
Adhyāya 32: Tāpasānāṃ Darśanaṃ — Ascetics Seek to Identify the Pāṇḍavas
Upa-parva: Āśrama-darśana (Visit to the Forest Āśrama) Episode
Vaiśaṃpāyana describes the Pāṇḍavas’ presence in the forest āśrama with their brothers and accompanying women. Distinguished ascetics arriving from various regions express a desire to know and correctly identify Yudhiṣṭhira, Bhīma, Arjuna, the twins (Nakula and Sahadeva), and the celebrated Draupadī. Saṃjaya responds by naming and indicating them, employing stylized physical and symbolic descriptors (lion-like stature, elephant-gait, lotus-eyes) that function as a formal recognition register. The passage also identifies several royal women through relational markers (sisterhood, marriage alliances, royal lineage), documenting the post-war household remnant now situated in an ascetic environment. After the identifications, the elderly Kuru king (in context, Dhṛtarāṣṭra) inquires about the welfare of those assembled; the scene closes with orderly seating and courteous exchanges, emphasizing controlled speech, respectful protocol, and communal stability in the āśrama precinct.
Chapter Arc: वन में आश्रम-जीवन के बीच एक अलौकिक रात्रि उतरती है—परलोक से आए हुए प्रियजन, क्रोध-मात्सर्य से रहित, मानो देवलोक के अमरों की भाँति, जीवितों के बीच प्रकट हो जाते हैं। → राजन्, पुत्र पिता-माता के साथ, पत्नी पति के साथ, भाई भाई के साथ, मित्र मित्र के साथ—सबके बिछोह का विष घुलकर एक ही प्रश्न बनता है: क्या यह मिलन सत्य है या माया? और यदि सत्य है, तो क्या यह क्षण टिकेगा? → एक ही रात्रि में सबका पूर्ण समागम—स्त्रियाँ अपने पिता, भाई, पति, पुत्रों से मिलकर ‘परमिका’ प्रसन्नता पाती हैं; शोक का भार उतरता है; सब स्वर्गसदृश संतोष में साथ-साथ विहार करते हैं, मानो मृत्यु का विधान क्षणभर को स्थगित हो गया हो। → प्रभात के निकट, परस्पर आलिंगन और अनुमति लेकर वे जैसे आए थे वैसे ही अदृश्य हो जाते हैं; व्यास के विसर्जन से यह दिव्य दृश्य समाप्त होता है और जीवित जन फिर अपने-अपने आश्रम-जीवन में लौटते हैं—पर भीतर एक शान्त, पवित्र स्मृति रह जाती है। → अदृश्य हुए जन विविध लोकों—राक्षस-पिशाच लोक, उत्तरकुरु आदि—की ओर चले जाते हैं; यह संकेत छोड़ते हुए कि कर्म और गति के रहस्य अभी भी मनुष्य-बुद्धि से परे हैं।
Verse 1
ऑपन-- मा बक। डे: त्रयस्त्रिंशो5 ध्याय: परलोकसे आये हुए व्यक्तियोंका परस्पर राग-द्वेषसे रहित होकर मिलना और रात बीतनेपर अदृश्य हो जाना
