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Shloka 8

Mokṣa-dharma Yoga-Upadeśa: Equanimity, Sense-Restraint, and Vision of the Ātman (आत्मदर्शन-योगोपदेशः)

अकर्मवान्‌ विकाडृक्षश्न पश्येज्जगदशाश्वतम्‌ । अश्वत्थसदृशं नित्यं जन्ममृत्युजरायुतम्‌

जो कर्तापन का अभिमान नहीं करता, जिसके मन में कोई कामना नहीं, जो इस जगत् को अश्वत्थ-वृक्ष के समान क्षणभंगुर देखता है और सदा इसे जन्म, मृत्यु तथा जरा से युक्त जानता है—वह (वैराग्य की दृष्टि से) सत्य को देखता है।

ब्राह्मण उवाच