Mokṣa-dharma Yoga-Upadeśa: Equanimity, Sense-Restraint, and Vision of the Ātman (आत्मदर्शन-योगोपदेशः)
प्रचिन्त्यावसथे कृत्स्नं यस्मिन् काले स पश्यति । तस्मिन् काले मनश्लास्य न च किंचन बाह्त:
मूलाधार आदि किसी आश्रय में मन को स्थिर करके जब वह सर्वस्वरूप परमात्मा का साक्षात्कार करता है, तब उस समय उसका मन प्रत्यक्षस्वरूप आत्मा से भिन्न कोई भी ‘बाह्य’ वस्तु नहीं मानता।
ब्राह्मण उवाच