देवैर्विष्णोः शरणागमनम्—शिवलिङ्गस्थापनं, शिवसहस्रनामस्तवः, सुदर्शनचक्रप्रदानं च
नित्यो नियतकल्याणः पुण्यश्रवणकीर्तनः दूरश्रवा विश्वसहो ध्येयो दुःस्वप्ननाशनः
nityo niyatakalyāṇaḥ puṇyaśravaṇakīrtanaḥ dūraśravā viśvasaho dhyeyo duḥsvapnanāśanaḥ
वह नित्य हैं; जिनका कल्याण नियत और अच्युत है। जिनका श्रवण और कीर्तन स्वयं पुण्य है। जिनकी कीर्ति दूर तक फैलती है; जो विश्व का भार सहते हैं। वे ध्येय हैं, और दुःस्वप्नों का नाश करने वाले हैं—अशुभ संकेतों और उनसे उत्पन्न भय को हरने वाले।
Suta Goswami (narrating Shiva’s names to the sages of Naimisharanya)