्रिय: । तथा य आत्मना55त्मानं सम्प्रयुक्त: प्रपश्यति

ब्राह्मण ने कहा—जो सदा संयत, निरन्तर योगयुक्त, आत्मवान् और जितेन्द्रिय है, वही आत्मा के द्वारा ही, साधना में पूर्णतः युक्त अपने आत्मस्वरूप को स्पष्ट देखता है।

Verse 21

जो साधक सदा संयमपरायण, योगयुक्त, मनको वशमें करनेवाला और जितेन्द्रिय है, वही आत्मासे प्रेरित होकर बुद्धिके द्वारा उसका साक्षात्कार कर सकता है ।। यथा हि पुरुष: स्वप्ने दृष्टवा पश्यत्यसाविति । तथा रूपमिवात्मानं साधुयुक्त: प्रपश्यति

ब्राह्मण ने कहा—जो साधक सदा संयमपरायण, योगयुक्त, मन को वश में करने वाला और जितेन्द्रिय है, वही आत्मा से प्रेरित होकर बुद्धि-बल के द्वारा उस तत्त्व का साक्षात्कार कर सकता है। जैसे पुरुष स्वप्न में देखी हुई वस्तु को ‘वह रहा’ ऐसा मानो प्रत्यक्ष देखता है, वैसे ही सुयमित योगी आत्मा को मानो रूपयुक्त-सा करके देखता है।

Verse 22

जैसे मनुष्य सपनेमें किसी अपरिचित पुरुषको देखकर जब पुनः उसे जाग्रत्‌ अवस्थामें देखता है, तब तुरंत पहचान लेता है कि “यह वही है।” उसी प्रकार साधन-परायण योगी समाधि-अवस्थामें आत्माको जिस रूपमें देखता है, उसी रूपमें उसके बाद भी देखता रहता है ।। इषीकां च यथा मुञ्जात्‌ वक्षिन्रिष्कृष्य दर्शयेत्‌ | योगी निष्कृष्य चात्मानं तथा पश्यति देहत:,जैसे कोई मनुष्य मूँजसे सींकको अलग करके दिखा दे, वैसे ही योगी पुरुष आत्माको इस देहसे पृथक्‌ करके देखता है

ब्राह्मण ने कहा—जैसे मनुष्य स्वप्न में किसी अपरिचित पुरुष को देखकर, फिर जाग्रत अवस्था में उसे देखता है तो तुरंत पहचान लेता है—“यह वही है”; वैसे ही साधन-परायण योगी समाधि में आत्मा को जिस रूप में देखता है, उसी रूप में आगे भी देखता रहता है। और जैसे कोई मूँज से सींक को खींचकर अलग दिखा दे, वैसे ही योगी आत्मा को मानो खींचकर इस देह से पृथक् करके देखता है।

Verse 23

मुछ्जं शरीरमित्याहुरिषीकामात्मनि श्रिताम्‌ । एतन्निदर्शनं प्रोक्तं योगविद्धिरनुत्तमम्‌,यहाँ शरीरको मूँज कहा गया है और आत्माको सींक। योगवेत्ताओंने देह और आत्माके पार्थक्यको समझनेके लिये यह बहुत उत्तम दृष्टान्त दिया है

ब्राह्मण ने कहा—शरीर को मूँज कहा गया है और आत्मा को उसमें स्थित सींक। देह और आत्मा के भेद को जानने के लिए योगवेत्ताओं ने यह दृष्टान्त परम उत्तम बताया है।

Verse 24

यदा हि युक्तमात्मानं सम्यक्‌ पश्यति देहभूृत्‌ । न तस्येहेश्वरः कश्चित्‌ त्रैलोक्यस्यापि यः प्रभु:,देहधारी जीव जब योगके द्वारा आत्माका यथार्थ-रूपसे दर्शन कर लेता है, उस समय उसके ऊपर त्रिभुवनके अधीश्वरका भी आधिपत्य नहीं रहता

जब देहधारी जीव योग के द्वारा आत्मा को उसके यथार्थ स्वरूप में सम्यक् देख लेता है, तब इस लोक में उस पर किसी का भी प्रभुत्व नहीं रहता—त्रैलोक्य के अधिपति का भी नहीं।

Verse 25

अन्यान्याश्षैव तनवो यशथेष्टं प्रतिपद्यते । विनिवृत्य जरां मृत्युंन शोचति न हृष्पति,वह योगी अपनी इच्छाके अनुसार विभिन्न प्रकारके शरीर धारण कर सकता है, बुढ़ापा और मृत्युको भी भगा देता है, वह न कभी शोक करता है न हर्ष

ब्राह्मण ने कहा—ऐसा योगी अपनी इच्छा के अनुसार अनेक प्रकार के शरीर धारण कर सकता है। वह जरा और मृत्यु को भी लौटा देता है; न वह शोक करता है, न हर्षित होता है।