वैशम्पायनजी कहते हैं—तब वे सब पुरुषश्रेष्ठ परस्पर एकत्र हुए। क्रोध और मात्सर्य से रहित तथा कल्मष से मुक्त होकर वे सब प्रेमपूर्वक मिले।
Verse 2
विधि परममास्थाय ब्रद्मर्षिविहितं शुभम् । संहृष्टमनस: सर्वे देवलोक इवामरा:
वैशम्पायनजी कहते हैं—ब्रह्मर्षियों द्वारा विहित उस परम कल्याणकारी विधि का आश्रय लेकर, क्रोध-मात्सर्य से रहित और पापशून्य वे सभी श्रेष्ठ पुरुष हर्षित हृदय से परस्पर प्रेमपूर्वक मिले। उस समय वे देवलोक के अमर देवताओं के समान आनन्द और सौहार्द से परिपूर्ण प्रतीत होते थे।
Verse 3
पुत्र: पित्रा च मात्रा च भार्याक्ष पतिभि: सह । भ्रात्रा भ्राता सखा चैव सख्या राजन् समागता:,राजन! पुत्र पिता-माताके साथ, स्त्री पतिके साथ, भाई भाईके साथ और मित्र मित्रके साथ मिले
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! पुत्र पिता और माता के साथ, पत्नी पति के साथ, भाई भाई के साथ और मित्र मित्र के साथ आकर मिले।
Verse 4
पाण्डवास्तु महेष्वासं कर्ण सौभद्रमेव च । सम्प्रहर्षात् समाजम्मुद्रौपदेयांश्व॒ सर्वश:,पाण्डव महाधनुर्धर कर्ण, सुभद्राकुमार अभिमन्यु और द्रौपदीके पाँचों पुत्र--इन सबके साथ अत्यन्त हर्षपूर्वक मिले
वैशम्पायनजी कहते हैं—पाण्डवों ने अत्यन्त हर्ष के साथ सुभद्रा-कुमार महाबली अभिमन्यु तथा द्रौपदी के समस्त पुत्रों से भी मिलन किया।
Verse 5
ततस्ते प्रीयमाणा वै कर्णेन सह पाण्डवा: । समेत्य पृथिवीपाल सौहद्ये च स्थिता भवन्,भूपाल! तत्पश्चात् सब पाण्डवोंने कर्णसे प्रसन्नता-पूर्वक मिलकर उनके साथ सौहार्दपूर्ण बर्ताव किया
वैशम्पायनजी कहते हैं—भूपाल! तत्पश्चात् पाण्डव प्रसन्नतापूर्वक कर्ण से मिले और उसके प्रति सौहार्दपूर्ण भाव में स्थित हो गए।
Verse 6
परस्परं समागम्य योधास्ते भरतर्षभ । मुने: प्रसादात् ते होवं क्षत्रिया नष्टमन््यव:
वैशम्पायनजी कहते हैं—भरतश्रेष्ठ! वे योद्धा परस्पर सम्मुख होकर मिले; और मुनि की कृपा से वे क्षत्रियजन अपना स्वाभाविक तेज और धैर्य पुनः प्राप्त कर, मोह और विक्षेप से रहित हो गए।
Verse 7
एवं समागता: सर्वे गुरुभि्बान्धवै: सह
इस प्रकार वे सब अपने गुरुओं और बान्धवों के साथ एकत्र हुए—कर्तव्य-भाव और कुल-एकता से संयुक्त होकर।
Verse 8
तां रात्रिमखिलामेवं विहृत्य प्रीतमानसा:
इस प्रकार उन्होंने वह पूरी रात हर्षोल्लासपूर्ण विहार में बिताई; उनके मन संतोष से परिपूर्ण थे।
Verse 9
नात्र शोको भयं त्रासो नारतिर्नायशो5भवत्
वहाँ न शोक था, न भय, न त्रास; न असंतोष उत्पन्न हुआ, न अपयश।
Verse 10
परस्परं समागम्य योधानां भरतर्षभ | भरतश्रेष्ठ] एक-दूसरेसे मिलकर उन योद्धाओंके मनमें शोक, भय, त्रास, उद्वेश और अपयशको स्थान नहीं मिला |। समागतास्ता: पितृभिशभ्रातृभि: पतिभि: सुतैः
