देवैर्विष्णोः शरणागमनम्—शिवलिङ्गस्थापनं, शिवसहस्रनामस्तवः, सुदर्शनचक्रप्रदानं च
शुभाङ्गो लोकसारङ्गो जगदीशो ऽमृताशनः भस्मशुद्धिकरो मेरुर् ओजस्वी शुद्धविग्रहः
śubhāṅgo lokasāraṅgo jagadīśo 'mṛtāśanaḥ bhasmaśuddhikaro merur ojasvī śuddhavigrahaḥ
जिनके अंग शुभ हैं; जो लोक-सार के सारङ्ग (मृग) की भाँति सर्वत्र विचरते हुए भी असंग हैं; वे जगदीश्वर हैं, अमृत के आस्वादक हैं। वे भस्म से शुद्धि करने वाले, मेरु-सम अचल आधार, तेजस्वी और परम शुद्ध विग्रह वाले हैं।
Suta Goswami (reciting the Shiva Sahasranama to the sages of Naimisharanya)