Verse 26

देवानामपि देवत्व॑ युक्त: कारयते वशी । ब्रह्म चाव्ययमाप्रोति हित्वा देहमशाश्व॒तम्‌,अपनी इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाला योगी पुरुष देवताओंका भी देवता हो सकता है। वह इस अनित्य शरीरका त्याग करके अविनाशी ब्रह्मको प्राप्त होता है

इन्द्रियों को वश में रखने वाला, संयमी योगी देवताओं में भी देवत्व प्राप्त कर सकता है। वह इस अनित्य शरीर का त्याग करके अविनाशी ब्रह्म को प्राप्त होता है।

Verse 27

विनश्यत्सु च भूतेषु न भयं तस्य जायते । क्लिश्यमानेषु भूतेषु न स क्लिश्यति केनचित्‌,सम्पूर्ण प्राणियोंका विनाश होनेपर भी उसे भय नहीं होता। सबके क्लेश उठानेपर भी उसको किसीसे क्लेश नहीं पहुँचता

समस्त प्राणियों का विनाश होने पर भी उसे भय नहीं होता। सबके क्लेश में पड़ने पर भी उसे कोई क्लेश नहीं पहुँचा सकता।

Verse 28

दुःखशोकमयैघोरै: सड़स्नेहसमुद्धवै: । न विचाल्यति युक्तात्मा निःस्पृह: शान्तमानस:,शान्ताचित्त एवं निःस्पृह योगी आसक्ति और स्नेहसे प्राप्त होनेवाले भयंकर दुःख-शोक तथा भयसे विचलित नहीं होता

शान्तचित्त और निःस्पृह, युक्तात्मा योगी आसक्ति और स्नेह से उत्पन्न होने वाले भयंकर दुःख-शोक से विचलित नहीं होता।

Verse 29

नैनं शस्त्राणि विध्यन्ते न मृत्युश्नास्य विद्यते । नात: सुखतरं किंचिल्लोके क्वचन दृश्यते,उसे शस्त्र नहीं बींध सकते, मृत्यु उसके पास नहीं पहुँच पाती, संसारमें उससे बढ़कर सुखी कहीं कोई नहीं दिखायी देता

ब्राह्मण ने कहा—शस्त्र उसे बींध नहीं सकते और मृत्यु उसके पास नहीं पहुँचती। संसार में उससे बढ़कर सुखी कहीं कोई नहीं दिखाई देता।

Verse 30

सम्यग्युक्त्वा स आत्मानमात्मन्येव प्रतिष्ठते । विनिवृत्तजरादु:ख: सुखं स्वपिति चापि स:,वह मनको आत्मामें लीन करके उसीमें स्थित हो जाता है तथा बुढ़ापाके दु:खोंसे छुटकारा पाकर सुखसे सोता--अक्षय आनन्दका अनुभव करता है

वह अपने मन को भली-भाँति संयमित करके आत्मा में ही लीन होकर उसी में प्रतिष्ठित हो जाता है। जरा के दुःखों से निवृत्त होकर वह सुखपूर्वक विश्राम करता है—अक्षय अन्तःआनन्द का अनुभव करता है।

Verse 31

देहान्यथेष्टमभ्येति हित्वेमां मानुषीं तनुम्‌ निर्वेदस्तु न कर्तव्यों भुज्जानेन कथंचन,वह इस मानव-शरीरका त्याग करके इच्छानुसार दूसरे बहुत-से शरीर धारण करता है। योगजनित ऐश्वर्यका उपभोग करनेवाले योगीको योगसे किसी तरह विरक्त नहीं होना चाहिये

वह इस मानव-शरीर का त्याग करके अपनी इच्छानुसार अनेक अन्य शरीरों को प्राप्त करता है। अतः योगजनित ऐश्वर्य का उपभोग करने वाले योगी को योग के प्रति किसी प्रकार का निर्वेद या विरक्ति नहीं करनी चाहिए।

Verse 32

सम्यग्युक्तो यदा55त्मानमात्मन्येव प्रपश्यति । तदैव न स्पृहयते साक्षादपि शतक्रतो:,अच्छी तरह योगका अभ्यास करके जब योगी अपनेमें ही आत्माका साक्षात्कार करने लगता है, उस समय वह साक्षात्‌ इन्द्रके पदको भी पानेकी इच्छा नहीं करता है

जब योगी सम्यक् अभ्यास से अपने में ही आत्मा का साक्षात्कार करने लगता है, तब उसी क्षण वह साक्षात् शतक्रतु (इन्द्र) के पद की भी इच्छा नहीं करता।

Verse 33

योगमेकान्तशीलस्तु यथा विन्दति तच्छूणु । दृष्टपूर्वां दिश॑ चिन्त्य यस्मिन्‌ संनिवसेत्‌ पुरे