हे भरतश्रेष्ठ! वे योद्धा परस्पर मिलकर अपने पिता, भ्राता, पति और पुत्रों से भी समागम को प्राप्त हुए; उस मिलन में उनके हृदय में शोक, भय, त्रास, उद्वेग और अपयश को स्थान न मिला।
Verse 11
एकां रात्रि विहृत्यैव ते वीरास्ताश्ष योषित:
वे वीर और वे स्त्रियाँ भी केवल एक ही रात विहार करके (फिर आगे बढ़े)—मानो संयमित विराम लेकर, इस पर्व की गंभीर कर्तव्य-धारा के अनुरूप।
Verse 12
ततो विसर्जयामास लोकांस्तान् मुनिपुज्गव:
तब मुनिवर व्यासजी ने उन सबको उनके-अपने लोकों के लिए विदा कर दिया। वे रथों और ध्वजाओं सहित अपने-अपने धामों को चले गए।
Verse 13
क्षणेनान्तर्तिताश्रैव प्रेक्षतामेव ले5डभवन् । अवगाहा महात्मान: पुण्यां भागीरथीं नदीम्
वैशम्पायन बोले—क्षणभर में, सबके देखते-देखते, वे दृष्टि से ओझल हो गए और पुण्यसलिला भागीरथी में अवगाहन कर अदृश्य हो गए।
Verse 14
देवलोकं ययु: केचित् केचित् ब्रह्मसदस्तथा,कोई देवलोकमें गये, कोई ब्रह्मलोकमें, कुछ वरुणलोकमें पधारे और कुछ कुबेरके लोकमें। कितने ही नरेश भगवान् सूर्यके लोकमें चले गये
वैशम्पायन बोले—कोई देवलोक को गए, कोई ब्रह्मा की सभा (ब्रह्मलोक) को पहुँचे। कुछ वरुणलोक में गए और कुछ कुबेरलोक में। अनेक नरेश सूर्यलोक को प्राप्त हुए।
Verse 15
केचिच्च वारुणं लोक॑ केचित् कौबेरमाप्रुवन् | ततो वैवस्वतं लोकं केचिच्चैवाप्रुवन्नपा:
वैशम्पायन बोले—कुछ वरुणलोक को गए, कुछ कुबेरलोक को प्राप्त हुए; और फिर कुछ वैवस्वत (यम) के लोक को पहुँचे।
Verse 16
राक्षसानां पिशाचानां केचिच्चाप्युत्तरान् कुरून् । विचित्रगतय: सर्वे यानवाप्यामरै: सह
वैशम्पायन बोले—राक्षसों और पिशाचों में से कुछ उत्तरकुरु देश की ओर गए। वे सब विचित्र गतियों से, और कुछ तो देवताओं के साथ भी, अपने-अपने यानों को पाकर चले।
Verse 17
गतेषु तेषु सर्वेषु सलिलस्थो महामुनि:
वैशम्पायन बोले—जब वे सब दृष्टि से ओझल हो गए, तब कौरवों के हितैषी, महातेजस्वी, धर्मशील महामुनि व्यास जल में खड़े-खड़े उन पतिविहीन क्षत्रिय स्त्रियों से बोले—“देवियो! तुममें से जो-जो सती-साध्वी अपने-अपने पति के लोक को जाना चाहती हैं, वे आलस्य त्यागकर तुरंत गंगा के जल में गोता लगाएँ।” उनकी बात सुनकर श्रद्धावती वे सती स्त्रियाँ अपने श्वशुर धृतराष्ट्र की आज्ञा लेकर गंगा के जल में प्रविष्ट हो गईं।
Verse 18
धर्मशीलो महातेजा: कुरूणां हितकृत् तथा । ततः प्रोवाच ता: सर्वा: क्षत्रिया निहतेश्वरा:
वैशम्पायन बोले—तब वह महात्मा, महातेजस्वी, धर्मशील और कुरुओं के हित में प्रवृत्त महामुनि (व्यास) जल में ही स्थित रहकर, जिनके स्वामी मारे जा चुके थे, उन सब क्षत्रिय स्त्रियों से बोले। उन्होंने उनके शोक को धर्म में स्थिर कर, उन्हें वांछित मार्ग दिखाया और पति-लोक की प्राप्ति के लिए उन्हें उपदेश दिया।
Verse 19
