Mokṣa-dharma Yoga-Upadeśa: Equanimity, Sense-Restraint, and Vision of the Ātman (आत्मदर्शन-योगोपदेशः)
संनियम्येन्द्रियग्रामं निर्घोषं निर्जने वने । कायमभ्यन्तरं कृत्स्नमेकाग्र: परिचिन्तयेत्
निर्जन वन में इन्द्रिय-समुदाय को वश में करके, शब्दशून्य होकर, एकाग्रचित्त से अपने शरीर के बाहर और भीतर प्रत्येक अंग में परिपूर्ण परब्रह्म परमात्मा का चिन्तन करे।
ब्राह्मण उवाच