ब्राह्मण ने कहा—“सुनो, एकान्तशील पुरुष योग को किस प्रकार प्राप्त करता है। पहले से परखी हुई किसी दिशा का विचार करके, वह ऐसे नगर में निवास करे जहाँ वह स्थिरतापूर्वक रह सके (साधना हेतु)।”

Verse 34

पुरस्याभ्यन्तरे तिष्ठन्‌ यस्मिन्नावसथे वसेत्‌ । तस्मिन्नावसथे धार्य सबाहा[॒ भ्यन्तरं मन:,शरीरके भीतर रहते हुए वह आत्मा जिस आश्रयमें स्थित होता है, उसीमें बाह्य और आभ्यन्तर विषयोंसहित मनको धारण करे

नगर के भीतर रहते हुए—अर्थात् शरीर-नगर में—जिस आश्रय में आत्मा निवास करती है, उसी आश्रय में बाह्य और आभ्यन्तर विषयों सहित मन को धारण करके स्थिर करे।

Verse 35

प्रचिन्त्यावसथे कृत्स्नं यस्मिन्‌ काले स पश्यति । तस्मिन्‌ काले मनश्लास्य न च किंचन बाह्त:,मूलाधार आदि किसी आश्रयमें चिन्तन करके जब वह सर्वस्वरूप परमात्माका साक्षात्कार करता है, उस समय उसका मन प्रत्यक्स्वरूप आत्मासे भिन्न कोई “बाहा[” वस्तु नहीं रह जाता

मूलाधार आदि किसी आश्रय में मन को स्थिर करके जब वह सर्वस्वरूप परमात्मा का साक्षात्कार करता है, तब उस समय उसका मन प्रत्यक्षस्वरूप आत्मा से भिन्न कोई भी ‘बाह्य’ वस्तु नहीं मानता।

Verse 36

संनियम्येन्द्रियग्रामं निर्घोषं निर्जने वने । कायमभ्यन्तरं कृत्स्नमेकाग्र: परिचिन्तयेत्‌,निर्जन वनमें इन्द्रिय-समुदायको वशमें करके एकाग्रचित्त हो शब्दशून्य अपने शरीरके बाहर और भीतर प्रत्येक अंगमें परिपूर्ण परब्रह्म परमात्माका चिन्तन करे

निर्जन वन में इन्द्रिय-समुदाय को वश में करके, शब्दशून्य होकर, एकाग्रचित्त से अपने शरीर के बाहर और भीतर प्रत्येक अंग में परिपूर्ण परब्रह्म परमात्मा का चिन्तन करे।

Verse 37

दन्तांस्तालु च जिद्ठां च गलं॑ ग्रीवां तथैव च । हृदयं चिन्तयेच्चापि तथा हृदयबन्धनम्‌,दन्त, तालु, जिह्ला, गला, ग्रीवा, हृदय तथा हृदय-बन्धन (नाड़ीमार्ग)-को भी परमात्मरूपसे चिन्तन करे

दाँत, तालु, जिह्वा, गला, ग्रीवा, हृदय तथा हृदय-बन्धन (नाड़ीमार्ग) को भी परमात्मरूप से चिन्तन करे।

Verse 38

इत्युक्त: स मया शिष्यो मेधावी मधुसूदन । पप्रच्छ पुनरेवेम॑ मोक्षधर्म सुदुर्वचम्‌,मधुसूदन! मेरे ऐसा कहनेपर उस मेधावी शिष्यने पुनः जिसका निरूपण करना अत्यन्त कठिन है, उस मोक्षधर्मके विषयमें पूछा--

मधुसूदन! मेरे ऐसा कहने पर उस मेधावी शिष्य ने फिर से उस मोक्षधर्म के विषय में पूछा, जिसका निरूपण करना अत्यन्त कठिन है।

Verse 39

भुक्तं भुक्तमिदं कोछे कथमन्न॑ विपच्यते । कथं रसत्वं बत्रजति शोणितत्वं कथं पुन:,“यह बारंबार खाया हुआ अन्न उदरमें पहुँचकर कैसे पचता है? किस तरह उसका रस बनता है और किस प्रकार वह रक्तके रूपमें परिणत हो जाता है?

“यह बार-बार खाया हुआ अन्न उदर में पहुँचकर कैसे पचता है? किस प्रकार वह रस बनता है और फिर कैसे रक्तरूप हो जाता है?”

Verse 40

तथा मांसं च मेदश्न स्नाय्वस्थीनि च योषिति । कथमेतानि सर्वाणि शरीराणि शरीरिणाम्‌,'स्त्री-शरीरमें मांस, मेदा, स्नायु और हडियाँ कैसे होती हैं? देहधारियोंके ये समस्त शरीर कैसे बढ़ते हैं? बढ़ते हुए शरीरका बल कैसे बढ़ता है? जिनका सब ओरसे अवरोध है, उन मलोंका पृथक्‌-पृथक्‌ नि:सारण कैसे होता है?