या या: पतिकृतान् लोका- निच्छन्ति परमस्त्रिय: । ता जाह्ववीजल क्षिप्र- मवगाहन्त्वतन्द्रिता:
“देवियो! तुममें से जो-जो परम साध्वी स्त्रियाँ अपने पतियों द्वारा प्राप्त लोकों को चाहती हैं, वे बिना आलस्य किए शीघ्र ही जाह्नवी (गंगा) के जल में अवगाहन करें।”
Verse 20
ततस्तस्य वच: श्रुत्वा श्रद्दधाना वराड़ना: । श्वशुरं समनुज्ञाप्य विविशुर्जाह्नवीजलम्
तब उसका वचन सुनकर श्रद्धा से युक्त वे श्रेष्ठ स्त्रियाँ अपने श्वशुर से अनुमति लेकर जाह्नवी (गंगा) के जल में प्रविष्ट हो गईं।
Verse 21
विमुक्ता मानुषैर्देहेस्ततस्ता भर्तृभि: सह | समाजग्मुस्तदा साध्व्य: सर्वा एव विशाम्पते,प्रजानाथ! वहाँ वे सभी साध्वी स्त्रियाँ मनुष्य-शरीरसे छुटकारा पाकर अपने-अपने पतिके साथ जा मिलीं
हे प्रजानाथ! तब वे सभी साध्वी स्त्रियाँ मनुष्य-देह से मुक्त होकर अपने-अपने पतियों के साथ जा मिलीं।
Verse 22
एवं क्रमेण सर्वास्ता: शीलवत्य: पतिव्रता: । प्रविश्य क्षत्रिया मुक्ता जम्मुर्भतसलोकताम्
इस प्रकार क्रमशः वे सब शीलवती, पतिव्रता क्षत्रिय-स्त्रियाँ अग्नि में प्रवेश कर देह-बन्धन से मुक्त हुईं और अपने-अपने पतियों के लोक को प्राप्त हो गईं।
Verse 23
इस प्रकार क्रमश: वे सभी शीलवती पतिव्रता क्षत्राणियाँ इस शरीरसे मुक्त हो पतिलोकको चली गयीं ।।
वैशम्पायन बोले—इस प्रकार क्रमशः वे सब शीलवती, पतिव्रता क्षत्रिय-स्त्रियाँ देह त्यागकर अपने पतियों के लोक को चली गईं। वे दिव्य रूप से युक्त, दिव्य आभूषणों से भूषित, दिव्य माला और दिव्य वस्त्र धारण किए हुए, अपने पतियों के समान ही तेजस्वी हो गईं।
Verse 24
ता: शीलगुणसम्पन्ना विमानस्था गतक्लमा: । सर्वा: सर्वगुणोपेता: स्वस्थानं प्रतिपेदिरे
शील और सद्गुण से सम्पन्न वे सब क्षत्रिय-बालाएँ विमान पर आरूढ़ होकर, समस्त क्लेश से रहित और सर्वगुणों से अलंकृत, अपने-अपने योग्य स्थान को प्राप्त हो गईं।
Verse 25
यस्य यस्य तु यः कामस्तस्मिन् काले बभूव ह | त॑ तं विसृष्टवान् व्यासो वरदो धर्मवत्सलः,उस समय जिसके-जिसके मनमें जो-जो कामना उत्पन्न हुई, धर्मवत्सल वरदायक भगवान् व्यासने वह सब पूर्ण की
उस समय जिसके-जिसके हृदय में जो-जो कामना उत्पन्न हुई, धर्मवत्सल वरदायक व्यास ने वह-वह सब पूर्ण कर दी।
Verse 26
तच्छुत्वा नरदेवानां पुनरागमनं नराः | जह्वषुर्मुदिताश्नासन् नानादेशगता अपि,संग्राममें मरे हुए राजाओंके पुनरागमनका वृत्तान्त सुनकर भिन्न-भिन्न देशके मनुष्योंको बड़ा आश्चर्य और आनन्द हुआ
नरदेवों (राजाओं) के पुनरागमन का समाचार सुनकर, भिन्न-भिन्न देशों के लोग भी हर्षित और मुदित हो उठे।
Verse 27
प्रियेः समागम॑ तेषां यः सम्यक् शृणुयान्नर: । प्रियाणि लभते नित्यमिह च प्रेत्य चैव सः