उसी प्रकार स्त्री-शरीर में भी मांस, मेदा, स्नायु और हड्डियाँ होती हैं। देहधारियों के ये सब शरीर कैसे बनते और बढ़ते हैं?

Verse 41

वर्धते वर्धमानस्य वर्धते च कथं बलम्‌ । निरोधानां निर्गमनं मलानां च पृथक्‌ पृथक्‌,'स्त्री-शरीरमें मांस, मेदा, स्नायु और हडियाँ कैसे होती हैं? देहधारियोंके ये समस्त शरीर कैसे बढ़ते हैं? बढ़ते हुए शरीरका बल कैसे बढ़ता है? जिनका सब ओरसे अवरोध है, उन मलोंका पृथक्‌-पृथक्‌ नि:सारण कैसे होता है?

बढ़ते हुए शरीर का बल भी साथ-साथ कैसे बढ़ता है? और जो मल भीतर सब ओर से अवरुद्ध हैं, वे अलग-अलग मार्गों से कैसे निकलते हैं?

Verse 42

कुतो वायं प्रश्नसिति उच्छवसित्यपि वा पुनः । कं च देशमधिष्ठाय तिष्ठत्यात्मायमात्मनि,“यह जीव कैसे साँस लेता, कैसे उच्छवास खींचता और किस स्थानमें रहकर इस शरीरमें सदा विद्यमान रहता है?

यह जीव कहाँ से श्वास लेता है और फिर उच्छ्वास कैसे छोड़ता है? और किस स्थान का आश्रय लेकर यह आत्मा इस देह में सदा स्थित रहती है?

Verse 43

जीव: कथं वहति च चेष्टमान: कलेवरम्‌ । कि वर्ण कीदृशं चैव निवेशयति वै पुन:

यह जीव चेष्टा करते हुए इस कलेवर को कैसे धारण करता है? और फिर वह किस प्रकार के रूप और किस दशा में पुनः प्रवेश करता है?

Verse 44

इति सम्परिपृष्टो5हं तेन विप्रेण माधव

हे माधव, इस प्रकार उस विप्र ने मुझसे भली-भाँति प्रश्न किए।

Verse 45

यथा स्वकोषे प्रक्षिप्प भाण्डं भाण्डमना भवेत्‌,जैसे घरका सामान अपने कोटेमें डालकर भी मनुष्य उन्हींके चिन्तनमें मन लगाये रहता है, उसी प्रकार इन्द्रियरूपी चंचल द्वारोंसे विचरनेवाले मनको अपनी कायामें ही स्थापित करके वहीं आत्माका अनुसंधान करे और प्रमादको त्याग दे

जैसे कोई मनुष्य घर का सामान अपने भंडार में रख देने पर भी उन्हीं वस्तुओं की चिंता में मन लगाए रहता है, वैसे ही इन्द्रियरूपी चंचल द्वारों से बाहर भटकते मन को अपने ही शरीर में समेटकर वहीं आत्मा का अनुसंधान करे और प्रमाद का त्याग करे।

Verse 46

तथा स्वकाये प्रक्षिप्य मनो द्वारैरनिश्चलै: । आत्मानं तत्र मार्गेत प्रमादं परिवर्जयेत्‌,जैसे घरका सामान अपने कोटेमें डालकर भी मनुष्य उन्हींके चिन्तनमें मन लगाये रहता है, उसी प्रकार इन्द्रियरूपी चंचल द्वारोंसे विचरनेवाले मनको अपनी कायामें ही स्थापित करके वहीं आत्माका अनुसंधान करे और प्रमादको त्याग दे

उसी प्रकार चंचल इन्द्रिय-द्वारों से बाहर जाने वाले मन को अपने शरीर में ही स्थापित करके वहीं आत्मा की खोज करे और प्रमाद को छोड़ दे।

Verse 47

एवं सततमुदूुक्त: प्रीतात्मा नचिरादिव । आसादयति तदू्‌ ब्रह्म यद्‌ दृष्टवा स्यात्‌ प्रधानवित्‌,इस प्रकार सदा ध्यानके लिये प्रयत्न करनेवाले पुरुषका चित्त शीघ्र ही प्रसन्न हो जाता है और वह उस परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है, जिसका साक्षात्कार करके मनुष्य प्रकृति एवं उसके विकारोंको स्वतः जान लेता है

इस प्रकार जो पुरुष सदा ध्यान के लिए उद्यत रहता है, उसका चित्त शीघ्र ही प्रसन्न हो जाता है; और वह उस ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है, जिसके साक्षात्कार से मनुष्य प्रकृति और उसके विकारों का यथार्थ ज्ञान पा लेता है।

Verse 48

न त्वसौ चक्षुषा ग्राह्मो न च सर्वैरपीन्द्रियै: । मनसैव प्रदीपेन महानात्मा प्रदृश्यते,उस परमात्माका इन चर्म-चक्षुओंसे दर्शन नहीं हो सकता, सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे भी उसको ग्रहण नहीं किया जा सकता; केवल बुद्धिरूपी दीपककी सहायतासे ही उस महान्‌ आत्माका दर्शन होता है

परन्तु वह परमात्मा इन चर्म-चक्षुओं से ग्रहण नहीं किया जा सकता, न ही समस्त इन्द्रियों से; केवल दीपक के समान प्रकाशित मन (बुद्धि) से ही उस महान् आत्मा का दर्शन होता है।

Verse 49

सर्वतःपाणिपादान्त: सर्वतो$क्षिशिरोमुख: । सर्वतः श्रुतिमाल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति,वह सब ओर हाथ-पैरवाला, सब ओर नेत्र, सिर और मुखवाला तथा सब ओर कानवाला है; क्योंकि वह संसारमें सबको व्याप्त करके स्थित है

वह सब ओर हाथ-पैर वाला है, सब ओर नेत्र, सिर और मुख वाला है, तथा सब ओर कान वाला है; क्योंकि वह समस्त जगत को व्याप्त करके, सबको आच्छादित किए स्थित है।

Verse 50

जीवो निष्क्रान्तमात्मानं शरीरात्‌ सम्प्रपश्यति । स तमुत्सृज्य देहे स्वं धारयन्‌ ब्रह्म केवलम्‌,तत्त्वज्ञ जीव अपने-आपको शरीरसे पृथक्‌ देखता है। वह शरीरके भीतर रहकर भी उसका त्याग करे--उसकी पृथकृताका अनुभव करके अपने स्वरूपभूत केवल परब्रह्म परमात्माका चिन्तन करता हुआ बुद्धिके सहयोगसे आत्माका साक्षात्कार करता है। उस समय वह यह सोचकर हँसता-सा रहता है कि अहो! मृगतृष्णामें प्रतीत होनेवाले जलकी भाँति मुझमें ही प्रतीत होनेवाले इस संसारने मुझे अबतक व्यर्थ ही भ्रममें डाल रखा था। जो इस प्रकार परमात्माका दर्शन करता है, वह उसीका आश्रय लेकर अन्तमें मुझमें ही मुक्त हो जाता है (अर्थात्‌ अपने-आपमें ही परमात्माका अनुभव करने लगता है)

ब्राह्मण ने कहा—जीव अपने-आपको शरीर से निकलकर, उससे पृथक् हुआ-सा देखता है। वह देह के भीतर रहते हुए भी देहाभिमान का त्याग कर देता है और केवल परब्रह्म को ही धारण करता है। तत्त्वज्ञ पुरुष अपने स्वरूपभूत परम ब्रह्म-परमात्मा का चिन्तन करते हुए, विवेक-बुद्धि के सहारे आत्मा का साक्षात्कार कर लेता है। तब वह मानो हँसता हुआ सोचता है—‘अहो! मृगतृष्णा के जल की भाँति, मुझमें ही प्रतीत होने वाले इस संसार ने अब तक मुझे व्यर्थ ही मोह में डाले रखा।’ जो इस प्रकार परमात्मा का दर्शन करता है, वह उसी का आश्रय लेकर अन्त में मुझमें ही मुक्त हो जाता है—अर्थात् अपने ही आत्मस्वरूप में परमात्मा का प्रत्यक्ष अनुभव करता है।

Verse 51

आत्मानमालोकयति मनसा प्रहसन्निव । तदेवमाश्रयं कृत्वा मोक्ष याति ततो मयेि,तत्त्वज्ञ जीव अपने-आपको शरीरसे पृथक्‌ देखता है। वह शरीरके भीतर रहकर भी उसका त्याग करे--उसकी पृथकृताका अनुभव करके अपने स्वरूपभूत केवल परब्रह्म परमात्माका चिन्तन करता हुआ बुद्धिके सहयोगसे आत्माका साक्षात्कार करता है। उस समय वह यह सोचकर हँसता-सा रहता है कि अहो! मृगतृष्णामें प्रतीत होनेवाले जलकी भाँति मुझमें ही प्रतीत होनेवाले इस संसारने मुझे अबतक व्यर्थ ही भ्रममें डाल रखा था। जो इस प्रकार परमात्माका दर्शन करता है, वह उसीका आश्रय लेकर अन्तमें मुझमें ही मुक्त हो जाता है (अर्थात्‌ अपने-आपमें ही परमात्माका अनुभव करने लगता है)

वह मन से आत्मा का दर्शन करता है, मानो हँसता हुआ। इस प्रकार उसी का आश्रय लेकर वह मोक्ष को प्राप्त होता है और फिर मुझमें ही स्थित हो जाता है।