वैशम्पायन बोले—जो मनुष्य उन प्रियजनों के समागम का यह वृत्तान्त श्रद्धा और एकाग्रता से सुनता है, वह इस लोक में भी और परलोक में भी सदा प्रिय वस्तुएँ प्राप्त करता है।
Verse 28
इष्टबान्धवसंयोगमनायासमनामयम् | यश्चैतच्छावयेद् विद्वान् विदुषो धर्मवित्तम:
यह (वृत्तान्त) इष्ट बन्धुओं से अनायास और निरामय मिलन कराता है। और जो विद्वान् इसे सुनवाता है—वह धर्म का ज्ञाता—विद्वानों में श्रेष्ठ होता है।
Verse 29
स यशः प्राप्तुयाल्लोके परत्र च शुभां गतिम् । इतना ही नहीं
वह इस लोक में यश प्राप्त करेगा और परलोक में शुभ गति को प्राप्त होगा।
Verse 30
साध्वाचारा दमोपेता दाननिर्धूतकल्मषा: । ऋजव: शुचय: शान्ता हिंसानृतविवर्जिता:
जो सत्कर्म में स्थित, दम-निग्रह से युक्त, दान से पाप-कल्मष धो चुके, सरल, शुद्ध, शान्त और हिंसा तथा असत्य से रहित हैं—
Verse 31
आस्तिका: श्रद्धधानाश्न धृतिमन्तश्न मानवा: । श्रुत्वा$5श्चर्यमिदं पर्व हवाप्स्यन्ति परां गतिम्
हे भारत! जो मनुष्य आस्तिक, श्रद्धालु और धैर्यवान् हैं, वे इस आश्चर्यजनक पर्व को सुनकर परम गति को प्राप्त करेंगे।
Verse 33
इति श्रीमहा भारते आश्रमवासिके पर्वणि पुत्रदर्शनपर्वणि स्त्रीणां स्वस्वपतिलोकगमने त्रयस्त्रिंशो 5 ध्याय:
इस प्रकार श्रीमहाभारत के आश्रमवासिकपर्व के अंतर्गत पुत्रदर्शनपर्व में स्त्रियों के अपने-अपने पति के लोक में गमन-विषयक तैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।
Verse 66
असौहदं परित्यज्य सौहृदे पर्यवस्थिता: । भरतभूषण! वे समस्त योद्धा एक-दूसरेसे मिलकर बड़े प्रसन्न हुए। इस प्रकार मुनिकी कृपासे वे सभी क्षत्रिय अपने क्रोधको भुलाकर शत्रुभाव छोड़कर परस्पर सौहार्द स्थापित करके मिले
वैशम्पायन बोले— हे भरतवंश-भूषण! वैरभाव को त्यागकर वे सब योद्धा परस्पर सौहार्द में स्थित हो एक-दूसरे से मिले और अत्यन्त प्रसन्न हुए। इस प्रकार मुनि की कृपा से उन सब क्षत्रियों ने क्रोध भुलाकर शत्रुता छोड़ दी और आपस में मेल-मिलाप स्थापित करके एकत्र हुए।
Verse 73
पुत्रैश्न पुरुषव्याप्रा: कुरवो<न्ये च पार्थिवा: । इस तरह वे सब पुरुषसिंह कौरव तथा अन्य नरेश गुरुजनों, बान्धवों और पुत्रोंके साथ मिले
वैशम्पायन बोले— इस प्रकार पुरुषार्थ में प्रवृत्त वे कौरव तथा अन्य नरेश अपने गुरुजनों, बान्धवों और पुत्रों के साथ मिलकर एकत्र हुए।
Verse 86
मेनिरे परितोषेण नृपा: स्वर्गसदो यथा । सारी रात एक-दूसरेके साथ घूमने-फिरनेके कारण उन सबके मनमें बड़ी प्रसन्नता थी। स्वर्गवासियोंके समान ही उन्हें वहाँ परम संतोषका अनुभव हुआ
वैशम्पायन बोले— वे नरेश परम संतोष से ऐसे तृप्त हुए मानो स्वर्गवासी हों। सारी रात परस्पर साथ घूमते-फिरते रहने से उनके मन हर्ष से भर गए और वहाँ उन्हें परम संतोष का अनुभव हुआ।
Verse 103