Verse 52

इदं सर्वरहस्यं ते मया प्रोक्त द्विजोत्तम । आपूृच्छे साधयिष्यामि गच्छ विप्र यथासुखम्‌,द्विजश्रेष्ठ) यह सारा रहस्य मैंने तुम्हें बता दिया। अब मैं जानेकी अनुमति चाहता हूँ। विप्रवर! तुम भी सुखपूर्वक अपने स्थानको लौट जाओ

हे द्विजोत्तम! यह समस्त रहस्य मैंने तुम्हें कह दिया। अब मैं विदा चाहता हूँ; जो करना है, उसे सिद्ध करूँगा। हे विप्र! तुम भी जैसे सुख हो, वैसे अपने स्थान को लौट जाओ।

Verse 53

इत्युक्त:स तदा कृष्ण मया शिष्यो महातपा: । अगच्छत यथाकामं ब्राह्मण: संशितव्रत:,श्रीकृष्ण! मेरे इस प्रकार कहनेपर वह कठोर व्रतका पालन करनेवाला मेरा महातपस्वी शिष्य ब्राह्मण काश्यप इच्छानुसार अपने अभीष्ट स्थानको चला गया

हे कृष्ण! मेरे ऐसा कहने पर वह मेरा महातपस्वी शिष्य—दृढ़ व्रतों वाला ब्राह्मण—तब इच्छानुसार अपने अभीष्ट स्थान को चला गया।

Verse 54

वायुदेव उवाच इत्युक्त्वा स तदा वाक्यं मां पार्थ द्विजसत्तम: । मोक्षधर्माश्रित: सम्यक्‌ तत्रैवान्तरधीयत,भगवान्‌ श्रीकृष्ण कहते हैं--अर्जुन! मोक्षधर्मका आश्रय लेनेवाले वे सिद्धमहात्मा श्रेष्ठ ब्राह्मण मुझसे यह प्रसंग सुनाकर वहीं अन्तर्धान हो गये

वायुदेव बोले—हे पार्थ! मुझसे यह वचन कहकर, मोक्षधर्म में भलीभाँति स्थित वह द्विजश्रेष्ठ वहीं उसी स्थान पर अन्तर्धान हो गया।

Verse 55

कच्चिदेतत्‌ त्वया पार्थ श्रुतमेकाग्रचेतसा । तदापि हि रथस्थस्त्वं श्रुववानेतदेव हि,पार्थ! क्‍या तुमने मेरे बताये हुए इस उपदेशको एकाग्रचित्त होकर सुना है? उस युद्धके समय भी तुमने रथपर बैठे-बैठे इसी तत्त्वको सुना था

वायु बोले—हे पार्थ! क्या तुमने इस उपदेश को एकाग्रचित्त होकर सुना है? क्योंकि युद्ध के समय भी तुम रथ पर बैठे-बैठे इसी सत्य को सुन चुके थे।

Verse 56

नैतत्‌ पार्थ सुविज्ञेयं व्यामिश्रेणेति मे मतिः । नरेणाकृतसंज्ञेन विशुद्धेनान्तरात्मना,कुन्तीनन्दन! मेरा तो ऐसा विश्वास है कि जिसका चित्त व्यग्र है, जिसे ज्ञानका उपदेश नहीं प्राप्त है, वह मनुष्य इस विषयको सुगमतापूर्वक नहीं समझ सकता। जिसका अन्त:करण शुद्ध है, वही इसे जान सकता है

वायु बोले—हे पार्थ! मेरा मत है कि यह विषय व्यामिश्र (उलझी) बुद्धि वाले के लिए सहज बोधगम्य नहीं है। जिसका चित्त अस्थिर है और जिसे सम्यक् उपदेश से संस्कारित नहीं किया गया, वह इसे सरलता से नहीं समझ सकता। केवल शुद्ध अन्तःकरण वाला ही इसे यथार्थ जान सकता है, हे कुन्तीनन्दन।

Verse 57

सुरहस्यमिदं प्रोक्तं देवानां भरतर्षभ । कच्चिन्नेदं श्रुतं पार्थ मनुष्येणेह कर्हिचित्‌,भरतश्रेष्ठ! यह मैंने देवताओंका परम गोपनीय रहस्य बताया है। पार्थ! इस जगतमें कभी किसी भी मनुष्यने इस रहस्यका श्रवण नहीं किया है

वायु बोले—हे भरतश्रेष्ठ! यह देवताओं का परम गोपनीय रहस्य मैंने तुम्हें बताया है। बताओ, हे पार्थ! क्या इस लोक में कभी किसी मनुष्य ने इस रहस्य को सुना है?

Verse 58

न होतच्छोतुमहों5न्यो मनुष्यस्त्वामृतेडनघ । नैतदद्य सुविज्ञेयं व्यामिश्रेणान्तरात्मना,अनघ! तुम्हारे सिवा दूसरा कोई मनुष्य इसे सुननेका अधिकारी भी नहीं है। जिसका चित्त दुविधेमें पड़ा हुआ है, वह इस समय इसे अच्छी तरह नहीं समझ सकता

वायु बोले—हे अनघ! तुम्हारे सिवा कोई दूसरा मनुष्य इसे सुनने का अधिकारी नहीं है। और जिसका अन्तःकरण संशय और द्वन्द्व से व्यामिश्र है, वह इस समय इसे स्पष्ट रूप से नहीं समझ सकता।

Verse 59

क्रियावद्धि्हिं कौन्तेय देवलोक: समावृत: । न चैतदिष्टं देवानां मर्त्यरूपनिवर्तनम्‌,कुन्तीकुमार! क्रियावान्‌ पुरुषोंसे देवलोक भरा पड़ा है। देवताओंको यह अभीष्ट नहीं है कि मनुष्यके मर्त्यरूपकी निवृत्ति हो

वायु बोले—हे कुन्तीकुमार! देवलोक क्रियावान्, धर्मनिष्ठ पुरुषों से परिपूर्ण है। देवताओं को यह अभीष्ट नहीं कि मनुष्य का मर्त्य-रूप (मानवीय अवस्था) समय से पहले निवृत्त हो; क्योंकि मनुष्य अपने नियत क्षेत्र में रहकर यथोचित कर्म से ही पुण्य और लोक-व्यवस्था की रक्षा करता है।

Verse 60

परा हि सा गति: पार्थ यत्‌ तद्‌ ब्रह्म सनातनम्‌ | यत्रामृतत्व॑ प्राप्रोति त्यक्त्वा देह सदा सुखी,पार्थ! जो सनातन ब्रह्म है, वही जीवकी परम-गति है। ज्ञानी मनुष्य देहको त्यागकर उस ब्रह्ममें ही अमृतत्त्वको प्राप्त होता है और सदाके लिये सुखी हो जाता है

हे पार्थ! वही सनातन ब्रह्म जीव की परम गति है। ज्ञानी पुरुष देह का त्याग करके उसी ब्रह्म में अमृतत्व को प्राप्त होता है और सदा के लिए सुखी हो जाता है।

Verse 61

इमं धर्म समास्थाय येडपि स्यु: पापयोनय: । स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेडपि यान्ति परां गतिम्‌,इस आत्मदर्शनरूप धर्मका आश्रय लेकर स्त्री, वैश्य और शूद्र तथा जो पापयोनिके मनुष्य हैं, वे भी परमगतिको प्राप्त हो जाते हैं

इस आत्मदर्शनरूप धर्म का आश्रय लेकर स्त्री, वैश्य, शूद्र तथा जो पापयोनि में जन्मे हैं—वे भी परम गति को प्राप्त हो जाते हैं।

Verse 62

किं पुनर्त्रह्मिणा: पार्थ क्षत्रिया वा बहुश्ुता: । स्वधर्मरतयो नित्य॑ ब्रह्मलोकपरायणा:,पार्थ! फिर जो अपने धर्ममें प्रेम रखते और सदा ब्रह्मलोककी प्राप्तिके साधनमें लगे रहते हैं, उन बहुश्रुत ब्राह्मण और क्षत्रियोंकी तो बात ही क्या है

हे पार्थ! फिर जो बहुश्रुत ब्राह्मण और क्षत्रिय अपने स्वधर्म में रत रहते हैं और सदा ब्रह्मलोक-प्राप्ति के साधनों में लगे रहते हैं—उनकी तो बात ही क्या है।

Verse 63

हेतुमच्चैतदुद्दिष्टमुपाया श्वास्य साधने । सिद्धि फलं च मोक्षश्न दुःखस्य च विनिर्णय:,इस प्रकार मैंने तुम्हें मोक्षधर्मका युक्तियुक्त उपदेश किया है। उसके साधनके उपाय भी बतलाये हैं और सिद्धि, फल, मोक्ष तथा दुःखके स्वरूपका भी निर्णय किया है

इस प्रकार मैंने तुम्हें मोक्षधर्म का युक्तियुक्त उपदेश किया है। उसके साधन के उपाय भी बताए हैं तथा सिद्धि, फल—मोक्ष—और दुःख के स्वरूप का भी निर्णय किया है।

Verse 64

नात: परं सुखं त्वन्यत्‌ किंचित्‌ स्याद्‌ भरतर्षभ । बुद्धिमान श्रद्दधानश्व पराक्रान्तश्व॒ पाण्डव,भरतश्रेष्ठ! इससे बढ़कर दूसरा कोई सुखदायक धर्म नहीं है। पाण्डुनन्दन! जो कोई बुद्धिमान, श्रद्धालु और पराक्रमी मनुष्य लौकिक सुखको सारहीन समझकर उसे त्याग देता है, वह उपर्युक्त इन उपायोंके द्वारा बहुत शीघ्र परम गतिको प्राप्त कर लेता है