मुर्दे परमिकां प्राप्प नायों दुः:खमथात्यजन् । वहाँ आयी हुई स्त्रियाँ अपने पिताओं, भाइयों, पतियों और पुत्रोंसे मिलकर बहुत प्रसन्न हुईं। उनका सारा दुःख दूर हो गया
वैशम्पायन बोले— परम अवस्था को प्राप्त होकर उन्होंने फिर शोक का परित्याग कर दिया। वहाँ आई हुई स्त्रियाँ अपने पिता, भाई, पति और पुत्रों से मिलकर अत्यन्त प्रसन्न हुईं; उनका समस्त दुःख दूर हो गया।
Verse 116
आमन्त्रयान्योन्यमाश्लिष्य ततो जम्मुर्यथागतम् । वे वीर और उनकी वे तरुणी स्त्रियाँ एक रात साथ-साथ विहार करके अन्तमें एक- दूसरेकी अनुमति ले परस्पर गले मिलकर जैसे आये थे, उसी प्रकार चले जानेको उद्यत हुए
वे वीर और उनकी वे तरुणी स्त्रियाँ एक रात साथ-साथ विहार करके, अन्त में परस्पर अनुमति लेकर और एक-दूसरे को गले लगाकर, जैसे आये थे उसी मार्ग से लौट जाने को उद्यत हुए।
Verse 133
सरथा: सध्वजाश्रैव स्वानि वेश्मानि भेजिरे | तब मुनिवर व्यासजीने उन सब लोगोंका विसर्जन कर दिया और वे महामना नरेश एक ही क्षणमें सबके देखते-देखते पुण्यसलिला भागीरथीमें गोता लगाकर अदृश्य हो गये। रथों और ध्वजाओंसहित अपने-अपने लोकोंमें चले गये
तब मुनिवर व्यासजी ने उन सब लोगों का विसर्जन कर दिया। वे महामना नरेश रथों और ध्वजाओं सहित अपने-अपने लोकों को चले गये; और सबके देखते-देखते एक ही क्षण में पुण्यसलिला भागीरथी में गोता लगाकर अदृश्य हो गये।
Verse 163
आज शम्मुस्ते महात्मान: सवाहा: सपदानुगा: । कितने ही राक्षसों और पिशाचोंके लोकोंमें चले गये और कितने ही उत्तरकुरुमें जा पहुँचे। इस प्रकार सबको विचित्र-विचित्र गतियोंकी प्राप्ति हुई थी और वे महामना वहींसे देवताओंके साथ अपने-अपने वाहनों और अनुचरोंसहित आये थे
आज वे महामना अपने-अपने वाहनों और अनुचरोंसहित चले गये—कितने ही राक्षसों और पिशाचों के लोकों में, और कितने ही उत्तरकुरु में जा पहुँचे। इस प्रकार सबको विचित्र-विचित्र गतियाँ प्राप्त हुईं; और वे वहीं से देवताओं के साथ अपने-अपने वाहनों और अनुचरोंसहित आये थे।
The implicit dilemma is how royal identity should be carried after catastrophic conflict: the Pāṇḍavas must remain publicly accountable as rulers while inhabiting an environment oriented to renunciation and restraint.
The scene teaches that social order after crisis depends on accurate testimony, disciplined speech, and respectful protocol—recognition is not mere curiosity but a stabilizing act of public truth.
No explicit phalaśruti is presented in these verses; the chapter’s meta-function is archival—preserving a formal catalog of persons and relations to situate the post-war community within the āśrama narrative continuum.