हे भरतश्रेष्ठ! इससे बढ़कर दूसरा कोई सुख नहीं है। हे पाण्डव! जो बुद्धिमान, श्रद्धालु और पराक्रमी पुरुष लौकिक सुख को तुच्छ जानकर त्याग देता है, वह ऊपर बताए उपायों से शीघ्र ही परम गति को प्राप्त कर लेता है।

Verse 65

यः परित्यज्यते मर्त्यो लोकसारमसारवत्‌ | एतैरुपायै: स क्षिप्रं परां गतिमवाप्रुते,भरतश्रेष्ठ! इससे बढ़कर दूसरा कोई सुखदायक धर्म नहीं है। पाण्डुनन्दन! जो कोई बुद्धिमान, श्रद्धालु और पराक्रमी मनुष्य लौकिक सुखको सारहीन समझकर उसे त्याग देता है, वह उपर्युक्त इन उपायोंके द्वारा बहुत शीघ्र परम गतिको प्राप्त कर लेता है

वायु ने कहा—हे भरतश्रेष्ठ! जो मर्त्य लोक के तथाकथित ‘सार’ को वास्तव में असार जानकर त्याग देता है, वह इन्हीं उपायों से शीघ्र परम गति को प्राप्त होता है।

Verse 66

एतावदेव वक्तव्यं नातो भूयो5स्ति किंचन । षण्मासान्‌ नित्ययुक्तस्य योग: पार्थ प्रवर्तते,पार्थ! इतना ही कहनेयोग्य विषय है। इससे बढ़कर कुछ भी नहीं है। जो छः: महीनेतक निरन्तर योगका अभ्यास करता है, उसका योग अवश्य सिद्ध हो जाता है

वायु ने कहा—इतना ही कहने योग्य है; इससे आगे कुछ भी नहीं। हे पार्थ! जो निरन्तर संयमयुक्त रहता है, उसका योग छः मास में प्रवृत्त होकर सिद्धि को प्राप्त होता है।

Verse 336

पुरस्याभ्यन्तरे तस्य मन: स्थाप्यं न बाह्मत:। एकान्तमें ध्यान करनेवाले पुरुषको जिस प्रकार योगकी प्राप्ति होती है, वह सुनो--जो उपदेश पहले श्रुतिमें देखा गया है, उसका चिन्तन करके जिस भागमें जीवका निवास माना गया है, उसीमें मनको भी स्थापित करे। उसके बाहर कदापि न जाने दे

ब्राह्मण ने कहा—मन को उस ‘पुर’ (शरीर-नगर) के भीतर ही स्थापित करना चाहिए, बाहर नहीं। एकान्त में एकाग्र ध्यान करने वाला पुरुष योग को कैसे प्राप्त करता है, सुनो: श्रुति में देखे हुए उपदेश का चिन्तन करके जहाँ जीव का निवास माना गया है, वहीं मन को भी स्थिर करे; उसे कभी बाहर न जाने दे।

Verse 433

याथातथ्येन भगवन्‌ वक्तुमहसि मेडनघ । 'चेष्टाशील जीवात्मा इस शरीरका भार कैसे वहन करता है? फिर कैसे और किस रंगके शरीरको धारण करता है। निष्पाप भगवन्‌! यह सब मुझे यथार्थरूपसे बताइये”

ब्राह्मण ने कहा—हे भगवन्, हे निष्पाप! आप मुझे यथातथ्य रूप से बताने योग्य हैं। चेष्टाशील जीवात्मा इस शरीर का भार कैसे वहन करता है? फिर वह कैसे और किस प्रकार/वर्ण के शरीर को धारण करता है? हे दोषरहित प्रभो, यह सब मुझे यथार्थ रूप में बताइए।

Verse 443

प्रत्यब्रुवं महाबाहो यथाश्रुतमरिंदम । शत्रुदमन महाबाहु माधव! उस ब्राह्मणके इस प्रकार पूछनेपर मैंने जैसा सुना था वैसा ही उसे बताया

हे महाबाहो, हे अरिंदम! मैंने प्रत्युत्तर में जैसा सुना था वैसा ही कहा। हे माधव! उस ब्राह्मण ने जब इस प्रकार मुझसे प्रश्न किया, तब मैंने उसे यथाश्रुत—अविकृत—वृत्तान्त सुना दिया।

Frequently Asked Questions

Non-attachment and non-reactivity: friendliness to all, self-control, purity, absence of pride, and equality toward opposites (life/death, pleasure/pain, gain/loss), culminating in a ‘non-initiating’ stance toward compulsive projects.

A staged inward relocation of attention: from an outer direction to the city, from the city to the dwelling, and from the dwelling to the body—keeping the mind from outward roaming and stabilizing it within embodied awareness to seek the self.

Yes. It concludes that for one who is ‘nitya-yukta’ (constantly disciplined), yoga becomes operative within six months, presented as an instructional benchmark rather than a narrative reward formula.